सीखने के लिए मैंने हर जख्म सींचे हैं, पढ़ना है दर्द मेरा तो सब लिंक नीचे हैं

मंगलवार, अप्रैल 28, 2020

सोशल मीडिया पर सवाल उठाना कितना सही ?

जो छात्र छात्राएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं या कर चुके हैं, शिक्षक बनना चाहते हैं या बन चुके हैं, वे हो सके तो अपना अध्ययन शेयर करें, उन्होंने क्या विशेष सीखा जो वे समाज को देना चाहते हैं. 

अभी तमाम लोग सोशल मीडिया से जुड़े हैं, ऐसे में ज्ञानार्जन कर रहे विद्यार्थी अपनी कोई विशेष योगता शेयर कर लोगों को ज्ञान विज्ञान आदि की जानकारी दे सकते हैं. समाज के आधी जनता भी चाहे तो सोशल मीडिया का उच्चतम उपयोग किया जा सकता है. सिर्फ ये कह देना की सोशल मीडिया जहर फैला रहा है... फलां फलां कर रहा है, इससे कुछ नहीं होगा. 

सोशल मेदिय अभी कोरे कागज की तरह होता है. आप उस पर कुछ भी शेयर कर सकते हैं. जैसे एक कलाकार, केनवास पर कुछ भी चित्र उकेर सकता है, जैसे कुम्हार मिट्टी से कोई भी बर्तन बना सकता है, ऐसे भी सोशल मिडिया का उपयोग उपयोगकर्ता कैसे भी कर सकता है... ज्ञान वर्धक जानकारी देकर या फिर जहरीली बातें शेयर करके.... आप माध्यम को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते... माध्यम को उपयोग करने वालो पर सवाल जरूर उठा सकते हैं.

जैसे, युद्ध में बन्दूक से दुश्मन को मारे तो सही लेकिन उसी बन्दूक से किसी अन्य को मार दें तो इसमें बन्दूक पर सवाल नहीं उठा सकते. वह तो सिर्फ एक उपकरण है. बिलकुल इसी तरह से आप सोशल मीडिया पर सवाल नहीं उठा सकते क्योंकि ये एक माध्यम है लोगो से, समूह से जुड़ने का. अब चाहे इसका सही उपयोग किया जाए या गलत. 

रविवार, अप्रैल 12, 2020

"social distancing" शब्द होना चाहिए या "physical distancing"


क्या सच में "social distancing" शब्द होना चाहिए या "physical distancing" covid-19 वायरस ने लोगों के बीच दूरी बना दी है, जिन्दा रहना है तो दूर रहना ही पड़ेगा, सामाजिकता तो वो प्यार मोहब्ब्बत है जो भारत में न कभी खत्म हुयीं न होगी.
हजारों सालों से मनुष्य ने दुनिया पर राज किया और ऐतिहासिक विकास किया है. मनुष्य ने इतना विकास कर लिया है कि कई वैज्ञानिकों ने तो अब ये ढूँढना शुरू कर दिया है की मनुष्य ने अपना विकास आखिर कहाँ से शुरू किया था. खेर ये तो बातें बाद में करेंगे. अब वापस आते हैं टॉपिक पर. किसी भी राष्ट्र में मीडिया के खासी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. और इसका गंभीरता को समझना पड़ेगा.
शुरू में अमेरिका भी कोरोना को मजाक में ले रहा था और चीन पर मजाकिया टिप्पणियां कर रहा था, आज अमेरिका कोरोना से विश्व में सबसे अधिक प्रभावित है.
इस बीच भारत में "सामाजिक दूरी" पर जोर दिया जा रहा है, भारत हजारो वर्षों से बहुत ही सोम्य रहा है, इसका फायदा अक्सर विदेशियों ने उठाया और कई बार भारत को गुलाम बनाने का प्रयास किया. असल में भारत की यही सोम्यता और सहजता उसके लिए शक्ति भी साबित होती है. तमाम कोशिशों के बावजूद लोगों ने समाज से दूरी नहीं बनायी, हाँ शारीरिक दूरी बनायी हुई है क्योंकि कोरोना वायरस 19 को हराना है. हमारे वरिष्ठ चिंतकों को सोचना होगा और अपील भी करनी होगी कि शरीरिक दूरी बनानी है न कि सामाजिक दूरी. सामाजिकता तो मनुष्य के रहन सहन, खान पान, पहनावा, बोल चाल, व्यवहारिक जुड़ाव, विभिन्न परम्पराओं के अनुसार तय होती है, जो फ़िलहाल कोरोना से प्रभावित नहीं है, प्रभावित है तो वो है स्वास्थ्य.
आज भी लोगों का व्यवहार वैसा ही है जैसा कोरोना के फैलने से पहले था... जहर फैलाने वाले कोरोना से पहले भी किसी न किसी विषय को लेकर जहर फैला रहे थे सो आज भी फैला रहे हैं.
अपना ध्यान रखें. सुरक्षित रहें. दूसरों को भी सुरक्षित रखें.

गुरुवार, अप्रैल 02, 2020

देश के हर जिले में हो "जिला पत्रकार अधिकारी"

जैसे हर जिले में हर विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी होता है, अब वैसे ही पत्रकारिता के स्तर को ठीक करने के लिए एक जिले का जिला पत्रकार अधिकारी बनाने की जरूरत है जो सीधे केंद्र का प्रतिनिधित्व करे. जैसे जिला कलेक्ट्रेट, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला आबकारी अधिकारी, जिला स्वास्थ्य अधिकारी, जिला आपूर्ति अधिकारी, जिला विद्युत् अधिकारी आदि, वैसे ही अब जरूरत है कि पत्रकारिता में भी जिला स्तर कर सबसे बड़ा पद का सर्जन किया जाए जो जिला पत्रकार अधिकारी हो, जिसकी जिम्मेवारी प्रेस और मीडिया से संबधित सभी कार्यों की जिम्मेवारी हो.

एक महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस से सम्बंधित यह भी लेना होगा कि प्रेस से संबधित हर क्षेत्र में सरकारी/प्राइवेट नौकरियों कासृजन किया जाए. देश सभी जिलों में जिला प्रत्रकार हो. इसकी जिम्मेवारी होगी की यह जिले से प्रकाशित हर खबर पर नजर रखे और यदि कोई पत्रकार गलत  खबर लिखता है या अन्धविश्वासी खबर हो तो तत्काल उस पर कार्यवाही कर सके. उसे बर्खास्त कर सके. उसका वेतन रोकना आदि जैसे अधिकार उसे प्राप्त हों.  अभी इस तरह की जिम्मेवारी जिला कलेक्टर के पास है. 

जिले का जिम्मेवार हो 
जब जिले में आपूर्ति सम्बन्धी कोई कमी होती है या शिकायत होती है तो जिले का आपूर्ति विभाग का जिला अधिकारी कार्यवाही करता है, जब किसी स्कूल में कोई घटना घटती है तो उसका जिम्मेवार जिला शिक्षा अधिकारी होता है. ऐसे ही अब जिला पत्रकार अधिकारी होना चाहिए जो जिले के प्रत्येक पत्रकार का और उसकी ख़बरों का जिम्मेवार हो. 

देश के हर जिले के हर विभाग में एक पत्रकार हो 
अब वक़्त आ गया कि जिले में कार्यरत हर विभाग में एक पत्रकार की पोस्ट होनी ही चाहिए. इससे होगा ये तमाम सूचनाओं से संबधित कार्य विभाग का पत्रकार करेगा. अभी होता ये है की बिजली कट गयी तो फ़ोन बिजली विभाग के सीधे अधिकारी को कर देते हैं, जबकि अधिकारी से पास पहले से ही बहुत काम होता है, ये अधिकारी अपना विषय पढ़कर आते हैं, जनसंचार की पढाई करने वाला ही जानता है कि जनता से जन संचार कैसे किया जाए. 

आज कल अधकारियों के प्रति, पुलिस के प्रति, राजनेताओं के प्रति जनता में अराजकता का भाव आ रहा है. यह और कुछ नहीं, सिर्फ और सिर्फ जन संचारकों की कमी की वजह से है. 

मंत्री, सांसद, विधायक को दिया जाए पत्रकार
हर मंत्री, सांसद, विधायक की टीम में सरकारी मीडिया कर्मी होना चाहिए जिसके पास जन संचार की डिग्री हो, जो जनता और जन प्रतिनिधि के बीच में पुल का काम करे. अभी तक यह काम वे लोग करते हैं जो जन संचार को कभी पढ़े भी नहीं होंगे. ऐसे में जन प्रतिनिधि और जनता के बीच जो खायी है उसे भरना बहुत मुश्किल है, जनता अपने जनप्रतिनिधि से मिल नहीं पाती, इस खायी को सिर्फ एक पत्रकार ही भर सकता है. एक विकासशील देश के लिए ऐसी खायी विकास में बड़ी रुकावट की तरह है. 

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग नाकाफी 
हमारे देश में हर जिले में, बाकी तीनो स्तंभों से जुड़े अधिकारी/प्रतिनिधि मिलते हैं लेकिन, विभागों में पत्रकार नहीं मिलते. हालाँकि जिले में जनसंपर्क विभाग होता है, जिसे देश की 3 तिहाई आबादी जानती तक नहीं. और बाकी विभागों में जनसंपर्क विभाग वह व्यक्ति संभालता है जिसने कभी जन संपर्क नहीं पढ़ा होता. रेलवे, बस अड्डे में जाइये और उनके बात करने का लहजा देखिये और उसे रिकॉर्ड करके लोगों को सुनाइए और चर्चा कीजिये. अस्पतालों में भी जनसंपर्क का काम कोई डॉक्टर ही देखता है. ऐसे में प्रेस की गंभीरता को समझना चाहिए. हालांकि कई जगह अब एक पोस्ट के लिए पत्रकारिता में डिग्री मांगने लगे है, लेकिन ये क्षद्म स्तर पर ही है. 

प्रेस/मिडिया में भर्ती के समय नहीं होती मानसिक परीक्षा
जब आई0आई0टी0, आई0आई0एम० या छोटे संस्थानों से भी कोई प्लेसमेंट होता है तो उनका फिटनेस सर्टिफिकेट भी माँगा जाता है. लेकिन अख़बारों और मीडिया में ऐसा देखने को नहीं मिलता. जबकि प्रेस/मीडिया में जिसे नौकरी दी जा रही है उसका मानसिक संतुलन अवश्य चेक करना चाहिए. हमारे देश की जनसँख्या 1,30,00,00,000 से भी ज्यादा है, ऐसे में यहाँ के पत्रकारों की मानसिक स्थिति कैसी है इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए.  क्योंकि इसका सीध असर देश पर ही पड़ता है.

समय समय पर हो पत्रकारों की काउन्सलिंग 
आपने सुना होगा समय समय पर अधिकारीयों के लिए कार्यशाला आयोजित की जाती है, जिसमें उन्हें उनके काम के दवाब के साथ कैसे समायोजन करना है, अपना ध्यान रखना है आदि सिखाया जाता है. लेकिन पत्रकारिता में ऐसा शायद ही कहीं होता हो. अभी हाल ही में दलित दस्तक के सम्पादक ने भरत रत्न बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर के प्रथम अख़बार "मूकनायक" एक 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजन किया था, जिसमे देश भर के पत्रकार, समाज चिंतक आदि को आमंत्रित किया गया था, जिसमें पत्रकारिता से सम्बंधित चर्चा भी हुयी. कई राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय अखबार समय समय पर कार्यक्रम आयोजित करती है जिसमें आम जनता की भी सहभागिता होती है लेकिन, देखा जाए तो विशेष तौर पर सिर्फ पत्रकारों से सम्बंधित कोई विशेष कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाता जिसमें उनके स्वास्थ्य सम्बन्धी, मानसिक या किसी भी प्रकार की काउंसलिंग नहीं की जाती. सवा सौ करोड़ की जनता के लिए विभिन्न राज्यों में विभिन्न अखबार प्रकाशित न्यूज़ चैनल प्रसारित किये जा रहे हैं, लेकिन उनके लिए काम करने वालो की परिस्थितियों पर किसी प्रकार की चर्चा नहीं होती.

पत्रकार अब समाजसेवी नहीं एक पद है. 
ऐसा इसलिए है कि अभी तक पत्रकार को समाज सेवी समझा जा रहा है, लेकिन भारत के वैश्विक होने के बाद अब ऐसा नहीं रहा. पत्रकार भी किसी न किसी संसथान से जुड़ा होता है, जिसमें किसी कंपनी की तरह के ही नियम लागू होते हैं. जैसे एक कर्मचारी एक कंपनी में काम करता है तो वह दूसरी कंपनी में काम नहीं कर सकता. दोहरी आमदनी का काम नहीं करेगा. कंपनी में किये जाने वाले काम की जानकारी सार्वजनिक नहीं करेगा आदि. इसी तरह से पत्रकार पर भी कुछ नियम लागू होते हैं, वह अपने संस्थान के लिए लिखी खबर को अन्य अखबार को न देगा, न बेचेगा. दो अखबारों में काम नहीं कर सकता. पत्रकारिता की नौकरी के साथ कोई अन्य काम नहीं कर सकता. टैक्स के दायरे में आएगा.
अब जबकि एक पत्रकार कानूनी नियमों का पालन कर रहा है तो उसे समाज सेवी नहीं समझना चाहिए. उसकी एक पोस्ट होती है, उसका भी प्रोमोशन होता है, यदि कोई समाज सेवी है तो वह आजीवन समाज सेवी ही रहेगा. समाजसेवियों का कोई प्रोमोशन नहीं होता. तमाम तर्क यह सिद्ध करते हैं की पत्रकार को समाज सेवी नहीं मन जाना चाहिए, वह एक व्यावसायिक नौकरी (प्रोफेशनल जॉब) है, जिसमें काम के बदले निर्धारित आय प्राप्त होती है. पत्रकार के पास अपे संस्थान का पहचान पत्र (आई0डी0) होता है, जैसे अन्य कंपनी अपने कर्मचारी को देती हैं. वह भी टैक्स भरता है.

पत्रकरों की भी लिखी जानी चाहिए CR 
जिस तरह से तमाम अधिकारियों की CR (चरित्र रजिस्टर) लिखी जाती है, बिल्कुल वैसे ही पत्रकारों की CR लिखी जानी चाहिए, इससे उनमें डर बना रहेगा कि गलत खबर दिखाने पर उनके चरित्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा. एक दो अख़बारों को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई अख़बार गलती प्रकाशित हो जाने पर माफ़ी मांगता है.
जिस देश में धार्मिक कट्टरता, पाखण्डवाद, सैकड़ों जातियां, अन्धविश्वास जैसी चीजों से जड़ें जमा रखी हों, वहां एक छोटी सी गलती नरसंहार, दंगे, झगड़े-फसाद, जातिगत हिंसा आदि करवा देती है, जिसके कई उदहारण हमारे सामने हैं.  ऐसे में पत्रकारिता की जिम्मेवारी बहुत ही गंभीर हो जाती है.

नये प्रेस आयोग की हो स्थापना 
भारत की आज़ादी के कुछ समय बाद 1952 में प्रेस आयोग की स्थापना की गयी थी, फिर 1978 में, जिसे दोबारा गठित किया 1980 में. ऐसे में 40 साल हो रहे हैं.
इन चालीस सालों में 2 पीढ़ी जवान हो गयीं हैं, टीवी रंगीन हो गये हैं, अख़बारों के पन्ने बढ़ गये, छपाई की गुणवत्ता बेहतर हो गयी, रेडियो में एफ0एम0 भी जुड़ गया, तकनीकी जबर्दस्त तरीके से फैली. हर काम कंप्यूटर से होए लगे. मोबाइल के रूप में दुनिया मुट्ठी में आ गयी. भारत खुली अर्थव्यवस्था बन गया.
इतना सब कुछ बदल जाने के बाद अब नये प्रेस आयोग का गठन होना जरूरी हो गया है. जीवन का तरीका बदला है, नजरिया बदला है, पहनावा, खान पान, व्यवहार आदि में भी परिवर्तन है ऐसे में पत्रकारिता भी बदली है.
इस बदली पत्रकारिता के लिए नये आयोग को आना चाहिए और नये ज़माने और लगातार परिवर्तित होती तकनीकी के अनुसार नियमन कर करना चाहिए.



सोमवार, मार्च 30, 2020

पत्रकारिता को 10वीं 12वीं में क्यों पढ़ाया जाय

संविधान के चार स्तम्भ हैं और माध्यमिक और उच्च माध्यमिक में सिर्फ 3 स्तंभों (न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका) बारे में कुछ न कुछ पढ़ाया ही जाता है, लेकिन जब बात आती है चौथे स्तम्भ  पत्रकारिता की तो इसकी तरफ कोई ध्यान नहीं जाता, जबकि चौथा स्तम्भ असीम संभावनाओं का भण्डार है.

जबकि होना ये चाहिए कि देश में सबसे अधिक पढाई और सजगता इस स्तम्भ के प्रति होनी चाहिए. प्रेस को फ्री कर देने से इसका नाजायज फायदा भी उठाया जाता है जो आजादी के बाद से होता आ रहा है. सर्वाधिक विविधता प्रेस के पाठ्यक्रम को लेकर होनी चाहिए. प्रेस की पढाई माध्यमिक से जरूर शुरू कर देनी चाहिए. उच्च माध्यमिक में और विविधता के साथ पढ़ाया जाना चाहिए, विषय के रूप में पढ़ाये तो और अच्छे निष्कर्ष आयेंगे.
चूँकि, प्रेस की पढ़ाई स्नातक से होती है तो ऐसे में प्रेस के पाठ्यक्रम से जुड़ाव जल्दी नहीं होता, प्रेस का पाठ्यक्रम भी बहुत छोटा और दूसरे विषयों से लिए उधार पर टिका होता है, ऐसे में प्रेस की जो गंभीरता आनी चाहिए वह आ नहीं पाती.
करोड़ों की जनसँख्या वाले भारत देश में प्रेस/मीडिया में अन्धविश्वास या आध्यात्म ज्यादा दिखाई देता है और विज्ञानं की कमी देखी जाती है. आज भी भारत में तमाम न्यूज़ चैनल ऐसे हैं जो भविष्य फल, धार्मिक स्थलों का रहस्य, धार्मिक प्रवचन आदि दिखाते हैं, जबकि उतनी मात्रा में संविधान या क़ानून की जानकारी या विज्ञान या तकनीकी की जानकारी वाली सामग्री नहीं होती. 

असल में इस तरह की कमी उनकी सोच और नजरिये की वजह से है, उनकी पत्रकारिता की पढाई या फिर प्रेस के प्रति जिम्मेदारी का अहसास उनके पाठ्यक्रम में कराया ही नहीं गया. प्रेस को बहुत ही छोटा मान लिया गया. देश के किसी पाठ्यक्रम को इस तरह नहीं बनाया गया जिससे प्रेस और संचार क्षमता की गंभीरता और उसके प्रतिफल को समझा सके. 

लगभग सभी संस्थानों को सिर्फ और सिर्फ अपना पाठ्यक्रम पूरा करके नौकरी दिलवानी है ताकि "कैम्पस प्लेसमेंट" दिखाकर और बच्चों को प्रवेश के लिए ललचा सकें. 

पत्रकारिता किसी भी देश की रीढ़ होती है. यदि संचार गलत किया गया, तो देश की विचारधारा भी वैसी ही बनेगी. किसी राष्ट्र का विकास वहां मौजूद पत्रकारिता (प्रेस/मीडिया) की कार्पयप्ररणाली पर निर्भर करता है.  

गंभीरता से लिया जाए तो प्रेस की पढ़ाई माध्यमिक स्तर से ही शुरू कर देनी चाहिए. छात्र जितना जागरूक होंगे, उतना ही प्रेस को निखारा जा सकेगा. जुझारू छात्र इस ओर आएंगे और प्रेस की भी यही मांग होती है. 



शनिवार, मार्च 21, 2020

कोरोना वायरस और फ्रंट पेज के विज्ञापन


जिस देश में कोरोना वायरस की वजह से प्रतियोगी परीक्षाएं रद्द कर दीं हों, चहरे के मास्क और सेनाटाजर आउट ऑफ़ स्टॉक चल रहे हों, मंदिर बंद, मस्जिद बंद, चर्च बंद, गुरूद्वारे बंद, रेल यात्री कम, हवाई यात्राएं बंद होने को, 8वीं तक के बच्चों को बिना परीक्षा पास की घोषणा कर दी हो, घर बैठे दफ्तर का काम शुरू हो गया हो, 60 प्रतिशत देश का हिस्सा प्रभावित हो चूका हो, खाने और रहने की जरूरतों का सामान स्टॉक होने लगा हो, जिस देश के  प्रधानमन्त्री लोगों को घरों में रहने की अपील कर दें, जहाँ कोरोना वायरस जांच किट की सन्दिग्ध के मुकाबले कमी हो, जहाँ आये दिन कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हों,....
वहां -
अखबारों के फ्रंट पेज पर भारी ऑफर वाले विज्ञापन आ रहे हैं. प्रेस का आज़ादी की लड़ाई में विशेष योगदान है. एक वक़्त था जब अंग्रेजी सरकार की विशेष नजर अख़बारों पर हुआ करती थी. क्योंकि सबको पता था अख़बार एक धधकते अंगारे की तरह है जो एक कोयले से दूसरे  कोयले में पहुँच कर उसे भी सुलगा देती है. पर आज अखबार पैसा कमाने की मशीन बन गये है. आजकल लगभग हर बड़ा बिसिनेस मैन अख़बार चला रहा है या अखबारों में निवेश कर रहा है. पहले संपादक के निर्णय स्वीकार किये जाते थे. आज़ादी के बाद से इसमें तेजी से परिवर्तन आया और सम्पादक की जगह प्रकाशक महत्वपूर्ण हो गया, अख़बार से अधिक विज्ञापनों पर ध्यान जाने लगा. लाभ के लिए ख़बरों से छेड़छाड़ होने लगी. पैसा कमाने का एक नया नाम सामने आया "पेड न्यूज़". और अब कई तरह से अख़बारों में पैसा कमाया जा रहा है जिसे आप सिद्ध भी नहीं कर पाएंगे.
मैंने टेलीविजन की बात नहीं की, क्योंकि टीवी पर आने वाली खबरों ने कभी भी लोगों का भरोसा नहीं जीत पाया. विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि टीवी पर आने वाली खबरों से अधिक अखबारों की ख़बरों पर भरोसा किया जाता है. इसीलिए मैं भी सबसे भरोसेमंद जनमाध्यम की बात करूंगा. हालाँकि टीवी न्यूज़ चैनल की बात करें तो विज्ञापनों के मामले में वे भी समान टिप्पणी के लायक हैं. बात कितनी भी गंभीर हो विज्ञापन से कोई समझौता नहीं होता. निर्भया के दोषियों को मिली फांसी की खबर के बीच में भी ब्रेक लिया जा रहा है. कोरोना से लोग किन किन राज्यों में प्रभावित हो रहे हैं ये भी ब्रेक के बाद बताया जायेगा. जब देश में वायरस को लेकर विषम परिस्थितियां बनती दिख रही हो तो न्यूज़ चैनलों का ऐसा व्यवहार विकासशील देश के लिए शोभा नहीं देता. 
भारत में आजादी के बाद से आज तक किसी सम्पादक को फांसी नहीं दी गयी. हजारों छोटे-बड़े अख़बार-पत्रिकाएँ निकलती हैं. उन्हें नियंत्रित और उन पर निगाह रखने के लिए प्रेस काउंसिल भी है, लेकिन आज तक किसी सम्पादक को फांसी या उम्र कैद जैसी सजा नहीं मिली, इसका मतलब ये माना जा सकता है कि किसी भी सम्पादक ने कोई बड़ा अपराध नहीं किया है.
अब वापस आते है कोरोना वायरस पर. देश में इस बीमारी को लेकर लोगों में बेचैनी बढ़ रही है, आये दिन लोग इस वायरस से प्रभावित हो रहे हैं, और अब तो मरने वालों की संख्या भी बढ़ रही है. इसी बीच अफवाह फैला कर विक्रेता वस्तुओं की कीमत बढ़ाकर बेंच रहे हैं. हालाँकि भारत में अफवाह फैलाकर पैसा कमाने की पुरानी रीति रही है, लेकिन अब हफ्ते दो हफ्ते में कुछ न कुछ अफवाह फ़ैल ही रही है.
इन सब के बीच अखबार या न्यूज़ चैनल अफवाहों पर उचित खबर नहीं बना रहे. कोरोना वायरस के प्रभाव या जांच पर खबरें मिल रही है. जागरूकता को लेकर ख़बरों की भरी कमी है. कोरोना वायरस को लेकर यदि कोई जागरूकता विज्ञापन प्रकाशित या प्रसारित हो भी रहा है तो वह पैसे के बिना नहीं है, जबकि अब फ्री भी जागरूकता विज्ञापन दिए जाए तो भी कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए. 
आज केंद्रीय और राज्य सरकारों को एक होकर काम करना होगा, जोकि फिलहाल नहीं हो रहा है. अभी भी पूर्वोतर राज्य सरकारों के जागरूकता सम्बन्धी विज्ञापन या खबरें देखने को नहीं मिली हैं. केरल में कोरोना के भारी प्रभाव के बावजूद तमिलनाडु, कर्नाटक में जागरूकता अभियान धीमा ही है. 
वक़्त आ गया है संविधान के चारों स्तंभों को एक हो जाने का, बिना किसी लाभ हानि की चिंता किये बगैर देश को समर्पित हो जाने का.
जन नेता, अखबार अक्सर शब्द इस्तेमाल करते हैं, "जनता तो बहुत भोली है". ऐसे में इस भोली भाली जनता को सँभालने का महत्वपूर्ण समय यही है. क्योंकि ये जनता, "जनता कर्फ्यू" पर भी बाहर निकलेगी, मना करने पर भी वही करेगी जो नहीं करना चाहिए, क्यूंकि "जनता तो भोली भाली है".

(20 मार्च की कुछ फोटो)




बुधवार, मार्च 04, 2020

वरिष्ठ पत्रकार विश्वेश्वर शर्मा सर को श्रद्धांजलि

बात उस समय की है, जब मैंने पत्रकारिता की डिग्री हांसिल कर प्रेस में गया था. दुनिया नयी थी और काम भी. राज एक्सप्रेस में पहली नौकरी मिली और उप सम्पादक का पद भी मिला. काम सीखने की रफ़्तार तेज थी, जूनून और डिग्री सर चढ़कर बोल रही थी. उसी दौरान वरिष्ठ पत्रकार विश्वेश्वर शर्मा सर राज एक्सप्रेस में एक स्टेड हेड के पद पर आये और मेरे कैरियर में बदलाव आने शुरू हो गये. शर्मा सर की एक बहुत ख़ास बात ये थी की शीले सर की तरह ये भी उन पत्रकारों पर ध्यान देते थे, जिनमें पत्रकारिता के प्रति समर्पण और विश्वास के साथ लग्न हो. मुझे याद है, जब मैं राज एक्सप्रेस में था, तो "विशु" सर (प्यार से सब उन्हें विशु सर कहते थे) ऑफिस में हर प्रांतीय डेस्क पर जाते थे और ये देखते थे कौन कितनी लग्न से काम कर रहा है. यही वो समय होता था जब वे और शीले सर जांचते थे कि कौन आगे बढ़ाने लायक है. मैं अपने काम को लेकर बहुत सजग था. मेरे रिश्तेदारों में आज भी कोई पत्रकार या पत्रकारिता जगत से नहीं है. मुझे अपने रिश्तेदारों में अपने पर गर्व होता था कि मैंने पत्रकारिता में आकर अपने दादा जी और नाना जी का सपना पूरा किया है. ऐसे में पहली नौकरी राज एक्सप्रेस में मन लगाकर काम करता था.

विशु सर की एक और ख़ास बात थी कि वे पत्रकार को समय समय पर परखते थे. जैसे जब भी कोई इंचार्ज छुट्टी पर चला जाता था तो उसका कार्यभार वे पुराने खिलाड़ी को न देकर नये पत्रकारों को देते थे. ऐसे में यदि वो नया उस जिम्मेदारी में खरा उतरता तो समझो उसका प्रमोशन पक्का. मुझे आज भी याद है, जब एक इंचार्ज छुट्टी पर गये तो मेरे डेस्क इंचार्ज को फ़ोन आया और इंचार्ज ने कहा, "बृजेन्द्र तुम्हें विशु सर ने बुलाया है." मेरा तो दिल ही बैठ गया. क्योंकि स्टेड हेड का फ़ोन आने का मतलब उस समय ये होता था कि अख़बार में गलती छप गयी है, और उप सम्पादक की खटिया खड़ी होने वाली है.

मैं उस समय समझा कि मुझसे कोई गलती हो गयी है और डांट पड़ेगी. कलेजा संभालते हुए उनके केबिन में गया, चेहरे के तोते तो उड़ रखे थे, लेकिन विशु सर की उस प्रतिभा से मैं उस समय परिचित नहीं था, सो जैसे ही मैं उनके कैबिन में गया, विशु सर मुस्कुराए और बोले, "बिजेन (सर मुझे बृजेन्द्र की जगह प्यार से बिजेन कहते थे) आज तू अपकंट्री का चार्ज संभालेगा." मेरा दिल तो जोर से धड़कने लगा. चेहरे पर हलकी मुस्कान और दिल में उमंग जागी. ऐसा लगा जैसे किसी ने छत्रपति साहू जी महाराज की तलवार हाथ में दे दी हो. जीवन में कभी सोचा भी नहीं था, मात्र 1 साल में मुझे किसी डेस्क का इंचार्ज भी बनाया जा सकता है. विशु सर ने एक दो बार और ऐसा किया और मेरी सफलता पर मुझे प्रोमट कर दिया गया और मुझे बनाया दिया डेस्क इंचार्ज. इस पर कई लोगों की भृकुटी तन गयी. उस समय राज एक्सप्रेस का सबसे कम उम्र का डेस्क इंचार्ज बना. ये सिर्फ विशु सर और शीले सर का आशीर्वाद और उनकी परख का नतीजा ही था. ऐसा ही कुछ और "नये चावलों" के साथ किया गया. राज एक्सप्रेस अख़बार को लेकर भी बड़े बदलाव हो रहे थे. अखबार का रंग, फॉण्ट, साइज़ सम्बन्धी भी उसी दौरान बड़े निर्णय लिए जा रहे थे. सर्कुलेशन में बदलाव देखा जाने लगा. अखबार ने प्रसार में जोर पकड़ा तो प्रबंधन ने नये पदों का सृजन किया, जिसे भरने की जिम्मेदारी एडिटोरियल बोर्ड को दी गयी. राज एक्सप्रेस में निकली भर्ती के लिए मुझे भी भर्ती बोर्ड का सदस्य बनाया गया. ये मेरी एक और उपलब्धि थी.

भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के कुछ महीने बाद विशु सर ने एक और मास्टर स्ट्रोक खेला जिसे मैं जिन्दगी में नहीं भूलूंगा. ये मास्टर स्ट्रोक था स्टेड हेड और पूरे डेस्क के बीच की कड़ी का पद.अभी तक सभी इंचार्ज का हेड स्टेड हेड हुआ करता था, लेकिन काम को और आसान बनाने और अच्छे समन्वय (co-ordination) के लिए एक स्टेड कोर्डिनेटर पद सृजित किया गया. उस समय शीले सर राज एक्सप्रेस के ग्रुप हेड थे और विशु सर स्टेट हेड. बड़े पदों के निर्णय, प्रबंधन, विभिन्न हेड, महत्वपूर्ण अधिकारी आदि लेते थे.

ऐसे में स्टेड कोर्डिनेटर के पद को भरने के लिए अख़बार के सभी इंचार्ज की मीटिंग बुलाई गयी, गरमा गर्मी देख पद भरने की तिथि को टाल दिया गया. और कुछ दिन बीतने के बाद विशु सर ने सीधा मास्टर स्ट्रोक खेला और मेरा नाम स्टेड कोर्डिनेटर के पद के लिए प्रस्तावित कर गया.

ऑफिस में खलबली मच गयी. बृजेन्द्र कॉर्डिनेट करेगा. मैं ऑफिस पहुंचा तो कुछ लोग चुपचाप बधाई देने लगे. जैसे जैसे शाम होती गयी माहौल गर्म हो गया. बड़े पदाधिकारी और कई पुराने मझे हुए पत्रकारों ने अपना मत रखा. बहरहाल अंत में इस पद को वापस हटाना पड़ा और ऑफिस के माहौल को ठीक किया गया. वैसे भी मुझे लगता है इतनी बड़ी जिम्मेदारी में संभल नहीं सकता था, क्यूंकि अनुभव की कमी थी. लेकिन जब भी वे दिन याद करता हूँ तो विशु सर और शीले सर की याद आ जाती है.

देश में पत्रकारिता की बात की जाती है तो हमेशा उदहारण उन्हीं पत्रकारों के दिए जाते हैं जिन्होंने अपने समय में संघर्ष किया और कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया. तमाम पत्रकार ऐसे भी रहे जिन्होंने पत्रकारिता को अपना जीवन समर्पित कर दिया और उसका हौवा भी नहीं बनाया और उन्हीं में एक स्वर्गीय विश्वेश्वर शर्मा सर हैं.

विशु सर उन पत्रकारों में रहे जिन्होंने हमेशा जुनूनी लोग ढूँढने में समय बिताया क्योंकि उनका मानना था कि पत्रकारिता कभी भी पैसा कमाने का जरिया नहीं हो सकती. ये शिक्षा की तरह शुद्ध सेवा का क्षेत्र है. लेकिन फिर भी लोग इसमें कमाई का जरिया ढूँढ़ते है जिसकी वजह से सच्ची पत्रकारिता को जिन्दा रहने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ता है.

कल विशु सर की वाल पर उन्हीं की खबर पढ़ी तो कतई यकीन नहीं हुआ, भोपाल होता तो तुरंत उनके घर जाता, लेकिन लखनऊ में होने के कारण फ़ोन करने के अलावा कोई और तरीका नहीं था. जब खबर सच्ची निकली तो दिल कुछ समय के लिए आहें भरने लगा. अपने विश्वविद्यालय भी नहीं गया. पता नहीं क्यों ये सब लिखने का मन कर रहा था तो लिख दिया.

विशु सर ने मुझे पत्रकारिता को जीना सिखाया उनके इस जज्बे को नहीं भूलूंगा. सर आप पंचतत्व में विलीन हो गये तो क्या मेरे दिल में हमेशा जिन्दा रहंगे.

बृजेन्द्र कुमार वर्मा 

शुक्रवार, जनवरी 31, 2020

बाबा साहेब डॉ0 भीम राव अम्बेडकर के समाचार पत्र "मूकनायक" के 100 वर्ष पूरे


बाबासाहेब को विभिन्न विषयों में पढ़ा जाता है लेकिन उनकी विशेष पहचान पत्रकारिता में होनी चाहिए जोकि अभी आपेक्षित रूप से नहीं मिल पा रही है. बाबा साहेब ने पत्रकारिता की आवश्यकता और शक्ति को बहुत जल्दी पहचान लिया था, वे जानते थे कि अछूतों के विकास के लिए उन्हें जागरूक करने के लिए पत्रकारिता एक बेहतर विकल्प हो सकता है, जोकि बाद में सही भी सिद्ध हुआ. 
आज (31 जनवरी 2020) बाबा साहेब डॉ0 भीम राव अम्बेडकर के समाचार पत्र "मूकनायक" के 100 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं. 

“मूकनायक” का प्रकाशन

समय बीता और 20वीं सदी की शुरुआत हुयी. 1920 में बाबा साहबे अम्बेडकर ने पत्रकारिता में प्रवेश किया. उन्होंने “मूकनायक” नामक पत्र की शुरुआत की, जिसका पहला अंक 31 जनवरी 1920 को प्रकाशित हुआ. यह तीन साल तक प्रकाशित हुआ. प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण “मूकनायक” बंद हो गया लेकिन बाबा साहेब की पत्रकारिता का जुनून कम नहीं हुआ. “मूकनायक” के बाद 1927 में उन्होंने “बहिष्कृत भारत” का प्रकाशन किया. इसका प्रकाशन 1929 तक होता रहा और फिर बंद हो गया. इसके बात “जनता” का 1930 में प्रकाशन शुरू हुआ. इसका प्रकशन काफी लम्बे समय तक रहा. यह 1956 तक प्रकाशित हुआ. इसके अलावा 1956 में “प्रबुद्ध भारत” का प्रकाशन हुआ. पत्रों के प्रकाशन में बाबा साहेब का सहयोग आर.डी. भंडारे, बी.सी. कांबले, बी.आर. कादरेकर, देवराव नाइक, जी.एन. सहस्त्रबुद्धे आदि ने दिया.

ज्योतिबा फुले जी का "दीनबंधु" 


तत्कालीन समय में पत्र पत्रिकाएँ समाचार, कवितायें, धार्मिक लेख आदि के प्रकाशन तक ही सीमित थे, उनमें अछूतों, पिछड़ों, की ख़बरों के लिए कोई जगह नहीं थी. लेकिन दलितों पर भी ध्यान गया. 19वीं शताब्दी के दौरान महराष्ट्र में ज्योतिबा फुले का आन्दोलन उच्च वर्ग और अंग्रेजों की नजर में आया. फुले जी ने सत्यशोधक आन्दोलन की शुरुआत की. उन्होंने “दीनबंधू” की स्थापना की. उस समय के अछूतों पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाले शिवराम जानवे काम्बले और फागूजी बंसोड ने समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू किया, हालंकि ये अल्प समय के लिए ही था, लेकिन दलित उत्थान और उनकी आवाज बनकर पत्र सामने आने लगे. यही वह काल माना गया जब से दलित पत्रों के प्रकाशन की नींव पड़ी. उस समय के गोपाल बाबा वालंगकर अछूत पत्रकार माने जाते हैं.
डॉ अम्बेडकर का पत्रकारिता में आने का कारण और तर्क

गाँधी जी का "हरिजन" और बाबा साहेब का "मूकनायक" 

डॉ अम्बेडकर की पत्रकारिता में प्रवेश का एक कारण यह भी था कि मीडिया संस्थानों में जो लोग काम कर रहे थे वे सामाजिक ढाँचे को बनाये रखना चाहते थे जो ऊंच-नीच से प्रभावित था. ऐसे में जो सामाजिक कुरीतियाँ व्याप्त थीं उन पर लेख नहीं लिखे जाते थे. अछूतों सम्बन्धी ख़बरों को महत्व नहीं दिया जाता था. सिर्फ उन्हीं ख़बरों का चयन एवं प्रकाशन होता था जो उनके महत्व और अच्छाई तक सीमित था. एक पत्रकार का काम होता है अपने समाज में घट रही घटनाओं को अखबारों में जगह दे. लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में उस काल में पत्रकारिता और पत्रकार धार्मिक विचारधारा और वर्ण व्यवस्था से प्रभावित था, ऐसे में डॉ अम्बेडकर समझ चुके थे, जब तक स्वयं पत्र न निकला जाय तब तक दलितों का उद्धार नहीं किया जा सकता. अध्ययन किया जाये तो यह बात सही भी सिद्ध होती है, क्योंकि महात्मा गाँधी ने भी “हरिजन” के नाम से समाचार पत्र निकला लेकिन उसमें किसी भी प्रकार का दलित उद्धार नहीं देखा जाता, इसीलिए डॉ अम्बेडकर का नजरिया पत्रकारिता के प्रति बहुत ही सजग और जीवंत रहा.  बाबा साहेब की पत्रकारिता जातिवादी पूर्वाग्रहों से अलग है. उनका मानना था कि “जब तक समाज के हर वर्ग को मीडिया में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, तब तक सूचनाओं का एकतरफा, एकांत और असंतुलित प्रसार जारी रहेगा”.

1920 तक आते आते डॉ अम्बेडकर आश्वस्त हो चुके थे कि यदि दलितों को जागृत करना है और सशक्त बनाना है तो पत्रकारिता की आवश्यकता होगी, इसी उद्देश्य के साथ ही उन्होंने “मूकनायक” का प्रकाशन शुरू किया था. “मूकनायक” पत्र के उद्घाटन अंक के सम्पादकीय में उन्होंने लिखा, “वर्तमान में हमारे लोगों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ उपाय सुझाने के लिए अखबार से बेहतर कोई स्त्रोत नहीं है और भविष्य में भी किया जाएगा”.

“मूकनायक” का प्रकाशन

समय बीता और 20वीं सदी की शुरुआत हुयी. 1920 में बाबा साहबे अम्बेडकर ने पत्रकारिता में प्रवेश किया. उन्होंने “मूकनायक” नामक पत्र की शुरुआत की, जिसका पहला अंक 31 जनवरी 1920 को प्रकाशित हुआ. यह तीन साल तक प्रकाशित हुआ. प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण “मूकनायक” बंद हो गया लेकिन बाबा साहेब की पत्रकारिता का जुनून कम नहीं हुआ. “मूकनायक” के बाद 1927 में उन्होंने “बहिष्कृत भारत” का प्रकाशन किया. इसका प्रकाशन 1929 तक होता रहा और फिर बंद हो गया. इसके बात “जनता” का 1930 में प्रकाशन शुरू हुआ. इसका प्रकशन काफी लम्बे समय तक रहा. यह 1956 तक प्रकाशित हुआ. इसके अलावा 1956 में “प्रबुद्ध भारत” का प्रकाशन हुआ. पत्रों के प्रकाशन में बाबा साहेब का सहयोग आर.डी. भंडारे, बी.सी. कांबले, बी.आर. कादरेकर, देवराव नाइक, जी.एन. सहस्त्रबुद्धे आदि ने दिया.

“मूकनायक” और “बहिष्कृत भारत” की स्थापना

“मूकनायक” का प्रकाशन बॉम्बे से एक पाक्षिक समाचार पत्र के रूप में शुरू हुआ. “मूकनायक” का कार्यालय परेल में स्थित था. समाचार पत्र के शीर्षक “मूकनायक” का शाब्दिक अर्थ है, “आवाज-रहित का नेता”. उस समय के शासक छत्रपति शाहू जी महाराज ने आर्थिक अनुदान भी दिया था. पांडुरंग भाटकर पहले संपादक बने. बाबा साहेब डॉक्टरेट की डिग्री के कारण भारत आते थे और फिर काम से चले जाते थे, लेकिन विदेश में रहने के बावजूद “मूकनायक” पर उनकी पूरी नजर रहती थी. हालाँकि जब वे भारत लौट आये तो वे भी सम्पादक रहे. भाटकर के सम्पादन के बाद यह स्थान घोलप ने लिया. घोलप को 1921 में लेजिस्लेटिव काउंसिल ऑफ बॉम्बे प्रेसीडेंसी का सदस्य बनाया गया वे पहले 'अछूत' थे जिन्हें ये गौरव प्राप्त हुआ। 

“मूकनायक” शुरू से ही वित्तीय निर्धनता से गुजरा. समाचार पत्र को चलाने के लिए बाबासाहेब को अपने पारसी मित्र नवल भठेना से काफी मदद मिली. भठेना ने कोलंबिया विश्वविद्यालय में अंबेडकर के साथ अध्ययन किया था. उन्होंने कई मौकों पर “मूकनायक” को जमानत करवाई. उन्होंने गोदरेज जैसे प्रमुख बॉम्बे आधारित उद्योगपतियों को विज्ञापन देने के लिए मना लिया. इतना सब होने के बावजूद भी “मूकनायक” की स्थिति ठीक न हो सकी और घोपल से व्यक्तिगत मतभेदों के कारण मूकनायक से अपना नाता तोड़ लिया। 

समाचार पत्र में धन का अभाव 

बाबा साहेब एक निर्धन जीवन जीते रहे. उनके पास धन का हमेशा अभाव रहा. यही धन का अभाव अखबारों के सम्बन्ध में भी था. “मूकनायक” और “बहिष्कृत भारत” जैसे अखबारों के बंद होने का प्रमुख कारण विज्ञापन की कमी और धन का अभाव ही था. डॉ अम्बेडकर इस बात पर दृढ़ थे कि आडम्बरों, कर्मकांड, अन्धविश्वासी आदि जैसे विज्ञापनों को वे कभी भी जगह नहीं देंगे. इस तरह के दृढ़ निश्चय से उनके अखबारों की हालत खराब होती गयी और अखबार तक बंद हो गये लेकिन उन्होंने कभी भी गैर सामाजिक विज्ञापनों को प्रकाशित नहीं किया. उनका चिन्तन पूर्ण रूप से सामाजिक विकास और उचित बदलाव को समर्पित था. 

बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर की 1930 तक एक जनसंचारक के रूप में पहचान बन गयी. बाबा साहबे ने न केवल “बहिष्कृत भारत”, अपितु उसके बाद के अख़बारों में भी दलित हिंसा पर लगातार लेख लिखे. दलित सभाओं में उनके महत्वपूर्ण सम्पादकीय सार्वजनिक रूप से पढ़े जाते थे. यही कारण था कि वे एक जनसंचारक के रूप में पहचाने जाने लगे. पश्चिमी भारत में उनकी पहचान तेजी से बढ़ी और दलित विरोधी हिंसा के प्रति दलितों को जुटाने में भी मदद मिली. 

...लेकिन तू अकेला है


...लेकिन तू अकेला है
-बृजेन्द्र कुमार वर्मा
31 जनवरी 2020
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चार दिन की चाँदनीं और चार दिन का मेला है,
भीड़ कितनी भी हो तेरे पास, लेकिन तू अकेला है.

तुझे कौन सुनेगा, कौन जानेगा, सुनकर क्या फर्क पड़ेगा,
लोग अभी अँधेरे में हैं और ये अंधियारे की बेला है.

सोच नीची, जात नीची, नीची पहरेदारी,
वो आखिर करे भी तो क्या करे, उसे समाज ने धकेला है.

तुझे क्या लगता है, तू ही है सरताज अकेला,
उतर तो बाज़ार में, फिर देख नहले पे भी दहला है.

कर करूणा की विनती उनसे, चाहे गिरजा पैरों में,
वो समाज का क्या सोचेंगे, जिनका दिल ही इतना मैला है.

मारा भी, पीटा भी, भगाया भी, भड़काया भी,
समाज मेरा समझ गया, तेरी औकात अब ढेला है.
-बृजेन्द्र कुमार वर्मा

बुधवार, दिसंबर 11, 2019

तमाम कम्पनी वॉलेट और बैंक खाते क्यों खोल रहे हैं??

क्या आप जानते हैं मोबाइल सिम provider जो बैंक खाता या वॉलेट की सुविधा दे रहे हैं वे संस्थान क्या गजब का खेल खेल रहे हैं. समझिये.
आप अपने सिम प्रदाता द्वारा शुरू किये वॉलेट एप में कभी भी बिना किसी कागजी कार्यवाही के पैसे ऐड कर सकते हैं. मतलब अपने बैंक से एप में पैसे डाल सकते हैं, लेकिन यदि उस वॉलेट मनी का उपयोग करना चाहो तो आप नहीं कर सकते, क्योंकि सबसे पहले आपको KYC करना पड़ेगा... फिर उन्ही कागजों की फोटो कॉपी सिम प्रदाता के दिए गये ईमेल पर भेजनी होगी. इतना ही नहीं आपको उस ATM या बैंक के 3 महीने के लेन-देन की जानकारी भी देनी होगी जिस से वॉलेट में पैसे डाले हैं.
तब जाकर वॉलेट शुरू होगा.
लोग धर्म और जाति में इतना व्यस्त हैं कि चोरी बलात्कार जैसे संगीन अपराधों पर ध्यान ही नहीं देते. लोगो को यह भी पता होना चैये कि जो आपका पैसा ही उसे लेने से कोई नहीं रोक सकता. ये आपका अधिकार है. लेकिन आज कल तो मोबाइल सिम भी बैंक खाता खोलने में लगे हुए हैं. कमाल ये हैं की हर कोई बैंक खाता खुला रहा है.. बिल या रिचार्ज सुविधा देने वाली वेबसाइट, सिम कार्ड प्रदाता कंपनी, ऑनलाइन शौपिंग साईट, डाक घर और भी... आखिर ये तमाम संस्थाएं बैंक खाते क्यों खुलवा रही हैं, ये समझ से परे है.
अभी तक अमजोन, फ्लिप्कार्ट जैसी ऑनलाइन शौपिंग स्टोर सिर्फ बाज़ार तक सीमित थे लेकिन अब इनका खुद का वॉलेट सुविधा है मतलब आप इन आर बने अकाउंट में पैसे रख सकते हैं. फ़ोन सिम बेचने वाली कंपनी तो इस कदर वॉलेट और बैंक खाते के पीछे लग गयी हैं के ग्राहक को रिचार्ज विकल्पों से पहले ही वॉलेट की और बैंक खाते की जानकारी मिल जाती है.
खेर, बात बस इतनी सी है कि तमाम कंपनी अपने क्षेत्र का काम छोडकर वॉलेट या बैंक खाते के पीछे क्यों पड़ी हैं और बैंक खाता खोलने का इतना ही शौक है तो भैया सिम बेचना बंद कर दो और खाते ही खोल लो.... कम से कम कहीं तो ठीक से काम हो.

मंगलवार, अक्टूबर 08, 2019

सेवा और नौकरी

सुरेश और महेश दो बहुत अच्छे दोस्त थे. बचपन से साथ पढ़े. पढ़ लिख कर विश्वविद्यालय तक पहुंच गए. दोनों ने डिग्री हासिल की. 
सुरेश की नौकरी बहुत जल्दी लग गई लेकिन महेश की नौकरी नहीं लगी. अक्सर महेश मजाक-मजाक में पूछ लेता कि यार तुम्हारी नौकरी लग गई, लेकिन मेरी नहीं लगी, ऐसा क्यों ?
सुरेश मुस्कुराता और बात को टाल देता, लेकिन कभी उसने सच बताने की कोशिश नहीं की. सुरेश वैसे शांत स्वभाव का था और महेश क्रांतिकारी. सुरेश शांत स्वभाव के होने के कारण काफी चीजें नहीं बोलता था. गलत का विरोध नहीं करता था, लेकिन हां इसका मतलब यह नहीं कि चालाक नहीं था. इधर महेश बहुत क्रांतिकारी विचार धारा का था. उसने कई ऐसी किताबें पढ़ी थी जिसमें सच्चाई, अच्छी बातें, जीवन जीने के सही उद्देश्य, सच्चे सिद्धांत जैसी बातें लिखी होती थी. महेश इन बातों को सीख कर क्रांतिकारी विचारधारा का बना.
गलत को गलत कह देता था और सही को सही बोलता था. वह गलत के खिलाफ विरोध भी करता था खड़ा हो जाता था. क्रांतिकारी विचारधारा का होने के नाते गलत का हमेशा से विरोध करता रहा. सुरेश ऐसा कुछ करता नहीं था. 
डिग्री पूरी होने के कुछ समय बाद ही, सुरेश की नौकरी लग गई और फिर शादी भी हो गयी. महेश आज भी चप्पलें घिस रहा है और अभी तक शादी भी नहीं हो पायी. हाल ही में एक और रिश्ते ने महेश को ठुकरा दिया था.
जब ही छुटियाँ पड़ती, सुरेश अपने परिवार के साथ गाँव आ जाता. इस बार 2 दिन की ही छुट्टी पड़ी लेकिन फिर भी आ गया. तबियत ठीक नहीं थी तो घर मिलने आ गया. 
सुरेश किसी से मिले या न मिले लेकिन महेश से मिले बिना नहीं जाता. न जाने क्यों सुरेश आज विशेष कारणों से महेश से मिलना चाह रहा था. जब तबियत खराब थी तो घर में रहा और खाली दिमाग में कई ख्याल रहे, महेश उन ख्यालों में से एक रहा. शायद इसीलिए सुरेश महेश से विशेष तौर पर मिलना चाह रहा था. 
इस बार महेश ही घर मिलने आ गया. 
दोनों गले मिले, कुशल क्षेम हुआ. चाय बनी. गाँव की बातें होने लगी... अचानक सुरेश ने पूछा, 
"लड़की वाले ने न क्यों कर दी"
महेश ने बिना अचरज बोल दिया, "पता नहीं यार, क्या बुराई देख ली". महेश चुप था. सुरेश ने गहरी सांस ली. और माँ से बोला, "माँ, बाग़ तक जा रहा हूँ, थोड़ी देर में लूटूँगा"
सुरेश ने महेश का हाथ पकड़ा और बाग़ की और ले जाने लगा. वैसे तो महेश और सुरेश दोस्त थे. लेकिन कोई देख कर नहीं कह सकता था कि ये दोस्त हैं. हमेशा भाई भाई की तरह रहे. एक दूसरे के घर में किसी निर्णय में भी इनकी भूमिका रहती. और माँ बाप इन दोनों की बात भी मानते. 
महेश को सुरेश का व्यवहार कुछ अजीब लग रहा था. न तो गुस्से में दिख रहा था और न ही शांत जैसे वो रहता है. कभी भी वो दो दिन की छुट्टी में नहीं आया और यदि बीमार होता तो यूं महेश को बाग़ लेकर नहीं जाता. महेश ने कई बात पूछा भी, "क्या बात है, कोई दिक्कत हो तो बताओ"
सुरेश ने खींज से बोला, "क्यों तू मेरी दिक्कत दूर करेगा ?" "किस किस की दिक्कत दूर करेगा, चल बता मुझे."
"कितनो की मदद करेगा, क्या मिला तुझे मदद करके?" "क्या नौकरी मिली? क्या शादी हुयी? क्या नेता बन गया??" 
"तू मुझे एक बात बता, क्या इज्जत है तेरी इस गाँव में ?"
महेश समझ नहीं पा रहा था कि सुरेश ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है. लेकिन उसने कुछ बोला नहीं. सुरेश ने अपने आप को संभाला. आम के बाग़ में सारे आम तोड़े जा चुके थे. बाग़ वीरान था. न कोई घोसला और न कोई उस बाग़ की सुरक्षा करने वाला. इंसान भी अजीब होता है, आम के बाग़ की सुरक्षा भी तब तक करता है जब की पेड़ आम देता रहता है. भेंस के लिए हरी घास भी तब तक आएगी जब तक कि वो दूध देगी. वरना भुस से काम चलाना पड़ेगा. 
दोनों बाग़ की मेंड़ पर बेठे गये. दोनों चुप थे. सिर्फ बाग़ के पत्तों के हिलने की आवाज आ रही थी. सुरेश ने हलकी साँसे भरी. सुरेश सर झुकाए बैठा था, महेश उसके चहरे को देख रहा था.
कुछ नहीं सूझा तो महेश ही बोल पड़ा,"यार ये बताओ चाचा कब बना रहे हो... हमारी नौकरी लग जाती तो अब तक शादी करके तुम्हें चाचा बना देते."
"हा हा हा.... हा..." महेश हंस पड़ा, लेकिन सुरेश चुप था.
महेश फिर बोला, पता नहीं क्यों नौकरी नहीं लगी... लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद यार हर बार इंटरव्यू में निकाल दिया जाता है... पता नहीं कब नौकरी लगेगी...."
"कभी नौकरी नहीं लगेगी", सुरेश तुरंत बोला.. महेश स्तब्ध रह गया..
"क्या... कभी नहीं मतलब ?" महेश ने पुछा.
सुरेश फिर बोला, "कभी नहीं मतलब कभी नहीं"
"तुम ऐसा क्यों सोचते हो यार ?" महेश ने सवाल किया.
सुरेश ने ठान लिया कि इस बार उसे बता कर रहेगा कि आखिर अब तक उसकी नौकरी क्यों नहीं लगी. सुरेश एक चालाक व्यक्ति था और समाज को अच्छे से समझता था, इसलिए नौकरी भी पा ली. 
महेश ने जोर दिया, "क्या हुआ, बोलो तुम ऐसा क्यों सोचते हो."
सुरेश ने लम्बी सांस ली और बड़े ही धैर्य से बोला, "यार! नौकरी तो तुम्हारी भी लग जाती, लेकिन कुछ कारणों की वजह से नहीं लगी. अगर तुम मुझे मौका दो तो मैं तुम्हें बताता हूं आज."
महेश अचानक उत्सुक हो उठा. मन में सोचने लगा, जब सुरेश जनता था तो अब तक बताया क्यों नहीं ? ऐसी कौन सी बात है जो मुझे आज तक नहीं बताई वो भी मुझ से जुडी हुयी. आज तक सुरेश ने ऐसा व्यवहार नहीं किया. फिर आज अचानक सुरेश को क्या हो गया... वो दिल में बातें क्यों छुपाने लगा. क्या ये शादी का असर है या कुछ और बात है. महेश में व्याकुल हो उठा, "आखिर क्या बात है बोलो न सुरा"
 सुरेश गंभीर होकर बोला, "मेरे दोस्त....लेकिन तुम मेरी बात का बुरा मत मानना यह तुम्हें वादा करना होगा"
"ठीक है नहीं मानूंगा...बिल्कुल बुरा नहीं मानूंगा, बोलो", महेश हर शर्त को तैयार था.

सुरेश ने गहरी सांस ली, नजरें महेश से मिलायीं और बड़े ही विनम्रता से बोलना शुरू किया.
"माही, मैं जानता हूं तुम क्रांतिकारी हो, तुम्हारी विचारधारा बहुत अच्छी है और इस देश में ऐसी विचारधारा के लोग बहुत ही कम मिलते हैं... मैं जानता हूं कि तुम्हारी नौकरी क्यों नहीं लग रही."
महेश की व्यकुलता बढ़ रही थी, क्रांतिकारी का नौकरी लगने से क्या मतलब. सुरेश ने मेरे क्रांतिकारी होने की बात क्यों बोली... महेश बस चुप रहा और सुनता रहा.

"पहला कारण यह है कि तुम हमेशा समाज की सेवा करते रहे. नौकरी पाने वालों को सिर्फ अपनी नौकरी पर ध्यान देना चाहिए... लेकिन तुम समाज की दिक्कतें दूर करने की कोशिश करते रहे, उनकी मदद करते रहे जो लोग परेशान रहते थे. तुम उनके साथ खड़े होकर उनकी समस्याओं को सुलझाते थे. इस वजह से तुमने सही से पढ़ाई नहीं कर पाई और तुम्हारी नौकरी नहीं लगी. अगर मैं निष्कर्ष पर पहुंचू, तो समाज की सेवा करने की वजह से तुम्हारी नौकरी नहीं लगी.
सुरेश गंभीर था, उसकी आवाज में जोर आने लगा, एक अनुभवी की तरह बोला, "मेरा विचार है कि जब भी नौकरी पाने की बात हो तो अपनी विचारधारा को त्याग देना चाहिए, क्योंकि हमारी विचारधाराएं हमारी नौकरी के बीच में आ जाती हैं और हमें नौकरी नहीं मिल पाती अगर आप की विचारधारा क्रांतिकारी स्वाभिमानी और सच्चाई की है तो विश्वास मानो तुम्हारी नौकरी कभी नहीं लगेगी"

महेश की आँखें, सुकड गयी, भोएं टेढ़ी हो गयी, जैसे बात ध्यान से सुन न पायी हो... अरे सुरेश ऐसा कैसे कह सकता है, लगता है सुरेश से कहने में कुछ गलती हो गयी, या मैंने ही शायद सही से सुन नहीं पाया हो...

सुरेश रुका नहीं, क्योंकि उसे लगा अगर रुक गया तो महेश वैचारिक द्वंद्व करने लगेगा और अभी वो किसी भी तरह से बहस करने के पक्ष में नहीं है. इससे पहले वो कुछ कहता सुरेश बिना रुके अपनी बात कहने लगा.

"मेरे दोस्त मैं तुम्हें एक उदाहरण देता हूं. अपने इसी गांव में तुम्हें वह उदाहरण देखने को मिल जाएगा."

अब महेश को अचरज महसूस होने लगा.. आखिर ऐसा कौन सा उदाहरण है, जो महेश गाँव में रहकर भी देख नहीं पाया और सुरेश ने शहर में रहकर भी देख लिया... महेश की साँसें बढ़ने लगी... उत्सुकता चरम पर थी. गला सूखने लगा..

"मेरे दोस्त कभी तुमने एक भूखे कुत्ते को देखा है... वह रोटी मांगने के लिए घर-घर भटकता है. किसी दरवाजे से रोटी मिल जाती है तो किसी दरवाजे से रोटी नहीं मिलती. जब रोटी मिल जाती है तो वह कुत्ता चुपचाप रोटी खा लेता है. कभी कभी रोटी मिलने की जगह कोई लाठी मार देता है... कोई डंडा मार देता है तो कोई पत्थर मार देता है, लेकिन कुत्ता कभी वापस उन पर भौंकता नहीं, उन्हें काटता नहीं.... बस दर्द से करहाता हुआ....वहां से चला जाता है और दूसरे दरवाजे पर रोटी ढूंढने की कोशिश करने लगता है. इसका मतलब यह हुआ कि कुत्ता रोटी मांगने की वजह से किसी पर वार नहीं करता. उसक मुख्य उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपनी भूख मिटाने... और रोटी खाने पर होता है किसी प्रकार का विरोध करने पर नहीं. किसी जानवर को लाठी मारना गलत है डंडा मारना गलत है लेकिन उसके बावजूद भी वह जानवर विरोध नहीं करता.
क्योंकि उसे अपनी भूख मिटानी है न कि किसी प्रकार का विरोध करना है हां यह जरूर है जिस वक्त उसकी भूख मिट जाएगी और उसका पेट भरा होगा तो वह शत प्रतिशत लाठी - डंडा मारने वालों को तुरंत वह काट खाएगा.. नौच डालेगा."
"इस बात से हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि जब भी आपको नौकरी चाहिए तो आपको सिर्फ नौकरी पर ध्यान देना चाहिए, अगर कुछ गलत घट रहा है तो घटने दो, अगर कुछ गलत हो रहा है तो बिल्कुल भी विरोध मत करो.... क्योंकि वह समय विरोध करने का नहीं है नौकरी पाने का है. नौकरी पाने के बाद तुम गलत को गलत कहो सही को सही. गलत के खिलाफ खड़े हो जाओ, विरोध करो, प्रदर्शन करो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अगर पेट खाली है तो हार निश्चित है, इसलिए पहले अपना पेट भरो यानि कि पहले नौकरी लो.
....इसीलिए मेरे दोस्त तुम्हारी नौकरी नहीं लगी और तुम आज भी बेरोजगार हो"

सुरेश को न जाने क्या ग्लानी महसूस करने लगा.. पता नहीं क्यों उसे अपने कहे पर विश्वास की जगह कमजोरी महसूस हुयी, वो उठा और महेश को वहीँ छोड़ के घर को चल दिया.

महेश अकेले वही बैठा रहा और सोच में पड़ गया. महेश बातें सुनकर अचंभित था.
मन में सोचने लगा.  मैंने हमेशा समाज की सेवा की. गरीब संसाधन विहीन लोगों की मदद करता रहा. मैंने सोचा मुझे पुण्य मिलेगा.
सुरेश ने जो बातें बोली उन बातों ने महेश को  झकझोर के रख दिया. महेश उठा और घर को जाने लगा. शाम हो चली थी, चरवाहे मवेशियों को घर लौटने लगे थे. महेश की चाल ठीली पड़ गयी.... मन उधेड़बुन में लगा थे.

"क्या जो मैंने आज तक किया वह गलत है ? क्या मैंने लोगों की मदद की तो वह गलत है ? क्या मैंने गलत का विरोध किया तो वह गलत है ? क्या मैंने लोगों की सेवा की तो मुझे उसका पुण्य नहीं मिलना चाहिए ? क्या कर्म सिद्धांत यह कहता है कि अच्छा करने पर अच्छा नहीं होगा ? रात हो गयी.. कुछ खाया भी नहीं... माँ भी हैरान थी कि महेश आखिर मन ही मन क्या बडबडा रहा है. रात हो गयी लेकिन महेश को नींद ही नहीं आई सारी रात महेश ने तारो से बहस की. सुबह बिना उठे ही सुरेश के घर चला गया.. अभी कुछ है जो पूछना बाकी है... चाची सुरेश को बुलाना कहना माही आया है...
अंदर से आवाज आई, "बेटा तो वो तो अभी अभी दिल्ली चला गया... कह रहा था, इस बार दो दिन की ही छुट्टी थी... जा स्टेशन चला जा... मिल जायेगा वहां."
महेश स्टेशन की और दौड़ा... सुरेश एक बेंच पर सर झुकाए बैठा था... महेश ने बिना कुछ और कहे सीधा पुछा,
"क्या कर्म सिद्धांत यही है, अच्छा करने पर अच्छा नहीं मिलता ?  क्या बुरा करने पर बुरा नहीं मिलता ?"
ट्रेन आने की घोषणा होने लगी.
सुरेश मुस्कुराया और उसके बड़ी ही शालीनता से जवाब दिया
"जो अच्छा करता है उसे जरूर अच्छा मिलता है.... और बुरा करने वाले को बुरा फल मिलता है... लेकिन मेरे दोस्त कर्म सिद्धांत भी एक प्रक्रिया है. हर कर्म का एक समय होता है. जिस कर्म को तुम कर रहे हो क्या सच में उस कर्म को करने का समय वह है जिस समय वह तुम कर रहे हो या नहीं."
"मैं जानता हूं कर्म सिद्धांत बिल्कुल काम करता है और सौ प्रतिशत वैसा ही होता है जैसा आप करते हो..... लेकिन मैं इसमें एक बात जोड़ना चाहूंगा. हर एक कर्म का एक समय होता है आपको भूख लगी है तो आप लड़ नहीं सकते.  तो प्रथम कर्म यह होना चाहिए कि आप अपना पेट भरे और उसके बाद लड़ाई लड़ें....पेट भरा रहेगा तो आप जम के लड़ सकते हैं....पेट खाली रहेगा तो आप लड़ नहीं सकते यानी कि आप जिसके लिए लड़ रहे हैं उसके लिए कोई मतलब नहीं बनता लड़ने का.
प्लेटफार्म पर शोर होने के बावजूद अब महेशो को सब ध्यान से सुनाई दे रहा था.... ट्रेन प्लेटफार्म पर आ रही थी, लोग अपना सामान लेकर ट्रेन में बैठने को तैयार थे... बस सुरेश और महेश अपनी जगह से हिले भी नहीं.

महेश की नजरें झुक गई... आंखें गीली हो गयीं... बस सुरेश की अंतिम पंक्तियों का इन्तेजार रह गया. 

सुरेश ने अपना बेग उठाया और महेश को बोला, "अपना उद्देश्य निश्चित करो माही... चलता हूँ... और सुनो... तुम चाचा बनने वाले हो..."

सुरेश ट्रेन की और बढ़ गया. महेश चुप खड़ा रहा... ट्रेन का हॉर्न बजा और चलने लगी... महेश ने सर उठाया ट्रेन को देखने लगा... ऐसा लग रहा था जैसे जिन्दगी बढ़ने लग गयी हो... समोसे बेचने वालों का ध्यान किसी और ट्रेन पर जाने लगा. कुली हट गये... प्लेटफोर्म खली हो गया... बस ट्रेन को उदासी से वही देख रहे थे जिनकी ट्रेन छूट गयी थी. महेश ये सब देख अपनी जिन्दगी से जोड़ने लगा. जो समोसे वाला ट्रेन के खड़े रहते प्लेटफार्म पर भाग भाग के समोसे बेच रहा था, ट्रेन के जाते ही वही प्लेटफोर्म अब किसी काम का नहीं रहा... अब विपरीत दिशा में बने प्लेटफार्म पर भाग भाग के समोसे बेच रहा है क्योंकि वहां कोई और ट्रेन खड़ी है.

महेश वापस घर आया, दिन बीता, शाम हुई, महेश ने खाना भी नहीं खाया और जाकर छत पर चुपचाप अपने बिस्तर पर लेट गया और फिर सितारों से बहस करने लगा.
क्या सच में उसने गलत वक्त पर लोगों की सेवा की ? क्या सच में उसे पहले नौकरी पा लेनी चाहिए थी ? क्या सेवा करने का भी कोई समय होता है , वह भी सही या गलत ? क्या सच में पढ़ लिख लेने के बाद नौकरी करनी चाहिए, सेवा नहीं करनी चाहिए लोगों की मदद नहीं करनी चाहिए ? क्या पढ़ लिख लेने के बाद उद्देश्य नौकरी रह जाता है ? यदि कोई नौकरी भी करना चाहे और लोगों की मदद भी करना चाहे जो कि उसकी दिली इच्छा हो तो क्या यह दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते ?
क्या सच में पीड़ितों का साथ देने से अन्य कुछ लोगों को इतना बुरा लग जाता है कि वह नौकरी ही न लगने दे. सूचना दे दें कि फला... फलां... को नौकरी मत देना वो फलां.. विचारधारा का है....
मतलब इतनी नफरत कि मदद करने वाला आजीवन भूखा ही रह जाए.... कोई उसकी दो रोटी की जुगाड़ भी ना हो सके...
क्या इस देश में किसी की मदद कर देना ? साथ दे देना, सेवा कर देना... किसी सच्चाई पर खड़े रह जाना गलत है ?
सुरेश इस तरह की फालतू की बातें कैसे कर सकता है... महेश जान रहा था, सुरेश कभी कभी बोलते बोलते लडखडा जाता था.... यानि वो अपनी बात से सहमत नहीं था.. अगर सहमत नहीं था तो बोला क्यों... और यदि अपनी बात पर अडिग था तो बोलते समय लड़खड़ा क्यों रहा था... सुरेश ने ये सब क्या जान के बोला... क्या ये उसका अनुभव है... क्या ऐसे फालतू के अनुभवों को मान लेना चाहिए.. यदि ऐसी बातों को माना गया तो फिर सब यही बात बोलने लगेगे.. कि  मदद नहीं कर सकता.. अभी मदद करने का समय नहीं है. क्या बेवकूफी की बातें बोल के चला गया सुरेश....
लेकिन यदि सुरेश की बातें फालतू और बेवकूफी भरी है तो महेश की नौकरी क्यों नहीं लगी... यदि महेश लोगो के लिए दिन रात लगे रहने की जगह सिर्फ पढ़ाई पे ध्यान देता तो क्या नौकरी नहीं लगती???  तमाम बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, कोचिंग करने के कारण घर से दूर रहते हैं और घर का कोई काम नहीं कर पाते.... देर सबेर वे कोई न कोई परीक्षा पास करते हैं और नौकरी लग जाती है. ..
महेश दिन भर का भूखा भी था, इसलिए तारों से ज्यादा बहस नहीं कर पाया और सो गया... लेकिन सुबह उठकर फिर से वह अपने सवालों का जवाब मांगेगा... कोई न कोई तो जवाब जरूर देगा..
बहरहाल अभी तो भूख की वजह से कमजोरी थी इसलिए तारो से बहस नहीं कर पाया... पेट भरा होता तो रात भर बहस कर सकता...