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शनिवार, अगस्त 06, 2022

भारत की आम जनता के लिए अहम क्यों है ई0डी0 अर्थात प्रवर्तन निदेशालय

गैर कानूनी लेनदेन एवं विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन पर रहती है नजर

 बृजेन्द्र कुमार वर्मा,

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार अध्ययनकर्ता हैं)

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आजकल ई0डी0 विभाग पूरे भारत में चर्चे में है। भारत में हो रहे गैर कानूनी लेनदेन एवं विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन पर इसकी नजर होती है। आम जनता को यह तो पता है कि ई0डी0 लोगों के घर से अवैध रूपयों को जब्त करता है, लेकिन यह कार्य करता कैसे है, यह बहुत कम लोगों को पता है, जबकि आम जनता को ई0डी0 के बारे में अवश्य ही पता होना चाहिए। क्योंकि देखा जाए तो अप्रत्यक्ष रूप से ई0डी0 आम जनता की गाढ़ी कमाई, जिसे अपराधियों ने अवैध रूप से अपने घरों में जमा कर रखा है, को ही बरामद करता है।

0डी0 अर्थात प्रवर्तन निदेशालय के इतिहास की बात करें तो इसकी स्थापना 01 मई, 1956 को हुई थी। विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947’ (फेरा, 1947) के अंतर्गत विनिमय नियंत्रण विधियों के उल्लंघन को रोकने के लिए आर्थिक कार्य विभाग के नियंत्रण में एक प्रवर्तन इकाई का गठन का गया था। इसका मुख्यालय दिल्ली बनाया गया। कुछ समय बाद वर्ष 1960 में इस निदेशालय का प्रशासनिक नियंत्रण, आर्थिक कार्य मंत्रालय से राजस्व विभाग में हस्तांतरित कर दिया गया। कुछ वर्षों बाद फेरा-47’ को हटाकर इसके स्थान पर फेरा, 1973 आ गया। तत्कालीन निदेशालय को मंत्रीमण्डल सचिवालय, कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में रखा गया।  इसे भी बदलकर 01 जून, 2000 से एक नई विधि विदेशी मुद्रा अधिनियम, ’1999-फेमा लागू किया गया। बाद मे, अंतर्राष्ट्रीय धन शोधन व्यवस्था के अनुरूप, एक नया कानून धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) बना और प्रवर्तन निदेशालय को 1 जुलाई 2005 से पीएमएलए को प्रवर्तित करने का दायित्व सौंपा गया। हाल ही में, विदेशों में शरण लेने वाले आर्थिक अपराधियों से संबंधित मामलों की संख्या में वृद्धि के कारण, सरकार ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018’ (एफइओए) पारित किया है और प्रवर्तन निदेशालय को 21 अप्रैल, 2018 से इसे लागू करने का दायित्व सौंपा गया है। वर्तमान में, निदेशालय राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में है।

भारत सरकार का प्रवर्तन निदेशालय एक बहु-अनुशासनिक संगठन है, जो धन शोधन (मनी लॉन्डरिंग) के अपराध और विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन की जांच करता है। ई0डी0 कई अधिनियमों के तहत कार्यवाही करते हैं। ई0डी0 के अनुसार, ’धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002’ (पीएमएलए) एक आपराधिक कानून है, जिसे धन शोधन (मनी लॉन्डरिंग) को रोकने के लिए और इस से प्राप्त संपत्ति की जब्ती का प्रावधान करने के लिए बनाया गया है। जब कोई मनी लॉन्डरिंग से धन एकत्रित करता है, तो ऐसे अपराधी के खिलाफ इस अधिनियम के तहत कार्यवाही की जाती है। इसी प्रकार ई0डी0 ’विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999’ (फेमा) के तहत भी कार्यवाही करता है। अधिनियम के अनुसार, यह एक नागरिक कानून है, जो विदेशी व्यापार और भुगतान की सुविधा से संबंधित कानूनों को समेकित और संशोधित करने और भारत में विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित विकास और रखरखाव को बढ़ावा देने के लिए अधिनियमित किया गया है। प्रवर्तन निदेशालय को विदेशी मुद्रा कानूनों और विनियमों के संदिग्ध उल्लंघनों के अन्वेषण करने, कानून का उल्लंघन करने वालों को न्याय निर्णित करने और उन पर जुर्माना लगाने की जिम्मेदारी दी गई है। इसी प्रकार भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018’ (एफईओए) के अंतर्गत ई0डी0 कार्य करता है। यह कानून आर्थिक अपराधियों को भारतीय न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से बाहर भागकर भारतीय कानून की प्रक्रिया से बचने से रोकने के लिए बनाया गया था। इस कानून के अंतर्गत ई0डी0 ऐसे भगोड़े आर्थिक अपराधी, जो गिरफ्तारी से बचते हुए भारत से बाहर भाग गए हैं, उनकी संपत्तियों को कुर्क करने का प्रावधान है। ई0डी0 इनके अलावा विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम, 1974’ (सीओएफइपीओएसए) के तहत, इस निदेशालय को फेमा के उल्लंघनों के संबंध में निवारक निरोध के मामलों को प्रायोजित करने का अधिकार है।

0डी0 की कार्यप्रणाली पर नजर डालें तो पता चलता है कि प्रवर्तन निदेशालय का एक निदेशक होता है, जिसके अधीनस्थ क्षेत्र स्तर के विशेष निदेशक कार्य करते हैं। यह केन्द्र स्तर पर कार्य करते हैं। कार्य संचालन के लिए क्षेत्र का बंटवारा पश्चिम क्षेत्र, उत्तर क्षेत्र, दक्षिण क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, और पूर्वी क्षेत्र के रूप में किया गया है। विशेष निदेशक के नीचे संयुक्त निदेशक होते हैं, जो क्षेत्र के विभिन्न जोन के लिए कार्य करते हैं। संयुक्त निदेशक के नीचे का कार्य उपनिदेशक देखते हैं। इतना ही नहीं विधिक सलाह एवं अन्य संबंधित कार्य के लिए संयुक्त सचिव नियुक्त किए जाते हैं। भारत के जिस क्षेत्र में विदेशी मुद्रा अथवा अवैध संपत्ति अथवा मनी लॉन्डरिंग जैसी अपराध होते हैं, वहां के क्षेत्रीय ई0डी0 अधिकारी कार्यवाही करते हैं, एवं रिपोर्ट सीनियर अधिकारी को अथवा कार्यालय को प्रेषित की जाती है।

0डी0 द्वारा की गयी विभिन्न कार्यवाहियों पर बात करें, तो भारत में हो रहे मनी लॉन्डरिंग, अवैध लेन-देन जैसे अपराधों की पोल खुल जाती है। आंकड़ों के अनुसार, ’धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) - 2002’ के अंतर्गत 31 मार्च 2022 तक कुल 5422 मामले दर्ज किए गए। इसमें 1739 मामलों में कुर्की का आदेश दिया जा चुका है। ई0डी0 द्वारा कुर्क की गयी कुल परिसम्पत्तियों का कुल मुल्य 104702 करोड़ रुपये है। पुष्ट अनंतिम कुर्की आदेशों की संख्या 1369 तथा न्यायनिर्णयन प्राधिकरण द्वारा अनंतिम कुर्की आदेशों के तहत कुर्क की गई परिसंपत्तियों का मूल्य 58591 करोड़ रूपये है। ई0डी0 ने इस अधिनियम के तहत 400 लोगों को गिरफ्तार भी किया है। दर्ज शिकायतों में 992 अभी भी विचाराधीन हैं। ई0डी0 ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा), 1999’ के तहत भी विभिन्न कार्यवाही को अंजाम दिया है। इस अधिनियम के तहत ई0डी0 ने 31 मार्च 2022 तक कुल 30716 मामलों की जाँच आरंभ की, जिसमें 15495 जाँच पूरी कर ली गयीं। 8109 लोगों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जबकि न्याय-निर्णीत कारण बताओ नोटिस 6472 लोगों को दिया गया। ई0डी0 ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018’ (एफईओए) के तहत भी कार्यवाही की है। इसमें 14 व्यक्तियों के विरुद्ध एफईओए के तहत कार्रवाई आरंभ की गयी, जिसमें  एफ000 घोषित व्यक्तियों की संख्या 09 है। अधिनियम के तहत जब्त की गयी परिसम्पतियों का कुल मूल्य 433 करोड़ है।

            वर्तमान में ई0डी0 भारतीय मीडिया में छाया हुआ है। ई0डी0 की कार्यवाही में जिस प्रकार से लोगों के घरों में भरा पड़ा पैसा बरामद किया जा रहा है, वह कहीं न कहीं आम जनता के खून पसीने की कमाई है, जिसे अपराधियों ने गलत तरीकों से इक्टठ्ठा किया है। भारत की गरीब जनता कहीं न कहीं ई0डी0 का धन्यवाद ही दे रही होगी, जो अवैध पैसा को बरामद कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक पार्टियां ई0डी0 के दुरुपयोग किए जाने की बात कर रही हैं। यदि ऐसा है तो यह भी सिद्ध करना चाहिए कि जिन पर ई0डी0 कार्यवाही करके करोड़ों बरामद कर रही है, वह पैसा आखिर आ कहां से रहा है। गैर-कानूनी तरीकों, मनी लॉन्डरिंग करने या विदेशों से अवैध लेन-देन से एकत्रित की गयी अवैध सम्पत्ति को यदि ई0डी0 बरामद कर भी रही है, तो इसे राजनीतिक नहीं कहना चिहए, क्योंकि यह आम जनता के हक का रूपया है, जो उन तक पहुंच ही नहीं पाया। ऐसी कार्यवाही लगातार होती रहनी चाहिए, फिर सरकार किसी भी पार्टी की ही क्यों न हो।

शनिवार, अक्टूबर 09, 2021

किसके कांशीराम ?

आज हर बहुजन संबधी राजनीतिक पार्टियाँ मान्यवर कांशीराम जी को अपने पार्टी का घोषित करने में लगी हुयीं हैं. हाँ ये अलग बात है, कि कोई भी उनके जैसा काम करने को राज़ी नहीं है. सब अपने मतलब और सत्ता के लालच में हैं. कांशीराम अब नाम नहीं रहा, बल्कि ये एक ब्रांड बन चुका है. जिसके कांशीराम, उसकी जनता, उसकी सत्ता. 

तमाम पार्टियों ने जिस तरह से कांशीराम को अपनी पार्टी का पेटेंट करने की कोशिश की है, उस तरह से उनके नक़्शे कदम पर चलने की कोशिश नहीं की. कांशीराम को सिर्फ वही पार्टी अपनी और आकर्षित कर सकेगी, जो उनके नक़्शे कदम पर चलने की ताकत रखती हो और बहुजनों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश कर रही हो. अन्यथा कांशीराम जी कि जन्मदिवस और परिनिर्वाण दिवस मनाना मात्र दिखावा रह जाएगा और ये ज्यादा दिन तक नहीं चल सकेगा, बहुजन जनता बहुत जल्द समझ जाएगी. 

बहुजनों अर्थात SC/ST/OBC में हजारों वर्षों से एक कमी है, जिसे बाबा साहेब, कांशीराम जैसे योद्धाओं ने भी दूर नहीं कर पाया, वो है, एकता न होना. 

यदि सामान्य वर्ग पर ध्यान दें, तो इनमें जबरदस्त एकता पायी जाती है. ये आपको सुबह लड़ते हुए दिख भी जाएँ तो शाम तब होती है जब एक थाली में खाना खाते हैं. दूसरी और बहुजनों की स्थिति है, जहाँ हमेशा से यही कोशिश रही है कि बहुजन एक हों, लेकिन एक नहीं हो पाते.

सबसे ज्यादा आपसी टिप्पणियाँ बहुजनों में ही है- 

कांशीराम जी ने बामसेफ बनाया, और बहुजन समाज पार्टी भी उन्होंने ही बनाई. लेकिन आज उनके बाद स्थिति ये है. कि बामसेफ और बहुजन समाज पार्टी की विचारधारा अलग हो चुकी है. दोनों संस्थान एक दूसरे पर टिप्पणियां करते रहते हैं. इन दोनों के अलावा भी अन्य पार्टियों का भी आपसी मतभेद है. 

राजनितिक पार्टियों के अलावा सामाजिक चिंतकों में भी आपसी मतभेद यहाँ तक कि आपसी खटास भी है. जबकि काम बहुजन केन्द्रित ही कर रहे हैं. लेकिन सब अपने को अम्बेडकर विचारक और सामने वाले को दिखावटी घोषित करने में लगे हैं. 

बहुजन के नाम से 4 प्रमुख पार्टियाँ और सभी एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं - 

बहुजन समाज पार्टी कहती है, चंद्रशेखर की आज़ाद समाज पार्टी RSS से प्रभावित है, चन्द्र शेखर रावण बसपा पर आरोप लगाते हैं. एक पार्टी और है "कांशीराम बहुजन मूलनिवासी पार्टी", ये भी बसपा पर आरोप लगाते हैं. एक पार्टी और है, बी०एम०पी० अर्थात बहुजन मुक्ति पार्टी, जो अपने को बहुजन समर्पित कहती है और ये भी अन्य पार्टियों पर सवाल उठाते हैं. हर पार्टी जोर शोर से बहुजनों को आकर्षित करने में लगे हैं. आखिर बहुजन जाए तो जाए कहाँ ?

पार्टी का विलय, लेकिन किसका ?

हर पार्टी की कोशिश है, कि बहुजनों की सरकार बने, लेकिन ये तभी होगा जब कोई एक प्रमुख पार्टी हो. ऐसा तब होगा जब सभी पार्टियों का विलय हो जाए और कोई एक पार्टी प्रमुखता से सामने आये. 

लेकिन फिर के सवाल है, कि किस पार्टी का विलय किस में हो? हर बहुजन पार्टी अपने को अच्छा साबित करने में लगी है और दूसरे की पार्टी को खराब. 

एक कारण और है, यदि एक पार्टी दूसरी पार्टी में विलय कर दे, तो स्वत दूसरी पार्टी बड़ी हो जायेगी, और जिसका विलय हुआ है उनके पदाधिकारी जिसमें विलय हुआ है उस पार्टी के पदाधिकारियों से स्वतः छोटे हो जायेंगें. जो कोई भी नहीं चाहेगा. 

9 अक्टूबर को सभी पार्टियाँ मना रही हैं कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस - 

लखनऊ में BSP, BMP, BKMP कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस मना रही हैं, हो सकता है एक दूसरे पर सवाल भी उठाएं. लेकिन इससे सरकार नहीं बन सकती. इसके लिए एक होना पड़ेगा. 

क्या अभी बहुजन सरकार बनने में लगेगा समय ? -

जिस तरह से बहुजन पार्टियों ने अपने अपने में बहुजनों को आकर्षित करने की होड़ शुरू की है. और कांशीराम जी को पेटेंट करने की कोशिश है इससे बहुजन में भी आपसी रंजिश शुरू हो सकती है. इससे सीधा सीध लाभी गैर बहुजन पार्टियाँ उठाएंगी. लेकिन सभी बहुजन पार्टियाँ एक हो जाएँ तो बहुत जल्द बहुजन सरकार बन सकती है. लेकिन इसके लिए सभी पार्टियों को एक मंच पर आकर खुली चर्चा करनी होगी. और एक पार्टी तय करनी होगी.  


रविवार, अगस्त 15, 2021

आज़ादी

बहुत जरूरी है 

कि लोग पहले आज़ादी को समझें, 

उस संघर्ष को समझें, 

जो पहले पूर्वजों ने झेला है, 

सहन किया है.

उस मार को, उस भय को, 

उस दंड को समझें, 

जो उन्हें बेवजह दिया गया, 

उन्हीं के देश में.

इसके बाद ये समझें कि आजादी मिली कैसे. 

आज़ादी मनाना और आज़ादी समझना, 

दोनों में फर्क है. 

यदि आपने आज़ादी को ठीक से समझा 

तो आप आज़ादी का जश्न 

हर्ष और उल्लास से मनाते हैं 

और आज़ादी का लाभ भी ले पाते हैं. 

पूर्वजों को मिली बेवजह मार की समाप्ति है आज़ादी 

पूर्वजों  को दिया गया दण्ड की समाप्ति है आज़ादी 

हर आँख से निकले आंसू की कीमत है आज़ादी 

अपनी मर्जी से फसल उगाने का अधिकार है आज़ादी

एक जगह से दूसरी जगह जाने की अनुमति है आज़ादी 

सर उठाकर प्रश्न करने का अधिकार है आज़ादी 

कलम उठाकर कोरे कागज पर शब्द उकेरना है आज़ादी 

सच तो ये है 

आज़ादी को समझना ही है आज़ादी.




मंगलवार, अप्रैल 28, 2020

क्यों ख़राब हो रही है सोशल मीडिया की छवि ?

सोशल मीडिया की छवि को जबरन खराब बनाया जाता है, क्योंकि वे जानते हैं यदि सोशल मीडिया को दबाया नहीं गया तो यही सोशल मीडिया सच की ऐसी दीवारे कड़ी कर सकता है जिसे गिरा पाना नामुमकिन हो जाएगा. जो काम आज सोशल मीडिया कर रहा है, वही का आज से पहले 20वीं शदाब्दी के शुरू के दशकों में प्रेस कर रहा था. जब उन पर रोक लगा दी जाती तो चुपचाप प्रेस चलाया जाता और छुपे छुपे पत्र एवं लेख एक जगह से दूसरी जगह भेजे जाते. लोगो को जागरूक करने की मुहीम हमेशा से चलती रही और चलती रहेगी.

वर्तमान में भी सोशल मीडिया पर सवाल उठाते हैं, इस माध्यम को बदनाम करते हैं, ताकि लोगो को जागरूक न किया जा सके. एक और कारण है, आजकल टेलीविजन पर समाचार कम देखे जाने लगे है और सोशल मीडिया पर आने वाले सूचना दायक वीडियो ज्यादा देखे जाते हैं, ऐसे में जो मुख्यधारा का मीडिया सूचना को तोड़ता मरोड़ता है तो आम जन को सोशल मीडिया से मिली सूचना से तुलना करके उस मुख्यधारा के मीडिया की सच्चाई पता चल जाती है और लोग देखना कम कर देते हैं, ऐसे में उस मीडिया की TRP प्रभावित होती है.

आज कल कुछ न्यूज़ चैनल, सोशल मीडिया के कुछ संदेशो की सच्चाई, जांच पड़ताल आदि जैसे कार्यक्रम कर बताते हैं कि सोशल मीडिया पर कैसे फेक न्यूज आ रही हैं..... पर वे लोगों को जिन्दा जलाने वाले वीडियों, या महिला पुरुष को भगा भगा के मारने वाले वीडियो की जांच पड़ताल नहीं करते... क्योंकि वे सरकार के इशारों पर काम करते हैं और सरकार की हो सकने वाली बदनामी वाले सो० मि० के संदेशों की जांच नहीं करते.
इससे कहा जा सकता है कहीं तो सोशल मीडिया को दबाने का प्रयास किया जा रहा है. 

इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि सोशल मीडिया का दुरूपयोग भी तेजी से बढ़ा है. इसके लिए आम जन उपयोग करता को आना होगा. हर आने वाले मेसज के बारे में तर्क करना होगा. ताकि दुरूपयोग को रोका जासके. 

आप सोशल मीडिया को दूसरे तरह से भी समझ सकते हैं, जिस समय मुख्यधारा के चैनल विदेश की बातें, पडोसी देश के कारनामे दिखाए जाएँ तो उस समय आप अपना सोशल मीडिया पर आ रहे संदेशों पर ध्यान दें... आपको पता चल जाएगा... न्यूज़ चैनल विदेश की बातें क्यों कर रहे हैं... और सोशल मीडिया क्या बता रहा है. 
सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों को एक बात से सचेत रहना होगा की वे किसी गलत मकसद से आने वाले संदेशो से बचे एवं उस व्यक्ति से तत्काल हट जाएँ या ग्रुप से रिमूव कर दें जो अनैतिक बात कर रहा है, धार्मिक द्वेष फैलाने की कोशिश कर रहा है. समझदारी से लिए गये निर्णय से आप सोशल मीडिया को भी बचा सकते हैं और इसकी छवि को भी. 

सोशल मीडिया पर सवाल उठाना कितना सही ?

जो छात्र छात्राएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं या कर चुके हैं, शिक्षक बनना चाहते हैं या बन चुके हैं, वे हो सके तो अपना अध्ययन शेयर करें, उन्होंने क्या विशेष सीखा जो वे समाज को देना चाहते हैं. 

अभी तमाम लोग सोशल मीडिया से जुड़े हैं, ऐसे में ज्ञानार्जन कर रहे विद्यार्थी अपनी कोई विशेष योगता शेयर कर लोगों को ज्ञान विज्ञान आदि की जानकारी दे सकते हैं. समाज के आधी जनता भी चाहे तो सोशल मीडिया का उच्चतम उपयोग किया जा सकता है. सिर्फ ये कह देना की सोशल मीडिया जहर फैला रहा है... फलां फलां कर रहा है, इससे कुछ नहीं होगा. 

सोशल मेदिय अभी कोरे कागज की तरह होता है. आप उस पर कुछ भी शेयर कर सकते हैं. जैसे एक कलाकार, केनवास पर कुछ भी चित्र उकेर सकता है, जैसे कुम्हार मिट्टी से कोई भी बर्तन बना सकता है, ऐसे भी सोशल मिडिया का उपयोग उपयोगकर्ता कैसे भी कर सकता है... ज्ञान वर्धक जानकारी देकर या फिर जहरीली बातें शेयर करके.... आप माध्यम को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते... माध्यम को उपयोग करने वालो पर सवाल जरूर उठा सकते हैं.

जैसे, युद्ध में बन्दूक से दुश्मन को मारे तो सही लेकिन उसी बन्दूक से किसी अन्य को मार दें तो इसमें बन्दूक पर सवाल नहीं उठा सकते. वह तो सिर्फ एक उपकरण है. बिलकुल इसी तरह से आप सोशल मीडिया पर सवाल नहीं उठा सकते क्योंकि ये एक माध्यम है लोगो से, समूह से जुड़ने का. अब चाहे इसका सही उपयोग किया जाए या गलत. 

बुधवार, अगस्त 15, 2018

सवार मेरी नाव के

रचना- 15 अगस्त 2018
द्वारा- बृजेन्द्र कुमार वर्मा 
कसीदे गढ़े जाते थे कभी, परिवार की शान के,
आग लगा के जा रहा मुसाफिर सीना तान के.

जब भी मिला वक्त, कुरेदे छाले हर एक पावं के,
और सारे झेल गया जोखिम हर एक दावं के.

लुटेरा जा रहा लूट के धन भी, मन भी, तन... भी,
कमाले ये, खड़े देख रहे सवार मेरी नाव के.
-बृजेन्द्र कुमार वर्मा



मंगलवार, अगस्त 14, 2018

जन्मदिन और कुछ लोग

जब भी जन्मदिन आता है तो लोग बड़े ही विशेष रूप से मनाते हैं.
मैं जन्मदिन की खुशियाँ नहीं मनाता मेरी विचारधारा थोड़ी अलग हैं.
मैं मानता हूँ कि ये दिन खुशियों का नहीं बल्कि जिम्मेदारी याद दिलाने का दिन है.
ये दिन बताता है कि तुम मौत के कितने करीब आ रहे हो. हालाँकि ये बच्चों पर लागू इसलिए नहीं होगा, क्योंकि उन्हें जीवन की समझ नहीं होती.

जन्मदिन मुझे ये याद दिलाता है कि समाज के लिए अच्छे काम करने हैं, इस दुनिया ने बहुत कुछ दिया, लेकिन मेरी जुम्मेदारी है कि मैं अपने समाज को अच्छा दूं. उन लोगों की मदद करूं जिन्हें सच में मदद की जरूरत है. तमाम लोग मेरी तरह सोचते हैं और अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए समाज में कुछ अच्छा करने की कोशिश करते रहते हैं.

लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो लोगों को अच्छा करने नहीं देते क्योंकि कुछ लोगों के अच्छा करने से कुछ लोगों की कुर्सियां हिलने लगती हैं, जिसे वे नहीं छोड़ना चाहते. ऐसे में कुछ लोगो के अच्छा करने से कुछ लोगों की हिलने वाली कुर्सी को बचाने के लिए वे अच्छा करने वाले को गलती से भी अच्छा नहीं करने देते या फिर ऐसा अडंगा लगा देते हैं, कि जिसके अन्दर अच्छा करने की चुलग रहती भी है, वो स्वतः ही समाप्त हो जाती है. 

इसके अलावा कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो कुछ अच्छा करने वाले लोगों को बचाते रहते हैं, तब, जब वे खतरे में होते हैं या परेशान होते हैं, कुछ लोग ऐसा इसलिए भी करते हैं, कि समाज से ऐसे लोगो की कमी न हो जाए जो अच्छा करने की सोचते हैं. अच्छा करने की सोच रखने वालो को, ऐसे लोग, जिनकी अच्छा हो जाने से कुर्सियां हिलने लगती हैं, परेशान करते हैं, ताकि अच्छा करने वाले अच्छा करने की जिद छोड़ दे. लेकिन ऐसे ही समय के लिए कुछ ऐसे लोग बने हैं, जो अच्छा करने वालों को किसी भी हाल में बचाने की कोशिश करते है.

अब कुछ लोग ये सोच रहे होंगे की बात तो शुरू की थी जन्मदिन की, जो कि मौत के करीब आने का अहसास कराता है तो इसमें अच्छा करने और बुरा करने की चर्चा का क्या लेना देना. क्यूंकि जन्मदिन वो भी मनाते हैं जो अच्छा करना चाह रहे हैं और जन्मदिन वे भी मनाते हैं जो अच्छा करने वालों को गलती से भी अच्छा नहीं करने देते. 
सबसे ज्यादा दिक्कत की बात ये पता लगाना है कि जो लोग अच्छा करना चाह रहे हैं वो असल में अच्छा है भी या नहीं, और जो उनके द्वारा किया जा रहा है वो कैसे और किसके लिए अच्छा है. क्यूंकि जो कुछ लोगों के द्वारा अच्छा किया जाने का प्रयास किया जाता है, उन्हें रोकने का प्रयास करने वालो के कार्य को भी तो अच्छा घोषित किया जा सकता है. क्यूंकि अच्छा करने वालों को रोककर वे अपनी हिलती हुयी कुर्सी को तो बचाते ही हैं साथ ही अन्य हिलने वाली कुर्सियों पर बैठे अपने संगठित साथियों की भी मदद करते हैं. ऐसे में अपने साथियों की किसी भी तरह की मदद जो उनके आने वाले भविष्य को संजोय रखती है आखिरकार यह भी तो अच्छा काम गिना जाना चाहिए ? 

अच्छे काम की परिभाषा उस होने वाले काम से मिलने वाले भविष्य के लाभ पर निर्भर करता है. यदि उससे लोगों को लाभ मिलता है तो वह अच्छा काम बन जाता है, वरना वही काम अच्छा काम नहीं होता. दरअसल एक ही काम एक समाज के लिए अच्छा होता है और वही काम दूसरे समाज के लिए अच्छा नहीं होता. औसतन एक कार्य अच्छा है या नहीं, ये उस कार्य को अच्छा मानने वाली जनसँख्या पर निर्भर करता है. देश में 126 करोड़ की जनसँख्या में 80 करोड़ किसी किये गये काम को अच्छा बता दें तो फिर वो अच्छा बन जाता है, फिर चाहे उस काम से कई कत्लेआम क्यूं न हो गये हों. समाज में लोगों द्वारा किये गये काम की स्वीकार्यता ही  काम के अच्छे या अच्छे न होने का प्रमाण होता है. 

ऐसे में कुछ लोग यह चाहते हैं कि वे जीवन में अच्छा करें, इसके लिए वे काम में जुट जाते हैं और ऐसा कर जाते हैं कि प्रशंसा होने लगती है, और कुछ लोगों की कुर्सियां हिलने लगती हैं. लेकिन इसी समय कुछ लोग, जिनकी कुर्सियां हिल रही हैं, वे अपने द्वारा किये जाने वाले कार्य को लोगों तक इस प्रकार पहुंचाते हैं कि लोगों द्वारा उसे बड़ी आसानी से स्वीकार्य कर लिया जाए. आसानी से स्वीकार करने के लिए वे कार्य को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं. अंततः जिन लोगों ने अच्छा किया था वो अच्छा सिद्ध नहीं हो पाता क्यूंकि लोगों द्वारा स्वीकार्यता नहीं मिल पाती. 

इस प्रकार उम्र बढ़ने लगती है और कई जन्मदिन आकर चले जाते हैं. आपने देखा होगा कि युवाओं के द्वारा मनाये जाने वाले जन्मदिन और अधेड़ावस्था में मनाये जाने वाले जन्मदिन के उत्साह में बेहद अंतर होता है. क्यूंकि युवा को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एह्साह नहीं होता, इसलिए खूब नाचता गाता है और अधेड़ में आते आते मायूस हो जाता है कि किया तो बहुत कुछ लेकिन सिद्ध कुछ नहीं हो पाया. 

लेकिन यहाँ भी फर्क करना होना. अधेड़ में दोनों वर्ग हैं. एक वे लोग, जो अच्छा करने के प्रयास में लगे रहे लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा. और दूसरा वर्ग वो जिसने अच्छा काम करने वालों को अच्छा काम करने नहीं दिया. 

मायूसी के अलग अलग प्रकार हैं. जो लोग अच्छा काम करना चाहते रहे वे इसलिए मायूस हैं क्यूंकि उनके द्वारा अच्छा काम किये जाने के बावजूद अच्छा काम स्वीकार नहीं किया गया. और जिन लोगों ने अपनी कुर्सियां बचाने के कारण अच्छा काम नहीं करने दिया, वे इसलिए मायूस हैं क्यूंकि वे सिर्फ हिलती कुर्सी ही बचाते रहे और कुछ कर ही न पाय. अब एक दिन तो इस कुर्सी से क्या दुनिया से उठाना पड़ेगा. तो फिर अच्छा काम करने वालों को रोकना या परेशान करना बेकार रहा. 

बात आखिर घूम कर वहीं आ जाती है, की इस दुनिया ने हमें बहुत कुछ दिया. इसलिए ये हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि हम भी इस दुनिया को कुछ अच्छा दें. जन्मदिन यही याद दिलाने आता है, कि समय कम है और काम ज्यादा. व्यक्ति हर जन्मदिन में मौत के करीब पहुँच रहा है. जीवन का आनंद जरूर लेना चाहिए और इसी आनंद के बीच कुछ अच्छा करने की सदैव सोच बनी रहनी चाहिए. यही जीवन है. 

आप भी समझने की कोशिश कीजिये कि आप किस तरह से कुछ अच्छा कर सकते हैं. 

- बृजेन्द्र कुमार वर्मा 


शनिवार, अगस्त 13, 2016

इरोम चानू शर्मिला पर टिप्पणी क्यों?

जिसने 16 साल, देखते ही गोली मारने के कानून को हटाने के लिए अनशन किया, जिसकी दुनिया में तारीफ होती है. जिसने दूसरों की जिंदगियां बचाने के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया. जिसने दूसरों पर अपनी सारी खुशियाँ लुटा दीं, आज कुछ नासमझ लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं.

बहुत दुखी हूँ मैं. ये देख और सुनकर. यहाँ तक कि मीडिया भी चुटकी लेने से नहीं चूक रहा. 

कहा जाता है कि 2 नवम्बर 2000 को मणिपुर के इंफाल के मालोम जगह पर असम रायफल की वजह से 10 बेगुनाह मर गये थे. इस पर "सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम 1958" को हटाने के लिए 4 नवम्बर को शर्मिला जी अनशन पर बैठ गयीं. नाक में नली के जरिये उन्हें खाना पहुँचाया जाता था. उन्हें आत्महत्या के प्रयास करने के लिए गिरफ्तार भी किया गया. एक अस्पताल में उनका कमरा जेल की तरह बन गया. पर वे जनता के लिए अनशन करती रही. 

कर साल बीतने के बाद लोगों का ध्यान वह से हटने लगा. मीडिया ने भी अनदेखा किया. एक समय ये आया की मीडिया के पास पूर्वोतर के लिए स्थान ही नहीं रहता. 


शर्मिला का दुःख- जो दिखता है वो बिकता है.

photo - from google images (link- static.independent.co.uk/
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अगर बात की जाए शर्मिला जी के अनशन की तो ये बहुत बड़ा बलिदान है उनके जीवन का. ऐसा तो अन्ना हजारे भी नहीं कर पाए. फिर भी अन्ना हजारे शर्मिला जी से ज्यादा लोकप्रिय हो गये. 
यहाँ मन दुखी होने वाली बात भी है कि इस देश में जो टीवी पर दिखता है वो लोकप्रिय हो जाता है. और जिसने सच में अनशन किया. जिसने मीडिया को अपनी तरफ नहीं ललचाया. जिसने कभी खबर बनने की कोशिश नहीं की. जिसने कभी प्रसिद्धि का नहीं सोचा. आज लोगों ने भी उन पर ध्यान देना छोड़ दिया.
कितना अजीब है. लोगों की लड़ाई लड़ने वाली को ही लोगों ने भुला दिया. शर्मिला जी शायद इससे बहुत दुखी हो गयीं.
.
अब आप समझ गये होंगे कि 200-300 साल पहले देश गुलाम क्यों बना था.

अनशन ख़त्म करते ही आलोचना शुरू.

कमाल की बात ये है, कि जिस महिला ने देश की जनता के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, जब उसने राजनीति में आकर सुधार करने का सोचा तो लोग उनकी बुराई करने लगे. अनशन ख़त्म न करने की बात कहने लगे.
अरे क्या अनशन करने का ठेका लिया है शर्मिला जी ने? क्यों अनशन पर बैठी रहे. अरे सब कुछ तो दे दिया. अब क्या रहा उनके पास? अब वो राजनीति में आकर कुछ सुधार करना चाहें तो क्या नहीं करना चाहिए? कोई आतंकवादी बनने जा रही है क्या?? और अनशन की ही बात है, तो भैया तुम करो न अनशन उन्होंने 16 साल किया तुम 16 महीने ही कर लो, तब उन पर टिप्पणी करना. अगर नहीं कर सकते तो बुराई भी मत करो.

समाज निकला धोखेबाज़ 

सच कहूं तो समाज ही धोखेबाज़ निकला. 
इस सामाज का दोगलापन देखिये..... ये समाज गुंडों को, अपराधियों को, अनपढ़ों को, लालचियों को, भ्रष्टाचारियों को, मतलबियों को तो सरकार में मंत्री बना देती है,
पर,
ध्यान से सुनना,
इरोम चानू शर्मिला जैसी देश भक्त को, जो मानवता की रक्षा के लिए अपनी सारी खुशियाँ कुर्बान करके लोगों की, इस समाज की सेवा में लग गई, उसे सरकार में मंत्री बने नहीं देखना चाहती.
हाय रे दुर्भाग्य इस देश का.

और अंत में

गलती गुंडों, मवालियों, भ्रष्टाचारियों या अनपढ़ों की नहीं है जो सरकार में बैठ गये. असल में जनता खुद गुनाहगार है. कोई गुंडा नेता है तो असल में गुंडा वो नेता नहीं.. असली गुंडा समाज है जिसने वोट देकर उस गुंडे को सरकार के लिए चुना. भ्रष्ट कभी भी नेता नहीं होता दोस्तों, भ्रष्ट होता है समाज जो 100-500 के लिए अपना वोट बेचकर भ्रष्टों को सरकार बना देता है.
गलती समाज की होती है.



शुक्रवार, मई 29, 2015

हाँ

किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ न मिला है और न ही मिल सकता है.
हमें सिर्फ ये प्रयास करते रहना चाहिए कि हम समझ में अच्छे से अच्छा कर सकें. बाकि सब भगवान् पर छोड़ देना चाहिए.
कहते हैं, जिसके कर्म सही हैं उसका सब कुछ सही है. और जिसके कर्म ख़राब हैं, वो कितना ही अच्छा दिखावा कर ले. पर उसका प्रतिफल उसे उसके कर्मों के अनुसार ही मिलता है.