सीखने के लिए मैंने हर जख्म सींचे हैं, पढ़ना है दर्द मेरा तो सब लिंक नीचे हैं
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मंगलवार, जुलाई 29, 2025

विदाई

गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव

किसी और गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव

वक़्त बदल जाने पर गाँव में

पुरुषों के चेहरे वही रहते हैं

बस स्त्रियों के चेहरे बदल जाते हैं ।

(-डॉ0 बी0के0 वर्मा)

 


खोने से बहे हैं

वो विदाई के समय रोता हुआ शख्स,

उसके आँसू दूर जाने से नहीं, किसी के खोने से बहे हैं,

तुम देखना लौट आने पर गुमसुम सी रहेगी,

फिर से निकलेंगे वही आँसू, जो खोने से बहे हैं।

(- डॉ0 बी0 के0 वर्मा)

सोमवार, जुलाई 28, 2025

प्लास्टिक खाने वाले फंगस के प्रचार में प्रेस पीछे क्यों ?


 डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा

प्लास्टिक प्रदूषण आज दुनिया के सबसे गंभीर पर्यावरणीय खतरों में से एक है। हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा हमारे महासागरों, नदियों और ज़मीन पर जमा हो रहा है, जो सदियों तक अपघटित नहीं होगा। यह न केवल वन्यजीवों को नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि हमारे पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन रहा है। इस विशाल चुनौती के बीच, वैज्ञानिक समुदाय ने एक अप्रत्याशित, लेकिन शक्तिशाली सहयोगी की खोज की है, जो है “प्लास्टिक खाने वाले फंगस”। इस सूक्ष्मजीव ने अपनी अप्रत्याशित और अनूठी क्षमताओं से पूरी दुनिया को चौंका दिया है, क्योंकि ये प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की हमारी लड़ाई में एक नई आशा लेकर आए हैं। और इसमें प्रेस को भी पीछे नहीं रहना है, जबकि पूरी दुनिया जानती है कि प्रेस की ताकत क्या है।

पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (PET), पॉलीइथाइलीन (PE), पॉलीप्रोपाइलीन (PP) और पॉलीस्टाइरीन (PS) जैसे प्लास्टिक हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन गए हैं। पानी की बोतलों से लेकर पैकेजिंग और कपड़ों तक। प्लास्टिक की कुछ बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें औद्योगिक क्रांति का एक महत्वपूर्ण घटक बना दिया है, लेकिन यही गुण उन्हें पर्यावरण के लिए भी एक खतरा बनाते हैं। पारंपरिक रीसाइक्लिंग विधियाँ महँगी होती हैं और अक्षम भी हो सकती हैं, और प्लास्टिक का एक बड़ा हिस्सा अंततः हमारे प्राकृतिक वातावरण में पहुँच जाता है। यहाँ वे माइक्रोप्लास्टिक में टूट जाते हैं, जो मिट्टी और पानी में प्रवेश कर खाद्य शृंखला का हिस्सा बन जाते हैं, जिसके दीर्घकालिक प्रभावों को हम अभी पूरी तरह से समझ भी नहीं पाए हैं। इस गंभीर स्थिति में, वैज्ञानिकों ने प्रकृति की गोद में पल रहे इस फंगस से परिचय कराया जिसके लिए प्रकृति का जितना धन्यवाद किया जाए, वो कम ही होगा। क्या कोई सूक्ष्मजीव ऐसे हैं, जो प्लास्टिक जैसे जटिल बहुलकों को तोड़ सकते हैं? जवाब है, हाँ।

यह इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। बात 2011 की है। बताया जाता है कि येल विश्वविद्यालय के कुछ शोधकर्ता इक्वाडोर के अमेज़न वर्षावन में  एक शोध ट्रिप पर गए हुए थे। यहाँ शोधकर्ताओं ने पेस्टालोटिओप्सिस माइक्रोस्पोरा (Pestalotiopsis microspora) नामक एक फंगस की खोज करके दुनिया को चौंका दिया। इस फंगस में पॉलीयूरेथेन (PU) को ऑक्सीजन-रहित वातावरण में भी विघटित करने की क्षमता थी। यह एक बड़ी सफलता थी, क्योंकि लैंडफिल (भूक्षेत्र जहाँ बड़ी मात्रा में अपशिष्ट पदार्थ गाड़ दिए जाते हैं) में प्लास्टिक अक्सर बिना ऑक्सीजन के ही पड़ा रहता है। यह खोज प्लास्टिक-खाने वाले सूक्ष्मजीवों के अध्ययन में एक मील का पत्थर साबित हुई। इस प्रारंभिक सफलता के बाद, दुनिया भर के शोधकर्ता सक्रिय हो गए। उन्होंने विभिन्न प्रकार के फंगस की पहचान की जो अलग-अलग प्लास्टिक को तोड़ने में सक्षम हैं। इनमें कुछ प्रमुख फंगस एस्परगिलस ट्यूबिंगेंसिस (Aspergillus tubingensis), फेनरोचेट क्राइसोस्पोरियम (Phanerochaete chrysosporium) आदि हैं। इसमें एस्परगिलस ट्यूबिंगेंसिस फंगस पॉलीइथाइलीन (PE) को तोड़ने के लिए जाना जाता है, जो दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक में से एक है। यह कटिन हाइड्रोलेस जैसे एंजाइमों का स्राव करता है, जो PE को छोटे एवं आसानी से विघटित होने वाले टुकड़ों में तोड़ देते हैं। इधर फेनरोचेटे क्राइसोस्पोरियम सफेद सड़ा हुआ कवक के रूप में जाना जाता है, जो लकड़ी के जटिल घटक, लिग्निन को तोड़ने की अपनी क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। शोध से पता चला है कि यह पॉलीयूरेथेन और पॉलीइथाइलीन सहित कुछ प्लास्टिक को भी प्रभावी ढंग से विघटित कर सकता है।

इन फंगस की गुप्त शक्ति उनके द्वारा उत्पादित एंजाइमों में निहित है। ये सूक्ष्म प्रोटीन फंगस की कोशिकाओं से बाहर निकलते हैं और प्लास्टिक बहुलक की लंबी, स्थिर शृंखलाओं पर रासायनिक रूप से हमला करते हैं। वे इन शृंखलाओं को छोटे, घुलनशील अणुओं में तोड़ देते हैं। एक बार जब प्लास्टिक के टुकड़े छोटे हो जाते हैं, तो फंगस उन्हें अपनी कोशिकाओं में अवशोषित कर लेते हैं और उन्हें अपनी वृद्धि और ऊर्जा के लिए उपयोग करते हैं। इस प्रक्रिया को जैव-अपघटन (Biodegradation) कहा जाता है। यह एक प्राकृतिक और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ तरीका है, जिससे प्लास्टिक को उसके मूल घटकों में तोड़ा जा सकता है, जिससे हानिकारक सह-उत्पाद (By-products) का उत्पादन नहीं होता।

ये बात बड़ी अचंभित करने वाली है कि जबकि पूरी दुनिया प्लास्टिक कचड़े से परेशान है, वह इस तरह की आशावादी खोज के बाद भी प्रेस में वो उत्साह नजर नहीं आया जैसा की आना चाहिए। इन फंगस पर वैज्ञानिक तो काम कर ही रहे हैं, पर प्रेस को भी उसी उत्साह और जूनून के साथ लिखना चाहिए। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रेस ने अपनी भूमिका निभाई और तमाम देशों की जनता की स्थिति को बताया। भारत को ही ले लीजिए, भारत की आजादी से लेकर विकास में प्रेस ने अपना योगदान दिया है। हालांकि भारतीय भाषा में विज्ञान की बातों को प्रकाशित करने में प्रेस के हाथ तंगी में रहते हैं, उसका भी एक विशेष कारण विज्ञान पत्रकारों का अभाव है, लेकिन फिर भी जितना हो सके विज्ञान को सरल और बोलचाल की भाषा में जितना प्रेषित किया जाए उतना ही जनता का लगाव इस और बढ़ेगा। विकासशील देशों को तो ऐसे फंगस पर विशेष रूप से काम करना चाहिए। वैज्ञानिकों को भी और प्रेस को भी। प्रेस ये तो खूब प्रकाशित कर रहा है कि प्लास्टिक किस तरह से पर्यावरण और स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, परंतु ये प्रकाशित करने मे पीछे क्यों कि इस तरह के फंगस को विकासशील देशों के पर्यावरण के लिए अनुकूल बनाया जाए तो स्थिति कुछ बेहतर हो सकती है। प्रेस का काम सिर्फ खबरें देने का ही नहीं, बल्कि जागरूक और उत्साहित करने का भी है। वैज्ञानिकों की अपनी सीमाएँ होती है, समाज में वे उतने सक्रिय नहीं होते, जितने वे अपनी प्रयोगशाला में होते हैं। ऐसे में समझाने का काम स्वयं प्रेस का हो जाता है।

प्लास्टिक खाने वाले फंगस की खोज ने प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए एक नया और रोमांचक मार्ग खोल दिया है। क्योंकि यह पारंपरिक तरीकों की तुलना में कम ऊर्जा और हानिकारक रसायनों का उपयोग करता है। अलग-अलग फंगस विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक को तोड़ सकते हैं, जिससे एक व्यापक समाधान संभव है। इसके अलावा बहुत ही कम लागत में बड़े पैमाने पर औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए यह प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है। उन क्षेत्रों में, जहाँ प्लास्टिक कचरा जमा होता है और पहुँच कठिन है, वहाँ इसका उपयोग किया जा सकता है। प्रेस को चाहिए कि इस पर खूब लिखे। सरकार, उद्योगपतियों, उद्यमियों आदि को इस और आकर्षित करे। जनता को जागरूक करे ताकि जनता सरकारों पर दबाव बना सके और इस तरह हम प्लास्टिक कचड़े के अंत के लिए एक नए आंदोलन को जन्म दे सकें। हालांकि अभी भी कुछ चुनौतियाँ सामने हैं, जैसे वर्तमान में, प्लास्टिक का जैव-अपघटन एक अपेक्षाकृत धीमी प्रक्रिया है। औद्योगिक पैमाने पर इसे तेज़ करने के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है। इसके अलावा कुछ फंगस को प्लास्टिक को प्रभावी ढंग से तोड़ने के लिए विशिष्ट तापमान, आर्द्रता और पोषक तत्वों की स्थिति की आवश्यकता होती है। हालांकि वैज्ञानिक इन प्लास्टिक के जैव-अपघटन के अंतिम उत्पादों और पर्यावरण पर उनके संभावित दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में पूरी समझ विकसित नहीं कर पाएँ हैं, ऐसे में इसे भी जानना जरूरी है। वैज्ञानिक अब एंजाइम इंजीनियरिंग के माध्यम से इन फंगस की क्षमताओं को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि वे अधिक तेज़ी से और कुशलता से प्लास्टिक को तोड़ सकें।

प्लास्टिक खाने वाला फंगस एक वैज्ञानिक चमत्कार हैं, जो हमें हमारे ग्रह को बचाने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण प्रदान कर सकते हैं। हालाँकि यह एक अंतिम समाधान नहीं है और प्लास्टिक के उत्पादन और खपत को कम करना अभी भी महत्वपूर्ण है। ये सूक्ष्मजीव हमें एक स्थायी भविष्य की ओर बढ़ने में मदद करने की अपार क्षमता रखते हैं। यह एक रोमांचक क्षेत्र है, जहाँ नवाचार हमें प्लास्टिक-मुक्त दुनिया के करीब ला सकता है और इन सब में प्रेस को हर बार की तरह अहम भूमिका निभानी है।

(लेखक जनसंचार के व्याख्याता हैं।)

सोमवार, जून 23, 2025

अधूरी मोहब्बत

(-डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा)

मोहब्बत की किताब का, एक पन्ना मोड़ आए हम।

कहानी पूरी न हुई, और क़लम तोड़ आए हम।।


कुछ ख़्वाब थे मुकम्मल, कुछ आँखों में ही सो गए।

थे वादे भी तो प्यारे, जो रूहों से जुदा हो गए।।

किनारों पर ही आकर, मौजों से बिछड़ आए हम।

कहानी पूरी न हुई, और क़लम तोड़ आए हम।।



वो रातें चाँदनी सी थीं, वो बातें रूह में बस गईं।

तस्वीरें ज़ेहन से निकलीं, पर यादें दिल में धंस गईं।।

उन्हीं यादों के साए में, ज़िंदगी छोड़ आए हम।

कहानी पूरी न हुई, और क़लम तोड़ आए हम।।

रविवार, जून 22, 2025

साया भी शरमाया


तुझसे जुदा होकर खुद को ही ग़ैर पाया,

तू गया तो मेरा साया भी मुझसे शरमाया।


आईनों ने पूछा, ये अजनबी है कौन?
हर अक्स ने आँखों को कुछ और दिखलाया।


लब खामोश थे, मगर दिल चीख कर बोला,
जिससे वफ़ा की, उसी ने दिल को सुलगाया।


तेरे बाद किसी मोड़ पे ख़ुशियाँ मिली भी तो क्या,
हाथ थामते ही ख़ुशी ने दर्द ही बरसाया?


अब तन्हाई मेरा शहर है, और यादें मेरा क़ाफ़िला,
इश्क़ के इस वीरान में, बस मैं हूँ और मेरा साया।


(-डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा)

मंगलवार, अगस्त 20, 2024

ये कविता काम आयेगी याद दिलाने में

माँ का दुप्पट्टा जो बदबू से भरा है, 

यही पसीना जिम्मेदार है तुम्हें काबिल बनाने में


सड़ गया जिस्म माँ का घर में,

क्या शेष रह गया जीवन बिताने में.


आज चुप है माँ, बेटे के अफसर बनने पर,

जिसने कभी एलान किया था जमाने में.


चली गयी माँ कुछ शेष न रहा,

अब क्या मिलेगा मुस्कराने में.


औलादों, अपनी माँ की गोद को याद रखना,

उसका भी हिस्सा है, मंजिल दिलाने में.


प्यार, दुलार, समर्पण इसे अपने पास रखना,

काम आएगी नफरत की आग बुझाने में.


मैं वक़्त को रोक तो नहीं सकता लेकिन 

ये कविता काम आयेगी याद दिलाने में 


दोस्तों ऐसा कोई काम न करना 

जो शर्म आये माँ को माँ कहलाने में 


ये साल भी कितना मगरूर है.

 वो शख्श, जो अभी दूर है,

तुम्हें पता ही नहीं कितना मजबूर है.


अब वो रात में बस तारे गिनता है 

जिस पर किताबों का फितूर है.


डरता है, कहीं बदनाम न हो जाए 

उसके पिता को उसपर गुरूर है 


वो चली गयी तो क्या हुआ 

उसकी आँखों में तो मेरा ही नूर है 


चली थी हवा कि सब गुजर जायेगा,

उफ़ | ये साल भी कितना मगरूर है. 


तो करता भी क्या

 मुफलिसी में अपनी जुबां दबा कर आया हूँ,

लौटकर आऊंगा नहीं, ये भी बता के आया हूँ 


मैंने मोहब्बत में हारी हैं कई बाजियाँ,

हाल ही में एक डोली उठा कर आया हूँ 


वो रात अलग थी, ये रात अलग,

दंगों में बच्चों का खून बचा कर आया हूँ


अच्छे अच्छों को रोटी तक नसीब नहीं,

मैं तो ईमानदारी मिट्टी में दबा कर आया हूँ.


 वो तो उसकी यादें हैं, तो दिन गुजर भी जाता है,

वरना कई बार खुद की अर्थी सजा कर आया हूँ.


उन्हीं हरामखोरों ने निकाल दिया बाहर,

जिनको सियासत सिखा कर आया हूँ. 


गम ये नहीं, खुद कर लिया बर्बाद 

ख़ुशी ये है, यही कहानी उसे सुना कर आया हूँ. 


घर से न निकलता, तो करता भी क्या 

मैं अपने घर वालों बहुत सता कर आया हूँ. 


शनिवार, सितंबर 24, 2022

ग्रामीण विकास में प्रत्यक्ष अवरोध है लंपी वायरस

बृजेन्द्र कुमार वर्मा,

(लेखक- ग्रामीण विकास संचारक हैं)

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लंपी वायरस ने यह स्थिति ला दी है कि समाज वैज्ञानिकों का ध्यान ग्रामण विकास और लगातार प्रभावित हो रहे दुग्ध उत्पादन की ओर जाने लगा है। ग्रामीण अपने विकास के लिए लगातार संघर्षरत रहा है, लेकिन लम्पी वायरस ने ग्रामीण विकास के विभिन्न अवरोधों में एक अवरोध को और बढ़ा दिया है, जो भारत के विभिन्न राज्यों के लिए चिंता का विषय बन चुका है, वह है मवेशियों में फैला लंपी त्वचा रोग। जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो बहुत जल्द पशुधन उत्पादन महंगा होने लगेगा, क्योंकि हजारों दुधारू गायों की मृत्यु हो चुकी है, और अब भी लगातार मर रही हैं। मीडिया कवरेज में ड्रॉन की मदद से ऊंचाई से लिए कई फुटेज देखने के बाद ऐसा लगता है कि लंपी से मरने वाले मवेशियों की संख्या राष्ट्र स्तर पर लाख से ऊपर भी हो सकती है। समाचार पत्रों की माने तो कई राज्यों में 10-10 हजार से ज्यादा गायों की मौत हो चुकी है। राहत की बात यह है कि ये रोग पशुओं से इंसानों में नहीं फैलता है, लेकिन फिर अप्रत्यक्ष रूप से वे इंसान प्रभावित हुए हैं, जो पशुधन रखते हैं, और जिनके मवेशी लंपी वायरस की चपेट में आ गए हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन होता है, जिसे विभिन्न संसाधनों द्वारा शहरों में पहुँचाया जाता है। गाँव के मवेशी पालक अपने मवेशियों का दूध निकालकर नजदीकी डेयरी को बेच देते हैं अथवा स्वयं दुग्ध उत्पाद बनाते हैं, जैसे दही, मट्ठा, मक्खन, घी, पनीर और उसे नजदीकी बाजार अथवा ठेकेदारों को बेच देते हैं। बात आती है उनके लाभ की। दुग्ध उत्पादों की बिक्री से मिलने वाले पैसों से ये मवेशी पालक अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। वर्तमान में भारत में हजारों मवेशी पालक इस समय सदमें में जी रहे हैं, उनका घर चलाने वाली गाय लंपी वायरस से ग्रसित है। गाय तो ग्रसित है ही, उनके पालक भी चिंता में समय काट रहे हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति भी खतरे में है। ऐसे में यदि दुधारू मवेशियों की लंपी वायरस से जाने जाएंगी अथवा बीमारी से ग्रसित होती जाएंगी तो दुग्ध उत्पादन पर सीधा प्रभाव पडे़गा। इससे पालकों को आर्थिक नुकसान तो होगा ही, साथ ही राष्ट्र का पशुधन भी प्रभावित होगा।

बीमारी की बात करें तो विशेषज्ञ बताते है कि यह गांठदार त्वचा रोग है, जिसे अंग्रेजी में लंपी स्कीन डिजीजकहते हैं, यह मवेशियों में होने वाला एक संक्रामक रोग है, जो पॉक्सविरिड परिवार के एक वायरस के कारण होता है। इसे नीथलिंग वायरस भी कहा जाता है। इस रोग के कारण पशुओं की त्वचा पर गांठें बन जाती हैं, मुंह से, नाक से स्त्राव होने लगता है। यह रोग त्वचा, श्लेष्मा झिल्ली और श्वसन मार्ग को प्रभावित करता है। साथ ही दो से तीन सेंटीमीटर बड़ी गांठें पड़ जाती हैं, बुखार आता है, शरीर में सूजन आने लगती है, कुछ समय बाद चलने में, खड़े होने में दिक्कत होने लगती है। यह रोग मच्छर, मक्खी और परजीवी से एक दूसरे में तेजी से फैलता है। यह बीमारी इतनी घातक होती है कि यदि समय पर इलाज न हो तो गायों की मृत्यु तक हो जाती है, और गाय ठीक भी हो जाए तो भविष्य में दूध कम उत्पादित करती हैं, बांझपन तक आ जाता है। साधारण शब्दों में कहें तो गाय पालने वाले (पालक) को आर्थिक नुकसान होता है।

उत्तर प्रदेश में आंकड़ों के अनुसार लगभग साढ़े पाँच लाख से अधिक मवेशियों का टीकाकरण किया जा चुका है। अभी पश्चिमी क्षेत्र में लंपी वायरस फैला हुआ है, जो पूर्व की ओर बढ़ रहा है। हाल ही में 8 सितंबर 2022 को उत्तर प्रदेश पशुधन विभाग के विशेष सचिव ने पूर्वी क्षेत्र को सुरक्षित करने व वायरस के प्रसार को रोकने के लिए एक मास्टर प्लान की बात कही है। विभाग के अनुसार मलेशिया देश की तर्ज़ पर पीलीभीत से लेकर इटावा तक लगभग 300 कि0मी0 की दूरी को 10 कि0मी0 चौड़े इम्यून बेल्ट से कवर करने का मास्टर प्लान तैयार किया है। यह बेल्ट एक तरह से बॉर्डर का काम करेगी और लंपी वायरस इसे पार कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पूर्वी उत्तर प्रदेश की तरफ नहीं जा सकेगा।

पशुपालन विभाग के अनुसार वैक्सीनेशन के ज़रिये इम्यून बेल्ट बनाने की तैयारियाँ पूरी की जा चुकी हैं। विभाग की माने तो इस पूरी बेल्ट में पशुओं में शत-प्रतिशत टीकाकरण की बात कही गयी है। निगरानी के लिये विशेष टास्क फोर्स होगी, जो लंपी वायरस से संक्रमित पशुओं की ट्रैकिंग और ट्रीटमेंट का ज़िम्मा संभालेगी। 2020 में ऐसा प्रयास मलेशिया में किया गया था, वहाँ की सरकार ने इसके सकारात्मक परिणाम बताए थे। यदि उत्तर प्रदेश ऐसा करने में सफलता प्राप्त कर लेता है तो पूर्वी क्षेत्र में लाखों मवेशियों को प्रभावित होने से रोका जा सकता है, यह उत्तर प्रदेश के लिए किसी विशेष उपलब्धि से कम नहीं होगी।

मृत्यु दर के बारे में बताया जा रहा है कि लंपी स्किन डिजीज से पीड़ित पशुओं में मृत्यु दर 1 से 5 प्रतिशत तक है, हालांकि संकर नस्ल के गौवंश में मृत्यु दर अधिक देखी गयी है। यूरोप, रूस, कजाकिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, भूटान, नेपाल और भारत में अलग-अलग समय में इसके मामले पाए गए हैं। इस समय गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश, आदि कई प्रदेशों के दुधारू मवेशियों में लंपी स्किन डिजीज फैली हुई है।

लंपी स्किन बीमारी मूल रूप से अफ्रीका में शुरू हुई और अफ्रीका के कई देशों में है. बताया जाता है कि 1929 में इस बीमारी की शुरुआत जाम्बिया देश में हुई थी, जहाँ से यह दक्षिण अफ्रीका में फैल गई। 21वीं सदी के दूसरे दशक की शुरूआत से ही यह बीमारी तेजी से फैल रही है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो 2019 में बांग्लादेश और चीन में तेजी से फैली, इसके बाद 2020 में नेपाल और भूटान में देखने को मिली और 2021 के अंतिम महीनों में भारत में लक्षण देखे जाने लगे और जुलाई 2022 से अब तक हजारों की संख्या में गाय मर चुकी हैं और लाखों प्रभावित हो चुकी हैं, हालांकि इनमें से हजारों की संख्या में ठीक भी हुई हैं।

पशुधन अधिकारी मवेशी पालकों को सलाह देते हैं कि वे मवेशियों के आसपास गंदगी न फैलने दें, मच्छर, मक्खियों, कीटों से मवेशियों को दूर रखें, कोई मवेशी जब लंपी वायरस से प्रभावित हो जाए तो उसे तुरंत अन्य मवेशियों से दूर कर दें और इलाज कराएं।

भारत के लिए पवित्र और करोड़ों ग्रामीणों का भरण-पोषण करने व दूध देने वाली गाय आज अपने जीवन के लिए इंसानों पर निर्भर हो चुकी हैं। ऐसे में भारत के पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम को तेजी लाते हुए बहुत जल्द ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे विभिन्न राज्यों में लम्पी वायरस से प्रभावित गायों का आसानी से, समय रहते और मुफ्त इलाज किया जा सके। हालांकि विभिन्न राज्य सरकारों ने टीकाकरण अभियान चलाया हुआ है। इसके अलावा पशु चिकित्सा विभाग ग्रसित मवेशियों का इलाज भी कर रही है, लेकिन सीमित संसाधनों और सीमित कर्मचारियों की संख्या के कारण ग्रसित मवेशियों तक पहुंच कम है, साथ ही कुछ सामज सेवी ऐसे भी हैं, जो ग्रसित मवेशियों के इलाज में हर तरह की मदद कर रहे हैं। कोविड-19 के आने पर जिस तरह से भारत ने मुस्तेदी से काम किया, उसी तरह से मवेशियों के लिए भी टीकाकरण में भी तेजी लानी होगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य पहचानों में से एक पहचान पशुपालन भी है। कई परिवार गाय, भेंस, बकरी, ऊंट पालते हैं एवं उनसे मिलने वाले दूध को बेचकर घर चलाते हैं। कई परिवार अंडा एवं मांसाहार के लिए भेड़, बकरी, मछली, मुर्गी, बत्तख आदि का पालन करते हैं। कई जातियाँ परम्परागत रूप से इस कार्य से जुड़े हैं एवं परिवार का भरण-पोषण करते हैं। पशुधन ग्रामीण आर्थिक विकास में खासा महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दक्षिण भारत में मछली पालन के लिए सरकार प्रोत्साहन देती है। उत्तर भारत में ऐसे ग्रामीण, जो मुर्गी अथवा मछली पालन करना चाहते हैं, उनके लिए सरकार ने कई प्रकार से प्रोत्साहन नीतियां बनाई हैं। ये सब कार्य इसलिए ही किए जा रहे हैं, क्योंकि सरकार ग्रामीण विकास के विभिन्न उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करती है। लंपी वायरस ने ग्रामीण विकास के लिए सरकार के सामने चुनौती प्रस्तुत की है। इस लंपी वायरस ने हजारों मवेशियों को निगल लिया है। लेकिन अब और नुकसान नहीं उठाया जा सकता। राज्य सरकारों को पशुधन अथवा पशु चिकित्सा विभाग के अलावा अन्य विभागों का साथ चाहिए हो तो देरी नहीं करनी चाहिए, ताकि आने वाले समय में लंपी वायरस को रोका ही न जाए अपितु, जड़ से खत्म कर दिया जाए। सरकार चाहे तो इसके लिए निजी संसाधनों का भी उपयोग कर सकती है, बस उद्देश्य लंपी स्किन रोग को खत्म करने का होना चाहिए।

मंगलवार, अगस्त 09, 2022

तेलंगाना की ’दलित बंधु योजना’ दलितों के लिए कितनी कारगर


- किसी योजना में दलित शब्द लिखने से कितना होगा लाभ

- अरबों रुपया खर्च करने के बाद दलितों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति


बृजेन्द्र कुमार वर्मा,

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार अध्ययनकर्ता हैं)

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21वीं सदी के दो दशक बीतने के बाद भी आए दिन अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार की खबरें आती ही रहती हैं, इससे यह साफ हो जाता है कि आज भी जातिगत हालात बदले नहीं हैं। भारत में अनुसूचित जातियों के उन्नयन के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन तेलंगाना अनुसूचित जातियों के लिए दलितशब्द जोड़कर विशेष योजना बनाकर अनुसूचित जातियों के उन्नयन के लिए काम कर रहा है। हालांकि मीडिया भी योजना की स्थिति से अवगत कराता रहता है। जानकारों की माने तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव एस0सी0 परिवारों के कल्याण को लेकर गंभीर हैं। यही कारण है कि वे अनुसूचित जाति के परिवारों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण के लिए तेलंगाना दलित बंधुयोजना का संचालन कर रहे हैं, जिसमें अनुसूचित जाति के परिवारों को 10 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता का प्रावधान है, ताकि उनके आय सृजन को बढ़ाया अथवा सुधारा जा सके अथवा आय सृजन में बढ़ोतरी की जा सके।

तेलंगाना दलित बंधु निधि निगरानी प्रणाली के माध्यम से योजना का क्रियान्वयन किया जाता है। इसके लिए तेलंगाना अनुसूचित जाति सहकारी विकास निगम लिमिटेड (टी0एस0सी0सी0डी0सी0एल0) का निर्माण किया गया है। योजना तेलंगाना के अनुसूचित जाति विकास मंत्रालय के अधीनस्थ है, जिसके वर्तमान में मंत्री कोप्पुला ईश्वर हैं, जबकि टीएससीसीडीसीएल के अध्यक्ष बंदा श्रीनिवास हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार तेलंगाना राज्य की कुल जनसंख्या 3,50,03,674 में से 54,08,800 अनुसूचित जाति की आबादी है, जो कुल जनसंख्या का 15.45 प्रतिशत है। यदि तेलंगाना सरकार अपने प्रदेश के अनुसूचित जातियों के परिवारों के कल्याण में सफलता पाती है, तो अनुसूचित जातियों के परिवारों का दिल जीतने में सरकार को आगे लाभ हो सकता है, लेकिन मीडिया में योजना से संबंधित प्रकाशित खबरें अनुसूचित जातियों की स्थिति को कुछ और ही बयां करती हैं।

अनुसूचित जाति के परिवारों को बैंकों से ऋण मिल पाने में हमेशा से ही कठिनाई होती रही है। देरी से ऋण मिलना, मांग के अनुरूप ऋण न मिलना, विभिन्न दस्तावेजों की मांग आदि ऐसे कई कारण हैं, जिनसे अनुसूचित जाति के परिवार ऋण लेते समय सहन करते हैं। कभी-कभी तो ऋण एस0सी0 परिवारों को तब स्वीकृत हो पाता है, जब पैसे की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है, जैसे फसल बोने के समय लिया जाने वाला ऋण। तेलंगाना सरकार ने अवरोधों को ध्यान में रखते हुए एस0सी0 परिवारों को बिना बैंक हस्तक्षेप के सीधे आर्थिक सहायता प्रदान करने का निर्णय लिया। इससे एक लाभ यह हुआ कि अनुसूचित जाति के परिवारों को बिना दिक्कत आर्थिक सहायता मिली एवं बिना देरी के मिली। इससे एक लाभ की संभावना यह भी हो सकती है कि समय से आर्थिक सहायता मिलने पर परिवारों के मुखियों को अपने आय सृजन को मजबूत करने में सहायता मिलती होगी। यद्यपि मीडिया ने भी इस योजना से संबंधित भ्रष्टाचार की खबरें प्रकाशित की हैं। यदि योजना में मिलने वाले रूपयों में भ्रष्टाचार होता है तो अनुसूचित जाति के परिवारों का कल्याण नहीं हो सकता। इस योजना पर मीडिया की हमेशा नजर रहना आवश्यक है।

अनुसूचित जाति के परिवारों को हमेशा से ही उपेक्षित नजर से देखा जाता रहा है। बहुत ही कम देखा गया है कि कोई योजना प्रत्यक्ष रूप से एस0सी0 परिवारों के लिए संचालित की जाती हों। भारत में आए दिन अनुसूचित जाति के परिवारों के साथ अनुचित व्यवहार, अत्याचार की खबरें आती रहती हैं। सैकड़ों वर्षों से अछूत समझा गया। ऐसे में बहुत ही कम राज्य ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अनुसूचित जाति को मुख्यधारा से जोड़ने एवं उनके सामाजिक एवं आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी हो। उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती ने अनुसूचित जाति को प्राथमिकता देते हुए उनके सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया, यही कारण है कि अनुसूचित जाति के लोगों के दिलों में मायावती के प्रति पूरे देश में विशेष सम्मान है। तेलंगाना की बात की जाए तो मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने भी अनुसूचित जाति के लिए ‘दलित बंधुयोजना संचालित कर उनके सामाजिक एवं आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने का प्रयास किया, यद्यपि इसमें कितनी सफलता मिलती है, यह समय ही तय करेगा।

योजना की बात की जाए तो इसके अंतर्गत सभी अनुसूचित जाति पात्र परिवारों को उनकी पसंद के अनुसार बिना बैंक ऋण लिंकेज के एक उपयुक्त आय उत्पन्न करने वाली योजनाओं को स्थापित करने के लिए अनुदान अथवा सब्सिडी के रूप में प्रति अनुसूचित जाति परिवार के लिए एकमुश्त पूंजी सहायता दस लाख तय की गयी है। अनुसूचित जाति सहकारी वित्त निगम लिमिटेड, हैदराबाद की स्थापना वर्ष 1974 में की गयी थी, तब तेलंगाना, आंध्र प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था, लेकिन राज्य का विभाजन होने के बाद यह दो भागों में बंट गया। 2014 में तेलंगाना बनने के बाद से अनुसूचित जाति सहकारी वित्त निगम लिमिटेड तेलंगाना के लिए कार्य कर रहा है।

दलित बंधु योजना भ्रष्टाचार के दलदल से अछूता नहीं है। कई बार योजना में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। गत जुलाई में कांग्रेस सांसद रहे उत्तम कुमार रेड्डी ने योजना को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाएं हैं। 5 जुलाई 2022 को ‘द सियासत डेली में प्रकाशित खबर के अनुसार कोडाद में मीडियाकर्मियों से बात करते हुए, उत्तम कुमार रेड्डी ने कहा कि ‘दलित बंधु योजना’ को ‘टीआरएस’ नेताओं के लिए एक पैसा बनाने की मशीन में बदल दिया गया है, जो भारी रिश्वत और कमीशन इकट्ठा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई दलित परिवारों को योजना के लाभार्थी के रूप में चयन के लिए 2 लाख रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक का भुगतान करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया, गरीब दलितों से ज्यादा यह योजना टीआरएस नेताओं के लिए आय योजना साबित हो रही है।’ 16 मार्च 2022 को ब्रोकर बंधु हेडिंग से ‘द हंस इंडिया ने खबर प्रकाशित कर योजना में हो रहे भ्रष्टाचार पर खबर प्रकाशित की। इसी तरह 12 फरवरी 2022 को ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के मुताबिक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंदी संजय कुमार ने मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को चुनौती दी है कि वे हुजूराबाद में ‘दलित बंधु योजना’ के 20,000 लाभार्थियों की सूची जारी करें, जिनके खातों में राज्य सरकार ने 10 लाख रुपये जारी करने का दावा किया है। इसके अलावा दूसरे मीडिया संस्थानों जैसे, द हिन्दूजैसे अखबारों ने भी योजना पर सवाल उठाए हैं।

आंकड़ों की बात करें तो दलित बंधु योजना के अंतर्गत हर साल औसत 100 करोड़ से अधिक सलाना खर्च किया जाता है। वर्ष 2014-15 में 241 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, जो एस0सी0 परिवारों के कल्याण के लिए एक वर्ष में किए गए खर्च के रूप में अच्छा प्रयास है, लेकिन यहां देखना यह भी है कि इस संबंध में भ्रष्टाचार की खबरें भी प्रकाशित हुई हैं। योजना के अंतर्गत सरकार ने 2020-21 के लिए 500 करोड़ अनुदान के रूप में प्रदान करने का लक्ष्य रखा, इसमें रिपोर्ट के बाद ही पता चल सकेगा कि कितनी राशि कहां खर्च की गयी। योजना के लक्ष्य के बारे में बताया गया है कि आवंटन में गरीब से गरीब अनुसूचित जाति के परिवारों को प्राथमिकता दी जाएगी। भूमिहीन अनुसूचित जाति की महिलाओं को तीन एकड़ कृषि भूमि प्रदान करना भी योजना में शामिल है। योजना में स्वरोजगार सृजन के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है। एस0सी0 व्यक्तियों को उद्यम के प्रति आकर्षित करने के लिए योजना में अनुसूचित जाति उद्यमियों को उद्यमिता विकास कार्यक्रम प्रदान करने के बारे में भी बताया गया है। योजना में कृषि भूमिहीन मजदूर, छोटे और सीमांत किसान, शिक्षित बेरोजगार, चमड़ा कारीगर, सफाई कर्मचारी आदि एस0सी0 परिवारों पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है। ऐसे अनुसूचित जाति के परिवार जो स्वरोजगार शुरू करना चाहते हैं, उनमें ग्रामीण क्षेत्र के लिए 1.5 लाख, जबकि शहरी क्षेत्रों में 2 लाख प्रति वर्ष निर्धारित किया गया है। इसमें 33 प्रतिशत महिलाओं को प्राथमिकता की बात कही गयी है। यद्यपि इस योजना का लाभ लेने और आर्थिक सहायता प्राप्त करने के बाद 5 वर्ष तक वह इस योजना का दोबरा लाभ नहीं लिया जा सकता।

दलित बंधु योजना के उद्देश्य सटीक और विकासात्मक हैं, लेकिन यदि अनुसूचित जाति के परिवारों को इसका लाभ नहीं मिलता है, तो खर्च किए गए अरबों रूपयों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। योजना में भ्रष्टाचार अनुसूचित जातियों के विकास में प्रत्यक्ष अवरोध है। मुख्यमंत्री को यह जान लेना चाहिए कि तेलंगाना की मीडिया सजग है। बेहद आवश्यक है कि योजना की धनराशि लाभार्थियों को पहुंचे और वह भी पूरी और बिना किसी भ्रष्टाचार के। यदि दलितों को योजना का लाभ पाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, तो इसका खामियाजा आने वाले चुनाव में चन्द्रशेखर राव की पार्टी ‘तेलंगाना राष्ट्र समिति को भुगतना होगा। इसके विपरीत मुख्यमंत्री यदि अनुसूचित जातियों का दिल जीतने में सफल हुए, तो उनकी सरकार दोबारा बनने से कोई नहीं रोक सकता।