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रविवार, जून 22, 2025

ग्रामीण विकास की पुनर्कल्पना: परंपरा, नवाचार और न्याय

- डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा 


 भूमिका

ग्रामीण भारत केवल खेत, खलिहान और मिट्टी का नाम नहीं है, यह एक समृद्ध सांस्कृतिक जीवनधारा है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता, श्रम और आत्मा, सामूहिकता और विविधता का अद्भुत समन्वय है। जब हम ग्रामीण विकास की बात करते हैं, तो यह केवल बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भर नहीं है, बल्कि एक ऐसे सामाजिक ढांचे की रचना है, जो समावेशी हो, न्यायपूर्ण हो, टिकाऊ हो और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करे। हम विकास प्रक्रिया की गहराइयों में जाकर उसकी परिभाषा, चुनौतियों, संभावनाओं और नीतिगत सुधारों की विवेचना कर सकते हैं।

1. ग्रामीण विकास की पारंपरिक अवधारणाएँ और सीमाएँ

ग्रामीण विकास को प्रारंभ में मुख्यतः कृषि उत्पादन, भूमि सुधार, सिंचाई, ग्रामीण बैंकिंग, और प्राथमिक शिक्षा जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति के रूप में देखा गया। भारत के पहले पंचवर्षीय योजना (1951-56) में 'कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम' की शुरुआत हुई, जिसने ग्रामीण भारत को योजनाबद्ध विकास से जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि, इन योजनाओं में स्थानीय सामाजिक संरचनाओं, जाति व्यवस्था, और महिला सहभागिता जैसे पहलुओं की उपेक्षा रही।

वर्षों तक विकास की यह दृष्टि 'टॉप-डाउन' रही — यानी निर्णय और योजनाएँ दिल्ली या राज्य मुख्यालय से बनती थीं, और उन्हें गाँवों पर थोप दिया जाता था। इससे स्थानीय समस्याओं की जटिलता को समझने और समाधान प्रदान करने में असफलता हुई।

2. 'बॉटम-अप' विकास और स्थानीय नवाचार

डॉ. अनिल गुप्ता अपनी पुस्तक में बताते हैं कि गाँवों में केवल 'समस्या' नहीं, समाधान भी विद्यमान हैं। हनी बी नेटवर्क और राष्ट्रीय नवप्रवर्तन फाउंडेशन (NIF) ने हजारों ग्रामीण नवाचारों को संकलित कर यह दिखाया कि सीमित संसाधनों में भी कैसे रचनात्मकता फलती-फूलती है।

Digital Green, e-Choupal, और mKisan जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स ने सूचना, कृषि, और विपणन को डिजिटली जोड़कर गाँवों को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा, परंतु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि इन नवाचारों की सफलता तब ही संभव है, जब स्थानीय साक्षरता, डिजिटल साक्षरता और बुनियादी अवसंरचना मजबूत हो।

3. सामाजिक न्याय के अभाव में अधूरा विकास

भारत का ग्रामीण समाज जाति, वर्ग, लिंग और भू-अधिकार जैसे असमानताओं से व्याप्त है। दलित, आदिवासी, और महिलाएँ अधिकांश योजनाओं में परिधीय भूमिका में रहती हैं। भूमि सुधार अधिनियमों के बावजूद ज़्यादातर भूमि अब भी कुछ ऊँची जातियों के नियंत्रण में है। 

महिलाओं की सहभागिता ग्राम पंचायतों में आरक्षण के माध्यम से बढ़ी है, लेकिन निर्णय-निर्माण की वास्तविक शक्ति अभी भी सीमित है। आत्मनिर्भर गाँव की कल्पना तभी साकार होगी जब सामाजिक न्याय उसकी रीढ़ बने।

4. ग्राम सभा और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण

पंचायती राज व्यवस्था को 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से संवैधानिक दर्जा मिला। ग्राम सभा को गाँव की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक इकाई माना गया, परंतु व्यवहार में यह सशक्त संस्था नहीं बन पाई है। इसके पीछे भ्रष्टाचार, राजनीतिक हस्तक्षेप, और जन-जागरूकता की कमी जैसी अनेक समस्याएँ हैं।

जहाँ ग्राम सभाओं को सक्रिय और निर्णयात्मक इकाई बनाया गया, जैसे केरल का कुदुम्बश्री मॉडल, वहाँ ठोस परिवर्तन देखने को मिले हैं। कुदुम्बश्री (जिसका स्थानीय मलयालम भाषा में अर्थ है "परिवार की समृद्धि") केरल सरकार का चल रहा सहभागी "गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण" मिशन है, जो 1998 में शुरू हुआ था, और महिलाओं के तीन-स्तरीय सामुदायिक नेटवर्क के माध्यम से काम करता है।

5. पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास

गाँवों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः प्रकृति पर आधारित होती है — वर्षा, भूमि, जंगल और जलस्रोत। परंतु वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, और औद्योगिक प्रदूषण ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है। राजस्थान के जल योद्धा राजेन्द्र सिंह ने जल संरक्षण के पारंपरिक तरीकों का पुनरुद्धार करके यह दिखाया कि पर्यावरणीय न्याय से ही टिकाऊ विकास संभव है। महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गाँव ने सामूहिक भागीदारी से वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण, और आजीविका के विविधीकरण का ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है जो देशभर के लिए उदाहरण बन गया है। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित हिवरे बाजार गाँव, सूखे की मार झेलने के बाद वर्षा जल संचयन और जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक मॉडल बन गया है। कभी यह गाँव अत्यधिक गरीबी और पलायन का शिकार था, लेकिन आज यह महाराष्ट्र के सबसे समृद्ध गांवों में से एक माना जाता है, जहाँ कई परिवार करोड़पति हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, हिवरे बाजार का भूजल स्तर नाटकीय रूप से बढ़ा। जहाँ पहले पानी की गंभीर कमी थी, वहीं आज गाँव में 350 कुएं और एक तालाब है, और पानी की आपूर्ति आसपास के गाँवों को भी की जाती है। इस सफलता ने कृषि उत्पादन में वृद्धि की, पशुधन को बढ़ावा दिया, और ग्रामीणों की आय में भारी वृद्धि हुई, जिससे यह गाँव देश के लिए एक आदर्श बन गया है।

6. जलवायु परिवर्तन और ग्रामों की अनुकूलन क्षमता

ग्रामीण क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ रहा है — बेमौसम वर्षा, सूखा, फसलों की विफलता, और जल संकट इसके प्रमुख लक्षण हैं। इन चुनौतियों के उत्तर में ग्राम समुदायों को पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के मेल से समाधान खोजना होगा। जैविक खेती, मिश्रित कृषि प्रणाली, और सामूहिक जल प्रबंधन ऐसे कुछ विकल्प हैं। 

7. ग्राम स्वराज की नई कल्पना: 'ग्राम स्वराज 2.0'

महात्मा गाँधी का 'ग्राम स्वराज' केवल ग्राम स्वशासन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, न्याय, और नैतिकता का आदर्श था। आज की डिजिटल और वैश्वीकृत दुनिया में गाँधी के इस विचार को फिर से पढ़ने और लागू करने की आवश्यकता है — लेकिन आधुनिक संदर्भ में।

'ग्राम स्वराज 2.0' का अर्थ होगा:

  • सूचना और तकनीक आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्था

  • लिंग और जाति आधारित असमानताओं का सक्रिय उन्मूलन

  • प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की जीवन पद्धति

  • नीति निर्माण में वास्तविक ग्राम सहभागिता

निष्कर्ष

ग्रामीण विकास एक बहुस्तरीय और बहुपरिमाणीय प्रक्रिया है जिसमें केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आयाम भी शामिल हैं। यह अध्याय इस बात पर बल देता है कि ग्रामीण भारत को केवल 'पिछड़ेपन' के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार, आत्मनिर्भरता और टिकाऊ जीवन पद्धति की प्रयोगशाला के रूप में देखा जाए।

भारत का भविष्य उसके गाँवों में बसता है, और जब तक गाँवों में न्याय, नवाचार और आत्मबल का आलोक नहीं फैलेगा, तब तक कोई भी विकास अधूरा ही रहेगा।


संदर्भ सूची

  1. Planning Commission (1952), First Five-Year Plan, Govt. of India

  2. Dreze, Jean and Amartya Sen (2013), An Uncertain Glory: India and its Contradictions

  3. Gupta, Anil K. (2016), Grassroots Innovation: Minds on the Margin are not Marginal Minds

  4. ITC e-Choupal Case Study, Harvard Business Review (2003)

  5. Rawal, Vikas (2008), Ownership Holdings of Land in Rural India, EPW

  6. Kabeer, Naila (1999), Resources, Agency, Achievements: Reflections on the Measurement of Women's Empowerment

  7. Mathew, George (1994), Panchayati Raj: From Legislation to Movement, ISS

  8. Kudumbashree Mission Reports, Government of Kerala

  9. Singh, Rajendra (2010), Water Warriors: People's Movement for Water in India

  10. Sinha, D. (2006), Hivre Bazar: A Model Village, Ministry of Rural Development

  11. IPCC Report (2022), Impacts, Adaptation and Vulnerability

  12. TERI (2020), Climate Resilience in Indian Villages

  13. Gandhi, M.K. (1946), Hind Swaraj

  14. Jodhka, Surinder S. (2002), Nation and Village: Images of Rural India in Gandhi, Nehru and Ambedkar

मंगलवार, अगस्त 20, 2024

ये कविता काम आयेगी याद दिलाने में

माँ का दुप्पट्टा जो बदबू से भरा है, 

यही पसीना जिम्मेदार है तुम्हें काबिल बनाने में


सड़ गया जिस्म माँ का घर में,

क्या शेष रह गया जीवन बिताने में.


आज चुप है माँ, बेटे के अफसर बनने पर,

जिसने कभी एलान किया था जमाने में.


चली गयी माँ कुछ शेष न रहा,

अब क्या मिलेगा मुस्कराने में.


औलादों, अपनी माँ की गोद को याद रखना,

उसका भी हिस्सा है, मंजिल दिलाने में.


प्यार, दुलार, समर्पण इसे अपने पास रखना,

काम आएगी नफरत की आग बुझाने में.


मैं वक़्त को रोक तो नहीं सकता लेकिन 

ये कविता काम आयेगी याद दिलाने में 


दोस्तों ऐसा कोई काम न करना 

जो शर्म आये माँ को माँ कहलाने में 


बुधवार, अक्टूबर 19, 2022

वो आएगा तू देखना

 

तू मेहनत कर, कई रिश्ते भी आयेंगे तू देखना,

जो लोग छोड़ चुके हैं, वो मुड़कर भी आयेंगे तू देखना ||

अभी कामयाबी नहीं मिली, कोई बात नहीं,

जिस दिन मिली, उस दिन फ़रिश्ते भी आयेंगे तू देखना ||

अभी मोहब्बत है तो मिल लिया करो,

अगर नाराज हुए, तो मैय्यत पे भी नहीं आयेंगे तू देखना ||

परिंदों की चिंता छोड़, पर आ गये उनके,

चार दिन की बात है, उड़ जायेंगे तू देखना ||

जानता हूँ, शायरी आती नहीं मुझको,

लेकिन आई, तो वो चाँद भी सुनने आएगा तू देखना ||

सबने कहा भूल जा उसे, वो दगाबाज़ निकला

और दिल कहता है, वो आएगा तू देखना ||


(-बृजेन्द्र कुमार वर्मा)

बुधवार, अगस्त 15, 2018

सवार मेरी नाव के

रचना- 15 अगस्त 2018
द्वारा- बृजेन्द्र कुमार वर्मा 
कसीदे गढ़े जाते थे कभी, परिवार की शान के,
आग लगा के जा रहा मुसाफिर सीना तान के.

जब भी मिला वक्त, कुरेदे छाले हर एक पावं के,
और सारे झेल गया जोखिम हर एक दावं के.

लुटेरा जा रहा लूट के धन भी, मन भी, तन... भी,
कमाले ये, खड़े देख रहे सवार मेरी नाव के.
-बृजेन्द्र कुमार वर्मा



गुरुवार, दिसंबर 24, 2015

क्या फ़िल्मी गाने बलात्कार को बढ़ावा देते हैं?, एक अध्ययन

एक और हमारा देश विश्व पटल पर अपना लोहा मनवा रहा है तो दूसरी तरफ हम अन्दर ही अन्दर खोखले होते जा रहे हैं. 12 दिसम्बर 2012 की रात सामूहिक बलात्कार हुआ. उसमें एक नाबालिग भी था जिसे 3 साल की सजा मिली, 20 दिसम्बर 2015 को हाल ही में उसे रिहा कर दिया गया. समाज ने
खैर अब विषयवस्तु पर आते हैं. क्या कभी सोच है हमने कि देश में नाबालिग इस तरह के कृत्य करने पर क्यों उतारू हो रहे हैं?
अगर ये कहा जाए कि देश में फ़िल्मी गाने बलात्कार को बढ़ावा दे रहे हैं तो गलत नहीं होगा. देश में बढ़ रही अश्लीलता और द्विअर्थी संवादों ने बहुत अधिक प्रभावित किया है. फिल्म, नाटक, ऑफिस, मॉल, दुकान, पार्क इत्यादि जगहों पर आपको द्विअर्थी बाते करते यार दोस्त मिल ही जायेंगे.

 हिंदी फिल्में/ अन्य भाषाई गाने कितने जिम्मेदार

आधुनिकीकरण की परिभाषा का हिंदी फिल्मों ने जो शोषण किया है उससे संस्कृति तो गर्त में चली ही गई, अब साथ में संवेदनाएं भी मरती जा रही हैं.
बच्चे कैसे बिगड़ते हैं, कुछ उदहारण देखिये-
"मैन्यु लगा सोलवां साल"- इस गाने को सुनकर नाबालिग या बालिग ये सोचेगे कि आखिर लड़कियों के सोल्वे साल में ऐसा क्या होता है, जिससे लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं, जब उन्हें इसका जवाब नहीं मिलेगा तो वो असली में किसी 16 साल की लड़की के पीछे लग जायेंगे, ये पता लगाने के लिए कि 16 साल कि लड़की होने पर उसके पीछे लोग क्यों पड़ जाते हैं.
बस, यहीं से छेड़खानी की शुरुआत हो जाती है. लड़कियों के पीछे पड़ना अच्छा लगने लगता है और धीरे धीर भटके हुए बच्चे क्राइम की गर्त में चले जाते हैं.

"चढ़ती जवानी" - जब नाबालिग इस गाने को सुनेगे तो पता लगाने की कोशिश करेंगे की आखिर कौन कौन सी सीढ़ी हैं जिनसे जवानी चढ़ती है?, जवानी चढ़ती कैसे है? जवानी चढ़ने से होता क्या है? इन सवालों के जवाब उन्हें पढाई से दूर करने लगते हैं. घर से दूर इन सवालों के जवाब ढूँढने के चक्कर में अप्रत्यक्ष रूप से वे कोई न कोई गलत काम शुरू कर देते हैं. इसमें लड़के एवं लड़कियां दोनों शामिल हैं.

"... मेरी रातों का नशा...सोया हुआ जिस्म जगा" - दिसम्बर 2015 में एक फिल्म रिलीज़ हुए जिसमें ये गाना दिखाया गया. इस गाने को सुन-देख कर जानने की कोशिश जरूर करेंगे कि एक जवान महिला के पुरुष से चिपकने पर ही जिस्म क्यों जाग जाता है. और सुबह जब पूरी दुनिया जाग ही जाती है तो रात को कौन सा जिस्म जगाने की बात कही जा रही है. इस गाने से सिर्फ नाबालिग लड़के ही नहीं कुप्रभावित होंगे अपितु ये लड़कियों को भी भटकाने के लिए काफी है. नाबालिग लड़कियां स्वयं सोचेंगी की आखिर सुबह जागने के बावजूद ऐसा कौन सा हिस्सा है जो सिर्फ पुरुष से चिपकाने पर ही जाग सकता है. ऐसे में छोटी उम्र में वे वो सब करने लग जाती है जो उनके भविष्य और शरीर के लिए नुकसान दायक होता है.

"कान में दम है तो बंद कर वालो"- एक गाने में जोर दिया गया है कि पार्टी होती रहेगी. और कान में दम हो तो बंद करवा लो. "कान" शब्द का ही क्यों प्रयोग किया गया. जबकि दम की ही बात करनी थी तो "हाथों में दम" या फिर "पैरों में दम" की बार करते. कान तो शरीर का एक छोटा सा हिस्सा होता है. इसमें किस तरह ताकत हो सकती है. विश्व में खेले जाने वाले तमाम खेल या होने वाले युद्ध में हाथ पैरों की ताकत दिखाई जाती है. सब जानते हैं कि कान में दम का कोई सार्थक अर्थ नहीं है. ऐसे में इस गाने में "कान" शब्द का इस्तेमाल करके कौन सा अर्थ निकालने की कोशिश की गई ये सभी व्यस्क जानते हैं. फिर भी हमारा समाज और खासकर युवा इस गाने को शादी, पार्टी, मोबाइल फ़ोन में खूब सुनते हैं.

"मैं हूँ बलात्कारी" - इस गाने पर तो पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने समबधित व्यक्ति को कोर्ट में बुलाया था. इस गाने से टीनएजर्स क्या सीखेंगे. खुद ही मूल्यांकन कर लीजिये

भोजपुरी फिल्म/गाने

भोजपुरी गानों ने तो अश्लीलता की हदें ही पार कर दी. इनके पोस्टर भी कम अश्लील नहीं होते. आखिर हम कौन सा समाज तैयार करना चाह रहे हैं. देखिये कुछ उदहारण -
"तेरी गर्मी दूर कर दूंगा", "अइसन दिहलू पप्पी", "हाफ पेंट वाली", "कॉलेज के पीछे, "माल कचा कचवा बनिहें गोलगप्पा", "मार दी कवनो बम", "मन करेला चुसे के होठवा", "देखे वाला चीज बा औढ़निया में", "ए रसीली हो", "मजा लेले माल पटाके", "इतना अप डाउन कईलू चएन फिरी क दिहलू", "लगा दी हमरा लहंगा में मीटर", "भउजी के चोली अलमारी भईल", "फराक तोहर टाईट बा", "मोबाइल दूध पियता", "बजार तोहार गरम बा", "हेड लाईट देखावेली", "सामियाना छेद छेद हो जाई", "बाबू साहेब लहंगा उठाई", "छेदवा छोट बा", "जींस ढीला हो जाई", "डाल तनी लूर से ना", "आपन ओढ़नी बिछाव गमछा छुट गईल बा घरे".... और भी कई गानों के बोल हैं.
इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि द्विअर्थों का प्रभाव बढ़ रहा है. यहाँ एक बात और बतानी जरूरी है, चूंकि द्विअर्थी संवाद में हंसी आने पर नाबालिग इस और खींचे चले जाते हैं, ऐसे में जो भाषा पुस्तकों में लिखी होती है वो छात्र छात्राओं को रोचक नहीं लगती. नतीजा ये होता है नाबालिग पुस्तकों से दूर हो जाते हैं. पढ़ने में मन नहीं लगता, फिर परीक्षा में पास होने के लिए नक़ल करते हैं, और अगर फ़ैल हो गये तो ख़ुदकुशी जैसे गलत कदम उठाने लगते हैं. ये प्रक्रिया देश के भविष्य को खोखला करती जाती है.

सोशल मीडिया और नाबालिग 

 नए जमाने में नाबालिगों का मनोरंजन करने का ढंग काफी बदला है. इससे अचरज नहीं होना चाहिए कि बच्चे अब मैदान में खेलने के बजाए घर में मोबाइल फ़ोन या इन्टरनेट पर आँखें गढ़ाए रहते हैं. वाट्स एप, फेसबुक, यू ट्यूब पर अकाउंट बनाते हैं और इसकी लत पड़ जाती है. स्कूलों में मोबाइल फ़ोन ले जाना, क्लास बंक करना जैसे गलत काम शुरू कर देते हैं. इसके अलावा बॉय फ्रेंड/गर्ल फ्रेंड बनने या बनाने लगते हैं. और ऐसे बच्चे समुचित विकास और समुचित शिक्षा को खो देते हैं. यही कारण है कि यौन शिक्षा देना आज के दौर में कितना जरूरी हो गया है.

दोस्तों 21वीं सदी का मतलब लोगों ने ये नहीं लगाया था कि लोगों के तन से कपड़े गायब हो जायेंगे. हिंदी फिल्मों के पोस्टर, उनके गाने, और संवाद ने लोगों को अश्लील मनोरंजन परोसा है. फिल्मों ने लोगों को संवाद का नया आयाम दिया जिसमें अश्लीलता आने लगी. भले ही शुरू में ये अच्छा लगता हो, पर इसने लोगों के दिमाग में गन्दगी भर दी है. वर्तमान में हो रही छेड़-छाड़ और बलात्कार, यौन शोषण जैसे अपराध इसी का नतीजा है. बड़ों को समझाने के समय तो गया, पर नाबालिगों को बर्बाद होने से बचा सकते हैं.

जो पेड़ तिरछे हो गये उन्हें तो सीधा नहीं किया जा सकता, उन्हें सिर्फ काटा जा सकता है, परन्तु जो पौधे तिरछे हो रहे हैं उन्हें तो सहारा देकर सीधा किया जा सकता है. क्यूं हम उसके तिरछे होकर पेड़ बनने का इंतज़ार करें और तब काट दें. पेड़ काटना कोई समाधान नहीं है. पेड़ काट काट कर तो बगीचा ही ख़तम हो जाएगा. क्यूं न ऐसा रास्ता निकला जाए कि बगीचा भी हरा भरा हो और हर पेड़ सीधा बढ़ता रहे.
जरा कल्पना तो कीजिए.


सन्दर्भ (द्वितीयक आकड़े)
1. http://www.bhojpurixp.com/bhojpuri-me-aslilta-ka-part-3/
2. http://emalwa.com/entertainment/%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A4%A8
3. इंटरनेट. 

शुक्रवार, मई 29, 2015

हाँ

किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ न मिला है और न ही मिल सकता है.
हमें सिर्फ ये प्रयास करते रहना चाहिए कि हम समझ में अच्छे से अच्छा कर सकें. बाकि सब भगवान् पर छोड़ देना चाहिए.
कहते हैं, जिसके कर्म सही हैं उसका सब कुछ सही है. और जिसके कर्म ख़राब हैं, वो कितना ही अच्छा दिखावा कर ले. पर उसका प्रतिफल उसे उसके कर्मों के अनुसार ही मिलता है.