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मंगलवार, अगस्त 20, 2024

ये साल भी कितना मगरूर है.

 वो शख्श, जो अभी दूर है,

तुम्हें पता ही नहीं कितना मजबूर है.


अब वो रात में बस तारे गिनता है 

जिस पर किताबों का फितूर है.


डरता है, कहीं बदनाम न हो जाए 

उसके पिता को उसपर गुरूर है 


वो चली गयी तो क्या हुआ 

उसकी आँखों में तो मेरा ही नूर है 


चली थी हवा कि सब गुजर जायेगा,

उफ़ | ये साल भी कितना मगरूर है. 


शनिवार, सितंबर 24, 2022

ग्रामीण विकास में प्रत्यक्ष अवरोध है लंपी वायरस

बृजेन्द्र कुमार वर्मा,

(लेखक- ग्रामीण विकास संचारक हैं)

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लंपी वायरस ने यह स्थिति ला दी है कि समाज वैज्ञानिकों का ध्यान ग्रामण विकास और लगातार प्रभावित हो रहे दुग्ध उत्पादन की ओर जाने लगा है। ग्रामीण अपने विकास के लिए लगातार संघर्षरत रहा है, लेकिन लम्पी वायरस ने ग्रामीण विकास के विभिन्न अवरोधों में एक अवरोध को और बढ़ा दिया है, जो भारत के विभिन्न राज्यों के लिए चिंता का विषय बन चुका है, वह है मवेशियों में फैला लंपी त्वचा रोग। जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो बहुत जल्द पशुधन उत्पादन महंगा होने लगेगा, क्योंकि हजारों दुधारू गायों की मृत्यु हो चुकी है, और अब भी लगातार मर रही हैं। मीडिया कवरेज में ड्रॉन की मदद से ऊंचाई से लिए कई फुटेज देखने के बाद ऐसा लगता है कि लंपी से मरने वाले मवेशियों की संख्या राष्ट्र स्तर पर लाख से ऊपर भी हो सकती है। समाचार पत्रों की माने तो कई राज्यों में 10-10 हजार से ज्यादा गायों की मौत हो चुकी है। राहत की बात यह है कि ये रोग पशुओं से इंसानों में नहीं फैलता है, लेकिन फिर अप्रत्यक्ष रूप से वे इंसान प्रभावित हुए हैं, जो पशुधन रखते हैं, और जिनके मवेशी लंपी वायरस की चपेट में आ गए हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन होता है, जिसे विभिन्न संसाधनों द्वारा शहरों में पहुँचाया जाता है। गाँव के मवेशी पालक अपने मवेशियों का दूध निकालकर नजदीकी डेयरी को बेच देते हैं अथवा स्वयं दुग्ध उत्पाद बनाते हैं, जैसे दही, मट्ठा, मक्खन, घी, पनीर और उसे नजदीकी बाजार अथवा ठेकेदारों को बेच देते हैं। बात आती है उनके लाभ की। दुग्ध उत्पादों की बिक्री से मिलने वाले पैसों से ये मवेशी पालक अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। वर्तमान में भारत में हजारों मवेशी पालक इस समय सदमें में जी रहे हैं, उनका घर चलाने वाली गाय लंपी वायरस से ग्रसित है। गाय तो ग्रसित है ही, उनके पालक भी चिंता में समय काट रहे हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति भी खतरे में है। ऐसे में यदि दुधारू मवेशियों की लंपी वायरस से जाने जाएंगी अथवा बीमारी से ग्रसित होती जाएंगी तो दुग्ध उत्पादन पर सीधा प्रभाव पडे़गा। इससे पालकों को आर्थिक नुकसान तो होगा ही, साथ ही राष्ट्र का पशुधन भी प्रभावित होगा।

बीमारी की बात करें तो विशेषज्ञ बताते है कि यह गांठदार त्वचा रोग है, जिसे अंग्रेजी में लंपी स्कीन डिजीजकहते हैं, यह मवेशियों में होने वाला एक संक्रामक रोग है, जो पॉक्सविरिड परिवार के एक वायरस के कारण होता है। इसे नीथलिंग वायरस भी कहा जाता है। इस रोग के कारण पशुओं की त्वचा पर गांठें बन जाती हैं, मुंह से, नाक से स्त्राव होने लगता है। यह रोग त्वचा, श्लेष्मा झिल्ली और श्वसन मार्ग को प्रभावित करता है। साथ ही दो से तीन सेंटीमीटर बड़ी गांठें पड़ जाती हैं, बुखार आता है, शरीर में सूजन आने लगती है, कुछ समय बाद चलने में, खड़े होने में दिक्कत होने लगती है। यह रोग मच्छर, मक्खी और परजीवी से एक दूसरे में तेजी से फैलता है। यह बीमारी इतनी घातक होती है कि यदि समय पर इलाज न हो तो गायों की मृत्यु तक हो जाती है, और गाय ठीक भी हो जाए तो भविष्य में दूध कम उत्पादित करती हैं, बांझपन तक आ जाता है। साधारण शब्दों में कहें तो गाय पालने वाले (पालक) को आर्थिक नुकसान होता है।

उत्तर प्रदेश में आंकड़ों के अनुसार लगभग साढ़े पाँच लाख से अधिक मवेशियों का टीकाकरण किया जा चुका है। अभी पश्चिमी क्षेत्र में लंपी वायरस फैला हुआ है, जो पूर्व की ओर बढ़ रहा है। हाल ही में 8 सितंबर 2022 को उत्तर प्रदेश पशुधन विभाग के विशेष सचिव ने पूर्वी क्षेत्र को सुरक्षित करने व वायरस के प्रसार को रोकने के लिए एक मास्टर प्लान की बात कही है। विभाग के अनुसार मलेशिया देश की तर्ज़ पर पीलीभीत से लेकर इटावा तक लगभग 300 कि0मी0 की दूरी को 10 कि0मी0 चौड़े इम्यून बेल्ट से कवर करने का मास्टर प्लान तैयार किया है। यह बेल्ट एक तरह से बॉर्डर का काम करेगी और लंपी वायरस इसे पार कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पूर्वी उत्तर प्रदेश की तरफ नहीं जा सकेगा।

पशुपालन विभाग के अनुसार वैक्सीनेशन के ज़रिये इम्यून बेल्ट बनाने की तैयारियाँ पूरी की जा चुकी हैं। विभाग की माने तो इस पूरी बेल्ट में पशुओं में शत-प्रतिशत टीकाकरण की बात कही गयी है। निगरानी के लिये विशेष टास्क फोर्स होगी, जो लंपी वायरस से संक्रमित पशुओं की ट्रैकिंग और ट्रीटमेंट का ज़िम्मा संभालेगी। 2020 में ऐसा प्रयास मलेशिया में किया गया था, वहाँ की सरकार ने इसके सकारात्मक परिणाम बताए थे। यदि उत्तर प्रदेश ऐसा करने में सफलता प्राप्त कर लेता है तो पूर्वी क्षेत्र में लाखों मवेशियों को प्रभावित होने से रोका जा सकता है, यह उत्तर प्रदेश के लिए किसी विशेष उपलब्धि से कम नहीं होगी।

मृत्यु दर के बारे में बताया जा रहा है कि लंपी स्किन डिजीज से पीड़ित पशुओं में मृत्यु दर 1 से 5 प्रतिशत तक है, हालांकि संकर नस्ल के गौवंश में मृत्यु दर अधिक देखी गयी है। यूरोप, रूस, कजाकिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, भूटान, नेपाल और भारत में अलग-अलग समय में इसके मामले पाए गए हैं। इस समय गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश, आदि कई प्रदेशों के दुधारू मवेशियों में लंपी स्किन डिजीज फैली हुई है।

लंपी स्किन बीमारी मूल रूप से अफ्रीका में शुरू हुई और अफ्रीका के कई देशों में है. बताया जाता है कि 1929 में इस बीमारी की शुरुआत जाम्बिया देश में हुई थी, जहाँ से यह दक्षिण अफ्रीका में फैल गई। 21वीं सदी के दूसरे दशक की शुरूआत से ही यह बीमारी तेजी से फैल रही है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो 2019 में बांग्लादेश और चीन में तेजी से फैली, इसके बाद 2020 में नेपाल और भूटान में देखने को मिली और 2021 के अंतिम महीनों में भारत में लक्षण देखे जाने लगे और जुलाई 2022 से अब तक हजारों की संख्या में गाय मर चुकी हैं और लाखों प्रभावित हो चुकी हैं, हालांकि इनमें से हजारों की संख्या में ठीक भी हुई हैं।

पशुधन अधिकारी मवेशी पालकों को सलाह देते हैं कि वे मवेशियों के आसपास गंदगी न फैलने दें, मच्छर, मक्खियों, कीटों से मवेशियों को दूर रखें, कोई मवेशी जब लंपी वायरस से प्रभावित हो जाए तो उसे तुरंत अन्य मवेशियों से दूर कर दें और इलाज कराएं।

भारत के लिए पवित्र और करोड़ों ग्रामीणों का भरण-पोषण करने व दूध देने वाली गाय आज अपने जीवन के लिए इंसानों पर निर्भर हो चुकी हैं। ऐसे में भारत के पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम को तेजी लाते हुए बहुत जल्द ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे विभिन्न राज्यों में लम्पी वायरस से प्रभावित गायों का आसानी से, समय रहते और मुफ्त इलाज किया जा सके। हालांकि विभिन्न राज्य सरकारों ने टीकाकरण अभियान चलाया हुआ है। इसके अलावा पशु चिकित्सा विभाग ग्रसित मवेशियों का इलाज भी कर रही है, लेकिन सीमित संसाधनों और सीमित कर्मचारियों की संख्या के कारण ग्रसित मवेशियों तक पहुंच कम है, साथ ही कुछ सामज सेवी ऐसे भी हैं, जो ग्रसित मवेशियों के इलाज में हर तरह की मदद कर रहे हैं। कोविड-19 के आने पर जिस तरह से भारत ने मुस्तेदी से काम किया, उसी तरह से मवेशियों के लिए भी टीकाकरण में भी तेजी लानी होगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य पहचानों में से एक पहचान पशुपालन भी है। कई परिवार गाय, भेंस, बकरी, ऊंट पालते हैं एवं उनसे मिलने वाले दूध को बेचकर घर चलाते हैं। कई परिवार अंडा एवं मांसाहार के लिए भेड़, बकरी, मछली, मुर्गी, बत्तख आदि का पालन करते हैं। कई जातियाँ परम्परागत रूप से इस कार्य से जुड़े हैं एवं परिवार का भरण-पोषण करते हैं। पशुधन ग्रामीण आर्थिक विकास में खासा महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दक्षिण भारत में मछली पालन के लिए सरकार प्रोत्साहन देती है। उत्तर भारत में ऐसे ग्रामीण, जो मुर्गी अथवा मछली पालन करना चाहते हैं, उनके लिए सरकार ने कई प्रकार से प्रोत्साहन नीतियां बनाई हैं। ये सब कार्य इसलिए ही किए जा रहे हैं, क्योंकि सरकार ग्रामीण विकास के विभिन्न उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करती है। लंपी वायरस ने ग्रामीण विकास के लिए सरकार के सामने चुनौती प्रस्तुत की है। इस लंपी वायरस ने हजारों मवेशियों को निगल लिया है। लेकिन अब और नुकसान नहीं उठाया जा सकता। राज्य सरकारों को पशुधन अथवा पशु चिकित्सा विभाग के अलावा अन्य विभागों का साथ चाहिए हो तो देरी नहीं करनी चाहिए, ताकि आने वाले समय में लंपी वायरस को रोका ही न जाए अपितु, जड़ से खत्म कर दिया जाए। सरकार चाहे तो इसके लिए निजी संसाधनों का भी उपयोग कर सकती है, बस उद्देश्य लंपी स्किन रोग को खत्म करने का होना चाहिए।

शनिवार, अगस्त 06, 2022

भारत की आम जनता के लिए अहम क्यों है ई0डी0 अर्थात प्रवर्तन निदेशालय

गैर कानूनी लेनदेन एवं विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन पर रहती है नजर

 बृजेन्द्र कुमार वर्मा,

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार अध्ययनकर्ता हैं)

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आजकल ई0डी0 विभाग पूरे भारत में चर्चे में है। भारत में हो रहे गैर कानूनी लेनदेन एवं विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन पर इसकी नजर होती है। आम जनता को यह तो पता है कि ई0डी0 लोगों के घर से अवैध रूपयों को जब्त करता है, लेकिन यह कार्य करता कैसे है, यह बहुत कम लोगों को पता है, जबकि आम जनता को ई0डी0 के बारे में अवश्य ही पता होना चाहिए। क्योंकि देखा जाए तो अप्रत्यक्ष रूप से ई0डी0 आम जनता की गाढ़ी कमाई, जिसे अपराधियों ने अवैध रूप से अपने घरों में जमा कर रखा है, को ही बरामद करता है।

0डी0 अर्थात प्रवर्तन निदेशालय के इतिहास की बात करें तो इसकी स्थापना 01 मई, 1956 को हुई थी। विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947’ (फेरा, 1947) के अंतर्गत विनिमय नियंत्रण विधियों के उल्लंघन को रोकने के लिए आर्थिक कार्य विभाग के नियंत्रण में एक प्रवर्तन इकाई का गठन का गया था। इसका मुख्यालय दिल्ली बनाया गया। कुछ समय बाद वर्ष 1960 में इस निदेशालय का प्रशासनिक नियंत्रण, आर्थिक कार्य मंत्रालय से राजस्व विभाग में हस्तांतरित कर दिया गया। कुछ वर्षों बाद फेरा-47’ को हटाकर इसके स्थान पर फेरा, 1973 आ गया। तत्कालीन निदेशालय को मंत्रीमण्डल सचिवालय, कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में रखा गया।  इसे भी बदलकर 01 जून, 2000 से एक नई विधि विदेशी मुद्रा अधिनियम, ’1999-फेमा लागू किया गया। बाद मे, अंतर्राष्ट्रीय धन शोधन व्यवस्था के अनुरूप, एक नया कानून धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) बना और प्रवर्तन निदेशालय को 1 जुलाई 2005 से पीएमएलए को प्रवर्तित करने का दायित्व सौंपा गया। हाल ही में, विदेशों में शरण लेने वाले आर्थिक अपराधियों से संबंधित मामलों की संख्या में वृद्धि के कारण, सरकार ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018’ (एफइओए) पारित किया है और प्रवर्तन निदेशालय को 21 अप्रैल, 2018 से इसे लागू करने का दायित्व सौंपा गया है। वर्तमान में, निदेशालय राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में है।

भारत सरकार का प्रवर्तन निदेशालय एक बहु-अनुशासनिक संगठन है, जो धन शोधन (मनी लॉन्डरिंग) के अपराध और विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन की जांच करता है। ई0डी0 कई अधिनियमों के तहत कार्यवाही करते हैं। ई0डी0 के अनुसार, ’धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002’ (पीएमएलए) एक आपराधिक कानून है, जिसे धन शोधन (मनी लॉन्डरिंग) को रोकने के लिए और इस से प्राप्त संपत्ति की जब्ती का प्रावधान करने के लिए बनाया गया है। जब कोई मनी लॉन्डरिंग से धन एकत्रित करता है, तो ऐसे अपराधी के खिलाफ इस अधिनियम के तहत कार्यवाही की जाती है। इसी प्रकार ई0डी0 ’विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999’ (फेमा) के तहत भी कार्यवाही करता है। अधिनियम के अनुसार, यह एक नागरिक कानून है, जो विदेशी व्यापार और भुगतान की सुविधा से संबंधित कानूनों को समेकित और संशोधित करने और भारत में विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित विकास और रखरखाव को बढ़ावा देने के लिए अधिनियमित किया गया है। प्रवर्तन निदेशालय को विदेशी मुद्रा कानूनों और विनियमों के संदिग्ध उल्लंघनों के अन्वेषण करने, कानून का उल्लंघन करने वालों को न्याय निर्णित करने और उन पर जुर्माना लगाने की जिम्मेदारी दी गई है। इसी प्रकार भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018’ (एफईओए) के अंतर्गत ई0डी0 कार्य करता है। यह कानून आर्थिक अपराधियों को भारतीय न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से बाहर भागकर भारतीय कानून की प्रक्रिया से बचने से रोकने के लिए बनाया गया था। इस कानून के अंतर्गत ई0डी0 ऐसे भगोड़े आर्थिक अपराधी, जो गिरफ्तारी से बचते हुए भारत से बाहर भाग गए हैं, उनकी संपत्तियों को कुर्क करने का प्रावधान है। ई0डी0 इनके अलावा विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम, 1974’ (सीओएफइपीओएसए) के तहत, इस निदेशालय को फेमा के उल्लंघनों के संबंध में निवारक निरोध के मामलों को प्रायोजित करने का अधिकार है।

0डी0 की कार्यप्रणाली पर नजर डालें तो पता चलता है कि प्रवर्तन निदेशालय का एक निदेशक होता है, जिसके अधीनस्थ क्षेत्र स्तर के विशेष निदेशक कार्य करते हैं। यह केन्द्र स्तर पर कार्य करते हैं। कार्य संचालन के लिए क्षेत्र का बंटवारा पश्चिम क्षेत्र, उत्तर क्षेत्र, दक्षिण क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, और पूर्वी क्षेत्र के रूप में किया गया है। विशेष निदेशक के नीचे संयुक्त निदेशक होते हैं, जो क्षेत्र के विभिन्न जोन के लिए कार्य करते हैं। संयुक्त निदेशक के नीचे का कार्य उपनिदेशक देखते हैं। इतना ही नहीं विधिक सलाह एवं अन्य संबंधित कार्य के लिए संयुक्त सचिव नियुक्त किए जाते हैं। भारत के जिस क्षेत्र में विदेशी मुद्रा अथवा अवैध संपत्ति अथवा मनी लॉन्डरिंग जैसी अपराध होते हैं, वहां के क्षेत्रीय ई0डी0 अधिकारी कार्यवाही करते हैं, एवं रिपोर्ट सीनियर अधिकारी को अथवा कार्यालय को प्रेषित की जाती है।

0डी0 द्वारा की गयी विभिन्न कार्यवाहियों पर बात करें, तो भारत में हो रहे मनी लॉन्डरिंग, अवैध लेन-देन जैसे अपराधों की पोल खुल जाती है। आंकड़ों के अनुसार, ’धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) - 2002’ के अंतर्गत 31 मार्च 2022 तक कुल 5422 मामले दर्ज किए गए। इसमें 1739 मामलों में कुर्की का आदेश दिया जा चुका है। ई0डी0 द्वारा कुर्क की गयी कुल परिसम्पत्तियों का कुल मुल्य 104702 करोड़ रुपये है। पुष्ट अनंतिम कुर्की आदेशों की संख्या 1369 तथा न्यायनिर्णयन प्राधिकरण द्वारा अनंतिम कुर्की आदेशों के तहत कुर्क की गई परिसंपत्तियों का मूल्य 58591 करोड़ रूपये है। ई0डी0 ने इस अधिनियम के तहत 400 लोगों को गिरफ्तार भी किया है। दर्ज शिकायतों में 992 अभी भी विचाराधीन हैं। ई0डी0 ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा), 1999’ के तहत भी विभिन्न कार्यवाही को अंजाम दिया है। इस अधिनियम के तहत ई0डी0 ने 31 मार्च 2022 तक कुल 30716 मामलों की जाँच आरंभ की, जिसमें 15495 जाँच पूरी कर ली गयीं। 8109 लोगों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जबकि न्याय-निर्णीत कारण बताओ नोटिस 6472 लोगों को दिया गया। ई0डी0 ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018’ (एफईओए) के तहत भी कार्यवाही की है। इसमें 14 व्यक्तियों के विरुद्ध एफईओए के तहत कार्रवाई आरंभ की गयी, जिसमें  एफ000 घोषित व्यक्तियों की संख्या 09 है। अधिनियम के तहत जब्त की गयी परिसम्पतियों का कुल मूल्य 433 करोड़ है।

            वर्तमान में ई0डी0 भारतीय मीडिया में छाया हुआ है। ई0डी0 की कार्यवाही में जिस प्रकार से लोगों के घरों में भरा पड़ा पैसा बरामद किया जा रहा है, वह कहीं न कहीं आम जनता के खून पसीने की कमाई है, जिसे अपराधियों ने गलत तरीकों से इक्टठ्ठा किया है। भारत की गरीब जनता कहीं न कहीं ई0डी0 का धन्यवाद ही दे रही होगी, जो अवैध पैसा को बरामद कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक पार्टियां ई0डी0 के दुरुपयोग किए जाने की बात कर रही हैं। यदि ऐसा है तो यह भी सिद्ध करना चाहिए कि जिन पर ई0डी0 कार्यवाही करके करोड़ों बरामद कर रही है, वह पैसा आखिर आ कहां से रहा है। गैर-कानूनी तरीकों, मनी लॉन्डरिंग करने या विदेशों से अवैध लेन-देन से एकत्रित की गयी अवैध सम्पत्ति को यदि ई0डी0 बरामद कर भी रही है, तो इसे राजनीतिक नहीं कहना चिहए, क्योंकि यह आम जनता के हक का रूपया है, जो उन तक पहुंच ही नहीं पाया। ऐसी कार्यवाही लगातार होती रहनी चाहिए, फिर सरकार किसी भी पार्टी की ही क्यों न हो।

मानसून में मत्स्य पालकों की स्थिति और संचालित योजनाओं का प्रभाव

मत्स्य पालन संबंधी योजनाओं को हितधारकों तक पहुंचाने से होगी विकास की डोर मजबूत

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार के अध्ययनकर्ता हैं)

बृजेन्द्र कुमार वर्मा 

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मछलियों के प्रजनन और मछली स्टॉक के संरक्षण के लिए तमिलनाडु की राज्य सरकार प्रजनन काल में मछुवारों को गहरे समुद्र में जाने के लिए रोकती है। इस साल भी परिस्थितियों के अनुसार राज्य सरकार ने मत्स्य पालन नियमन अधिनियम, 2001 के प्रावधानों के तहत प्रतिबंध लागू किया जो 15 अप्रैल 2022 से 14 जून तक रखा गया। जो मछुवारे मशीन नौकाओं का प्रयोग करते हैं, वे प्रतिबंध काल में गहरे समुद्र में नहीं जा सकते, यद्यपि पारंपरिक और देशी नौकाओं को छूट है। मत्स्य पालकों के लिए ये तीन महीने आर्थिक स्थिति के लिए काफी कठिन होते हैं। छोटे किसानों के लिए कभी-कभी संकट का समय भी आ जाता है। यही कारण है कि केन्द्र सरकार व राज्य सरकार इनके लिए कोई न कोई योजनाओं का लाभ देकर इनका संरक्षण करती है। प्रतिबंध के दौरान तमिलनाडु सरकार ने प्रत्येक मछुआरे को मासिक सहायता 6,000 रुपए दिए।

मत्स्य पालन भी भारत में भोजन, रोजगार और आय का महत्वपूर्ण स्त्रोत है। यह क्षेत्र लगभग 1.60 करोड मछुआरों तथा मत्स्य पालक किसानों को प्राथमिक स्तर पर आजीविका प्रदान करता है। इनमें अधिकतर वे मछुवारे हैं, जोकि आर्थिक रूप से पिछड़े एवं कमजोर वर्ग के हैं। भारत सरकार ने भी इनके कल्याण पर ध्यान दिया ताकि कमजोर वर्ग के मुछवारों को सशक्त बनाया जा सके। इस ध्यान में रखते हुए मत्स्य, पशु पालन एवं डेयरी मंत्रालय के मत्स्य पालन विभाग ने 2015 से 2020 तक 5 वर्ष के लिए राष्ट्रीय मछुआरा कल्याण योजना चलाई। वर्तमान में मत्स्य पालन विभाग प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना चला रहा है।

योजना की बात करें तो आंकड़ों के अनुसार इसमें 2020 से 2025 के बीच 5 वर्ष के लिए लगभग 20050 करोड़ रुपए का अब तक का सर्वाधिक निवेश किए जाने की संभावना है। इस निवेश को मत्स्य पालन क्षेत्र को टिकाऊ बनाने में लगाया जाएगा, साथ ही मत्स्य पालन किसानों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण में भी खर्च किया जाना है। जब मछुआरों का समुद्र में प्रवेश प्रतिबंधित होता है अथवा जिस अवधि में मछलियां बहुत कम मिलती हैं, उस दौरान मत्स्य किसानों की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है। ऐसे में सरकार प्रत्येक मछुवारे को आर्थिक सहायता प्रदान करना आवश्यक हो जाता है।

            मुछवारों के लिए चलाई जा रही योजनाओं में सिर्फ आर्थिक सहायता ही शामिल नहीं होती, अपितु बीमा आदि का भी प्रावधान होता है। राज्य अथवा केन्द्र सरकार के द्वारा दिए जाने वाले बीमा में दुर्घटना में हुई मृत्यु अथवा स्थाई पूर्ण अपंगता होने पर 5 लाख रूपये, स्थाई आंशिक अपंगता होने पर 2.5 लाख रूपये और दुर्घटना होने पर अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में 25000 रूपये बीमा के जरिए प्रदान किया जाता है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना में फरवरी 2022 तक इस योजना के क्रियान्वयन पर केंद्र के हिस्से के रूप में 369.55 करोड रुपए की राशि खर्च की जा चुकी है।

            आंकड़े हमेशा अच्छे लगते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। पिछले साल 2021 में तमिलनाडु में मछुवारा संगठन भारतीय समुद्री मत्स्य पालन विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और रैलियां कर रहे थे। तमिलनाडु-पुडुचेरी मछुवारा संघ ने जोर-शोर से विधेयक की खिलाफत की थी।

यद्यपि यह भी आवश्यक है कि प्रजनन काल में मछलियों को न पकड़ा जाए, और साथ ही इस काल के दौरान मछुवारों को उनके क्षेत्र में नहीं जाना चाहिए। लेकिन कुछ असामाजिक तत्व सरकार की बात नहीं सुनती और कानून का उल्लंघन करती है। ऐसे में जब काननू बनता है, तो उसके दायरे में कमजोर तबके के मत्स्य पालन किसान भी आ जाते हैं। कमजोर तबके के किसान इस प्रतिबंध काल में आर्थिक संकट को झेलने के लिए विवश हो जाते हैं। जब कभी कोई मछुआरा प्रावधानों के तहत प्रतिबंध आदेश का उल्लंघन करता है, तो मशीनीकृत नाव मछुआरों के खिलाफ नावों के लाइसेंस रद्द करने तक जैसी कार्यवाही की जाती है। इसमें प्रवर्तन एजेंसियां, भारतीय तटरक्षक, तमिलनाडु मरीन पुलिस और मत्स्य विभाग आदि की नजर रहती है। प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय मानकों और प्रक्रियाओं के अनुरूप होते हैं। इस प्रकार के प्रतिबंध अमरीका, स्पेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी हर साल लगाए जाते हैं। भारत में यह नियम पहली बार केरल में लागू हुआ था।

मानसून काल में मछलियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है, जिस प्रकार से मछुवारों को आर्थिक संरक्षण दिया जाता है, उसी प्रकार से मछलियों के लिए भी सरकार को संरक्षण के लिए निर्णय लिया जाना चाहिए, जोकि समुद्र में जाने के प्रतिबंध से अलग हो। क्योंकि कानून बनाने के बावजूद भी कुछ असामाजिक तत्व मछलियां पकड़ते ही हैं, जिन पर आए दिन कार्यवाही होती है। समुद्री मछली संरक्षण के अलावा तालाबों में मछली पालन को बढ़ावा दिया जा सकता है, जिसके लिए जागरूकता की अति आवश्यकता होगी। मानसून में भारत की लगभग आधी आबादी बाढ़ जैसे हालातों से गुजर रही है। यही पानी का यदि संरक्षण किया जाए, तो यह बरसात का पानी मछलियों की जनसंख्या के लिए अमृत सिद्ध हो सकता है। इसके अलावा बड़े तालाबों, झीलों, नहरों के निर्माण से रोजगार का भी सजृन होगा और साथ ही मत्स्य पालकों को भी इस ओर आकर्षित किया जा सकेगा। भारत में प्रधानमंत्री ने स्टार्ट-अप की रूप रेखाओं के आधार पर युवाओं को इस ओर आकर्षित किया है। ऐसे में युवाओं को मत्स्य पालन की ओर भी व्यवसाय की दृष्टि से आकर्षित किया जा सकता है। तालाबों का निर्माण, निजी जमीन पर तालाबों के लिए सब्सिडी जैसी सहायता, मत्स्य पालन जागरूकता अभियान इसमें सहायक हो सकते हैं। हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं से नीली क्रांति लायी गयी थी। इस नीली क्रांति से कई लक्ष्यों को प्राप्त किया गया था। आज बारिश के पानी को बचाना बेहद आवश्यक है, क्योंकि इससे लगातार कम हो रहे जमीनी पानी को रोका जा सकता है, लेकिन साथ ही अधूरे पड़े, अव्यवस्थित हो चुके तालाबों के पुनर्निमाण, सुधार, मरम्मत, जीर्णाद्धार करना आवश्यक है। ऐसा करने पर ही राज्य, केन्द्र द्वारा चलाए जा रहे मत्स्य संबंधी विभिन्न योजनाओं को सफल किया जा सकता है, साथ ही समुद्री क्षेत्र से दूर स्थित मैदानी क्षेत्रों में भी आसानी से मत्स्य बाजार को बढ़ाया जा सकता है। यही मत्स्य पालन किसानों और क्षेत्रीय विकास के लिए उत्तम प्रयास होगा।