सीखने के लिए मैंने हर जख्म सींचे हैं, पढ़ना है दर्द मेरा तो सब लिंक नीचे हैं
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मंगलवार, जुलाई 29, 2025

विदाई

गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव

किसी और गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव

वक़्त बदल जाने पर गाँव में

पुरुषों के चेहरे वही रहते हैं

बस स्त्रियों के चेहरे बदल जाते हैं ।

(-डॉ0 बी0के0 वर्मा)

 


खोने से बहे हैं

वो विदाई के समय रोता हुआ शख्स,

उसके आँसू दूर जाने से नहीं, किसी के खोने से बहे हैं,

तुम देखना लौट आने पर गुमसुम सी रहेगी,

फिर से निकलेंगे वही आँसू, जो खोने से बहे हैं।

(- डॉ0 बी0 के0 वर्मा)

सोमवार, जून 23, 2025

अधूरी मोहब्बत

(-डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा)

मोहब्बत की किताब का, एक पन्ना मोड़ आए हम।

कहानी पूरी न हुई, और क़लम तोड़ आए हम।।


कुछ ख़्वाब थे मुकम्मल, कुछ आँखों में ही सो गए।

थे वादे भी तो प्यारे, जो रूहों से जुदा हो गए।।

किनारों पर ही आकर, मौजों से बिछड़ आए हम।

कहानी पूरी न हुई, और क़लम तोड़ आए हम।।



वो रातें चाँदनी सी थीं, वो बातें रूह में बस गईं।

तस्वीरें ज़ेहन से निकलीं, पर यादें दिल में धंस गईं।।

उन्हीं यादों के साए में, ज़िंदगी छोड़ आए हम।

कहानी पूरी न हुई, और क़लम तोड़ आए हम।।

रविवार, जून 22, 2025

साया भी शरमाया


तुझसे जुदा होकर खुद को ही ग़ैर पाया,

तू गया तो मेरा साया भी मुझसे शरमाया।


आईनों ने पूछा, ये अजनबी है कौन?
हर अक्स ने आँखों को कुछ और दिखलाया।


लब खामोश थे, मगर दिल चीख कर बोला,
जिससे वफ़ा की, उसी ने दिल को सुलगाया।


तेरे बाद किसी मोड़ पे ख़ुशियाँ मिली भी तो क्या,
हाथ थामते ही ख़ुशी ने दर्द ही बरसाया?


अब तन्हाई मेरा शहर है, और यादें मेरा क़ाफ़िला,
इश्क़ के इस वीरान में, बस मैं हूँ और मेरा साया।


(-डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा)

मंगलवार, अगस्त 20, 2024

ये कविता काम आयेगी याद दिलाने में

माँ का दुप्पट्टा जो बदबू से भरा है, 

यही पसीना जिम्मेदार है तुम्हें काबिल बनाने में


सड़ गया जिस्म माँ का घर में,

क्या शेष रह गया जीवन बिताने में.


आज चुप है माँ, बेटे के अफसर बनने पर,

जिसने कभी एलान किया था जमाने में.


चली गयी माँ कुछ शेष न रहा,

अब क्या मिलेगा मुस्कराने में.


औलादों, अपनी माँ की गोद को याद रखना,

उसका भी हिस्सा है, मंजिल दिलाने में.


प्यार, दुलार, समर्पण इसे अपने पास रखना,

काम आएगी नफरत की आग बुझाने में.


मैं वक़्त को रोक तो नहीं सकता लेकिन 

ये कविता काम आयेगी याद दिलाने में 


दोस्तों ऐसा कोई काम न करना 

जो शर्म आये माँ को माँ कहलाने में 


ये साल भी कितना मगरूर है.

 वो शख्श, जो अभी दूर है,

तुम्हें पता ही नहीं कितना मजबूर है.


अब वो रात में बस तारे गिनता है 

जिस पर किताबों का फितूर है.


डरता है, कहीं बदनाम न हो जाए 

उसके पिता को उसपर गुरूर है 


वो चली गयी तो क्या हुआ 

उसकी आँखों में तो मेरा ही नूर है 


चली थी हवा कि सब गुजर जायेगा,

उफ़ | ये साल भी कितना मगरूर है. 


बुधवार, अक्टूबर 19, 2022

वो आएगा तू देखना

 

तू मेहनत कर, कई रिश्ते भी आयेंगे तू देखना,

जो लोग छोड़ चुके हैं, वो मुड़कर भी आयेंगे तू देखना ||

अभी कामयाबी नहीं मिली, कोई बात नहीं,

जिस दिन मिली, उस दिन फ़रिश्ते भी आयेंगे तू देखना ||

अभी मोहब्बत है तो मिल लिया करो,

अगर नाराज हुए, तो मैय्यत पे भी नहीं आयेंगे तू देखना ||

परिंदों की चिंता छोड़, पर आ गये उनके,

चार दिन की बात है, उड़ जायेंगे तू देखना ||

जानता हूँ, शायरी आती नहीं मुझको,

लेकिन आई, तो वो चाँद भी सुनने आएगा तू देखना ||

सबने कहा भूल जा उसे, वो दगाबाज़ निकला

और दिल कहता है, वो आएगा तू देखना ||


(-बृजेन्द्र कुमार वर्मा)

शनिवार, सितंबर 24, 2022

ग्रामीण विकास में प्रत्यक्ष अवरोध है लंपी वायरस

बृजेन्द्र कुमार वर्मा,

(लेखक- ग्रामीण विकास संचारक हैं)

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लंपी वायरस ने यह स्थिति ला दी है कि समाज वैज्ञानिकों का ध्यान ग्रामण विकास और लगातार प्रभावित हो रहे दुग्ध उत्पादन की ओर जाने लगा है। ग्रामीण अपने विकास के लिए लगातार संघर्षरत रहा है, लेकिन लम्पी वायरस ने ग्रामीण विकास के विभिन्न अवरोधों में एक अवरोध को और बढ़ा दिया है, जो भारत के विभिन्न राज्यों के लिए चिंता का विषय बन चुका है, वह है मवेशियों में फैला लंपी त्वचा रोग। जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो बहुत जल्द पशुधन उत्पादन महंगा होने लगेगा, क्योंकि हजारों दुधारू गायों की मृत्यु हो चुकी है, और अब भी लगातार मर रही हैं। मीडिया कवरेज में ड्रॉन की मदद से ऊंचाई से लिए कई फुटेज देखने के बाद ऐसा लगता है कि लंपी से मरने वाले मवेशियों की संख्या राष्ट्र स्तर पर लाख से ऊपर भी हो सकती है। समाचार पत्रों की माने तो कई राज्यों में 10-10 हजार से ज्यादा गायों की मौत हो चुकी है। राहत की बात यह है कि ये रोग पशुओं से इंसानों में नहीं फैलता है, लेकिन फिर अप्रत्यक्ष रूप से वे इंसान प्रभावित हुए हैं, जो पशुधन रखते हैं, और जिनके मवेशी लंपी वायरस की चपेट में आ गए हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन होता है, जिसे विभिन्न संसाधनों द्वारा शहरों में पहुँचाया जाता है। गाँव के मवेशी पालक अपने मवेशियों का दूध निकालकर नजदीकी डेयरी को बेच देते हैं अथवा स्वयं दुग्ध उत्पाद बनाते हैं, जैसे दही, मट्ठा, मक्खन, घी, पनीर और उसे नजदीकी बाजार अथवा ठेकेदारों को बेच देते हैं। बात आती है उनके लाभ की। दुग्ध उत्पादों की बिक्री से मिलने वाले पैसों से ये मवेशी पालक अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। वर्तमान में भारत में हजारों मवेशी पालक इस समय सदमें में जी रहे हैं, उनका घर चलाने वाली गाय लंपी वायरस से ग्रसित है। गाय तो ग्रसित है ही, उनके पालक भी चिंता में समय काट रहे हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति भी खतरे में है। ऐसे में यदि दुधारू मवेशियों की लंपी वायरस से जाने जाएंगी अथवा बीमारी से ग्रसित होती जाएंगी तो दुग्ध उत्पादन पर सीधा प्रभाव पडे़गा। इससे पालकों को आर्थिक नुकसान तो होगा ही, साथ ही राष्ट्र का पशुधन भी प्रभावित होगा।

बीमारी की बात करें तो विशेषज्ञ बताते है कि यह गांठदार त्वचा रोग है, जिसे अंग्रेजी में लंपी स्कीन डिजीजकहते हैं, यह मवेशियों में होने वाला एक संक्रामक रोग है, जो पॉक्सविरिड परिवार के एक वायरस के कारण होता है। इसे नीथलिंग वायरस भी कहा जाता है। इस रोग के कारण पशुओं की त्वचा पर गांठें बन जाती हैं, मुंह से, नाक से स्त्राव होने लगता है। यह रोग त्वचा, श्लेष्मा झिल्ली और श्वसन मार्ग को प्रभावित करता है। साथ ही दो से तीन सेंटीमीटर बड़ी गांठें पड़ जाती हैं, बुखार आता है, शरीर में सूजन आने लगती है, कुछ समय बाद चलने में, खड़े होने में दिक्कत होने लगती है। यह रोग मच्छर, मक्खी और परजीवी से एक दूसरे में तेजी से फैलता है। यह बीमारी इतनी घातक होती है कि यदि समय पर इलाज न हो तो गायों की मृत्यु तक हो जाती है, और गाय ठीक भी हो जाए तो भविष्य में दूध कम उत्पादित करती हैं, बांझपन तक आ जाता है। साधारण शब्दों में कहें तो गाय पालने वाले (पालक) को आर्थिक नुकसान होता है।

उत्तर प्रदेश में आंकड़ों के अनुसार लगभग साढ़े पाँच लाख से अधिक मवेशियों का टीकाकरण किया जा चुका है। अभी पश्चिमी क्षेत्र में लंपी वायरस फैला हुआ है, जो पूर्व की ओर बढ़ रहा है। हाल ही में 8 सितंबर 2022 को उत्तर प्रदेश पशुधन विभाग के विशेष सचिव ने पूर्वी क्षेत्र को सुरक्षित करने व वायरस के प्रसार को रोकने के लिए एक मास्टर प्लान की बात कही है। विभाग के अनुसार मलेशिया देश की तर्ज़ पर पीलीभीत से लेकर इटावा तक लगभग 300 कि0मी0 की दूरी को 10 कि0मी0 चौड़े इम्यून बेल्ट से कवर करने का मास्टर प्लान तैयार किया है। यह बेल्ट एक तरह से बॉर्डर का काम करेगी और लंपी वायरस इसे पार कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पूर्वी उत्तर प्रदेश की तरफ नहीं जा सकेगा।

पशुपालन विभाग के अनुसार वैक्सीनेशन के ज़रिये इम्यून बेल्ट बनाने की तैयारियाँ पूरी की जा चुकी हैं। विभाग की माने तो इस पूरी बेल्ट में पशुओं में शत-प्रतिशत टीकाकरण की बात कही गयी है। निगरानी के लिये विशेष टास्क फोर्स होगी, जो लंपी वायरस से संक्रमित पशुओं की ट्रैकिंग और ट्रीटमेंट का ज़िम्मा संभालेगी। 2020 में ऐसा प्रयास मलेशिया में किया गया था, वहाँ की सरकार ने इसके सकारात्मक परिणाम बताए थे। यदि उत्तर प्रदेश ऐसा करने में सफलता प्राप्त कर लेता है तो पूर्वी क्षेत्र में लाखों मवेशियों को प्रभावित होने से रोका जा सकता है, यह उत्तर प्रदेश के लिए किसी विशेष उपलब्धि से कम नहीं होगी।

मृत्यु दर के बारे में बताया जा रहा है कि लंपी स्किन डिजीज से पीड़ित पशुओं में मृत्यु दर 1 से 5 प्रतिशत तक है, हालांकि संकर नस्ल के गौवंश में मृत्यु दर अधिक देखी गयी है। यूरोप, रूस, कजाकिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, भूटान, नेपाल और भारत में अलग-अलग समय में इसके मामले पाए गए हैं। इस समय गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश, आदि कई प्रदेशों के दुधारू मवेशियों में लंपी स्किन डिजीज फैली हुई है।

लंपी स्किन बीमारी मूल रूप से अफ्रीका में शुरू हुई और अफ्रीका के कई देशों में है. बताया जाता है कि 1929 में इस बीमारी की शुरुआत जाम्बिया देश में हुई थी, जहाँ से यह दक्षिण अफ्रीका में फैल गई। 21वीं सदी के दूसरे दशक की शुरूआत से ही यह बीमारी तेजी से फैल रही है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो 2019 में बांग्लादेश और चीन में तेजी से फैली, इसके बाद 2020 में नेपाल और भूटान में देखने को मिली और 2021 के अंतिम महीनों में भारत में लक्षण देखे जाने लगे और जुलाई 2022 से अब तक हजारों की संख्या में गाय मर चुकी हैं और लाखों प्रभावित हो चुकी हैं, हालांकि इनमें से हजारों की संख्या में ठीक भी हुई हैं।

पशुधन अधिकारी मवेशी पालकों को सलाह देते हैं कि वे मवेशियों के आसपास गंदगी न फैलने दें, मच्छर, मक्खियों, कीटों से मवेशियों को दूर रखें, कोई मवेशी जब लंपी वायरस से प्रभावित हो जाए तो उसे तुरंत अन्य मवेशियों से दूर कर दें और इलाज कराएं।

भारत के लिए पवित्र और करोड़ों ग्रामीणों का भरण-पोषण करने व दूध देने वाली गाय आज अपने जीवन के लिए इंसानों पर निर्भर हो चुकी हैं। ऐसे में भारत के पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम को तेजी लाते हुए बहुत जल्द ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे विभिन्न राज्यों में लम्पी वायरस से प्रभावित गायों का आसानी से, समय रहते और मुफ्त इलाज किया जा सके। हालांकि विभिन्न राज्य सरकारों ने टीकाकरण अभियान चलाया हुआ है। इसके अलावा पशु चिकित्सा विभाग ग्रसित मवेशियों का इलाज भी कर रही है, लेकिन सीमित संसाधनों और सीमित कर्मचारियों की संख्या के कारण ग्रसित मवेशियों तक पहुंच कम है, साथ ही कुछ सामज सेवी ऐसे भी हैं, जो ग्रसित मवेशियों के इलाज में हर तरह की मदद कर रहे हैं। कोविड-19 के आने पर जिस तरह से भारत ने मुस्तेदी से काम किया, उसी तरह से मवेशियों के लिए भी टीकाकरण में भी तेजी लानी होगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य पहचानों में से एक पहचान पशुपालन भी है। कई परिवार गाय, भेंस, बकरी, ऊंट पालते हैं एवं उनसे मिलने वाले दूध को बेचकर घर चलाते हैं। कई परिवार अंडा एवं मांसाहार के लिए भेड़, बकरी, मछली, मुर्गी, बत्तख आदि का पालन करते हैं। कई जातियाँ परम्परागत रूप से इस कार्य से जुड़े हैं एवं परिवार का भरण-पोषण करते हैं। पशुधन ग्रामीण आर्थिक विकास में खासा महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दक्षिण भारत में मछली पालन के लिए सरकार प्रोत्साहन देती है। उत्तर भारत में ऐसे ग्रामीण, जो मुर्गी अथवा मछली पालन करना चाहते हैं, उनके लिए सरकार ने कई प्रकार से प्रोत्साहन नीतियां बनाई हैं। ये सब कार्य इसलिए ही किए जा रहे हैं, क्योंकि सरकार ग्रामीण विकास के विभिन्न उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करती है। लंपी वायरस ने ग्रामीण विकास के लिए सरकार के सामने चुनौती प्रस्तुत की है। इस लंपी वायरस ने हजारों मवेशियों को निगल लिया है। लेकिन अब और नुकसान नहीं उठाया जा सकता। राज्य सरकारों को पशुधन अथवा पशु चिकित्सा विभाग के अलावा अन्य विभागों का साथ चाहिए हो तो देरी नहीं करनी चाहिए, ताकि आने वाले समय में लंपी वायरस को रोका ही न जाए अपितु, जड़ से खत्म कर दिया जाए। सरकार चाहे तो इसके लिए निजी संसाधनों का भी उपयोग कर सकती है, बस उद्देश्य लंपी स्किन रोग को खत्म करने का होना चाहिए।

शनिवार, अक्टूबर 09, 2021

किसके कांशीराम ?

आज हर बहुजन संबधी राजनीतिक पार्टियाँ मान्यवर कांशीराम जी को अपने पार्टी का घोषित करने में लगी हुयीं हैं. हाँ ये अलग बात है, कि कोई भी उनके जैसा काम करने को राज़ी नहीं है. सब अपने मतलब और सत्ता के लालच में हैं. कांशीराम अब नाम नहीं रहा, बल्कि ये एक ब्रांड बन चुका है. जिसके कांशीराम, उसकी जनता, उसकी सत्ता. 

तमाम पार्टियों ने जिस तरह से कांशीराम को अपनी पार्टी का पेटेंट करने की कोशिश की है, उस तरह से उनके नक़्शे कदम पर चलने की कोशिश नहीं की. कांशीराम को सिर्फ वही पार्टी अपनी और आकर्षित कर सकेगी, जो उनके नक़्शे कदम पर चलने की ताकत रखती हो और बहुजनों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश कर रही हो. अन्यथा कांशीराम जी कि जन्मदिवस और परिनिर्वाण दिवस मनाना मात्र दिखावा रह जाएगा और ये ज्यादा दिन तक नहीं चल सकेगा, बहुजन जनता बहुत जल्द समझ जाएगी. 

बहुजनों अर्थात SC/ST/OBC में हजारों वर्षों से एक कमी है, जिसे बाबा साहेब, कांशीराम जैसे योद्धाओं ने भी दूर नहीं कर पाया, वो है, एकता न होना. 

यदि सामान्य वर्ग पर ध्यान दें, तो इनमें जबरदस्त एकता पायी जाती है. ये आपको सुबह लड़ते हुए दिख भी जाएँ तो शाम तब होती है जब एक थाली में खाना खाते हैं. दूसरी और बहुजनों की स्थिति है, जहाँ हमेशा से यही कोशिश रही है कि बहुजन एक हों, लेकिन एक नहीं हो पाते.

सबसे ज्यादा आपसी टिप्पणियाँ बहुजनों में ही है- 

कांशीराम जी ने बामसेफ बनाया, और बहुजन समाज पार्टी भी उन्होंने ही बनाई. लेकिन आज उनके बाद स्थिति ये है. कि बामसेफ और बहुजन समाज पार्टी की विचारधारा अलग हो चुकी है. दोनों संस्थान एक दूसरे पर टिप्पणियां करते रहते हैं. इन दोनों के अलावा भी अन्य पार्टियों का भी आपसी मतभेद है. 

राजनितिक पार्टियों के अलावा सामाजिक चिंतकों में भी आपसी मतभेद यहाँ तक कि आपसी खटास भी है. जबकि काम बहुजन केन्द्रित ही कर रहे हैं. लेकिन सब अपने को अम्बेडकर विचारक और सामने वाले को दिखावटी घोषित करने में लगे हैं. 

बहुजन के नाम से 4 प्रमुख पार्टियाँ और सभी एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं - 

बहुजन समाज पार्टी कहती है, चंद्रशेखर की आज़ाद समाज पार्टी RSS से प्रभावित है, चन्द्र शेखर रावण बसपा पर आरोप लगाते हैं. एक पार्टी और है "कांशीराम बहुजन मूलनिवासी पार्टी", ये भी बसपा पर आरोप लगाते हैं. एक पार्टी और है, बी०एम०पी० अर्थात बहुजन मुक्ति पार्टी, जो अपने को बहुजन समर्पित कहती है और ये भी अन्य पार्टियों पर सवाल उठाते हैं. हर पार्टी जोर शोर से बहुजनों को आकर्षित करने में लगे हैं. आखिर बहुजन जाए तो जाए कहाँ ?

पार्टी का विलय, लेकिन किसका ?

हर पार्टी की कोशिश है, कि बहुजनों की सरकार बने, लेकिन ये तभी होगा जब कोई एक प्रमुख पार्टी हो. ऐसा तब होगा जब सभी पार्टियों का विलय हो जाए और कोई एक पार्टी प्रमुखता से सामने आये. 

लेकिन फिर के सवाल है, कि किस पार्टी का विलय किस में हो? हर बहुजन पार्टी अपने को अच्छा साबित करने में लगी है और दूसरे की पार्टी को खराब. 

एक कारण और है, यदि एक पार्टी दूसरी पार्टी में विलय कर दे, तो स्वत दूसरी पार्टी बड़ी हो जायेगी, और जिसका विलय हुआ है उनके पदाधिकारी जिसमें विलय हुआ है उस पार्टी के पदाधिकारियों से स्वतः छोटे हो जायेंगें. जो कोई भी नहीं चाहेगा. 

9 अक्टूबर को सभी पार्टियाँ मना रही हैं कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस - 

लखनऊ में BSP, BMP, BKMP कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस मना रही हैं, हो सकता है एक दूसरे पर सवाल भी उठाएं. लेकिन इससे सरकार नहीं बन सकती. इसके लिए एक होना पड़ेगा. 

क्या अभी बहुजन सरकार बनने में लगेगा समय ? -

जिस तरह से बहुजन पार्टियों ने अपने अपने में बहुजनों को आकर्षित करने की होड़ शुरू की है. और कांशीराम जी को पेटेंट करने की कोशिश है इससे बहुजन में भी आपसी रंजिश शुरू हो सकती है. इससे सीधा सीध लाभी गैर बहुजन पार्टियाँ उठाएंगी. लेकिन सभी बहुजन पार्टियाँ एक हो जाएँ तो बहुत जल्द बहुजन सरकार बन सकती है. लेकिन इसके लिए सभी पार्टियों को एक मंच पर आकर खुली चर्चा करनी होगी. और एक पार्टी तय करनी होगी.  


रविवार, मई 09, 2021

कोरोना की तीसरी लहर कैसे, तर्क तो देना पड़ेगा ?

समाचार चैनलों पर तीसरी लहर पर बहस शुरू हो गयी है.

पहली लहर - बुजुर्ग प्रभावित
दूसरी लहर - जवान प्रभावित
तीसरी लहर - ???
बुजुर्ग, जवान फिर ------- ये सवाल यदि किसी भी पढ़े लिखे या अनपढ़ किसी से भी करो तो जवाब "बच्चे" ही आएगा.
स्वास्थ्य एवं अन्य जानकार भी उत्तर "बच्चे" ही दे रहे हैं... लेकिन किस तर्क पर?
स्वास्थ्य अधिकारियों को जनता को वायरस के प्रभाव के तर्कों के आधार पर जागरूक करना चाहिए ताकि वे समझ सकें, वो भी आसान शब्दों में.
माननीय न्यायलय भी प्रश्न पूछ सकते हैं कि किस आधार पर "बच्चे" उत्तर दिया जा रहा है, इससे सटीक जानकारी मिलने सम्भावना होगी.
माना कोरोना ताकतवर हो रहा है, तो भी वो घर में कैसे आएगा???
जो लोग बाहर जाकर घर में कोरोना ला रहे थे, उससे तो बच्चे पहली लहर में भी प्रभावित हो रहे थे. तो तीसरी लहर में विशेष क्या होगा ये जानना माता-पिताओं के लिए जरूरी होगा.
और दूसरी बात जो बच्चे पहले से ही घर में हैं, जो बाहर न स्कूल जा रहे हैं, न नौकरी करने, न बिज़नस करने, न कोई जिम्मेदारी का निर्वहन तो फिर कोरोना कैसे प्रभावित करेगा???
यदि ये पता चले तो परिवार पहले ही कुछ न कुछ बचाव के निर्णय ले सकेंगे.

गुरुवार, दिसंबर 31, 2020

सदमा

-बृजेन्द्र कुमार वर्मा 

 वो कुछ कर नहीं पाया, तस्वीर दीवार पे लगाए बैठा है,

इश्क ने ऐसा हराया उसे , सदमा दिल पे लगाए बैठा है,

बयाँ करो तो हंस के चले जाते हैं  लोग, 

यही कारण है कि हर दर्द छुपाये बैठा है 

जिन्दगी में आया जो भी, वो धोखा देके जाता रहा 

सुना है अब वो अपनी आस्तीन में छुरा छुपाये बैठा है. 

जानता है, कोई सुन नहीं सकता इस गम के समंदर को 

इसलिए अपनी जुबां पे लगाम लगाए बैठा है 

मैं कैसे कह दूं वो शख्स हरामी है, 

जो अपनी जिन्दगी भी दांव पे लगाए बैठा है 

बिना रिश्वत के वो कुछ कर नहीं सकता 

देख लो अभी तक फाइल दबाये बैठा है. 

-बृजेन्द्र कुमार वर्मा 


मंगलवार, मई 12, 2020

बदनसीब घड़ा

बदनसीब घड़ा

(कहानी प्रेम कथा की एक घटना से प्रेरित है)

-  बृजेन्द्र कुमार वर्मा


ये दिन हर बार की तरह सामान्य नहीं था. हर बार तो धूप भी निकलती थी और शाम होते-होते गर्मी भी कम हो जाती थी. बारिश होती भी थी, तो मौसम को रंगीन बना देती थी, लेकिन इस बार मौसम के बारे में कुछ भी कहना अनोखा सा लग रहा था. लेकिन प्रेमिका को ये मौसम नहीं, नदी पार अपना प्रेमी दिखाई दे रहा था. प्रेमियों की खासियत समझने के लिए उनके जैसा बनना पड़ेगा. उनके जैसा मतलब संत. किसी से पूछोगे, तुम्हारे लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है, तो कोई बोलेगा धन, कोई बोलेगा तन तो कोई बोलेगा मन. लेकिन प्रेमी जोड़ा बोलेगा समपर्ण. लेकिन क्या करें साहित्य में समपर्ण की परिभाषाएं भी अलग-अलग हैं. बहरहाल प्रेमी जोड़े का समर्पण समझना भी मुश्किल है, या ये कहें हालातों के अनुसार समपर्ण भी बदलता रहता है.

 

इतना भरोसा तो माँ को अपने बेटे पर भी नहीं होगा , जितना भरोसा प्रेमिका को अपने हाथों से बनाए घड़े पर था. लेकिन बेचारी प्रेमिका को क्या मालूम था कि उसके बनाये घड़े को हटाकर उसके जैसे कच्चे घड़े को रख दिया गया है, वो भी उसी के संबंधी ने, लेकिन अच्छी आत्मा को सब अच्छे ही दिखाई देते हैं, सो प्रेमिका को भी उसके अपने सच में अपने ही नजर आए। हर बार की तहर नदी पार प्रेमी से मिलने चल दी। उसका घड़ा जो उसका माझी बनता, उसे ध्यान से भी नहीं देखा, परखा भी नहीं। 

 

हाय! ये दुनिया भी अजीब है, परखने का काम भी वो करते हैं, जिसे अपनों पर भी भरोसा नहीं होता और जिसे भरोसा होता है, वो कभी परखता ही नहीं। 

 

लोग नदी के उफान से अपने घर की ओर जा रहे थे, तो प्रमिका मुस्कान लिए नदी ओर जा रही थी। शाम जल्दी ढलने लगी, आज तो सूरज भी इस तुफान के आगे हल्का नजर आ रहा था, बारिश तो हो ही रही थी, लेकिन ये तेज हवाएं मौसम को सुहाना बनाने की जगह भयावह बना रही थी। लोग डर रहे थे, प्रमिका खुश हो रही थी। भगवान भी किसी का नसीब सोने से लिख देता है, तो किसी का मिट्टी से, लेकिन नसीब ही सब कुछ नहीं होता, समय से आगे तो भगवान भी ठहर जाता है, इसीलिए सोने के नसीब वाले मिट्टी में मिल जाते हैं और मिट्टी में खेलने वाले सोने का ताज पहन लेते हैं।

 

प्रेमिका मिट्टी के बर्तन जरूर बनाती थी, लेकिन प्रेम ने उसकी आँखों को प्रकृति की गोद सा बना दिया था। उसे मिट्टी में भी अस्तित्व नजर आते और वो भी दिवानी ठहरती नहीं, जो दिखता, चाक पर रखकर बना देती। देश-विदेश से उसकी कलाकृति को देखने मुसाफिर आते थे। उसका आशिक़ भी कभी मुसाफिर ही था। 

 

प्रेमिका नदी पर पहुँच गयी। नदी उफान दिखा रही थी, लेकिन प्रेमिका उस पार तट को देख रही थी, सिर्फ घड़ा ही था, जो उस उफान को देखकर घबरा रहा था। जुबां होती तो बोल देता, ‘प्रेमिका उस पार न जा सकेगी’

 

प्रेमिका उतर पड़ी नदी में, उस नूर को, उस प्रकृति के बनाए नायाब तोहफे को देखने, जिसे आँख वाले भी नहीं देख सकते, दिलवाले भी समझ नहीं सकते। उस खुशबू को लेने जिसे प्रकृति ने नसीब वालों के लिए बनाया है, जिसे महसूस करना किसी के बस में नहीं। उन धड़कनों को सुनने, जिसके लिए तमाम पवित्र आत्माएं इंतजार करती हैं, उसमें कुछ पहर रहने के लिए। 

 

नदी का उफान, तेज होती बारिश, बढ़ता बहाव और प्रेमिका को दिखता किनारा। बेदर्द और खौफनाक होते मौसम को देखकर प्रेमिका घड़े से कुछ पूछती कि घड़ा बोल पड़ा।

 

क्या तुम्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा कि मैं कैसा हूँ और तुम मुझे किन परिस्थितियों में ले जा रही हो ?’, घड़ा घबराता हुआ बोला।

 

पानी में तैरती प्रेमिका बोली, ‘कैसे हो का क्या मतलब है ?, क्या तुम जानते नहीं, हमेशा की तरह मुझे कहाँ  जाना है, और तुम मेरे लिए क्या करते हो ?’

 

नहीं मैं नहीं जानता’, डरता हुआ घड़ा बोला।

 

प्रेमिका दुखी मन से बोली, ‘देखो मेरे प्यारे घड़े इन विपरीत परिस्थितियों में मुझसे ऐसी हँसी न करो। मुझ बदनसीब की बिन इच्छा शादी हुई। माता-पिता ने भी हमेशा के लिए विदाई दे दी। ससुराल में भी मुझे प्यार नहीं मिला और जब तुझे बनाया तो सिर्फ इसलिए कि मैं उस पार जाकर अपने प्रेमी को देख सकूं, उससे मिल सकूं। हर बार तूने मेरा साथ दिया, आज तुझे क्या हो गया। मेरा नसीब इतना तो खराब नहीं कि मैं अपने प्रेमी को दुखी करूं। अब मेरा नसीब भी तेरे हवाले है, तू ही किनारे पहुँचाता  है, तो आज तुझे क्या हो गया है ?

 

पानी के तेज बहाव से घड़ा कमजोर हो रहा था, लेकिन बातों को समझ नहीं पा रहा था कि आखिर उसने कब प्रेमिका को हमेशा किनारे पर पहुँचाया. वो इस भयानक मौसम में क्यों झूठ बोलेगा -

 

मैंने तो आज तक नदी को देखा भी नहीं, मुझे तो तुम्हारी भाभी ने कल ही बनाया, लगता है तुम्हें धोखा हुआ है’

सन्न रह गयी प्रेमिका... अब रोने लगी, ‘हाय। तो क्या अब भाभी भी मुझे...। मुझे धोखा हुआ नहीं है, धोखा दिया है। जिसे मैंने अपनी बहन माना उसने ही...। नफरतों की फहरिस्त में एक और नाम जुड़ जाने से नफरतों का तौल नहीं बढ़ जाता, हाँ  इतना जरूर है, खतरे बढ़ जाते हैं।

 

प्रेमिका को अब बस घड़े का ही सहारा था, सो घड़े से ही विनती करने लगी। ‘

ऐ घड़े- मेरा बस एक काम कर दे,

पिघलते जिस्म को जाम कर दे,

थाम ले कुछ साँस अपनी,

हाथ मेरे अपनी लगाम कर दे,

देख नदी ने जान लिया है,

लहरों ने भी पहचान लिया है,

बस यही एक एहसान कर दे,

इस नदी के पार कर दे।’

 

घड़ा क्या करता, कसमसाता हुआ बोला, ‘प्रेमिका तुम समझती क्यों नहीं मैं कच्चा घड़ा हूँ। मुझे पकाया नहीं गया।’

 

प्रेमिका ने भी उत्तर दिया, ‘तुम कच्चे हो तो क्या हुआ, आखिर मेरा प्यार तो पक्का है। जीवन भी इंसान को कच्चे से पक्के होने का समय देती है। दुख और सुख साथ-साथ चलते हैं। दुख ही ऐसे हैं, जो इंसान को समय के साथ-साथ पक्का बना देती हैं। माना तुम्हें पकाया नहीं गया, इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम स्वयं भी पकना नहीं चाहो। जब दुख का समय आता है, उस समय पकने का सही मौका होता है। जिन बच्चों को शिक्षा नहीं मिलती तो क्या वे समझदार नहीं माने जा सकते। जरा समाज में बात तो करके देखो, कभी-कभी  ऊँचे पदों पर बैठे लोगों से ज्यादा अच्छी बातें वे कर जाते हैं, जिन्होंने स्कूल तक का मुँह नहीं देखा होता।’

 

देखो प्रिय घड़े मेरा वक्त हमेशा से बुरा ही रहा है, इस नदी को ही देखो। आज तक जिसने मेरे शरीर की प्यास बुझाई और उस किनारे पहुँचाकर मेरी आत्मा की प्यास बुझाई, जिसने हजारों इंसानों की, वृक्षों की प्यास बुझाई, निर्मलता दी, आज वह भी इस मौसम की मार झेल रही है। याद रखना जिसका दिल भी इस पवित्र नदी जैसा होगा, उसे किसी न किसी बात को लेकर कुछ न कुछ झेलना जरूर पड़ेगा|’

 

घड़ा पिघलने लगा, ‘अब मेरा समय आ गया है। मैं इस काबिल न बन पाया कि तुम्हें उस पार ले जा सकूं। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन अब तो लगता है, यदि कोई अच्छा भी हो तो हालात आपको उसकी मदद नहीं करने देते।’

 

मैं डूब रही हूँ। अब क्या करूं, क्या उनसे मुलाकात नहीं होगी, ऐसा ही है तो मुझे कुछ कहना है उनसे। इस जीवन में उनकी नहीं बन सकी, लेकिन अगले जन्म में उनकी बनूँगी। लेकिन पक्षी बनकर, इंसान नहीं। इंसानों ने तो गाँव, शहर, सरहदों, समाज, वर्ग यहाँ  तक कि जिस्म तक पर पाबंदियाँ लगा दी हैं। पंछी आजाद होते हैं।’

 

घड़ा पिघल रहा था, उस पर चढ़ा रंग फीका पड़ने लगा। प्रेमिका की कोशिशें जारी थीं, लेकिन विफलता का दामन बढ़ता जा रहा था, मानो उसे हराने में सारी कायनात एक हो गयी हो। 

साँस फूलने लगी तो हड़बड़ाते हुए घड़े से बोली, ‘

अब तो नदी को भी तरस आने लगा, मौसम को धिक्कारने लगी, क्या अभी ही खराब होना था, थोड़ा रुक नहीं सकते थे। उन्हें क्यों नहीं सताते, जो दूसरों को सताते हैं, क्यों उन पर बिजलियाँ नहीं गिराते जो सिर्फ अपने लाभ के लिए दूसरों के घरों में आग लगा देते हैं। नदी कर भी क्या सकती है, नियती से बंधी जो है। 

 

घड़ा अंतिम समय में आ गया, ‘अब मुझे माफ कर दो, जितना कर सकता था, कर दिया अब सहा नहीं जाता, पानी में खो जाने का समय आ गया। सोचा था, मेरा निर्माण हुआ है तो एक काम तो अच्छा जरूर करूँगा। हर किसी को अपने जीवन में एक अच्छा काम जरूर करना चाहिए, जो बाकी जीवन को आसान बना दे, लेकिन मैं एक भी काम अच्छा नहीं कर पाया, मुझे दुख है। तुम्हें उस पार पहुँचाने की कोशिश भी अब नाकाम हो गई। मेरा आधा शरीर डूब गया, तुम भी हाँफने लगी।

हे ईश्वर! कुछ ऐसा कर दे,

मेरे कर्मों में नेक लिख दे,

इस लड़की को उस पार कर दे।’

 

सिसक कर रोने लगी प्रेमिका, ‘तुम तो कमजोर निकले घड़े। तन से भी और मन से भी। देखो, मैं तो स्त्री हूँ, न जाने मुझे कहाँ-कहाँ  से धोखा मिला, नफरतें मिली। लेकिन, एक प्रेम ने मुझे इतना मजबूत बना दिया कि सारे धोखों और नफरतों को मैंने माफ कर दिया। और सच ये भी है कि मैं तुम्हें भी माफ करती हूँ। तुम्हें तो एक बुरा काम करने के लिए बनाया गया था, लेकिन फिर भी तुमने एक अच्छा काम किया, मेरी जितनी मदद हो सकी, उतनी कर दी। अब इन लहरों ने तुम्हारे चीथड़े करना शुरू कर दिया, ये उनका कर्म है, वे भी नियती से जो बंधे हैं।’

 

काश मैं उन्हें देख पाती, सुनो... मुझे माफ कर दो आपको बेवजह इंतजार करवा दिया...’, प्रेमिका अब थकने लगी थी। 

 

उस ओर खड़े प्रेमी की धड़कन अचानक बढ़ गई। जैसे प्रेमिका कुछ कह रही है। इतना मौसम खराब था तो आना ही नहीं चाहिए था, लेकिन दिल इतना बेचैन क्यों हो रहा है। इतनी तेज बारिश आँधी में कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा, शाम तो थी ही साथ ही बादलों ने और अंधेरा कर दिया। नदी में आँधी से टूटे पेड़ तैर रहे हैं, डूब चुके जानवर भी उतराने लगे। लेकिन अभी तक प्रेमिका आती दिखाई नहीं दे रही।

 

प्रेमी का दिल इतना बेचैन हुआ कि लगा नदी किनारे लहरें उसके पैरों को पकड़कर गिड़गिड़ा रही हों, चलो जल्दी चलो, कहीं देर न हो जाए। प्रेमी को जब कुछ समझ नहीं आया तो आखिरकार लहरों ने ही प्रेमिका की चोली उसके पैरों में ला रख दी। प्रेमी चिला उठा और नदी में छलांग लगा दी। लहरें नियति से बंधी थी, तो क्या मदद नहीं कर सकती ?

 

एक अधिकारी नियमों के तले काम करता है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वह नियमों का गुलाम हो गया, वह अधिकार प्राप्त व्यक्ति होता है, जो नियम के लिए काम जरूर करता है लेकिन समयानुसार वह निर्णय ले सकता है, जो किसी के भले के लिए हों। यदि नियमों से भलाई होती नहीं दिखती, तो यह अधिकारी ही होती है जो विरोध कर सकता है, क्योंकि वह नियम और नियम मानने वालों के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी होता है। ऐसा ही कुछ लहरों ने नियति का पालन करते हुए प्रेमी के साथ प्रेमिका के लिए किया। 

 

आखिरकार लहरों ने प्रेमी को प्रेमिका के पास पहुँचा दिया, प्रेमिका अपनी थकान भूल गई, भयानक मौसम को भूल गई, अपने साथ बहाकर ले जाती लहरें उसे मखमल लगने लगी, घड़ा तो मानो उसका हथियार बन गया, मुस्कराते हुए प्रेमी से कहने लगी, ‘माफ कर दो मुझे, मैं आ नहीं पायी’

 

प्रेमी की आँखों में आँसू थे, दोनों एक दूजे से लिपट गए। जोर-जोर से अपनी किस्मत पर रोने लगे। वे समझ गए आखिर प्रकृति चाहती क्या थी। घड़ा पिघल चुका था, बस मुँह ही रह गया था पिघलने को, क्योंकि प्रेमिका ने उसे भी अपने सीने से लगा रखा था, सो बचा रहा। हाय रे प्रेमिका तुझे अपनी जान की परवाह न रही, उस कमजोर घड़े को बचाए रही, जिससे खुद मदद माँग रही थी। नारी दिखती कमजोर है, पर होती सबसे मजबूत है। उसकी आवाज में कितनी विवशता क्यों न हो, लेकिन उसके कर्म प्रकृति को जिन्दा रखते हैं। 

 

जैसे ही प्रेमी जोड़ा मिला, वैसे ही गाँव में बाढ़ आ गयी। लग रहा था, मानो प्रेमियों के आँसूओं से बाढ़ आ गयी। नदी का गुस्सा फूट पड़ा। ऐसा लग रहा था, जैसे नदी अपने लहरों को गाँवों में संदेश भेज कर कह दिया हो, बेरहमों! लो मैं उन्हें अपने साथ ले जा रही हूँ, जिन्हें तुमने प्यार से रहने नहीं दिया। ये बेचारे तो जीना चाहते थे, लेकिन इनको मरता देख तुम खुश हो रहे होगे। देख लो, अब तुम्हें नफरत करने की जरूरत नहीं, ले जा रही हूँ इन्हें हमेशा के लिए। लेकिन इतना याद रखना जब तक मेरा अस्तित्व है, इनके प्रेम की सुगंध मुझसे आती रहेगी। 

घड़ा प्रेमी जोड़े के प्यार को देख रोने लगा। अंतिम साँसों में पूछ बैठा, ‘प्रेमिका क्या तुमसे कुछ पूछ सकता हूँ ? मैं जानता हूँ, तुम्हारी मदद नहीं कर पाया, जानता हूँ, तुमसे पहले मैंने हिम्मत छोड़ दी, तुम आखिरकार अपने प्रेमी से मिल ही ली। इस अंत समय में मेरा योगदान क्या है ?’

 

प्रेमी जोड़ा डूब रहा था, अंत समय में भी प्रेमिका के चेहरे पर मुस्कान थी, कहने लगी, ‘तुम्हारा ही योगदान है कि मैं अपने प्रेम से आखिरी समय में मिल पायी और अभी तक नहीं डूबी। तुमने जो सहारा इस संकट में दिया, वो हमेशा याद रहेगा। तुम कच्ची मिट्टी के जरूर बने हो, लेकिन तुम्हारे इरादे किसी फौलाद से कम न थे। मुझे तुम्हारे इरादों ने बचाकर रखा। जाओ तुम्हें वरदान भी देती हूँ, जो लोग हम दोनों के प्रेम को याद रखेगा, वो तुम्हें भी याद रखेगा। इस नदी ने हम प्रेमियों को जगह दी। तो इन नदियों से ही पता चलेगा कि दुनिया में प्रेम कितना शेष है। नदियाँ सूखने लगे तो समझना प्रेम खत्म हो रहा है।’

 

प्रेमिका ठहरी नहीं, अंत में यह भी कह गई, ‘घड़े तुम्हें ये किसने का कि तुम पूरी तरह डूब जाओगे, माना कि तुम्हारा पूरा बदन पानी में मिल गया, लेकिन तुम्हारा मौखला मेरे हृदय से लगने के बाद मेरे जैसा मजबूत हो गया है, तुम्हें किनारा जरूर मिलेगा। जब नई कोपलें खिलें, तो तुम उन्हें इस अंत समय की घटना को जरूर सुनाना। इंसान पूरी जानकारी ले न ले, अंत सबको जरूर समझना चाहिए। 

 

इसके बाद नदी प्रेमी जोड़े को अपने आगोश में ले गई। जो घड़ा अपनी अंतिम साँसे ले रहा था, अब उसे पता चला कि उसकी अंतिम साँसे नहीं है, जो घबराहट थी, वह अब न रही। बारिश तेज हो रही थी, नदी उफान पर थी, गाँव डूब चुके थे। शाम ढल चुकी थी। अंधेरा हो चुका था। सूरज तो जैसे डूबा, नहीं अचानक बदहवाश गिर गया हो। ऐसा लग रहा था, कोई मनवंतर शुरू हो गया हो।

 

घड़ा अब किनारा ढूंढ रहा था।