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सोमवार, जुलाई 28, 2025

प्लास्टिक खाने वाले फंगस के प्रचार में प्रेस पीछे क्यों ?


 डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा

प्लास्टिक प्रदूषण आज दुनिया के सबसे गंभीर पर्यावरणीय खतरों में से एक है। हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा हमारे महासागरों, नदियों और ज़मीन पर जमा हो रहा है, जो सदियों तक अपघटित नहीं होगा। यह न केवल वन्यजीवों को नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि हमारे पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन रहा है। इस विशाल चुनौती के बीच, वैज्ञानिक समुदाय ने एक अप्रत्याशित, लेकिन शक्तिशाली सहयोगी की खोज की है, जो है “प्लास्टिक खाने वाले फंगस”। इस सूक्ष्मजीव ने अपनी अप्रत्याशित और अनूठी क्षमताओं से पूरी दुनिया को चौंका दिया है, क्योंकि ये प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की हमारी लड़ाई में एक नई आशा लेकर आए हैं। और इसमें प्रेस को भी पीछे नहीं रहना है, जबकि पूरी दुनिया जानती है कि प्रेस की ताकत क्या है।

पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (PET), पॉलीइथाइलीन (PE), पॉलीप्रोपाइलीन (PP) और पॉलीस्टाइरीन (PS) जैसे प्लास्टिक हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन गए हैं। पानी की बोतलों से लेकर पैकेजिंग और कपड़ों तक। प्लास्टिक की कुछ बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें औद्योगिक क्रांति का एक महत्वपूर्ण घटक बना दिया है, लेकिन यही गुण उन्हें पर्यावरण के लिए भी एक खतरा बनाते हैं। पारंपरिक रीसाइक्लिंग विधियाँ महँगी होती हैं और अक्षम भी हो सकती हैं, और प्लास्टिक का एक बड़ा हिस्सा अंततः हमारे प्राकृतिक वातावरण में पहुँच जाता है। यहाँ वे माइक्रोप्लास्टिक में टूट जाते हैं, जो मिट्टी और पानी में प्रवेश कर खाद्य शृंखला का हिस्सा बन जाते हैं, जिसके दीर्घकालिक प्रभावों को हम अभी पूरी तरह से समझ भी नहीं पाए हैं। इस गंभीर स्थिति में, वैज्ञानिकों ने प्रकृति की गोद में पल रहे इस फंगस से परिचय कराया जिसके लिए प्रकृति का जितना धन्यवाद किया जाए, वो कम ही होगा। क्या कोई सूक्ष्मजीव ऐसे हैं, जो प्लास्टिक जैसे जटिल बहुलकों को तोड़ सकते हैं? जवाब है, हाँ।

यह इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। बात 2011 की है। बताया जाता है कि येल विश्वविद्यालय के कुछ शोधकर्ता इक्वाडोर के अमेज़न वर्षावन में  एक शोध ट्रिप पर गए हुए थे। यहाँ शोधकर्ताओं ने पेस्टालोटिओप्सिस माइक्रोस्पोरा (Pestalotiopsis microspora) नामक एक फंगस की खोज करके दुनिया को चौंका दिया। इस फंगस में पॉलीयूरेथेन (PU) को ऑक्सीजन-रहित वातावरण में भी विघटित करने की क्षमता थी। यह एक बड़ी सफलता थी, क्योंकि लैंडफिल (भूक्षेत्र जहाँ बड़ी मात्रा में अपशिष्ट पदार्थ गाड़ दिए जाते हैं) में प्लास्टिक अक्सर बिना ऑक्सीजन के ही पड़ा रहता है। यह खोज प्लास्टिक-खाने वाले सूक्ष्मजीवों के अध्ययन में एक मील का पत्थर साबित हुई। इस प्रारंभिक सफलता के बाद, दुनिया भर के शोधकर्ता सक्रिय हो गए। उन्होंने विभिन्न प्रकार के फंगस की पहचान की जो अलग-अलग प्लास्टिक को तोड़ने में सक्षम हैं। इनमें कुछ प्रमुख फंगस एस्परगिलस ट्यूबिंगेंसिस (Aspergillus tubingensis), फेनरोचेट क्राइसोस्पोरियम (Phanerochaete chrysosporium) आदि हैं। इसमें एस्परगिलस ट्यूबिंगेंसिस फंगस पॉलीइथाइलीन (PE) को तोड़ने के लिए जाना जाता है, जो दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक में से एक है। यह कटिन हाइड्रोलेस जैसे एंजाइमों का स्राव करता है, जो PE को छोटे एवं आसानी से विघटित होने वाले टुकड़ों में तोड़ देते हैं। इधर फेनरोचेटे क्राइसोस्पोरियम सफेद सड़ा हुआ कवक के रूप में जाना जाता है, जो लकड़ी के जटिल घटक, लिग्निन को तोड़ने की अपनी क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। शोध से पता चला है कि यह पॉलीयूरेथेन और पॉलीइथाइलीन सहित कुछ प्लास्टिक को भी प्रभावी ढंग से विघटित कर सकता है।

इन फंगस की गुप्त शक्ति उनके द्वारा उत्पादित एंजाइमों में निहित है। ये सूक्ष्म प्रोटीन फंगस की कोशिकाओं से बाहर निकलते हैं और प्लास्टिक बहुलक की लंबी, स्थिर शृंखलाओं पर रासायनिक रूप से हमला करते हैं। वे इन शृंखलाओं को छोटे, घुलनशील अणुओं में तोड़ देते हैं। एक बार जब प्लास्टिक के टुकड़े छोटे हो जाते हैं, तो फंगस उन्हें अपनी कोशिकाओं में अवशोषित कर लेते हैं और उन्हें अपनी वृद्धि और ऊर्जा के लिए उपयोग करते हैं। इस प्रक्रिया को जैव-अपघटन (Biodegradation) कहा जाता है। यह एक प्राकृतिक और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ तरीका है, जिससे प्लास्टिक को उसके मूल घटकों में तोड़ा जा सकता है, जिससे हानिकारक सह-उत्पाद (By-products) का उत्पादन नहीं होता।

ये बात बड़ी अचंभित करने वाली है कि जबकि पूरी दुनिया प्लास्टिक कचड़े से परेशान है, वह इस तरह की आशावादी खोज के बाद भी प्रेस में वो उत्साह नजर नहीं आया जैसा की आना चाहिए। इन फंगस पर वैज्ञानिक तो काम कर ही रहे हैं, पर प्रेस को भी उसी उत्साह और जूनून के साथ लिखना चाहिए। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रेस ने अपनी भूमिका निभाई और तमाम देशों की जनता की स्थिति को बताया। भारत को ही ले लीजिए, भारत की आजादी से लेकर विकास में प्रेस ने अपना योगदान दिया है। हालांकि भारतीय भाषा में विज्ञान की बातों को प्रकाशित करने में प्रेस के हाथ तंगी में रहते हैं, उसका भी एक विशेष कारण विज्ञान पत्रकारों का अभाव है, लेकिन फिर भी जितना हो सके विज्ञान को सरल और बोलचाल की भाषा में जितना प्रेषित किया जाए उतना ही जनता का लगाव इस और बढ़ेगा। विकासशील देशों को तो ऐसे फंगस पर विशेष रूप से काम करना चाहिए। वैज्ञानिकों को भी और प्रेस को भी। प्रेस ये तो खूब प्रकाशित कर रहा है कि प्लास्टिक किस तरह से पर्यावरण और स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, परंतु ये प्रकाशित करने मे पीछे क्यों कि इस तरह के फंगस को विकासशील देशों के पर्यावरण के लिए अनुकूल बनाया जाए तो स्थिति कुछ बेहतर हो सकती है। प्रेस का काम सिर्फ खबरें देने का ही नहीं, बल्कि जागरूक और उत्साहित करने का भी है। वैज्ञानिकों की अपनी सीमाएँ होती है, समाज में वे उतने सक्रिय नहीं होते, जितने वे अपनी प्रयोगशाला में होते हैं। ऐसे में समझाने का काम स्वयं प्रेस का हो जाता है।

प्लास्टिक खाने वाले फंगस की खोज ने प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए एक नया और रोमांचक मार्ग खोल दिया है। क्योंकि यह पारंपरिक तरीकों की तुलना में कम ऊर्जा और हानिकारक रसायनों का उपयोग करता है। अलग-अलग फंगस विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक को तोड़ सकते हैं, जिससे एक व्यापक समाधान संभव है। इसके अलावा बहुत ही कम लागत में बड़े पैमाने पर औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए यह प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है। उन क्षेत्रों में, जहाँ प्लास्टिक कचरा जमा होता है और पहुँच कठिन है, वहाँ इसका उपयोग किया जा सकता है। प्रेस को चाहिए कि इस पर खूब लिखे। सरकार, उद्योगपतियों, उद्यमियों आदि को इस और आकर्षित करे। जनता को जागरूक करे ताकि जनता सरकारों पर दबाव बना सके और इस तरह हम प्लास्टिक कचड़े के अंत के लिए एक नए आंदोलन को जन्म दे सकें। हालांकि अभी भी कुछ चुनौतियाँ सामने हैं, जैसे वर्तमान में, प्लास्टिक का जैव-अपघटन एक अपेक्षाकृत धीमी प्रक्रिया है। औद्योगिक पैमाने पर इसे तेज़ करने के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है। इसके अलावा कुछ फंगस को प्लास्टिक को प्रभावी ढंग से तोड़ने के लिए विशिष्ट तापमान, आर्द्रता और पोषक तत्वों की स्थिति की आवश्यकता होती है। हालांकि वैज्ञानिक इन प्लास्टिक के जैव-अपघटन के अंतिम उत्पादों और पर्यावरण पर उनके संभावित दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में पूरी समझ विकसित नहीं कर पाएँ हैं, ऐसे में इसे भी जानना जरूरी है। वैज्ञानिक अब एंजाइम इंजीनियरिंग के माध्यम से इन फंगस की क्षमताओं को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि वे अधिक तेज़ी से और कुशलता से प्लास्टिक को तोड़ सकें।

प्लास्टिक खाने वाला फंगस एक वैज्ञानिक चमत्कार हैं, जो हमें हमारे ग्रह को बचाने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण प्रदान कर सकते हैं। हालाँकि यह एक अंतिम समाधान नहीं है और प्लास्टिक के उत्पादन और खपत को कम करना अभी भी महत्वपूर्ण है। ये सूक्ष्मजीव हमें एक स्थायी भविष्य की ओर बढ़ने में मदद करने की अपार क्षमता रखते हैं। यह एक रोमांचक क्षेत्र है, जहाँ नवाचार हमें प्लास्टिक-मुक्त दुनिया के करीब ला सकता है और इन सब में प्रेस को हर बार की तरह अहम भूमिका निभानी है।

(लेखक जनसंचार के व्याख्याता हैं।)

रविवार, जून 22, 2025

साया भी शरमाया


तुझसे जुदा होकर खुद को ही ग़ैर पाया,

तू गया तो मेरा साया भी मुझसे शरमाया।


आईनों ने पूछा, ये अजनबी है कौन?
हर अक्स ने आँखों को कुछ और दिखलाया।


लब खामोश थे, मगर दिल चीख कर बोला,
जिससे वफ़ा की, उसी ने दिल को सुलगाया।


तेरे बाद किसी मोड़ पे ख़ुशियाँ मिली भी तो क्या,
हाथ थामते ही ख़ुशी ने दर्द ही बरसाया?


अब तन्हाई मेरा शहर है, और यादें मेरा क़ाफ़िला,
इश्क़ के इस वीरान में, बस मैं हूँ और मेरा साया।


(-डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा)

मंगलवार, अगस्त 20, 2024

तो करता भी क्या

 मुफलिसी में अपनी जुबां दबा कर आया हूँ,

लौटकर आऊंगा नहीं, ये भी बता के आया हूँ 


मैंने मोहब्बत में हारी हैं कई बाजियाँ,

हाल ही में एक डोली उठा कर आया हूँ 


वो रात अलग थी, ये रात अलग,

दंगों में बच्चों का खून बचा कर आया हूँ


अच्छे अच्छों को रोटी तक नसीब नहीं,

मैं तो ईमानदारी मिट्टी में दबा कर आया हूँ.


 वो तो उसकी यादें हैं, तो दिन गुजर भी जाता है,

वरना कई बार खुद की अर्थी सजा कर आया हूँ.


उन्हीं हरामखोरों ने निकाल दिया बाहर,

जिनको सियासत सिखा कर आया हूँ. 


गम ये नहीं, खुद कर लिया बर्बाद 

ख़ुशी ये है, यही कहानी उसे सुना कर आया हूँ. 


घर से न निकलता, तो करता भी क्या 

मैं अपने घर वालों बहुत सता कर आया हूँ. 


बुधवार, अक्टूबर 19, 2022

वो आएगा तू देखना

 

तू मेहनत कर, कई रिश्ते भी आयेंगे तू देखना,

जो लोग छोड़ चुके हैं, वो मुड़कर भी आयेंगे तू देखना ||

अभी कामयाबी नहीं मिली, कोई बात नहीं,

जिस दिन मिली, उस दिन फ़रिश्ते भी आयेंगे तू देखना ||

अभी मोहब्बत है तो मिल लिया करो,

अगर नाराज हुए, तो मैय्यत पे भी नहीं आयेंगे तू देखना ||

परिंदों की चिंता छोड़, पर आ गये उनके,

चार दिन की बात है, उड़ जायेंगे तू देखना ||

जानता हूँ, शायरी आती नहीं मुझको,

लेकिन आई, तो वो चाँद भी सुनने आएगा तू देखना ||

सबने कहा भूल जा उसे, वो दगाबाज़ निकला

और दिल कहता है, वो आएगा तू देखना ||


(-बृजेन्द्र कुमार वर्मा)

मंगलवार, सितंबर 13, 2022

भारत में अमेज़न ऑनलाइन शौपिंग साईट क्यों है नंबर वन

भारत में अमेज़न ऑनलाइन शौपिंग साईट नंबर वन यूं ही नहीं बनी, बल्कि कुछ कारण हैं. 

हाल ही में मैंने अमेज़न से 8 पेन का सेट खरीदा । उसमें पेन के साथ एक रिफिल कंपनी फ्री दे रही थी. ऐसे में 8 पेन के साथ मुझे 8 रिफिल भी मिलनी चाहिए थी. लेकिन यहाँ सेलर ने कर दिया गड़बड़. 

जब ये सामान मेरे घर आया तो मैंने इसे खोला और देखा कि पेन वही है, लेकिन ये फ्री रिफिल वाला ऑफर  वाला सेट नहीं है । मुझे 8 रिफिल नहीं मिली, जोकि मिलनी चाहिए थी. बाज़ार में उस रिफिल कि कीमत 20 से 25 रूपए है, ऐसे में मुझे लगभग 160 से  200 रूपए के बीच का सीधा नुक्सान हुआ. 

मैंने अमेज़न पर इसे रिप्लेस/रिटर्न के लिए निवेदन (रिक्वेस्ट) कर दिया. 

अब बात आती है अमेज़न की. भारत में शायद ही ऐसी सर्विस होगी कि कम्पनी खुद ग्राहक को कॉल करे. लेकिन अमेज़न ऐसा ही करती है. "टोक टू अस" पर मैंने कॉल के लिए नंबर टाइप किया और क्लिक कर दिया, क्लिक करते हैं कॉल आ गया. 

मैंने 8 पेन के साथ 8 रिफिल न मिलने की बात कही. कस्टमर केयर एग्जीक्यूटिव ने तुरंत ही रिप्लेस किया और रिटर्न का आदेश कर दिया. 

इतना ही नहीं, मैंने शिकायत भी कर दी, कि इस पेन बेचने वाले सेलर के इस उत्पाद (प्रोडक्ट) को अमेज़न पर बेचने से रोक लगा दी जाए, ताकि कोई और ग्राहक को परेशानी न हो. मेरी इस शिकायत को आगे बढ़ाया (फॉरवर्ड) गया. 

फिर क्या था, कुछ दिन बाद अर्थात आज 12 सितम्बर को उस प्रोडक्ट को अमेज़न पर बेचने से रोक दिया गया. (फोटो में आप देख सकते हैं) ताकि और ग्राहकों को परेशानी का सामना न करना पड़े. 

अमेज़न का भारत में ऑनलाइन शौपिंग में नंबर 1 पर रहने का ऐसे ही कई कारण हैं. करोड़ों की खरीद यूं ही नहीं होती इस वेबसाइट से. 

भारत में भारतीय ऑनलाइन शौपिंग साईट भी हैं, जो टक्कर देना चाहती हैं, लेकिन अमेज़न को टक्कर देने के लिए उन्हें कड़े निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करना होगा. ग्राहक को सर आँखों पर बैठाना होगा, नहीं तो अमेज़न को टक्कर देना सपना ही रहेगा. 

शनिवार, अगस्त 06, 2022

भारत की आम जनता के लिए अहम क्यों है ई0डी0 अर्थात प्रवर्तन निदेशालय

गैर कानूनी लेनदेन एवं विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन पर रहती है नजर

 बृजेन्द्र कुमार वर्मा,

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार अध्ययनकर्ता हैं)

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आजकल ई0डी0 विभाग पूरे भारत में चर्चे में है। भारत में हो रहे गैर कानूनी लेनदेन एवं विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन पर इसकी नजर होती है। आम जनता को यह तो पता है कि ई0डी0 लोगों के घर से अवैध रूपयों को जब्त करता है, लेकिन यह कार्य करता कैसे है, यह बहुत कम लोगों को पता है, जबकि आम जनता को ई0डी0 के बारे में अवश्य ही पता होना चाहिए। क्योंकि देखा जाए तो अप्रत्यक्ष रूप से ई0डी0 आम जनता की गाढ़ी कमाई, जिसे अपराधियों ने अवैध रूप से अपने घरों में जमा कर रखा है, को ही बरामद करता है।

0डी0 अर्थात प्रवर्तन निदेशालय के इतिहास की बात करें तो इसकी स्थापना 01 मई, 1956 को हुई थी। विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947’ (फेरा, 1947) के अंतर्गत विनिमय नियंत्रण विधियों के उल्लंघन को रोकने के लिए आर्थिक कार्य विभाग के नियंत्रण में एक प्रवर्तन इकाई का गठन का गया था। इसका मुख्यालय दिल्ली बनाया गया। कुछ समय बाद वर्ष 1960 में इस निदेशालय का प्रशासनिक नियंत्रण, आर्थिक कार्य मंत्रालय से राजस्व विभाग में हस्तांतरित कर दिया गया। कुछ वर्षों बाद फेरा-47’ को हटाकर इसके स्थान पर फेरा, 1973 आ गया। तत्कालीन निदेशालय को मंत्रीमण्डल सचिवालय, कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में रखा गया।  इसे भी बदलकर 01 जून, 2000 से एक नई विधि विदेशी मुद्रा अधिनियम, ’1999-फेमा लागू किया गया। बाद मे, अंतर्राष्ट्रीय धन शोधन व्यवस्था के अनुरूप, एक नया कानून धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) बना और प्रवर्तन निदेशालय को 1 जुलाई 2005 से पीएमएलए को प्रवर्तित करने का दायित्व सौंपा गया। हाल ही में, विदेशों में शरण लेने वाले आर्थिक अपराधियों से संबंधित मामलों की संख्या में वृद्धि के कारण, सरकार ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018’ (एफइओए) पारित किया है और प्रवर्तन निदेशालय को 21 अप्रैल, 2018 से इसे लागू करने का दायित्व सौंपा गया है। वर्तमान में, निदेशालय राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में है।

भारत सरकार का प्रवर्तन निदेशालय एक बहु-अनुशासनिक संगठन है, जो धन शोधन (मनी लॉन्डरिंग) के अपराध और विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन की जांच करता है। ई0डी0 कई अधिनियमों के तहत कार्यवाही करते हैं। ई0डी0 के अनुसार, ’धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002’ (पीएमएलए) एक आपराधिक कानून है, जिसे धन शोधन (मनी लॉन्डरिंग) को रोकने के लिए और इस से प्राप्त संपत्ति की जब्ती का प्रावधान करने के लिए बनाया गया है। जब कोई मनी लॉन्डरिंग से धन एकत्रित करता है, तो ऐसे अपराधी के खिलाफ इस अधिनियम के तहत कार्यवाही की जाती है। इसी प्रकार ई0डी0 ’विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999’ (फेमा) के तहत भी कार्यवाही करता है। अधिनियम के अनुसार, यह एक नागरिक कानून है, जो विदेशी व्यापार और भुगतान की सुविधा से संबंधित कानूनों को समेकित और संशोधित करने और भारत में विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित विकास और रखरखाव को बढ़ावा देने के लिए अधिनियमित किया गया है। प्रवर्तन निदेशालय को विदेशी मुद्रा कानूनों और विनियमों के संदिग्ध उल्लंघनों के अन्वेषण करने, कानून का उल्लंघन करने वालों को न्याय निर्णित करने और उन पर जुर्माना लगाने की जिम्मेदारी दी गई है। इसी प्रकार भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018’ (एफईओए) के अंतर्गत ई0डी0 कार्य करता है। यह कानून आर्थिक अपराधियों को भारतीय न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से बाहर भागकर भारतीय कानून की प्रक्रिया से बचने से रोकने के लिए बनाया गया था। इस कानून के अंतर्गत ई0डी0 ऐसे भगोड़े आर्थिक अपराधी, जो गिरफ्तारी से बचते हुए भारत से बाहर भाग गए हैं, उनकी संपत्तियों को कुर्क करने का प्रावधान है। ई0डी0 इनके अलावा विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम, 1974’ (सीओएफइपीओएसए) के तहत, इस निदेशालय को फेमा के उल्लंघनों के संबंध में निवारक निरोध के मामलों को प्रायोजित करने का अधिकार है।

0डी0 की कार्यप्रणाली पर नजर डालें तो पता चलता है कि प्रवर्तन निदेशालय का एक निदेशक होता है, जिसके अधीनस्थ क्षेत्र स्तर के विशेष निदेशक कार्य करते हैं। यह केन्द्र स्तर पर कार्य करते हैं। कार्य संचालन के लिए क्षेत्र का बंटवारा पश्चिम क्षेत्र, उत्तर क्षेत्र, दक्षिण क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, और पूर्वी क्षेत्र के रूप में किया गया है। विशेष निदेशक के नीचे संयुक्त निदेशक होते हैं, जो क्षेत्र के विभिन्न जोन के लिए कार्य करते हैं। संयुक्त निदेशक के नीचे का कार्य उपनिदेशक देखते हैं। इतना ही नहीं विधिक सलाह एवं अन्य संबंधित कार्य के लिए संयुक्त सचिव नियुक्त किए जाते हैं। भारत के जिस क्षेत्र में विदेशी मुद्रा अथवा अवैध संपत्ति अथवा मनी लॉन्डरिंग जैसी अपराध होते हैं, वहां के क्षेत्रीय ई0डी0 अधिकारी कार्यवाही करते हैं, एवं रिपोर्ट सीनियर अधिकारी को अथवा कार्यालय को प्रेषित की जाती है।

0डी0 द्वारा की गयी विभिन्न कार्यवाहियों पर बात करें, तो भारत में हो रहे मनी लॉन्डरिंग, अवैध लेन-देन जैसे अपराधों की पोल खुल जाती है। आंकड़ों के अनुसार, ’धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) - 2002’ के अंतर्गत 31 मार्च 2022 तक कुल 5422 मामले दर्ज किए गए। इसमें 1739 मामलों में कुर्की का आदेश दिया जा चुका है। ई0डी0 द्वारा कुर्क की गयी कुल परिसम्पत्तियों का कुल मुल्य 104702 करोड़ रुपये है। पुष्ट अनंतिम कुर्की आदेशों की संख्या 1369 तथा न्यायनिर्णयन प्राधिकरण द्वारा अनंतिम कुर्की आदेशों के तहत कुर्क की गई परिसंपत्तियों का मूल्य 58591 करोड़ रूपये है। ई0डी0 ने इस अधिनियम के तहत 400 लोगों को गिरफ्तार भी किया है। दर्ज शिकायतों में 992 अभी भी विचाराधीन हैं। ई0डी0 ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा), 1999’ के तहत भी विभिन्न कार्यवाही को अंजाम दिया है। इस अधिनियम के तहत ई0डी0 ने 31 मार्च 2022 तक कुल 30716 मामलों की जाँच आरंभ की, जिसमें 15495 जाँच पूरी कर ली गयीं। 8109 लोगों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जबकि न्याय-निर्णीत कारण बताओ नोटिस 6472 लोगों को दिया गया। ई0डी0 ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018’ (एफईओए) के तहत भी कार्यवाही की है। इसमें 14 व्यक्तियों के विरुद्ध एफईओए के तहत कार्रवाई आरंभ की गयी, जिसमें  एफ000 घोषित व्यक्तियों की संख्या 09 है। अधिनियम के तहत जब्त की गयी परिसम्पतियों का कुल मूल्य 433 करोड़ है।

            वर्तमान में ई0डी0 भारतीय मीडिया में छाया हुआ है। ई0डी0 की कार्यवाही में जिस प्रकार से लोगों के घरों में भरा पड़ा पैसा बरामद किया जा रहा है, वह कहीं न कहीं आम जनता के खून पसीने की कमाई है, जिसे अपराधियों ने गलत तरीकों से इक्टठ्ठा किया है। भारत की गरीब जनता कहीं न कहीं ई0डी0 का धन्यवाद ही दे रही होगी, जो अवैध पैसा को बरामद कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक पार्टियां ई0डी0 के दुरुपयोग किए जाने की बात कर रही हैं। यदि ऐसा है तो यह भी सिद्ध करना चाहिए कि जिन पर ई0डी0 कार्यवाही करके करोड़ों बरामद कर रही है, वह पैसा आखिर आ कहां से रहा है। गैर-कानूनी तरीकों, मनी लॉन्डरिंग करने या विदेशों से अवैध लेन-देन से एकत्रित की गयी अवैध सम्पत्ति को यदि ई0डी0 बरामद कर भी रही है, तो इसे राजनीतिक नहीं कहना चिहए, क्योंकि यह आम जनता के हक का रूपया है, जो उन तक पहुंच ही नहीं पाया। ऐसी कार्यवाही लगातार होती रहनी चाहिए, फिर सरकार किसी भी पार्टी की ही क्यों न हो।

बैंकिंग में ऑनलाइन फ्रॉडिंग से बचने के लिए जागरूकता एकमात्र साधन

ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा की जरूरत ज्यादा, मीडिया की भूमिका अहम

 बृजेन्द्र कुमार वर्मा

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार अध्ययनकर्ता हैं)

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जैसे-जैसे ऑनलाइन लेन-देन बढ़ता जा रहा है, उसी के साथ ऑनलाइन खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं। भारत में डिजिटलीकरण का विकास सूचना और संचार प्रौद्योगिकी तकनीकी पर आधारित है। लेन-देन को आसान बनाने के लिए इस पर अधिक जोर दिया जाने लगा। कोविड-19 के बाद से भारतीय तेजी से ऑनलाइन लेन-देन की ओर मुड़ने लगे। भारत सरकार डिजिटल इंडिया प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और ई मार्केटप्लेस जैसी व्यवस्था की ओर आकर्षण का उद्देश्य समाज को सशक्त बनाने और अर्थव्यवस्था को डिजीटल की ओर मोड़ने का प्रयास है। लेकिन अच्छे के साथ, बुरा भी साथ चलता है। जागरूकता की कमी होने से और बैंकों में जमा रूपयों के प्रति डर दिखाकर डिजीटल फ्रॉडिंग आम बात होती जा रही है, जिसके लिए तकनीकी व्यवस्था लानी अनिवार्य हो गयी है। वित्तीय समावेशन भारत में सामाजिक सुरक्षा तंत्र के केंद्र में है। वित्तीय समावेशन के साथ ही वित्तीय प्रौद्योगिकी फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी का विस्तार हो रहा है। फिनटेक ने भुगतान और लेनदेन के विभिन्न प्रकार के नए विकल्प मुहैया कराए हैं। उदाहरण स्वरूप भीम यूपीआई से भारतीयों का जुड़ाव बढ़ा है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के अनुसार मार्च 2022 तक यूपीआई के माध्यम से 88.8 खरब रुपए के 5.04 अरब लेनदेन हुए हैं। पिछले साल आधार समर्थित भुगतान प्रणाली के उपयोग से 20 अरब से ज्यादा लेनदेन किए गए।

कुछ कंपनियां भी भारत में ऐसी संचालित हैं, जो ऑनलाइन ही ऋण प्रदान कर रही हैं। पहले के समय में आपको ऋण लेने के लिए बहुत से कागजी कार्यवाही करनी होती थी, कंपनियों के ऑफिस के चक्कर काटने पड़ते थे। ऑनलाइन बैंकिंग और लेन-देन ने इस व्यवस्था को आसान बना दिया है। साथ ही कुछ धोखेबाज कंपनियां भी चल रही हैं, जो जनता को ठगने का काम करती हैं। वे जनता को फोन करती हैं, ओर उनके खातों की जानकारी देकर धोखे से भरा एस0एम0एस0 भेज कर केवाईसी के नाम पर अथवा सतर्कता का हवाला देकर ओटीपी देने को कहती हैं, जैसे ही उन्हें ओटीपी मिलता है, उनके बैंक खातों से पैसे चले जाते हैं। सरकार को इसके लिए भी विभाग बनाना चाहिए, जो यह आसानी से पता लगा सके कि फोन कहां से आया है और ठगी का पैसा किसके बैंक खाते में गया है। तभी धोखाधड़ी को रोका जा सकता है।

भारत सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऑनलाइन बैंकिंग सुविधा को और आसान बनाना होगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2017 में प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान को मंजूरी दी। इस अभियान का उद्देश्य 6 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक पहुंचकर गांवों में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना है। यह विश्व का सबसे बड़ा डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार लगभग 5 करोड व्यक्तियों जोड़ा जा चुका है और लगभग 4.90 करोड़ को प्रशिक्षित किया जा चुका है। अभी यह संख्या बहुत कम है। भारत की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रही है, जिनकी कुल जनसंख्या लगभग 80 करोड़ है। ऐसे में जागरूकता अभियान जारी रहना चाहिए और लगातार ग्रामीणों को जागरूक करते रहना होगा, नहीं तो ऑनलाइन फ्रॉडिंग होती ही रहेगी, अपितु इनकी संख्या बढ़ती रहेगी।

यहां मीडिया का जिक्र करना भी आवश्यक है, क्योंकि ऑनलाइन फ्रॉडिंग के खिलाफ अभियान मीडिया ही सफल कर सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी देखी गयी है। ऐसे में दृश्य-श्रव्य संचार माध्यमों के उपयोग से ही जनता को जागरूक किया जा सकता है। ग्रामीण जनता को यह भरोसा दिलाना आवश्यक है कि उनका पैसा पूर्ण रूप से सुरक्षित है और बैंक बिना कारण कोई ओ0टी0पी0 नहीं भेजती। जब ग्राहक स्वयं अपने बैंक से लेन-देन करता है, तभी ओ0टी0पी0 आता है, वह भी मात्र 5 मिनट के लिए, अन्यथा बैंक बिना कारण ओ0टी0पी0 नहीं भेजती। सरकार को जागरूकता अभियान के लिए विशेष विभाग का निर्माण करना चाहिए, जो प्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर उदाहरण सहित लोगों को अवगत कराएं। ऐसा करने पर ही लोगों को ऑनलाइन लेन-देन के प्रति भरोसा बना रहेगा। कई घटनाएं ऐसी घटी हैं, जिसमें किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन फ्रॉडिंग होने के बाद से वह इतना ऑनलाइन लेन-देन से घबरा गए हैं, कि जानकारी होने के बाद भी सुविधा का उपयोग नहीं कर रहे और बैंक में लाइन में लगकर कार्य करवा रहे हैं। ऐसे लोगों को भी वापस जोड़ने और भरोसा दिलाना चुनौती होगी।

इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि तकनीकी सस्ती हुई है, और यही कारण है कि मोबाइल फोन की उपलब्धता गांवों में भी बढ़ी है। मोबाइल फोन से लेन-देन बहुत आसान हो गया। मोबाइल नेटवर्क की पहुंच भी गांवों तक होने लगी। इंटरनेट ग्राहकों की संख्या में सबसे तेज वृद्धि वाले 10 राज्यों में से 7 का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 2014 और 2018 के बीच संपूर्ण भारत के औसत से कम रहा है। इस काल में अकेले उत्तर प्रदेश में इंटरनेट के ग्राहकों की संख्या में 3.6 करोड़ का इजाफा हुआ है। यह भारत की कुल वृद्धि सील इंटरनेट ग्राहक संख्या का 12 प्रतिशत है। इसी तरह सर्वाधिक ग्राम पंचायतों में सार्वजनिक सेवा केंद्रों के खुलने में भी वृद्धि हुई है। वर्ष 2020 में 1 जनवरी और 31 अक्टूबर के बीच 6467 अतिरिक्त शहरी और ग्रामीण सीएससी जोड़े गए। ग्राम पंचायत स्तर पर 10339 सक्रिय सीएससी जोड़े गए हैं।

इन तमाम फायदों के बीच ग्रामीणों को एक और फायदा प्रदान करना अनिवार्य है, और वह है उनकी सामाजिक सुरक्षा, क्योंकि ठगी के लिए लोगों की निजी जानकारियां ली जा रही हैं। उनकी जानकारी उन्हीं को बताकर उनके हमदर्द बनने की काशिश ठगी को अंजाम देती है। वर्तमान में बैंक खातों के लिए मोबाइल फोन नम्बर और आधार महत्वपूर्ण हो गए हैं। इसी व्यवस्था से गरीबों के बैंक खातों में सीधे आर्थिक सहायता पहुंचायर जाती है। आंकड़ों के अनुसार सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से डीबीटी का उपयोग कर 36 हजार 659 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम लाखों लाभार्थियों के बैंक खातों में स्थानांतरित की जा चुकी है।

ऑनलाइन ठगों की नजर अब डिजिटल लॉकरों पर भी पड़ रही है। जैसे-जैसे डिजिटल लॉकरों की संख्या और उपयोग की बारम्बारता बढ़ेगी, इसमें भी सेंधमारी और ठगी, चोरी शुरू हो जाएगी। डिजिटल लॉकर नागरिकों को अपने विभिन्न प्रकार के दस्तावेजों को एक ही डिजिटल वॉलेट में रखने की सुविधा मुहैया कराता है। इसमें यदि ऐसे दस्तावेज रखे जाने लगे, जो बैंक से संबंधित हैं अथवा पैसे से संबंधित हैं, तो हैकर इसमें भी सेंध लगाने का प्रयास अधिक करने लगेंगे और ऑनलाइन चोरी के खतरे बढ़ने लगेंगे। इसके लिए आवश्यक यह है कि जनता को डिजीटल लॉकर प्रदान करने से पहले उनको उपयोग के लिए टैनिंग दी जाए, इसके बाद ही ऐसी सुविधाएं प्रदान की जाएं।

प्रौद्योगिकी देश की सामाजिक व आर्थिक प्रगति में उत्प्रेरक की भूमिका निभा रही है, लेकिन इसके खतरे भी बढ़ रहे हैं। भारत सरकार जनता के लिए उपयोग ऑनलाइन सुविधाएं तो बढ़ा रही है, लेकिन यह भी जरूरी है कि वह जनता की आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा को भी मजबूत करे। वर्तमान मे जिस प्रकार से ऑनलाइन सेंधमारी बढ़ी है और लगातार लोगों के बैंकों के खातों से पैसे निकाले जा रहे हैं, इस संबंध में भी जनता के लिए सरकार को आगे आकर ऑनलाइन चोरी को भी रोकना होगा। क्योंकि सरकार जब कोई सुविधा प्रदान करने के लिए समर्पित है तो उसी जनता की सुरक्षा के लिए भी पुख्ता इंतेजाम करना किसी दायित्व से कम नहीं होना चाहिए।