गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव
किसी और गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव
वक़्त बदल जाने पर गाँव में
पुरुषों के चेहरे वही रहते हैं
बस स्त्रियों के चेहरे बदल जाते हैं ।
(-डॉ0 बी0के0 वर्मा)
गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव
किसी और गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव
वक़्त बदल जाने पर गाँव में
पुरुषों के चेहरे वही रहते हैं
बस स्त्रियों के चेहरे बदल जाते हैं ।
(-डॉ0 बी0के0 वर्मा)
वो विदाई के समय रोता हुआ शख्स,
उसके आँसू दूर जाने से नहीं, किसी के खोने से बहे हैं,
तुम देखना लौट आने पर गुमसुम सी रहेगी,
फिर से निकलेंगे वही आँसू, जो खोने से बहे हैं।
(- डॉ0 बी0 के0 वर्मा)
(-डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा)
मोहब्बत की किताब का, एक पन्ना मोड़ आए हम।
कहानी पूरी न हुई, और क़लम तोड़ आए हम।।
कुछ ख़्वाब थे मुकम्मल, कुछ आँखों में ही सो गए।
थे वादे भी तो प्यारे, जो रूहों से जुदा हो गए।।
किनारों पर ही आकर, मौजों से बिछड़ आए हम।
कहानी पूरी न हुई, और क़लम तोड़ आए हम।।
वो रातें चाँदनी सी थीं, वो बातें रूह में बस गईं।
तस्वीरें ज़ेहन से निकलीं, पर यादें दिल में धंस गईं।।
उन्हीं यादों के साए में, ज़िंदगी छोड़ आए हम।
कहानी पूरी न हुई, और क़लम तोड़ आए हम।।
तुझसे जुदा होकर खुद को ही ग़ैर पाया,
तू गया तो मेरा साया भी मुझसे शरमाया।
आईनों ने पूछा, ये अजनबी है कौन?
हर अक्स ने आँखों को कुछ और दिखलाया।
लब खामोश थे, मगर दिल चीख कर बोला,
जिससे वफ़ा की, उसी ने दिल को सुलगाया।
तेरे बाद किसी मोड़ पे ख़ुशियाँ मिली भी तो क्या,
हाथ थामते ही ख़ुशी ने दर्द ही बरसाया?
अब तन्हाई मेरा शहर है, और यादें मेरा क़ाफ़िला,
इश्क़ के इस वीरान में, बस मैं हूँ और मेरा साया।
(-डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा)
माँ का दुप्पट्टा जो बदबू से भरा है,
यही पसीना जिम्मेदार है तुम्हें काबिल बनाने में
सड़ गया जिस्म माँ का घर में,
क्या शेष रह गया जीवन बिताने में.
आज चुप है माँ, बेटे के अफसर बनने पर,
जिसने कभी एलान किया था जमाने में.
चली गयी माँ कुछ शेष न रहा,
अब क्या मिलेगा मुस्कराने में.
औलादों, अपनी माँ की गोद को याद रखना,
उसका भी हिस्सा है, मंजिल दिलाने में.
प्यार, दुलार, समर्पण इसे अपने पास रखना,
काम आएगी नफरत की आग बुझाने में.
मैं वक़्त को रोक तो नहीं सकता लेकिन
ये कविता काम आयेगी याद दिलाने में
दोस्तों ऐसा कोई काम न करना
जो शर्म आये माँ को माँ कहलाने में
वो शख्श, जो अभी दूर है,
तुम्हें पता ही नहीं कितना मजबूर है.
अब वो रात में बस तारे गिनता है
जिस पर किताबों का फितूर है.
डरता है, कहीं बदनाम न हो जाए
उसके पिता को उसपर गुरूर है
वो चली गयी तो क्या हुआ
उसकी आँखों में तो मेरा ही नूर है
चली थी हवा कि सब गुजर जायेगा,
उफ़ | ये साल भी कितना मगरूर है.
मुफलिसी में अपनी जुबां दबा कर आया हूँ,
लौटकर आऊंगा नहीं, ये भी बता के आया हूँ
मैंने मोहब्बत में हारी हैं कई बाजियाँ,
हाल ही में एक डोली उठा कर आया हूँ
वो रात अलग थी, ये रात अलग,
दंगों में बच्चों का खून बचा कर आया हूँ
अच्छे अच्छों को रोटी तक नसीब नहीं,
मैं तो ईमानदारी मिट्टी में दबा कर आया हूँ.
वो तो उसकी यादें हैं, तो दिन गुजर भी जाता है,
वरना कई बार खुद की अर्थी सजा कर आया हूँ.
उन्हीं हरामखोरों ने निकाल दिया बाहर,
जिनको सियासत सिखा कर आया हूँ.
गम ये नहीं, खुद कर लिया बर्बाद
ख़ुशी ये है, यही कहानी उसे सुना कर आया हूँ.
घर से न निकलता, तो करता भी क्या
मैं अपने घर वालों बहुत सता कर आया हूँ.
तू मेहनत कर, कई रिश्ते भी आयेंगे तू देखना,
जो लोग छोड़ चुके हैं, वो मुड़कर भी आयेंगे तू
देखना ||
अभी कामयाबी नहीं मिली, कोई बात नहीं,
जिस दिन मिली, उस दिन फ़रिश्ते भी आयेंगे तू
देखना ||
अभी मोहब्बत है तो मिल लिया करो,
अगर नाराज हुए, तो मैय्यत पे भी नहीं आयेंगे तू
देखना ||
परिंदों की चिंता छोड़, पर आ गये उनके,
चार दिन की बात है, उड़ जायेंगे तू देखना ||
जानता हूँ, शायरी आती नहीं मुझको,
लेकिन आई, तो वो चाँद भी सुनने आएगा तू देखना ||
सबने कहा भूल जा उसे, वो दगाबाज़ निकला
और दिल कहता है, वो आएगा तू देखना ||
(-बृजेन्द्र कुमार वर्मा)
भारत में अमेज़न ऑनलाइन शौपिंग साईट नंबर वन यूं ही नहीं बनी, बल्कि कुछ कारण हैं.
हाल ही में मैंने अमेज़न से 8 पेन का सेट खरीदा । उसमें पेन के साथ एक रिफिल कंपनी फ्री दे रही थी. ऐसे में 8 पेन के साथ मुझे 8 रिफिल भी मिलनी चाहिए थी. लेकिन यहाँ सेलर ने कर दिया गड़बड़.
जब ये सामान मेरे घर आया तो मैंने इसे खोला और देखा कि पेन वही है, लेकिन ये फ्री रिफिल वाला ऑफर वाला सेट नहीं है । मुझे 8 रिफिल नहीं मिली, जोकि मिलनी चाहिए थी. बाज़ार में उस रिफिल कि कीमत 20 से 25 रूपए है, ऐसे में मुझे लगभग 160 से 200 रूपए के बीच का सीधा नुक्सान हुआ.
मैंने अमेज़न पर इसे रिप्लेस/रिटर्न के लिए निवेदन (रिक्वेस्ट) कर दिया.
अब बात आती है अमेज़न की. भारत में शायद ही ऐसी सर्विस होगी कि कम्पनी खुद ग्राहक को कॉल करे. लेकिन अमेज़न ऐसा ही करती है. "टोक टू अस" पर मैंने कॉल के लिए नंबर टाइप किया और क्लिक कर दिया, क्लिक करते हैं कॉल आ गया.
मैंने 8 पेन के साथ 8 रिफिल न मिलने की बात कही. कस्टमर केयर एग्जीक्यूटिव ने तुरंत ही रिप्लेस किया और रिटर्न का आदेश कर दिया.
इतना ही नहीं, मैंने शिकायत भी कर दी, कि इस पेन बेचने वाले सेलर के इस उत्पाद (प्रोडक्ट) को अमेज़न पर बेचने से रोक लगा दी जाए, ताकि कोई और ग्राहक को परेशानी न हो. मेरी इस शिकायत को आगे बढ़ाया (फॉरवर्ड) गया.
फिर क्या था, कुछ दिन बाद अर्थात आज 12 सितम्बर को उस प्रोडक्ट को अमेज़न पर बेचने से रोक दिया गया. (फोटो में आप देख सकते हैं) ताकि और ग्राहकों को परेशानी का सामना न करना पड़े.
अमेज़न का भारत में ऑनलाइन शौपिंग में नंबर 1 पर रहने का ऐसे ही कई कारण हैं. करोड़ों की खरीद यूं ही नहीं होती इस वेबसाइट से.
भारत में भारतीय ऑनलाइन शौपिंग साईट भी हैं, जो टक्कर देना चाहती हैं, लेकिन अमेज़न को टक्कर देने के लिए उन्हें कड़े निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करना होगा. ग्राहक को सर आँखों पर बैठाना होगा, नहीं तो अमेज़न को टक्कर देना सपना ही रहेगा.
आज हर बहुजन संबधी राजनीतिक पार्टियाँ मान्यवर कांशीराम जी को अपने पार्टी का घोषित करने में लगी हुयीं हैं. हाँ ये अलग बात है, कि कोई भी उनके जैसा काम करने को राज़ी नहीं है. सब अपने मतलब और सत्ता के लालच में हैं. कांशीराम अब नाम नहीं रहा, बल्कि ये एक ब्रांड बन चुका है. जिसके कांशीराम, उसकी जनता, उसकी सत्ता.
तमाम पार्टियों ने जिस तरह से कांशीराम को अपनी पार्टी का पेटेंट करने की कोशिश की है, उस तरह से उनके नक़्शे कदम पर चलने की कोशिश नहीं की. कांशीराम को सिर्फ वही पार्टी अपनी और आकर्षित कर सकेगी, जो उनके नक़्शे कदम पर चलने की ताकत रखती हो और बहुजनों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश कर रही हो. अन्यथा कांशीराम जी कि जन्मदिवस और परिनिर्वाण दिवस मनाना मात्र दिखावा रह जाएगा और ये ज्यादा दिन तक नहीं चल सकेगा, बहुजन जनता बहुत जल्द समझ जाएगी.
बहुजनों अर्थात SC/ST/OBC में हजारों वर्षों से एक कमी है, जिसे बाबा साहेब, कांशीराम जैसे योद्धाओं ने भी दूर नहीं कर पाया, वो है, एकता न होना.
यदि सामान्य वर्ग पर ध्यान दें, तो इनमें जबरदस्त एकता पायी जाती है. ये आपको सुबह लड़ते हुए दिख भी जाएँ तो शाम तब होती है जब एक थाली में खाना खाते हैं. दूसरी और बहुजनों की स्थिति है, जहाँ हमेशा से यही कोशिश रही है कि बहुजन एक हों, लेकिन एक नहीं हो पाते.
कांशीराम जी ने बामसेफ बनाया, और बहुजन समाज पार्टी भी उन्होंने ही बनाई. लेकिन आज उनके बाद स्थिति ये है. कि बामसेफ और बहुजन समाज पार्टी की विचारधारा अलग हो चुकी है. दोनों संस्थान एक दूसरे पर टिप्पणियां करते रहते हैं. इन दोनों के अलावा भी अन्य पार्टियों का भी आपसी मतभेद है.
राजनितिक पार्टियों के अलावा सामाजिक चिंतकों में भी आपसी मतभेद यहाँ तक कि आपसी खटास भी है. जबकि काम बहुजन केन्द्रित ही कर रहे हैं. लेकिन सब अपने को अम्बेडकर विचारक और सामने वाले को दिखावटी घोषित करने में लगे हैं.
बहुजन समाज पार्टी कहती है, चंद्रशेखर की आज़ाद समाज पार्टी RSS से प्रभावित है, चन्द्र शेखर रावण बसपा पर आरोप लगाते हैं. एक पार्टी और है "कांशीराम बहुजन मूलनिवासी पार्टी", ये भी बसपा पर आरोप लगाते हैं. एक पार्टी और है, बी०एम०पी० अर्थात बहुजन मुक्ति पार्टी, जो अपने को बहुजन समर्पित कहती है और ये भी अन्य पार्टियों पर सवाल उठाते हैं. हर पार्टी जोर शोर से बहुजनों को आकर्षित करने में लगे हैं. आखिर बहुजन जाए तो जाए कहाँ ?
हर पार्टी की कोशिश है, कि बहुजनों की सरकार बने, लेकिन ये तभी होगा जब कोई एक प्रमुख पार्टी हो. ऐसा तब होगा जब सभी पार्टियों का विलय हो जाए और कोई एक पार्टी प्रमुखता से सामने आये.
लेकिन फिर के सवाल है, कि किस पार्टी का विलय किस में हो? हर बहुजन पार्टी अपने को अच्छा साबित करने में लगी है और दूसरे की पार्टी को खराब.
एक कारण और है, यदि एक पार्टी दूसरी पार्टी में विलय कर दे, तो स्वत दूसरी पार्टी बड़ी हो जायेगी, और जिसका विलय हुआ है उनके पदाधिकारी जिसमें विलय हुआ है उस पार्टी के पदाधिकारियों से स्वतः छोटे हो जायेंगें. जो कोई भी नहीं चाहेगा.
लखनऊ में BSP, BMP, BKMP कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस मना रही हैं, हो सकता है एक दूसरे पर सवाल भी उठाएं. लेकिन इससे सरकार नहीं बन सकती. इसके लिए एक होना पड़ेगा.
जिस तरह से बहुजन पार्टियों ने अपने अपने में बहुजनों को आकर्षित करने की होड़ शुरू की है. और कांशीराम जी को पेटेंट करने की कोशिश है इससे बहुजन में भी आपसी रंजिश शुरू हो सकती है. इससे सीधा सीध लाभी गैर बहुजन पार्टियाँ उठाएंगी. लेकिन सभी बहुजन पार्टियाँ एक हो जाएँ तो बहुत जल्द बहुजन सरकार बन सकती है. लेकिन इसके लिए सभी पार्टियों को एक मंच पर आकर खुली चर्चा करनी होगी. और एक पार्टी तय करनी होगी.
मैं सच कहूं तो मेरी बुराई करता है
वो झूठ पे झूठ कहे तो उसकी बातों पे मरता है
गलतियाँ करे खुद, उसे शर्म नहीं आती
अपनी गलतियाँ को वो दूसरों पे मढ़ता है
तेरी तस्वीर देख के खुद को रोक लेता हूँ
जब भी नफरत का जूनून सर पे चढ़ता है
बड़ा बनने का रास्ता सिर्फ एक होता है
गलती मान के जो अपना दिल साफ़ करता है
- बृजेन्द्र कुमार वर्मा
-बृजेन्द्र कुमार वर्मा
वो कुछ कर नहीं पाया, तस्वीर दीवार पे लगाए बैठा है,
इश्क ने ऐसा हराया उसे , सदमा दिल पे लगाए बैठा है,
बयाँ करो तो हंस के चले जाते हैं लोग,
यही कारण है कि हर दर्द छुपाये बैठा है
जिन्दगी में आया जो भी, वो धोखा देके जाता रहा
सुना है अब वो अपनी आस्तीन में छुरा छुपाये बैठा है.
जानता है, कोई सुन नहीं सकता इस गम के समंदर को
इसलिए अपनी जुबां पे लगाम लगाए बैठा है
मैं कैसे कह दूं वो शख्स हरामी है,
जो अपनी जिन्दगी भी दांव पे लगाए बैठा है
बिना रिश्वत के वो कुछ कर नहीं सकता
देख लो अभी तक फाइल दबाये बैठा है.
-बृजेन्द्र कुमार वर्मा