तुझसे जुदा होकर खुद को ही ग़ैर पाया,
तू गया तो मेरा साया भी मुझसे शरमाया।
आईनों ने पूछा, ये अजनबी है कौन?
हर अक्स ने आँखों को कुछ और दिखलाया।
लब खामोश थे, मगर दिल चीख कर बोला,
जिससे वफ़ा की, उसी ने दिल को सुलगाया।
तेरे बाद किसी मोड़ पे ख़ुशियाँ मिली भी तो क्या,
हाथ थामते ही ख़ुशी ने दर्द ही बरसाया?
अब तन्हाई मेरा शहर है, और यादें मेरा क़ाफ़िला,
इश्क़ के इस वीरान में, बस मैं हूँ और मेरा साया।
(-डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा)
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