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शनिवार, अगस्त 06, 2022

मानसून में मत्स्य पालकों की स्थिति और संचालित योजनाओं का प्रभाव

मत्स्य पालन संबंधी योजनाओं को हितधारकों तक पहुंचाने से होगी विकास की डोर मजबूत

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार के अध्ययनकर्ता हैं)

बृजेन्द्र कुमार वर्मा 

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मछलियों के प्रजनन और मछली स्टॉक के संरक्षण के लिए तमिलनाडु की राज्य सरकार प्रजनन काल में मछुवारों को गहरे समुद्र में जाने के लिए रोकती है। इस साल भी परिस्थितियों के अनुसार राज्य सरकार ने मत्स्य पालन नियमन अधिनियम, 2001 के प्रावधानों के तहत प्रतिबंध लागू किया जो 15 अप्रैल 2022 से 14 जून तक रखा गया। जो मछुवारे मशीन नौकाओं का प्रयोग करते हैं, वे प्रतिबंध काल में गहरे समुद्र में नहीं जा सकते, यद्यपि पारंपरिक और देशी नौकाओं को छूट है। मत्स्य पालकों के लिए ये तीन महीने आर्थिक स्थिति के लिए काफी कठिन होते हैं। छोटे किसानों के लिए कभी-कभी संकट का समय भी आ जाता है। यही कारण है कि केन्द्र सरकार व राज्य सरकार इनके लिए कोई न कोई योजनाओं का लाभ देकर इनका संरक्षण करती है। प्रतिबंध के दौरान तमिलनाडु सरकार ने प्रत्येक मछुआरे को मासिक सहायता 6,000 रुपए दिए।

मत्स्य पालन भी भारत में भोजन, रोजगार और आय का महत्वपूर्ण स्त्रोत है। यह क्षेत्र लगभग 1.60 करोड मछुआरों तथा मत्स्य पालक किसानों को प्राथमिक स्तर पर आजीविका प्रदान करता है। इनमें अधिकतर वे मछुवारे हैं, जोकि आर्थिक रूप से पिछड़े एवं कमजोर वर्ग के हैं। भारत सरकार ने भी इनके कल्याण पर ध्यान दिया ताकि कमजोर वर्ग के मुछवारों को सशक्त बनाया जा सके। इस ध्यान में रखते हुए मत्स्य, पशु पालन एवं डेयरी मंत्रालय के मत्स्य पालन विभाग ने 2015 से 2020 तक 5 वर्ष के लिए राष्ट्रीय मछुआरा कल्याण योजना चलाई। वर्तमान में मत्स्य पालन विभाग प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना चला रहा है।

योजना की बात करें तो आंकड़ों के अनुसार इसमें 2020 से 2025 के बीच 5 वर्ष के लिए लगभग 20050 करोड़ रुपए का अब तक का सर्वाधिक निवेश किए जाने की संभावना है। इस निवेश को मत्स्य पालन क्षेत्र को टिकाऊ बनाने में लगाया जाएगा, साथ ही मत्स्य पालन किसानों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण में भी खर्च किया जाना है। जब मछुआरों का समुद्र में प्रवेश प्रतिबंधित होता है अथवा जिस अवधि में मछलियां बहुत कम मिलती हैं, उस दौरान मत्स्य किसानों की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है। ऐसे में सरकार प्रत्येक मछुवारे को आर्थिक सहायता प्रदान करना आवश्यक हो जाता है।

            मुछवारों के लिए चलाई जा रही योजनाओं में सिर्फ आर्थिक सहायता ही शामिल नहीं होती, अपितु बीमा आदि का भी प्रावधान होता है। राज्य अथवा केन्द्र सरकार के द्वारा दिए जाने वाले बीमा में दुर्घटना में हुई मृत्यु अथवा स्थाई पूर्ण अपंगता होने पर 5 लाख रूपये, स्थाई आंशिक अपंगता होने पर 2.5 लाख रूपये और दुर्घटना होने पर अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में 25000 रूपये बीमा के जरिए प्रदान किया जाता है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना में फरवरी 2022 तक इस योजना के क्रियान्वयन पर केंद्र के हिस्से के रूप में 369.55 करोड रुपए की राशि खर्च की जा चुकी है।

            आंकड़े हमेशा अच्छे लगते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। पिछले साल 2021 में तमिलनाडु में मछुवारा संगठन भारतीय समुद्री मत्स्य पालन विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और रैलियां कर रहे थे। तमिलनाडु-पुडुचेरी मछुवारा संघ ने जोर-शोर से विधेयक की खिलाफत की थी।

यद्यपि यह भी आवश्यक है कि प्रजनन काल में मछलियों को न पकड़ा जाए, और साथ ही इस काल के दौरान मछुवारों को उनके क्षेत्र में नहीं जाना चाहिए। लेकिन कुछ असामाजिक तत्व सरकार की बात नहीं सुनती और कानून का उल्लंघन करती है। ऐसे में जब काननू बनता है, तो उसके दायरे में कमजोर तबके के मत्स्य पालन किसान भी आ जाते हैं। कमजोर तबके के किसान इस प्रतिबंध काल में आर्थिक संकट को झेलने के लिए विवश हो जाते हैं। जब कभी कोई मछुआरा प्रावधानों के तहत प्रतिबंध आदेश का उल्लंघन करता है, तो मशीनीकृत नाव मछुआरों के खिलाफ नावों के लाइसेंस रद्द करने तक जैसी कार्यवाही की जाती है। इसमें प्रवर्तन एजेंसियां, भारतीय तटरक्षक, तमिलनाडु मरीन पुलिस और मत्स्य विभाग आदि की नजर रहती है। प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय मानकों और प्रक्रियाओं के अनुरूप होते हैं। इस प्रकार के प्रतिबंध अमरीका, स्पेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी हर साल लगाए जाते हैं। भारत में यह नियम पहली बार केरल में लागू हुआ था।

मानसून काल में मछलियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है, जिस प्रकार से मछुवारों को आर्थिक संरक्षण दिया जाता है, उसी प्रकार से मछलियों के लिए भी सरकार को संरक्षण के लिए निर्णय लिया जाना चाहिए, जोकि समुद्र में जाने के प्रतिबंध से अलग हो। क्योंकि कानून बनाने के बावजूद भी कुछ असामाजिक तत्व मछलियां पकड़ते ही हैं, जिन पर आए दिन कार्यवाही होती है। समुद्री मछली संरक्षण के अलावा तालाबों में मछली पालन को बढ़ावा दिया जा सकता है, जिसके लिए जागरूकता की अति आवश्यकता होगी। मानसून में भारत की लगभग आधी आबादी बाढ़ जैसे हालातों से गुजर रही है। यही पानी का यदि संरक्षण किया जाए, तो यह बरसात का पानी मछलियों की जनसंख्या के लिए अमृत सिद्ध हो सकता है। इसके अलावा बड़े तालाबों, झीलों, नहरों के निर्माण से रोजगार का भी सजृन होगा और साथ ही मत्स्य पालकों को भी इस ओर आकर्षित किया जा सकेगा। भारत में प्रधानमंत्री ने स्टार्ट-अप की रूप रेखाओं के आधार पर युवाओं को इस ओर आकर्षित किया है। ऐसे में युवाओं को मत्स्य पालन की ओर भी व्यवसाय की दृष्टि से आकर्षित किया जा सकता है। तालाबों का निर्माण, निजी जमीन पर तालाबों के लिए सब्सिडी जैसी सहायता, मत्स्य पालन जागरूकता अभियान इसमें सहायक हो सकते हैं। हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं से नीली क्रांति लायी गयी थी। इस नीली क्रांति से कई लक्ष्यों को प्राप्त किया गया था। आज बारिश के पानी को बचाना बेहद आवश्यक है, क्योंकि इससे लगातार कम हो रहे जमीनी पानी को रोका जा सकता है, लेकिन साथ ही अधूरे पड़े, अव्यवस्थित हो चुके तालाबों के पुनर्निमाण, सुधार, मरम्मत, जीर्णाद्धार करना आवश्यक है। ऐसा करने पर ही राज्य, केन्द्र द्वारा चलाए जा रहे मत्स्य संबंधी विभिन्न योजनाओं को सफल किया जा सकता है, साथ ही समुद्री क्षेत्र से दूर स्थित मैदानी क्षेत्रों में भी आसानी से मत्स्य बाजार को बढ़ाया जा सकता है। यही मत्स्य पालन किसानों और क्षेत्रीय विकास के लिए उत्तम प्रयास होगा।

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