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रविवार, जून 22, 2025

ग्रामीण विकास की पुनर्कल्पना: परंपरा, नवाचार और न्याय

- डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा 


 भूमिका

ग्रामीण भारत केवल खेत, खलिहान और मिट्टी का नाम नहीं है, यह एक समृद्ध सांस्कृतिक जीवनधारा है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता, श्रम और आत्मा, सामूहिकता और विविधता का अद्भुत समन्वय है। जब हम ग्रामीण विकास की बात करते हैं, तो यह केवल बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भर नहीं है, बल्कि एक ऐसे सामाजिक ढांचे की रचना है, जो समावेशी हो, न्यायपूर्ण हो, टिकाऊ हो और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करे। हम विकास प्रक्रिया की गहराइयों में जाकर उसकी परिभाषा, चुनौतियों, संभावनाओं और नीतिगत सुधारों की विवेचना कर सकते हैं।

1. ग्रामीण विकास की पारंपरिक अवधारणाएँ और सीमाएँ

ग्रामीण विकास को प्रारंभ में मुख्यतः कृषि उत्पादन, भूमि सुधार, सिंचाई, ग्रामीण बैंकिंग, और प्राथमिक शिक्षा जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति के रूप में देखा गया। भारत के पहले पंचवर्षीय योजना (1951-56) में 'कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम' की शुरुआत हुई, जिसने ग्रामीण भारत को योजनाबद्ध विकास से जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि, इन योजनाओं में स्थानीय सामाजिक संरचनाओं, जाति व्यवस्था, और महिला सहभागिता जैसे पहलुओं की उपेक्षा रही।

वर्षों तक विकास की यह दृष्टि 'टॉप-डाउन' रही — यानी निर्णय और योजनाएँ दिल्ली या राज्य मुख्यालय से बनती थीं, और उन्हें गाँवों पर थोप दिया जाता था। इससे स्थानीय समस्याओं की जटिलता को समझने और समाधान प्रदान करने में असफलता हुई।

2. 'बॉटम-अप' विकास और स्थानीय नवाचार

डॉ. अनिल गुप्ता अपनी पुस्तक में बताते हैं कि गाँवों में केवल 'समस्या' नहीं, समाधान भी विद्यमान हैं। हनी बी नेटवर्क और राष्ट्रीय नवप्रवर्तन फाउंडेशन (NIF) ने हजारों ग्रामीण नवाचारों को संकलित कर यह दिखाया कि सीमित संसाधनों में भी कैसे रचनात्मकता फलती-फूलती है।

Digital Green, e-Choupal, और mKisan जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स ने सूचना, कृषि, और विपणन को डिजिटली जोड़कर गाँवों को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा, परंतु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि इन नवाचारों की सफलता तब ही संभव है, जब स्थानीय साक्षरता, डिजिटल साक्षरता और बुनियादी अवसंरचना मजबूत हो।

3. सामाजिक न्याय के अभाव में अधूरा विकास

भारत का ग्रामीण समाज जाति, वर्ग, लिंग और भू-अधिकार जैसे असमानताओं से व्याप्त है। दलित, आदिवासी, और महिलाएँ अधिकांश योजनाओं में परिधीय भूमिका में रहती हैं। भूमि सुधार अधिनियमों के बावजूद ज़्यादातर भूमि अब भी कुछ ऊँची जातियों के नियंत्रण में है। 

महिलाओं की सहभागिता ग्राम पंचायतों में आरक्षण के माध्यम से बढ़ी है, लेकिन निर्णय-निर्माण की वास्तविक शक्ति अभी भी सीमित है। आत्मनिर्भर गाँव की कल्पना तभी साकार होगी जब सामाजिक न्याय उसकी रीढ़ बने।

4. ग्राम सभा और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण

पंचायती राज व्यवस्था को 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से संवैधानिक दर्जा मिला। ग्राम सभा को गाँव की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक इकाई माना गया, परंतु व्यवहार में यह सशक्त संस्था नहीं बन पाई है। इसके पीछे भ्रष्टाचार, राजनीतिक हस्तक्षेप, और जन-जागरूकता की कमी जैसी अनेक समस्याएँ हैं।

जहाँ ग्राम सभाओं को सक्रिय और निर्णयात्मक इकाई बनाया गया, जैसे केरल का कुदुम्बश्री मॉडल, वहाँ ठोस परिवर्तन देखने को मिले हैं। कुदुम्बश्री (जिसका स्थानीय मलयालम भाषा में अर्थ है "परिवार की समृद्धि") केरल सरकार का चल रहा सहभागी "गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण" मिशन है, जो 1998 में शुरू हुआ था, और महिलाओं के तीन-स्तरीय सामुदायिक नेटवर्क के माध्यम से काम करता है।

5. पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास

गाँवों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः प्रकृति पर आधारित होती है — वर्षा, भूमि, जंगल और जलस्रोत। परंतु वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, और औद्योगिक प्रदूषण ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है। राजस्थान के जल योद्धा राजेन्द्र सिंह ने जल संरक्षण के पारंपरिक तरीकों का पुनरुद्धार करके यह दिखाया कि पर्यावरणीय न्याय से ही टिकाऊ विकास संभव है। महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गाँव ने सामूहिक भागीदारी से वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण, और आजीविका के विविधीकरण का ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है जो देशभर के लिए उदाहरण बन गया है। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित हिवरे बाजार गाँव, सूखे की मार झेलने के बाद वर्षा जल संचयन और जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक मॉडल बन गया है। कभी यह गाँव अत्यधिक गरीबी और पलायन का शिकार था, लेकिन आज यह महाराष्ट्र के सबसे समृद्ध गांवों में से एक माना जाता है, जहाँ कई परिवार करोड़पति हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, हिवरे बाजार का भूजल स्तर नाटकीय रूप से बढ़ा। जहाँ पहले पानी की गंभीर कमी थी, वहीं आज गाँव में 350 कुएं और एक तालाब है, और पानी की आपूर्ति आसपास के गाँवों को भी की जाती है। इस सफलता ने कृषि उत्पादन में वृद्धि की, पशुधन को बढ़ावा दिया, और ग्रामीणों की आय में भारी वृद्धि हुई, जिससे यह गाँव देश के लिए एक आदर्श बन गया है।

6. जलवायु परिवर्तन और ग्रामों की अनुकूलन क्षमता

ग्रामीण क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ रहा है — बेमौसम वर्षा, सूखा, फसलों की विफलता, और जल संकट इसके प्रमुख लक्षण हैं। इन चुनौतियों के उत्तर में ग्राम समुदायों को पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के मेल से समाधान खोजना होगा। जैविक खेती, मिश्रित कृषि प्रणाली, और सामूहिक जल प्रबंधन ऐसे कुछ विकल्प हैं। 

7. ग्राम स्वराज की नई कल्पना: 'ग्राम स्वराज 2.0'

महात्मा गाँधी का 'ग्राम स्वराज' केवल ग्राम स्वशासन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, न्याय, और नैतिकता का आदर्श था। आज की डिजिटल और वैश्वीकृत दुनिया में गाँधी के इस विचार को फिर से पढ़ने और लागू करने की आवश्यकता है — लेकिन आधुनिक संदर्भ में।

'ग्राम स्वराज 2.0' का अर्थ होगा:

  • सूचना और तकनीक आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्था

  • लिंग और जाति आधारित असमानताओं का सक्रिय उन्मूलन

  • प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की जीवन पद्धति

  • नीति निर्माण में वास्तविक ग्राम सहभागिता

निष्कर्ष

ग्रामीण विकास एक बहुस्तरीय और बहुपरिमाणीय प्रक्रिया है जिसमें केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आयाम भी शामिल हैं। यह अध्याय इस बात पर बल देता है कि ग्रामीण भारत को केवल 'पिछड़ेपन' के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार, आत्मनिर्भरता और टिकाऊ जीवन पद्धति की प्रयोगशाला के रूप में देखा जाए।

भारत का भविष्य उसके गाँवों में बसता है, और जब तक गाँवों में न्याय, नवाचार और आत्मबल का आलोक नहीं फैलेगा, तब तक कोई भी विकास अधूरा ही रहेगा।


संदर्भ सूची

  1. Planning Commission (1952), First Five-Year Plan, Govt. of India

  2. Dreze, Jean and Amartya Sen (2013), An Uncertain Glory: India and its Contradictions

  3. Gupta, Anil K. (2016), Grassroots Innovation: Minds on the Margin are not Marginal Minds

  4. ITC e-Choupal Case Study, Harvard Business Review (2003)

  5. Rawal, Vikas (2008), Ownership Holdings of Land in Rural India, EPW

  6. Kabeer, Naila (1999), Resources, Agency, Achievements: Reflections on the Measurement of Women's Empowerment

  7. Mathew, George (1994), Panchayati Raj: From Legislation to Movement, ISS

  8. Kudumbashree Mission Reports, Government of Kerala

  9. Singh, Rajendra (2010), Water Warriors: People's Movement for Water in India

  10. Sinha, D. (2006), Hivre Bazar: A Model Village, Ministry of Rural Development

  11. IPCC Report (2022), Impacts, Adaptation and Vulnerability

  12. TERI (2020), Climate Resilience in Indian Villages

  13. Gandhi, M.K. (1946), Hind Swaraj

  14. Jodhka, Surinder S. (2002), Nation and Village: Images of Rural India in Gandhi, Nehru and Ambedkar

मंगलवार, अगस्त 09, 2022

तेलंगाना की ’दलित बंधु योजना’ दलितों के लिए कितनी कारगर


- किसी योजना में दलित शब्द लिखने से कितना होगा लाभ

- अरबों रुपया खर्च करने के बाद दलितों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति


बृजेन्द्र कुमार वर्मा,

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार अध्ययनकर्ता हैं)

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21वीं सदी के दो दशक बीतने के बाद भी आए दिन अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार की खबरें आती ही रहती हैं, इससे यह साफ हो जाता है कि आज भी जातिगत हालात बदले नहीं हैं। भारत में अनुसूचित जातियों के उन्नयन के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन तेलंगाना अनुसूचित जातियों के लिए दलितशब्द जोड़कर विशेष योजना बनाकर अनुसूचित जातियों के उन्नयन के लिए काम कर रहा है। हालांकि मीडिया भी योजना की स्थिति से अवगत कराता रहता है। जानकारों की माने तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव एस0सी0 परिवारों के कल्याण को लेकर गंभीर हैं। यही कारण है कि वे अनुसूचित जाति के परिवारों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण के लिए तेलंगाना दलित बंधुयोजना का संचालन कर रहे हैं, जिसमें अनुसूचित जाति के परिवारों को 10 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता का प्रावधान है, ताकि उनके आय सृजन को बढ़ाया अथवा सुधारा जा सके अथवा आय सृजन में बढ़ोतरी की जा सके।

तेलंगाना दलित बंधु निधि निगरानी प्रणाली के माध्यम से योजना का क्रियान्वयन किया जाता है। इसके लिए तेलंगाना अनुसूचित जाति सहकारी विकास निगम लिमिटेड (टी0एस0सी0सी0डी0सी0एल0) का निर्माण किया गया है। योजना तेलंगाना के अनुसूचित जाति विकास मंत्रालय के अधीनस्थ है, जिसके वर्तमान में मंत्री कोप्पुला ईश्वर हैं, जबकि टीएससीसीडीसीएल के अध्यक्ष बंदा श्रीनिवास हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार तेलंगाना राज्य की कुल जनसंख्या 3,50,03,674 में से 54,08,800 अनुसूचित जाति की आबादी है, जो कुल जनसंख्या का 15.45 प्रतिशत है। यदि तेलंगाना सरकार अपने प्रदेश के अनुसूचित जातियों के परिवारों के कल्याण में सफलता पाती है, तो अनुसूचित जातियों के परिवारों का दिल जीतने में सरकार को आगे लाभ हो सकता है, लेकिन मीडिया में योजना से संबंधित प्रकाशित खबरें अनुसूचित जातियों की स्थिति को कुछ और ही बयां करती हैं।

अनुसूचित जाति के परिवारों को बैंकों से ऋण मिल पाने में हमेशा से ही कठिनाई होती रही है। देरी से ऋण मिलना, मांग के अनुरूप ऋण न मिलना, विभिन्न दस्तावेजों की मांग आदि ऐसे कई कारण हैं, जिनसे अनुसूचित जाति के परिवार ऋण लेते समय सहन करते हैं। कभी-कभी तो ऋण एस0सी0 परिवारों को तब स्वीकृत हो पाता है, जब पैसे की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है, जैसे फसल बोने के समय लिया जाने वाला ऋण। तेलंगाना सरकार ने अवरोधों को ध्यान में रखते हुए एस0सी0 परिवारों को बिना बैंक हस्तक्षेप के सीधे आर्थिक सहायता प्रदान करने का निर्णय लिया। इससे एक लाभ यह हुआ कि अनुसूचित जाति के परिवारों को बिना दिक्कत आर्थिक सहायता मिली एवं बिना देरी के मिली। इससे एक लाभ की संभावना यह भी हो सकती है कि समय से आर्थिक सहायता मिलने पर परिवारों के मुखियों को अपने आय सृजन को मजबूत करने में सहायता मिलती होगी। यद्यपि मीडिया ने भी इस योजना से संबंधित भ्रष्टाचार की खबरें प्रकाशित की हैं। यदि योजना में मिलने वाले रूपयों में भ्रष्टाचार होता है तो अनुसूचित जाति के परिवारों का कल्याण नहीं हो सकता। इस योजना पर मीडिया की हमेशा नजर रहना आवश्यक है।

अनुसूचित जाति के परिवारों को हमेशा से ही उपेक्षित नजर से देखा जाता रहा है। बहुत ही कम देखा गया है कि कोई योजना प्रत्यक्ष रूप से एस0सी0 परिवारों के लिए संचालित की जाती हों। भारत में आए दिन अनुसूचित जाति के परिवारों के साथ अनुचित व्यवहार, अत्याचार की खबरें आती रहती हैं। सैकड़ों वर्षों से अछूत समझा गया। ऐसे में बहुत ही कम राज्य ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अनुसूचित जाति को मुख्यधारा से जोड़ने एवं उनके सामाजिक एवं आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी हो। उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती ने अनुसूचित जाति को प्राथमिकता देते हुए उनके सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया, यही कारण है कि अनुसूचित जाति के लोगों के दिलों में मायावती के प्रति पूरे देश में विशेष सम्मान है। तेलंगाना की बात की जाए तो मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने भी अनुसूचित जाति के लिए ‘दलित बंधुयोजना संचालित कर उनके सामाजिक एवं आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने का प्रयास किया, यद्यपि इसमें कितनी सफलता मिलती है, यह समय ही तय करेगा।

योजना की बात की जाए तो इसके अंतर्गत सभी अनुसूचित जाति पात्र परिवारों को उनकी पसंद के अनुसार बिना बैंक ऋण लिंकेज के एक उपयुक्त आय उत्पन्न करने वाली योजनाओं को स्थापित करने के लिए अनुदान अथवा सब्सिडी के रूप में प्रति अनुसूचित जाति परिवार के लिए एकमुश्त पूंजी सहायता दस लाख तय की गयी है। अनुसूचित जाति सहकारी वित्त निगम लिमिटेड, हैदराबाद की स्थापना वर्ष 1974 में की गयी थी, तब तेलंगाना, आंध्र प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था, लेकिन राज्य का विभाजन होने के बाद यह दो भागों में बंट गया। 2014 में तेलंगाना बनने के बाद से अनुसूचित जाति सहकारी वित्त निगम लिमिटेड तेलंगाना के लिए कार्य कर रहा है।

दलित बंधु योजना भ्रष्टाचार के दलदल से अछूता नहीं है। कई बार योजना में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। गत जुलाई में कांग्रेस सांसद रहे उत्तम कुमार रेड्डी ने योजना को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाएं हैं। 5 जुलाई 2022 को ‘द सियासत डेली में प्रकाशित खबर के अनुसार कोडाद में मीडियाकर्मियों से बात करते हुए, उत्तम कुमार रेड्डी ने कहा कि ‘दलित बंधु योजना’ को ‘टीआरएस’ नेताओं के लिए एक पैसा बनाने की मशीन में बदल दिया गया है, जो भारी रिश्वत और कमीशन इकट्ठा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई दलित परिवारों को योजना के लाभार्थी के रूप में चयन के लिए 2 लाख रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक का भुगतान करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया, गरीब दलितों से ज्यादा यह योजना टीआरएस नेताओं के लिए आय योजना साबित हो रही है।’ 16 मार्च 2022 को ब्रोकर बंधु हेडिंग से ‘द हंस इंडिया ने खबर प्रकाशित कर योजना में हो रहे भ्रष्टाचार पर खबर प्रकाशित की। इसी तरह 12 फरवरी 2022 को ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के मुताबिक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंदी संजय कुमार ने मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को चुनौती दी है कि वे हुजूराबाद में ‘दलित बंधु योजना’ के 20,000 लाभार्थियों की सूची जारी करें, जिनके खातों में राज्य सरकार ने 10 लाख रुपये जारी करने का दावा किया है। इसके अलावा दूसरे मीडिया संस्थानों जैसे, द हिन्दूजैसे अखबारों ने भी योजना पर सवाल उठाए हैं।

आंकड़ों की बात करें तो दलित बंधु योजना के अंतर्गत हर साल औसत 100 करोड़ से अधिक सलाना खर्च किया जाता है। वर्ष 2014-15 में 241 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, जो एस0सी0 परिवारों के कल्याण के लिए एक वर्ष में किए गए खर्च के रूप में अच्छा प्रयास है, लेकिन यहां देखना यह भी है कि इस संबंध में भ्रष्टाचार की खबरें भी प्रकाशित हुई हैं। योजना के अंतर्गत सरकार ने 2020-21 के लिए 500 करोड़ अनुदान के रूप में प्रदान करने का लक्ष्य रखा, इसमें रिपोर्ट के बाद ही पता चल सकेगा कि कितनी राशि कहां खर्च की गयी। योजना के लक्ष्य के बारे में बताया गया है कि आवंटन में गरीब से गरीब अनुसूचित जाति के परिवारों को प्राथमिकता दी जाएगी। भूमिहीन अनुसूचित जाति की महिलाओं को तीन एकड़ कृषि भूमि प्रदान करना भी योजना में शामिल है। योजना में स्वरोजगार सृजन के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है। एस0सी0 व्यक्तियों को उद्यम के प्रति आकर्षित करने के लिए योजना में अनुसूचित जाति उद्यमियों को उद्यमिता विकास कार्यक्रम प्रदान करने के बारे में भी बताया गया है। योजना में कृषि भूमिहीन मजदूर, छोटे और सीमांत किसान, शिक्षित बेरोजगार, चमड़ा कारीगर, सफाई कर्मचारी आदि एस0सी0 परिवारों पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है। ऐसे अनुसूचित जाति के परिवार जो स्वरोजगार शुरू करना चाहते हैं, उनमें ग्रामीण क्षेत्र के लिए 1.5 लाख, जबकि शहरी क्षेत्रों में 2 लाख प्रति वर्ष निर्धारित किया गया है। इसमें 33 प्रतिशत महिलाओं को प्राथमिकता की बात कही गयी है। यद्यपि इस योजना का लाभ लेने और आर्थिक सहायता प्राप्त करने के बाद 5 वर्ष तक वह इस योजना का दोबरा लाभ नहीं लिया जा सकता।

दलित बंधु योजना के उद्देश्य सटीक और विकासात्मक हैं, लेकिन यदि अनुसूचित जाति के परिवारों को इसका लाभ नहीं मिलता है, तो खर्च किए गए अरबों रूपयों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। योजना में भ्रष्टाचार अनुसूचित जातियों के विकास में प्रत्यक्ष अवरोध है। मुख्यमंत्री को यह जान लेना चाहिए कि तेलंगाना की मीडिया सजग है। बेहद आवश्यक है कि योजना की धनराशि लाभार्थियों को पहुंचे और वह भी पूरी और बिना किसी भ्रष्टाचार के। यदि दलितों को योजना का लाभ पाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, तो इसका खामियाजा आने वाले चुनाव में चन्द्रशेखर राव की पार्टी ‘तेलंगाना राष्ट्र समिति को भुगतना होगा। इसके विपरीत मुख्यमंत्री यदि अनुसूचित जातियों का दिल जीतने में सफल हुए, तो उनकी सरकार दोबारा बनने से कोई नहीं रोक सकता।

शनिवार, अक्टूबर 09, 2021

किसके कांशीराम ?

आज हर बहुजन संबधी राजनीतिक पार्टियाँ मान्यवर कांशीराम जी को अपने पार्टी का घोषित करने में लगी हुयीं हैं. हाँ ये अलग बात है, कि कोई भी उनके जैसा काम करने को राज़ी नहीं है. सब अपने मतलब और सत्ता के लालच में हैं. कांशीराम अब नाम नहीं रहा, बल्कि ये एक ब्रांड बन चुका है. जिसके कांशीराम, उसकी जनता, उसकी सत्ता. 

तमाम पार्टियों ने जिस तरह से कांशीराम को अपनी पार्टी का पेटेंट करने की कोशिश की है, उस तरह से उनके नक़्शे कदम पर चलने की कोशिश नहीं की. कांशीराम को सिर्फ वही पार्टी अपनी और आकर्षित कर सकेगी, जो उनके नक़्शे कदम पर चलने की ताकत रखती हो और बहुजनों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश कर रही हो. अन्यथा कांशीराम जी कि जन्मदिवस और परिनिर्वाण दिवस मनाना मात्र दिखावा रह जाएगा और ये ज्यादा दिन तक नहीं चल सकेगा, बहुजन जनता बहुत जल्द समझ जाएगी. 

बहुजनों अर्थात SC/ST/OBC में हजारों वर्षों से एक कमी है, जिसे बाबा साहेब, कांशीराम जैसे योद्धाओं ने भी दूर नहीं कर पाया, वो है, एकता न होना. 

यदि सामान्य वर्ग पर ध्यान दें, तो इनमें जबरदस्त एकता पायी जाती है. ये आपको सुबह लड़ते हुए दिख भी जाएँ तो शाम तब होती है जब एक थाली में खाना खाते हैं. दूसरी और बहुजनों की स्थिति है, जहाँ हमेशा से यही कोशिश रही है कि बहुजन एक हों, लेकिन एक नहीं हो पाते.

सबसे ज्यादा आपसी टिप्पणियाँ बहुजनों में ही है- 

कांशीराम जी ने बामसेफ बनाया, और बहुजन समाज पार्टी भी उन्होंने ही बनाई. लेकिन आज उनके बाद स्थिति ये है. कि बामसेफ और बहुजन समाज पार्टी की विचारधारा अलग हो चुकी है. दोनों संस्थान एक दूसरे पर टिप्पणियां करते रहते हैं. इन दोनों के अलावा भी अन्य पार्टियों का भी आपसी मतभेद है. 

राजनितिक पार्टियों के अलावा सामाजिक चिंतकों में भी आपसी मतभेद यहाँ तक कि आपसी खटास भी है. जबकि काम बहुजन केन्द्रित ही कर रहे हैं. लेकिन सब अपने को अम्बेडकर विचारक और सामने वाले को दिखावटी घोषित करने में लगे हैं. 

बहुजन के नाम से 4 प्रमुख पार्टियाँ और सभी एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं - 

बहुजन समाज पार्टी कहती है, चंद्रशेखर की आज़ाद समाज पार्टी RSS से प्रभावित है, चन्द्र शेखर रावण बसपा पर आरोप लगाते हैं. एक पार्टी और है "कांशीराम बहुजन मूलनिवासी पार्टी", ये भी बसपा पर आरोप लगाते हैं. एक पार्टी और है, बी०एम०पी० अर्थात बहुजन मुक्ति पार्टी, जो अपने को बहुजन समर्पित कहती है और ये भी अन्य पार्टियों पर सवाल उठाते हैं. हर पार्टी जोर शोर से बहुजनों को आकर्षित करने में लगे हैं. आखिर बहुजन जाए तो जाए कहाँ ?

पार्टी का विलय, लेकिन किसका ?

हर पार्टी की कोशिश है, कि बहुजनों की सरकार बने, लेकिन ये तभी होगा जब कोई एक प्रमुख पार्टी हो. ऐसा तब होगा जब सभी पार्टियों का विलय हो जाए और कोई एक पार्टी प्रमुखता से सामने आये. 

लेकिन फिर के सवाल है, कि किस पार्टी का विलय किस में हो? हर बहुजन पार्टी अपने को अच्छा साबित करने में लगी है और दूसरे की पार्टी को खराब. 

एक कारण और है, यदि एक पार्टी दूसरी पार्टी में विलय कर दे, तो स्वत दूसरी पार्टी बड़ी हो जायेगी, और जिसका विलय हुआ है उनके पदाधिकारी जिसमें विलय हुआ है उस पार्टी के पदाधिकारियों से स्वतः छोटे हो जायेंगें. जो कोई भी नहीं चाहेगा. 

9 अक्टूबर को सभी पार्टियाँ मना रही हैं कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस - 

लखनऊ में BSP, BMP, BKMP कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस मना रही हैं, हो सकता है एक दूसरे पर सवाल भी उठाएं. लेकिन इससे सरकार नहीं बन सकती. इसके लिए एक होना पड़ेगा. 

क्या अभी बहुजन सरकार बनने में लगेगा समय ? -

जिस तरह से बहुजन पार्टियों ने अपने अपने में बहुजनों को आकर्षित करने की होड़ शुरू की है. और कांशीराम जी को पेटेंट करने की कोशिश है इससे बहुजन में भी आपसी रंजिश शुरू हो सकती है. इससे सीधा सीध लाभी गैर बहुजन पार्टियाँ उठाएंगी. लेकिन सभी बहुजन पार्टियाँ एक हो जाएँ तो बहुत जल्द बहुजन सरकार बन सकती है. लेकिन इसके लिए सभी पार्टियों को एक मंच पर आकर खुली चर्चा करनी होगी. और एक पार्टी तय करनी होगी.  


मंगलवार, मई 05, 2020

बंटाई

कविता 

  बंटाई  


फसल काट ली 
बोरों में भर ली 
बंटवारे की बात आई 
जिसकी जितनी क्षमता थी
उतनी बोरे रखने की आज़ादी 
मेहनत करने वाले ने अपना झोपड़ा खोला 
जमीन वाले ने अपना महल 
-बृजेन्द्र कुमार वर्मा 

गुरुवार, जुलाई 16, 2015

विचारों का द्वंद्व: दो चहरों वाला समाज

आज एक ऐसे विषय पर लिखने को विवश हुआ हूँ, जिसने कई बार मेरे मन में विभिन्न तर्कों को जन्म दिया है. तर्कों ने मुझे समाज के दो चेहरे देखने का मौका दिया. असल में हम कई बार एक ही विचार पर किसी समय कुछ होते हैं और किसी और समय पहले से हटकर अर्थात कुछ और. हमारा मन, हमारे समक्ष, हमारे लाभ और व्यक्तिगत उचित-अनुचित के अनुसार विचार प्रस्तुत करता है. मान लीजिये बरसात में छाता की जरूरत है और वह आम दिनों के मुकाबले किसी दूकान पर मंहगा बिकने लगा तो मन में विचार उठेगा कि भाई कितना मंहगा बेचा जा रहा है, इसे तो सस्ता होना चाहिए और जब बरसात का मौसम न हो और उसी दूकान में बहुत सारे छाते बिक रहे हों तो मन में विचार आएगा, "भई इन छातों का क्या काम?" ऐसे में हम इस बात से सहमत हो सकते हैं कि एक विषय पर एक ही व्यक्ति की समय-समय पर विचारधारा अलग-अलग हो सकती है.
खैर, मैं यहाँ कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूँढना चाहता हूँ.

1. पहला सवाल - वंश किसका कहलाता है- पुरुष का या महिला का ?
वर्तमान में महिला सशक्तिकरण के लिए हर जगह प्रयास किये जा रहे हैं. जागरूकता लाने के लिए आये दिन विभिन्न घटनाओं और विषयों पर बहस होती रहती है. ऐसा होना भी चाहिए. मैं इसका समर्थन करता हूँ.
महिला को पुरुष के बराबर माना जाता है, मानसिक तौर पर भी और कानूनन भी. मैं इसे भलीभाति समझता और सहर्ष स्वीकारता हूँ. 
आज कल एक बहस जोरों पर है कि शादी के बाद जब बच्चों का जन्म होता है तो वंश पुरुष का क्यों माना जाए, महिला का क्यों नहीं? समाज में चली आ रही परम्परा के अनुसार वंश को पुरुष आगे बढ़ाता है, अर्थात स्त्री पुरुष के वंश को आगे बढ़ाती है. घूमफिर कर वंश पुरुष का होता है. स्त्री का कोई वंश नहीं होता. इस पर भी जबरदस्त बहस चलती है, मीडिया, सेमिनार, कॉलेज, सामाजिक जनमाध्यमों (social media) जैसे फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स एप आदि पर आये दिन लोग इस सम्बन्ध में जागरूकता लाने सम्बन्धी विचार प्रस्तुत एवं प्रसारित करते ही रहते हैं.
मैं इस बात से पूर्णरूपेण सहमत हूँ कि वंश सिर्फ पुरुष का ही नहीं हो सकता, इस पर नारी का भी उतना ही अधिकार है. और जो सिर्फ वंश पर अधिकार पुरुष का मानते हैं मैं उनका विरोध करता हूँ. 
पर यहाँ सवाल कुछ और है.....

क्या है सवाल? 
जब कोई पुरुष किसी नारी को बहला फुसलाकर उसे गर्भवती बना देता है तो लोग स्त्री से प्रश्न करते हैं- "किसका पाप है?" (ये वाक्य आप भारतीय फिल्मों, मनोरंजक धारावाहिकों, नाटकों, लेखों में सुन और पढ़ सकते हैं.)

अब जरा समझें- "किसका पाप है?" का अर्थ ये हुआ कि पीड़ित स्त्री से पूछा जा रहा है कि- जो बच्चा गर्भ में पल रहा है उसका जिम्मेदार पुरुष कौन है? इस वाक्य से यह बात निकल कर आती है कि जब कोई पुरुष, नारी को बहला-फुसलाकर दुष्कर्म जैसा घटिया, नीच और घिनौना काम करता है तब उसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ पुरुष को माना जाता है, नारी को नहीं, क्यूंकि नारी को तो बहलाया और फुसलाया गया... (क़ानून भी ऐसी पीड़ित महिला का पक्ष रखता है. महिलाओं का संरक्षण होना भी चाहिए.) ऐसे में जिम्मेदारी पुरुष की हुई... अर्थात पीड़ित नारी के गर्भ में पल रहे बच्चे का जिम्मेदार पुरुष हुआ.

तर्क- 
जब कोई पुरुष दुष्कर्म जैसा घटिया, नीच कर्म कर नारी को बहला फुसलाकर उसे गर्भवती बना देता है तो उस कृत्य से गर्भ में आये बच्चे का पूरा जिम्मेदार वो पुरुष होता है, तो शादी के बाद पति द्वारा पत्नी के गर्भ में आये बच्चे का पूरा जिम्मेदार पति अर्थात पुरुष क्यों न हो? क्यों न वंश पुरुष का माना जाए?
या फिर, अगर शादी के बाद जन्मे बच्चे पर महिला का बराबर अधिकार हो और वंश पुरुष का होने के साथ महिला का भी वंश माना जाए तो पुरुष द्वारा स्त्री के साथ किये कृत्य में महिला को भी बराबर का दोषी क्यों न माना जाए? शादी से पहले अवेध सम्बन्ध बनाने के बाद गर्भ में आये बच्चे का जिम्मेवार पुरुष के साथ स्त्री को भी क्यों न माना जाए? तब समाज का पीड़ित स्त्री से सवाल, "किसका है ये पाप?" न होकर "किसके साथ किया ये पाप?" क्यों न हो? परन्तु ऐसा नहीं होता.
अगर पुरुष बहला फुसला कर स्त्री को गर्भवती करे तो गर्भ का जिम्मेदार पुरुष और जब शादी के बाद यही कार्य पुरुष करे तो लोग स्त्री के अधिकार और सम्मान की बात कर गर्भ के बच्चे को महिला का भी वंश माने जाने की वकालत करते हैं. ऐसे में हमें समाज के दो अलग अलग चेहरे देखने को मिलते हैं. 

इसमें भी एक सवाल
अगर मान लीजिये शादी के बिना कोई स्त्री सोचसमझ कर और जानकार-बूझकर पुरुष के साथ मिलकर गर्भवती होती है, तब भी क्या गर्भ का जिम्मेदार सिर्फ पुरुष को माना जायेगा? क्या तब भी कहा जाएगा के वंश सिर्फ पुरुष का है या यहाँ भी स्त्री के वंश होने की वकालत की जाएगी. आखिर बात ये समझ नहीं आ रही कि स्त्री को बहलाने-फुसलाने पर पुरुष द्वारा किये किसी कृत्य के कारण ही सारी विचारधारा क्यों बदल जाती है? 

शादी से पहले किये किसी कृत्य पर समाज की विचारधारा कुछ और, और फिर शादी के बाद किये उसी कृत्य पर समाज की विचार धारा कुछ और?
खैर...

2. दूसरा सवाल- क्या पुरुष और स्त्री बराबर हैं?

इस प्रश्न का मैंने हर जगह यही उत्तर पाया कि हाँ, स्त्री और पुरुष मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, व्यावहारिक (शारीरिक शक्ति छोड़ कर) हर पहलु में बराबर है. इसमें कोई संदेह नहीं. कानून भी इसका समर्थन करता है. यही कारण है कि किसी सरकारी पद पर जो आय पुरुष को दी जाती है उतने बराबर की आय महिला को भी दी जाती है. महिलाओं और पुरुषों का किसी एक पद पर एक जैसा ही पे-ग्रेड और तनख्वा का प्रावधान है. इस व्यवहार की सराहना करनी चाहिए. ये विचारधारा सिद्ध करती है कि पुरुष और महिला एक बराबर हैं.

तर्क- 
कमाल की बात है कि स्त्री-पुरुष मानसिक और दिमागी तौर पर दोनों एक सामान हैं तो फिर एक उम्र + एक बौद्धिक स्तर के पुरुष (मान लीजिये बी.ए. III का छात्र) द्वारा उसी उम्र की + उसी बौद्धिक स्तर की स्त्री (मान लीजिये बी.ए. III का छात्रा) को बहला-फुसला कैसे लेता है? अर्थात किसी उम्र+ एक बौद्धिक स्तर का पुरुष जब उसी उम्र + उसी बौद्धिक स्तर की स्त्री को बहलाने और फुसलाने की कोशिश करता है तो वो स्त्री कैसे बहल और फुसल जाती है?? तब स्त्री की बौद्धिक स्थिति और मानसिक स्तरता कैसे कम हो जाती है? अगर विज्ञान और कानून को माने तो स्त्री और पुरुष सामान हैं, सीधी सी बात है कि पुरुष के बहलाने-फुसलाने पर स्त्री को बहलना-फुसलना नहीं चाहिए क्योंकि दोनों एक सामान दिमागी स्तर के हैं.
यह एक सोचनीय प्रश्न है, जिसपर आत्मचिंतन करने की जरूरत है.

मैं अपनी बात कहूँ तो-
इसका उत्तर पहला ये हो सकता है कि- पुरुष द्वारा स्त्री को बहलाने-फुसलाने की सम्भावना तब ज्यादा हो सकती है जब पुरुष विकसित क्षेत्र का हो सकता है और स्त्री पिछड़े इलाके और अविकसित क्षेत्र की. हम जानते हैं कि क्षेत्र और समुदाय का निश्चित ही जीवन और विचार-व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है. यही कारण है कि छात्र अपने पिछड़े इलाको से बहार निकल कर शहर पढ़ने या नौकरी करने आते हैं. 

दूसरा उत्तर ये भी हो सकता है, कि भारत में हज़ारों वर्षों से स्त्री को दबाकर रखा गया. स्त्री को एक उपभोग की वस्तु समझा गया, धीरे-धीरे स्त्रियाँ अपने को स्वयं में कमजोर समझने लगी (और आज भी समझती हैं), इन हज़ारों वर्षों में निर्णय लेने की क्षमता कम हो गई... आज स्थिति ये है कि कोई भी निर्णय लेने के लिए पिता, भाई अथवा पति (जो सभी पुरुष हैं) पर आश्रित रहती हैं, ऐसे में उन्हें अगर कोई पुरुष बहलाने की कोशिश कर रहा होता है तो उन्हें लगता है कि शायद उक्त पुरुष सही ही बोल रहा होगा. ऐसे में महिला स्वयं का विवेक का उपयोग न कर दूसरों की बात पर विश्वाश कर लेती  और पुरुष के बहलाने-फुसलाने पर बहल और फुसल जाती हैं. 
जो स्थिति महिलाओं की हज़ारों वर्षों से है, बिलकुल वैसी ही स्थिति दलितों की भी रही. इन्हें भी दबाया-कुचला गया. धीरे धीरे ये वर्ग भी उस जख्म से उबर रहे हैं, जो ऊँची जातियों ने इन्हें दिए हैं. आरक्षण इसमें एक सहायक के तौर पर सामने आया. आरक्षण ने न केवल दलितों को आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित माहौल दिया अपितु महिलाओं को भी आरक्षण देकर उन्हें शान से जीने का हक दिया. उनका स्वाभिमान जगाया है. 

निष्कर्ष 
अजीबो गरीब प्रश्नों और उनके तर्कों का विश्लेषण करने पर हम छोटे मोटे निष्कर्ष पर तो पहुँच गये, फिर भी इसका असर जब तक समाज में देखने को न मिले तब तक इन निष्कर्षों का कोई मूल्य नहीं.
1. निष्कर्ष यह निकल कर आता है कि अगर पिछड़े क्षेत्र की महिलाओं को जो कि आगे बढ़ना चाहती हैं परन्तु संसाधनों के अभाव में नहीं बढ़ पा रही हैं, अगर उन्हें उसी पिछड़े क्षेत्र में आगे बढ़ने अथवा पढने और सुरक्षित माहौल प्रदान किया जाए तो वे जागरूक होंगी और तब किसी पुरुष की हिम्मत न होगी जो स्त्री को बहला अथवा फुसला सके.

2. दूसरा निष्कर्ष यह निकल कर आता है कि जिस प्रकार से, मान लीजिये बस में कोई भरा सिलेन्डर ले जाए और बस में फट जाए तो इसमें दोष सिर्फ उस व्यक्ति का नहीं जिसने सिलेंडर बस में रखा बल्कि परिचालक का भी है जिसने उसे बस में रखने दिया, ठीक उसी प्रकार से जब कोई पुरुष, किसी स्त्री को बहलाने की कोशिश करता है, तो दोष सिर्फ उस पुरुष का ही नहीं, बल्कि दोष उस कानून पालकों का भी है जिनकी नाक के नीचे ये सब निडर होकर किया जा रहा है, उस व्यवस्था का भी है जिसने पुरुष को मौका दिया ऐसा कृत्य करने का. इस का भी सुधार होना चाहिए. 

3. भ्रष्टाचार में सरकारी कर्मचारियों के लिप्त होने के कारण अपराधी सरेआम कुकृत्य करते रहते हैं, और बेख़ौफ़ घुमते हैं, क्यूंकि वो जानते हैं कि सरकारी कर्मचारियों के पास इतना टाइम ही नहीं कि वे अपराधियों को पकड़ सकें. सारा समय अच्छी जगह स्थानान्तरण कराने में और बाकी समय स्थानान्तरण में किये "खर्चे" को पूरा करने और "कमाने" में लगा देते हैं.

अंत में इतना ही कहना चाहता हूँ, मैंने यहाँ कोई बहस का मुद्दा नहीं दिया. मैंने अपने प्रश्नों के उत्तर तलाशने की कोशिश की. जीवन में हर राह में प्रश्न होते हैं. उन्ही के हल मनुष्य आजीवन करता है, और जिसके हल मिलते जाते हैं, उनको मनुष्य संचार के माध्यम से प्रेषित करता रहता है. यही संसार है, यही संचार है.