गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव
किसी और गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव
वक़्त बदल जाने पर गाँव में
पुरुषों के चेहरे वही रहते हैं
बस स्त्रियों के चेहरे बदल जाते हैं ।
(-डॉ0 बी0के0 वर्मा)
गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव
किसी और गाँव की लड़कियां ब्याह दी जाती हैं किसी और गाँव
वक़्त बदल जाने पर गाँव में
पुरुषों के चेहरे वही रहते हैं
बस स्त्रियों के चेहरे बदल जाते हैं ।
(-डॉ0 बी0के0 वर्मा)
वो विदाई के समय रोता हुआ शख्स,
उसके आँसू दूर जाने से नहीं, किसी के खोने से बहे हैं,
तुम देखना लौट आने पर गुमसुम सी रहेगी,
फिर से निकलेंगे वही आँसू, जो खोने से बहे हैं।
(- डॉ0 बी0 के0 वर्मा)
- डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा
भूमिका
ग्रामीण भारत केवल खेत, खलिहान और मिट्टी का नाम नहीं है, यह एक समृद्ध सांस्कृतिक जीवनधारा है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता, श्रम और आत्मा, सामूहिकता और विविधता का अद्भुत समन्वय है। जब हम ग्रामीण विकास की बात करते हैं, तो यह केवल बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भर नहीं है, बल्कि एक ऐसे सामाजिक ढांचे की रचना है, जो समावेशी हो, न्यायपूर्ण हो, टिकाऊ हो और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करे। हम विकास प्रक्रिया की गहराइयों में जाकर उसकी परिभाषा, चुनौतियों, संभावनाओं और नीतिगत सुधारों की विवेचना कर सकते हैं।
1. ग्रामीण विकास की पारंपरिक अवधारणाएँ और सीमाएँ
ग्रामीण विकास को प्रारंभ में मुख्यतः कृषि उत्पादन, भूमि सुधार, सिंचाई, ग्रामीण बैंकिंग, और प्राथमिक शिक्षा जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति के रूप में देखा गया। भारत के पहले पंचवर्षीय योजना (1951-56) में 'कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम' की शुरुआत हुई, जिसने ग्रामीण भारत को योजनाबद्ध विकास से जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि, इन योजनाओं में स्थानीय सामाजिक संरचनाओं, जाति व्यवस्था, और महिला सहभागिता जैसे पहलुओं की उपेक्षा रही।
वर्षों तक विकास की यह दृष्टि 'टॉप-डाउन' रही — यानी निर्णय और योजनाएँ दिल्ली या राज्य मुख्यालय से बनती थीं, और उन्हें गाँवों पर थोप दिया जाता था। इससे स्थानीय समस्याओं की जटिलता को समझने और समाधान प्रदान करने में असफलता हुई।
2. 'बॉटम-अप' विकास और स्थानीय नवाचार
डॉ. अनिल गुप्ता अपनी पुस्तक में बताते हैं कि गाँवों में केवल 'समस्या' नहीं, समाधान भी विद्यमान हैं। हनी बी नेटवर्क और राष्ट्रीय नवप्रवर्तन फाउंडेशन (NIF) ने हजारों ग्रामीण नवाचारों को संकलित कर यह दिखाया कि सीमित संसाधनों में भी कैसे रचनात्मकता फलती-फूलती है।
Digital Green, e-Choupal, और mKisan जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स ने सूचना, कृषि, और विपणन को डिजिटली जोड़कर गाँवों को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा, परंतु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि इन नवाचारों की सफलता तब ही संभव है, जब स्थानीय साक्षरता, डिजिटल साक्षरता और बुनियादी अवसंरचना मजबूत हो।
3. सामाजिक न्याय के अभाव में अधूरा विकास
भारत का ग्रामीण समाज जाति, वर्ग, लिंग और भू-अधिकार जैसे असमानताओं से व्याप्त है। दलित, आदिवासी, और महिलाएँ अधिकांश योजनाओं में परिधीय भूमिका में रहती हैं। भूमि सुधार अधिनियमों के बावजूद ज़्यादातर भूमि अब भी कुछ ऊँची जातियों के नियंत्रण में है।
महिलाओं की सहभागिता ग्राम पंचायतों में आरक्षण के माध्यम से बढ़ी है, लेकिन निर्णय-निर्माण की वास्तविक शक्ति अभी भी सीमित है। आत्मनिर्भर गाँव की कल्पना तभी साकार होगी जब सामाजिक न्याय उसकी रीढ़ बने।
4. ग्राम सभा और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण
पंचायती राज व्यवस्था को 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से संवैधानिक दर्जा मिला। ग्राम सभा को गाँव की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक इकाई माना गया, परंतु व्यवहार में यह सशक्त संस्था नहीं बन पाई है। इसके पीछे भ्रष्टाचार, राजनीतिक हस्तक्षेप, और जन-जागरूकता की कमी जैसी अनेक समस्याएँ हैं।
जहाँ ग्राम सभाओं को सक्रिय और निर्णयात्मक इकाई बनाया गया, जैसे केरल का कुदुम्बश्री मॉडल, वहाँ ठोस परिवर्तन देखने को मिले हैं। कुदुम्बश्री (जिसका स्थानीय मलयालम भाषा में अर्थ है "परिवार की समृद्धि") केरल सरकार का चल रहा सहभागी "गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण" मिशन है, जो 1998 में शुरू हुआ था, और महिलाओं के तीन-स्तरीय सामुदायिक नेटवर्क के माध्यम से काम करता है।
5. पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास
गाँवों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः प्रकृति पर आधारित होती है — वर्षा, भूमि, जंगल और जलस्रोत। परंतु वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, और औद्योगिक प्रदूषण ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है। राजस्थान के जल योद्धा राजेन्द्र सिंह ने जल संरक्षण के पारंपरिक तरीकों का पुनरुद्धार करके यह दिखाया कि पर्यावरणीय न्याय से ही टिकाऊ विकास संभव है। महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गाँव ने सामूहिक भागीदारी से वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण, और आजीविका के विविधीकरण का ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है जो देशभर के लिए उदाहरण बन गया है। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित हिवरे बाजार गाँव, सूखे की मार झेलने के बाद वर्षा जल संचयन और जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक मॉडल बन गया है। कभी यह गाँव अत्यधिक गरीबी और पलायन का शिकार था, लेकिन आज यह महाराष्ट्र के सबसे समृद्ध गांवों में से एक माना जाता है, जहाँ कई परिवार करोड़पति हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, हिवरे बाजार का भूजल स्तर नाटकीय रूप से बढ़ा। जहाँ पहले पानी की गंभीर कमी थी, वहीं आज गाँव में 350 कुएं और एक तालाब है, और पानी की आपूर्ति आसपास के गाँवों को भी की जाती है। इस सफलता ने कृषि उत्पादन में वृद्धि की, पशुधन को बढ़ावा दिया, और ग्रामीणों की आय में भारी वृद्धि हुई, जिससे यह गाँव देश के लिए एक आदर्श बन गया है।
6. जलवायु परिवर्तन और ग्रामों की अनुकूलन क्षमता
ग्रामीण क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ रहा है — बेमौसम वर्षा, सूखा, फसलों की विफलता, और जल संकट इसके प्रमुख लक्षण हैं। इन चुनौतियों के उत्तर में ग्राम समुदायों को पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के मेल से समाधान खोजना होगा। जैविक खेती, मिश्रित कृषि प्रणाली, और सामूहिक जल प्रबंधन ऐसे कुछ विकल्प हैं।
7. ग्राम स्वराज की नई कल्पना: 'ग्राम स्वराज 2.0'
महात्मा गाँधी का 'ग्राम स्वराज' केवल ग्राम स्वशासन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, न्याय, और नैतिकता का आदर्श था। आज की डिजिटल और वैश्वीकृत दुनिया में गाँधी के इस विचार को फिर से पढ़ने और लागू करने की आवश्यकता है — लेकिन आधुनिक संदर्भ में।
'ग्राम स्वराज 2.0' का अर्थ होगा:
सूचना और तकनीक आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्था
लिंग और जाति आधारित असमानताओं का सक्रिय उन्मूलन
प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की जीवन पद्धति
नीति निर्माण में वास्तविक ग्राम सहभागिता
निष्कर्ष
ग्रामीण विकास एक बहुस्तरीय और बहुपरिमाणीय प्रक्रिया है जिसमें केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आयाम भी शामिल हैं। यह अध्याय इस बात पर बल देता है कि ग्रामीण भारत को केवल 'पिछड़ेपन' के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार, आत्मनिर्भरता और टिकाऊ जीवन पद्धति की प्रयोगशाला के रूप में देखा जाए।
भारत का भविष्य उसके गाँवों में बसता है, और जब तक गाँवों में न्याय, नवाचार और आत्मबल का आलोक नहीं फैलेगा, तब तक कोई भी विकास अधूरा ही रहेगा।
संदर्भ सूची
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ITC e-Choupal Case Study, Harvard Business Review (2003)
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Jodhka, Surinder S. (2002), Nation and Village: Images of Rural India in Gandhi, Nehru and Ambedkar
तुझसे जुदा होकर खुद को ही ग़ैर पाया,
तू गया तो मेरा साया भी मुझसे शरमाया।
आईनों ने पूछा, ये अजनबी है कौन?
हर अक्स ने आँखों को कुछ और दिखलाया।
लब खामोश थे, मगर दिल चीख कर बोला,
जिससे वफ़ा की, उसी ने दिल को सुलगाया।
तेरे बाद किसी मोड़ पे ख़ुशियाँ मिली भी तो क्या,
हाथ थामते ही ख़ुशी ने दर्द ही बरसाया?
अब तन्हाई मेरा शहर है, और यादें मेरा क़ाफ़िला,
इश्क़ के इस वीरान में, बस मैं हूँ और मेरा साया।
(-डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा)
बृजेन्द्र कुमार
वर्मा,
(लेखक- ग्रामीण
विकास संचारक हैं)
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लंपी वायरस ने यह स्थिति ला दी है कि समाज वैज्ञानिकों का ध्यान ग्रामण विकास और लगातार प्रभावित हो रहे दुग्ध उत्पादन की ओर जाने लगा है। ग्रामीण अपने विकास के लिए लगातार संघर्षरत रहा है, लेकिन लम्पी वायरस ने ग्रामीण विकास के विभिन्न अवरोधों में एक अवरोध को और बढ़ा दिया है, जो भारत के विभिन्न राज्यों के लिए चिंता का विषय बन चुका है, वह है मवेशियों में फैला लंपी त्वचा रोग। जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो बहुत जल्द पशुधन उत्पादन महंगा होने लगेगा, क्योंकि हजारों दुधारू गायों की मृत्यु हो चुकी है, और अब भी लगातार मर रही हैं। मीडिया कवरेज में ड्रॉन की मदद से ऊंचाई से लिए कई फुटेज देखने के बाद ऐसा लगता है कि लंपी से मरने वाले मवेशियों की संख्या राष्ट्र स्तर पर लाख से ऊपर भी हो सकती है। समाचार पत्रों की माने तो कई राज्यों में 10-10 हजार से ज्यादा गायों की मौत हो चुकी है। राहत की बात यह है कि ये रोग पशुओं से इंसानों में नहीं फैलता है, लेकिन फिर अप्रत्यक्ष रूप से वे इंसान प्रभावित हुए हैं, जो पशुधन रखते हैं, और जिनके मवेशी लंपी वायरस की चपेट में आ गए हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन होता है, जिसे विभिन्न संसाधनों द्वारा शहरों में पहुँचाया जाता है। गाँव के मवेशी पालक अपने मवेशियों का दूध निकालकर नजदीकी डेयरी को बेच देते हैं अथवा स्वयं दुग्ध उत्पाद बनाते हैं, जैसे दही, मट्ठा, मक्खन, घी, पनीर और उसे नजदीकी बाजार अथवा ठेकेदारों को बेच देते हैं। बात आती है उनके लाभ की। दुग्ध उत्पादों की बिक्री से मिलने वाले पैसों से ये मवेशी पालक अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। वर्तमान में भारत में हजारों मवेशी पालक इस समय सदमें में जी रहे हैं, उनका घर चलाने वाली गाय लंपी वायरस से ग्रसित है। गाय तो ग्रसित है ही, उनके पालक भी चिंता में समय काट रहे हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति भी खतरे में है। ऐसे में यदि दुधारू मवेशियों की लंपी वायरस से जाने जाएंगी अथवा बीमारी से ग्रसित होती जाएंगी तो दुग्ध उत्पादन पर सीधा प्रभाव पडे़गा। इससे पालकों को आर्थिक नुकसान तो होगा ही, साथ ही राष्ट्र का पशुधन भी प्रभावित होगा।
बीमारी की बात करें तो विशेषज्ञ बताते है कि यह गांठदार त्वचा रोग है, जिसे अंग्रेजी में ‘लंपी स्कीन डिजीज’ कहते हैं, यह मवेशियों में होने वाला एक संक्रामक रोग है, जो पॉक्सविरिड परिवार के एक वायरस के कारण होता है। इसे नीथलिंग वायरस भी कहा जाता है। इस रोग के कारण पशुओं की त्वचा पर गांठें बन जाती हैं, मुंह से, नाक से स्त्राव होने लगता है। यह रोग त्वचा, श्लेष्मा झिल्ली और श्वसन मार्ग को प्रभावित करता है। साथ ही दो से तीन सेंटीमीटर बड़ी गांठें पड़ जाती हैं, बुखार आता है, शरीर में सूजन आने लगती है, कुछ समय बाद चलने में, खड़े होने में दिक्कत होने लगती है। यह रोग मच्छर, मक्खी और परजीवी से एक दूसरे में तेजी से फैलता है। यह बीमारी इतनी घातक होती है कि यदि समय पर इलाज न हो तो गायों की मृत्यु तक हो जाती है, और गाय ठीक भी हो जाए तो भविष्य में दूध कम उत्पादित करती हैं, बांझपन तक आ जाता है। साधारण शब्दों में कहें तो गाय पालने वाले (पालक) को आर्थिक नुकसान होता है।
उत्तर प्रदेश में आंकड़ों के अनुसार लगभग साढ़े पाँच लाख से अधिक मवेशियों का टीकाकरण किया जा चुका है। अभी पश्चिमी क्षेत्र में लंपी वायरस फैला हुआ है, जो पूर्व की ओर बढ़ रहा है। हाल ही में 8 सितंबर 2022 को उत्तर प्रदेश पशुधन विभाग के विशेष सचिव ने पूर्वी क्षेत्र को सुरक्षित करने व वायरस के प्रसार को रोकने के लिए एक मास्टर प्लान की बात कही है। विभाग के अनुसार मलेशिया देश की तर्ज़ पर पीलीभीत से लेकर इटावा तक लगभग 300 कि0मी0 की दूरी को 10 कि0मी0 चौड़े इम्यून बेल्ट से कवर करने का मास्टर प्लान तैयार किया है। यह बेल्ट एक तरह से बॉर्डर का काम करेगी और लंपी वायरस इसे पार कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पूर्वी उत्तर प्रदेश की तरफ नहीं जा सकेगा।
पशुपालन विभाग के अनुसार वैक्सीनेशन के ज़रिये इम्यून बेल्ट बनाने की तैयारियाँ पूरी की जा चुकी हैं। विभाग की माने तो इस पूरी बेल्ट में पशुओं में शत-प्रतिशत टीकाकरण की बात कही गयी है। निगरानी के लिये विशेष टास्क फोर्स होगी, जो लंपी वायरस से संक्रमित पशुओं की ट्रैकिंग और ट्रीटमेंट का ज़िम्मा संभालेगी। 2020 में ऐसा प्रयास मलेशिया में किया गया था, वहाँ की सरकार ने इसके सकारात्मक परिणाम बताए थे। यदि उत्तर प्रदेश ऐसा करने में सफलता प्राप्त कर लेता है तो पूर्वी क्षेत्र में लाखों मवेशियों को प्रभावित होने से रोका जा सकता है, यह उत्तर प्रदेश के लिए किसी विशेष उपलब्धि से कम नहीं होगी।
मृत्यु दर के बारे में बताया जा रहा है कि लंपी स्किन डिजीज से पीड़ित पशुओं में मृत्यु दर 1 से 5 प्रतिशत तक है, हालांकि संकर नस्ल के गौवंश में मृत्यु दर अधिक देखी गयी है। यूरोप, रूस, कजाकिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, भूटान, नेपाल और भारत में अलग-अलग समय में इसके मामले पाए गए हैं। इस समय गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश, आदि कई प्रदेशों के दुधारू मवेशियों में लंपी स्किन डिजीज फैली हुई है।
लंपी स्किन बीमारी मूल रूप से अफ्रीका में शुरू हुई और अफ्रीका के कई देशों में है. बताया जाता है कि 1929 में इस बीमारी की शुरुआत जाम्बिया देश में हुई थी, जहाँ से यह दक्षिण अफ्रीका में फैल गई। 21वीं सदी के दूसरे दशक की शुरूआत से ही यह बीमारी तेजी से फैल रही है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो 2019 में बांग्लादेश और चीन में तेजी से फैली, इसके बाद 2020 में नेपाल और भूटान में देखने को मिली और 2021 के अंतिम महीनों में भारत में लक्षण देखे जाने लगे और जुलाई 2022 से अब तक हजारों की संख्या में गाय मर चुकी हैं और लाखों प्रभावित हो चुकी हैं, हालांकि इनमें से हजारों की संख्या में ठीक भी हुई हैं।
पशुधन अधिकारी मवेशी पालकों को सलाह देते हैं कि वे मवेशियों के आसपास गंदगी न फैलने दें, मच्छर, मक्खियों, कीटों से मवेशियों को दूर रखें, कोई मवेशी जब लंपी वायरस से प्रभावित हो जाए तो उसे तुरंत अन्य मवेशियों से दूर कर दें और इलाज कराएं।
भारत के लिए पवित्र और करोड़ों
ग्रामीणों का भरण-पोषण करने व दूध देने वाली गाय आज अपने जीवन के लिए इंसानों पर
निर्भर हो चुकी हैं। ऐसे में भारत के पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम
को तेजी लाते हुए बहुत जल्द ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे विभिन्न
राज्यों में लम्पी वायरस से प्रभावित गायों का आसानी से, समय रहते और
मुफ्त इलाज किया जा सके। हालांकि विभिन्न राज्य सरकारों ने टीकाकरण अभियान चलाया
हुआ है। इसके अलावा पशु चिकित्सा विभाग ग्रसित मवेशियों का इलाज भी कर रही है,
लेकिन
सीमित संसाधनों और सीमित कर्मचारियों की संख्या के कारण ग्रसित मवेशियों तक पहुंच
कम है, साथ ही कुछ सामज सेवी ऐसे भी हैं, जो ग्रसित
मवेशियों के इलाज में हर तरह की मदद कर रहे हैं। कोविड-19 के आने पर जिस
तरह से भारत ने मुस्तेदी से काम किया, उसी तरह से मवेशियों के लिए भी टीकाकरण
में भी तेजी लानी होगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य
पहचानों में से एक पहचान पशुपालन भी है। कई परिवार गाय, भेंस, बकरी,
ऊंट
पालते हैं एवं उनसे मिलने वाले दूध को बेचकर घर चलाते हैं। कई परिवार अंडा एवं
मांसाहार के लिए भेड़, बकरी, मछली, मुर्गी, बत्तख
आदि का पालन करते हैं। कई जातियाँ परम्परागत रूप से इस कार्य से जुड़े हैं एवं
परिवार का भरण-पोषण करते हैं। पशुधन ग्रामीण आर्थिक विकास में खासा महत्वपूर्ण
स्थान रखता है। दक्षिण भारत में मछली पालन के लिए सरकार प्रोत्साहन देती है। उत्तर
भारत में ऐसे ग्रामीण, जो मुर्गी अथवा मछली पालन करना चाहते हैं,
उनके
लिए सरकार ने कई प्रकार से प्रोत्साहन नीतियां बनाई हैं। ये सब कार्य इसलिए ही किए
जा रहे हैं, क्योंकि सरकार ग्रामीण विकास के विभिन्न
उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करती है। लंपी वायरस ने ग्रामीण विकास के
लिए सरकार के सामने चुनौती प्रस्तुत की है। इस लंपी वायरस ने हजारों मवेशियों को
निगल लिया है। लेकिन अब और नुकसान नहीं उठाया जा सकता। राज्य सरकारों को पशुधन
अथवा पशु चिकित्सा विभाग के अलावा अन्य विभागों का साथ चाहिए हो तो देरी नहीं करनी
चाहिए, ताकि आने वाले समय में लंपी वायरस को रोका ही न जाए अपितु, जड़
से खत्म कर दिया जाए। सरकार चाहे तो इसके लिए निजी संसाधनों का भी उपयोग कर सकती
है, बस उद्देश्य लंपी स्किन रोग को खत्म करने का होना चाहिए।
- किसी योजना में ’दलित’ शब्द लिखने से कितना होगा लाभ
- अरबों रुपया खर्च करने के बाद दलितों की सामाजिक एवं आर्थिक
स्थिति
बृजेन्द्र कुमार वर्मा,
(लेखक- ग्रामीण विकास
संचार अध्ययनकर्ता हैं)
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21वीं सदी के दो दशक
बीतने के बाद भी आए दिन अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार की खबरें आती ही रहती हैं, इससे यह साफ हो जाता है कि आज भी जातिगत हालात बदले नहीं हैं।
भारत में अनुसूचित जातियों के उन्नयन के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन तेलंगाना अनुसूचित जातियों के लिए ‘दलित’शब्द जोड़कर विशेष योजना बनाकर अनुसूचित जातियों के उन्नयन के
लिए काम कर रहा है। हालांकि मीडिया भी योजना की स्थिति से अवगत कराता रहता है। जानकारों
की माने तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव एस0सी0 परिवारों के कल्याण को लेकर गंभीर हैं। यही कारण है कि वे अनुसूचित
जाति के परिवारों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण के लिए ‘तेलंगाना दलित बंधु’योजना का संचालन कर रहे हैं, जिसमें अनुसूचित जाति
के परिवारों को 10 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता का प्रावधान है, ताकि उनके आय सृजन को बढ़ाया अथवा सुधारा जा सके अथवा आय सृजन
में बढ़ोतरी की जा सके।
तेलंगाना दलित बंधु निधि निगरानी प्रणाली के माध्यम से योजना
का क्रियान्वयन किया जाता है। इसके लिए तेलंगाना अनुसूचित जाति सहकारी विकास निगम लिमिटेड
(टी0एस0सी0सी0डी0सी0एल0)
का निर्माण किया गया है। योजना तेलंगाना के अनुसूचित जाति विकास
मंत्रालय के अधीनस्थ है, जिसके वर्तमान में मंत्री कोप्पुला ईश्वर हैं, जबकि टीएससीसीडीसीएल के अध्यक्ष बंदा श्रीनिवास हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार तेलंगाना राज्य की कुल जनसंख्या 3,50,03,674 में से 54,08,800 अनुसूचित जाति की
आबादी है, जो कुल जनसंख्या का 15.45 प्रतिशत है। यदि तेलंगाना
सरकार अपने प्रदेश के अनुसूचित जातियों के परिवारों के कल्याण में सफलता पाती है, तो अनुसूचित जातियों के परिवारों का दिल जीतने में सरकार को
आगे लाभ हो सकता है, लेकिन मीडिया में योजना से संबंधित प्रकाशित खबरें अनुसूचित
जातियों की स्थिति को कुछ और ही बयां करती हैं।
अनुसूचित जाति के परिवारों को बैंकों से ऋण मिल पाने में हमेशा
से ही कठिनाई होती रही है। देरी से ऋण मिलना, मांग के अनुरूप ऋण
न मिलना, विभिन्न दस्तावेजों की मांग आदि ऐसे कई कारण हैं, जिनसे अनुसूचित जाति के परिवार ऋण लेते समय सहन करते हैं। कभी-कभी
तो ऋण एस0सी0 परिवारों को तब स्वीकृत हो पाता है, जब पैसे की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है, जैसे फसल बोने के समय लिया जाने वाला ऋण। तेलंगाना सरकार ने
अवरोधों को ध्यान में रखते हुए एस0सी0 परिवारों को बिना बैंक हस्तक्षेप के सीधे आर्थिक सहायता प्रदान
करने का निर्णय लिया। इससे एक लाभ यह हुआ कि अनुसूचित जाति के परिवारों को बिना दिक्कत
आर्थिक सहायता मिली एवं बिना देरी के मिली। इससे एक लाभ की संभावना यह भी हो सकती है
कि समय से आर्थिक सहायता मिलने पर परिवारों के मुखियों को अपने आय सृजन को मजबूत करने
में सहायता मिलती होगी। यद्यपि मीडिया ने भी इस योजना से संबंधित भ्रष्टाचार की खबरें
प्रकाशित की हैं। यदि योजना में मिलने वाले रूपयों में भ्रष्टाचार होता है तो अनुसूचित
जाति के परिवारों का कल्याण नहीं हो सकता। इस योजना पर मीडिया की हमेशा नजर रहना आवश्यक
है।
अनुसूचित जाति के परिवारों को हमेशा से ही उपेक्षित नजर से देखा
जाता रहा है। बहुत ही कम देखा गया है कि कोई योजना प्रत्यक्ष रूप से एस0सी0 परिवारों के लिए संचालित की जाती हों। भारत में आए दिन अनुसूचित
जाति के परिवारों के साथ अनुचित व्यवहार, अत्याचार की खबरें
आती रहती हैं। सैकड़ों वर्षों से अछूत समझा गया। ऐसे में बहुत ही कम राज्य ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अनुसूचित जाति को मुख्यधारा से जोड़ने एवं उनके सामाजिक
एवं आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी हो। उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती ने
अनुसूचित जाति को प्राथमिकता देते हुए उनके सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को मजबूत करने
का प्रयास किया, यही कारण है कि अनुसूचित जाति के लोगों के दिलों में मायावती
के प्रति पूरे देश में विशेष सम्मान है। तेलंगाना की बात की जाए तो मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर
राव ने भी अनुसूचित जाति के लिए ‘दलित बंधु’ योजना संचालित कर उनके
सामाजिक एवं आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने का प्रयास किया, यद्यपि इसमें कितनी सफलता मिलती है, यह समय ही तय करेगा।
योजना की बात की जाए तो इसके अंतर्गत सभी अनुसूचित जाति पात्र
परिवारों को उनकी पसंद के अनुसार बिना बैंक ऋण लिंकेज के एक उपयुक्त आय उत्पन्न करने
वाली योजनाओं को स्थापित करने के लिए अनुदान अथवा सब्सिडी के रूप में प्रति अनुसूचित
जाति परिवार के लिए एकमुश्त पूंजी सहायता दस लाख तय की गयी है। अनुसूचित जाति सहकारी
वित्त निगम लिमिटेड, हैदराबाद की स्थापना वर्ष 1974 में की गयी थी, तब तेलंगाना, आंध्र प्रदेश का हिस्सा
हुआ करता था, लेकिन राज्य का विभाजन होने के बाद यह दो भागों में बंट गया।
2014 में तेलंगाना बनने के बाद से अनुसूचित जाति सहकारी वित्त निगम
लिमिटेड तेलंगाना के लिए कार्य कर रहा है।
‘दलित बंधु योजना’ भ्रष्टाचार के दलदल से अछूता नहीं है। कई बार योजना में भ्रष्टाचार
के आरोप लगे हैं। गत जुलाई में कांग्रेस सांसद रहे उत्तम कुमार रेड्डी ने योजना को
लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाएं हैं। 5 जुलाई 2022 को ‘द सियासत डेली’ में प्रकाशित खबर के अनुसार कोडाद में मीडियाकर्मियों से बात
करते हुए, उत्तम कुमार रेड्डी ने कहा कि ‘दलित बंधु योजना’ को ‘टीआरएस’
नेताओं के लिए एक पैसा बनाने की मशीन में बदल दिया गया है, जो भारी रिश्वत और कमीशन इकट्ठा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि
कई दलित परिवारों को योजना के लाभार्थी के रूप में चयन के लिए 2 लाख रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक का भुगतान
करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया, ‘गरीब दलितों से ज्यादा यह योजना टीआरएस नेताओं के लिए आय योजना
साबित हो रही है।’ 16 मार्च 2022 को ‘ब्रोकर बंधु’ हेडिंग से ‘द हंस इंडिया’ ने खबर प्रकाशित कर योजना में हो रहे भ्रष्टाचार पर खबर प्रकाशित
की। इसी तरह 12 फरवरी 2022 को ‘द न्यू इंडियन
एक्सप्रेस’ में प्रकाशित खबर के मुताबिक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंदी संजय
कुमार ने मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को चुनौती दी है कि वे हुजूराबाद में ‘दलित
बंधु योजना’ के 20,000 लाभार्थियों की सूची जारी करें, जिनके खातों में राज्य सरकार ने 10 लाख रुपये जारी करने का दावा किया है। इसके अलावा दूसरे मीडिया
संस्थानों जैसे, ‘द हिन्दू’ जैसे अखबारों ने भी
योजना पर सवाल उठाए हैं।
आंकड़ों की बात करें तो ’दलित बंधु योजना’ के अंतर्गत हर साल औसत 100 करोड़ से अधिक सलाना
खर्च किया जाता है। वर्ष 2014-15 में 241 करोड़ रुपये खर्च किए
गए थे, जो एस0सी0 परिवारों के कल्याण के लिए एक वर्ष में किए गए खर्च के रूप
में अच्छा प्रयास है, लेकिन यहां देखना यह भी है कि इस संबंध में भ्रष्टाचार की खबरें
भी प्रकाशित हुई हैं। योजना के अंतर्गत सरकार ने 2020-21 के लिए 500 करोड़ अनुदान के रूप में प्रदान करने का लक्ष्य रखा, इसमें रिपोर्ट के बाद ही पता चल सकेगा कि कितनी राशि कहां खर्च
की गयी। योजना के लक्ष्य के बारे में बताया गया है कि आवंटन में गरीब से गरीब अनुसूचित
जाति के परिवारों को प्राथमिकता दी जाएगी। भूमिहीन अनुसूचित जाति की महिलाओं को तीन
एकड़ कृषि भूमि प्रदान करना भी योजना में शामिल है। योजना में स्वरोजगार सृजन के लिए
आर्थिक सहायता का प्रावधान है। एस0सी0 व्यक्तियों को उद्यम के प्रति आकर्षित करने के लिए योजना में
अनुसूचित जाति उद्यमियों को उद्यमिता विकास कार्यक्रम प्रदान करने के बारे में भी बताया
गया है। योजना में कृषि भूमिहीन मजदूर, छोटे और सीमांत किसान, शिक्षित बेरोजगार, चमड़ा कारीगर, सफाई कर्मचारी आदि एस0सी0 परिवारों पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है। ऐसे अनुसूचित
जाति के परिवार जो स्वरोजगार शुरू करना चाहते हैं, उनमें ग्रामीण क्षेत्र
के लिए 1.5 लाख, जबकि शहरी क्षेत्रों
में 2 लाख प्रति वर्ष निर्धारित किया गया है। इसमें 33 प्रतिशत महिलाओं को प्राथमिकता की बात कही गयी है। यद्यपि इस
योजना का लाभ लेने और आर्थिक सहायता प्राप्त करने के बाद 5 वर्ष तक वह इस योजना का दोबरा लाभ नहीं लिया जा सकता।
‘दलित बंधु योजना’ के उद्देश्य सटीक और विकासात्मक हैं, लेकिन यदि अनुसूचित जाति के परिवारों को इसका लाभ नहीं मिलता है, तो खर्च किए गए अरबों रूपयों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। योजना में भ्रष्टाचार अनुसूचित जातियों के विकास में प्रत्यक्ष अवरोध है। मुख्यमंत्री को यह जान लेना चाहिए कि तेलंगाना की मीडिया सजग है। बेहद आवश्यक है कि योजना की धनराशि लाभार्थियों को पहुंचे और वह भी पूरी और बिना किसी भ्रष्टाचार के। यदि दलितों को योजना का लाभ पाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, तो इसका खामियाजा आने वाले चुनाव में चन्द्रशेखर राव की पार्टी ‘तेलंगाना राष्ट्र समिति’ को भुगतना होगा। इसके विपरीत मुख्यमंत्री यदि अनुसूचित जातियों का दिल जीतने में सफल हुए, तो उनकी सरकार दोबारा बनने से कोई नहीं रोक सकता।
बदनसीब घड़ा
(कहानी प्रेम कथा की एक घटना से प्रेरित है)
- बृजेन्द्र कुमार वर्मा
ये दिन हर बार की तरह सामान्य नहीं था. हर बार तो धूप भी निकलती थी और शाम होते-होते
गर्मी भी कम हो जाती थी. बारिश होती भी थी, तो मौसम को रंगीन बना देती थी, लेकिन इस बार मौसम
के बारे में कुछ भी कहना अनोखा सा लग रहा था. लेकिन प्रेमिका को ये मौसम नहीं, नदी
पार अपना प्रेमी दिखाई दे रहा था. प्रेमियों की खासियत समझने के लिए उनके जैसा बनना
पड़ेगा. उनके जैसा मतलब संत. किसी से पूछोगे, तुम्हारे लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है,
तो कोई बोलेगा धन, कोई बोलेगा तन तो कोई बोलेगा
मन. लेकिन प्रेमी जोड़ा बोलेगा समपर्ण. लेकिन क्या करें साहित्य में समपर्ण की परिभाषाएं
भी अलग-अलग हैं. बहरहाल प्रेमी जोड़े का समर्पण समझना भी मुश्किल है, या ये कहें हालातों के अनुसार समपर्ण भी बदलता रहता है.
इतना भरोसा तो माँ को अपने बेटे पर भी नहीं होगा , जितना भरोसा प्रेमिका को अपने
हाथों से बनाए घड़े पर था. लेकिन बेचारी प्रेमिका को क्या मालूम था कि उसके बनाये घड़े
को हटाकर उसके जैसे कच्चे घड़े को रख दिया गया है, वो भी उसी के संबंधी ने, लेकिन अच्छी
आत्मा को सब अच्छे ही दिखाई देते हैं, सो प्रेमिका को भी उसके अपने सच में अपने ही
नजर आए। हर बार की तहर नदी पार प्रेमी से मिलने चल दी। उसका घड़ा जो उसका माझी बनता,
उसे ध्यान से भी नहीं देखा, परखा भी नहीं।
हाय! ये दुनिया भी अजीब है, परखने का काम भी वो करते हैं, जिसे अपनों
पर भी भरोसा नहीं होता और जिसे भरोसा होता है, वो कभी परखता ही
नहीं।
लोग नदी के उफान से अपने घर की ओर जा रहे थे, तो प्रमिका मुस्कान लिए नदी ओर जा रही
थी। शाम जल्दी ढलने लगी, आज तो सूरज भी इस तुफान के आगे हल्का
नजर आ रहा था, बारिश तो हो ही रही थी, लेकिन
ये तेज हवाएं मौसम को सुहाना बनाने की जगह भयावह बना रही थी। लोग डर रहे थे,
प्रमिका खुश हो रही थी। भगवान भी किसी का नसीब सोने से लिख देता है,
तो किसी का मिट्टी से, लेकिन नसीब ही सब कुछ नहीं होता,
समय से आगे तो भगवान भी ठहर जाता है, इसीलिए सोने के नसीब वाले मिट्टी
में मिल जाते हैं और मिट्टी में खेलने वाले सोने का ताज पहन लेते हैं।
प्रेमिका मिट्टी के बर्तन जरूर बनाती थी, लेकिन प्रेम ने उसकी आँखों को प्रकृति
की गोद सा बना दिया था। उसे मिट्टी में भी अस्तित्व नजर आते और वो भी दिवानी ठहरती
नहीं, जो दिखता, चाक पर रखकर बना देती।
देश-विदेश से उसकी कलाकृति को देखने मुसाफिर आते थे। उसका आशिक़ भी कभी मुसाफिर ही था।
प्रेमिका नदी पर पहुँच गयी। नदी उफान दिखा रही थी, लेकिन प्रेमिका
उस पार तट को देख रही थी, सिर्फ घड़ा ही था, जो उस उफान को देखकर
घबरा रहा था। जुबां होती तो बोल देता, ‘प्रेमिका उस पार न जा
सकेगी’
प्रेमिका उतर पड़ी नदी में, उस नूर को, उस प्रकृति के बनाए नायाब तोहफे
को देखने, जिसे आँख वाले भी नहीं देख सकते, दिलवाले भी समझ नहीं
सकते। उस खुशबू को लेने जिसे प्रकृति ने नसीब वालों के लिए बनाया है, जिसे महसूस करना किसी के बस में नहीं। उन धड़कनों को सुनने, जिसके लिए तमाम
पवित्र आत्माएं इंतजार करती हैं, उसमें कुछ पहर रहने के लिए।
नदी का उफान, तेज होती बारिश, बढ़ता बहाव और प्रेमिका को दिखता किनारा।
बेदर्द और खौफनाक होते मौसम को देखकर प्रेमिका घड़े से कुछ पूछती कि घड़ा बोल पड़ा।
‘क्या तुम्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा कि मैं कैसा हूँ और तुम मुझे किन परिस्थितियों
में ले जा रही हो ?’, घड़ा घबराता हुआ बोला।
पानी में तैरती प्रेमिका बोली, ‘कैसे हो का क्या मतलब है ?, क्या तुम जानते नहीं, हमेशा की तरह मुझे कहाँ जाना है, और तुम मेरे लिए क्या
करते हो ?’
‘नहीं मैं नहीं जानता’, डरता हुआ घड़ा बोला।
प्रेमिका दुखी मन से बोली, ‘देखो मेरे प्यारे घड़े इन विपरीत परिस्थितियों में मुझसे ऐसी हँसी
न करो। मुझ बदनसीब की बिन इच्छा शादी हुई। माता-पिता ने भी हमेशा के लिए विदाई दे दी।
ससुराल में भी मुझे प्यार नहीं मिला और जब तुझे बनाया तो सिर्फ इसलिए कि मैं उस पार
जाकर अपने प्रेमी को देख सकूं, उससे मिल सकूं। हर बार तूने मेरा
साथ दिया, आज तुझे क्या हो गया। मेरा नसीब इतना तो खराब नहीं कि मैं अपने प्रेमी को
दुखी करूं। अब मेरा नसीब भी तेरे हवाले है, तू ही किनारे पहुँचाता
है, तो आज तुझे क्या हो गया है ?
पानी के तेज बहाव से घड़ा कमजोर हो रहा था, लेकिन बातों को समझ नहीं पा रहा था कि
आखिर उसने कब प्रेमिका को हमेशा किनारे पर पहुँचाया. वो इस भयानक मौसम में क्यों झूठ
बोलेगा -
‘मैंने तो आज तक नदी को देखा भी नहीं, मुझे तो तुम्हारी
भाभी ने कल ही बनाया, लगता है तुम्हें धोखा हुआ है’
सन्न रह गयी प्रेमिका... अब रोने लगी, ‘हाय। तो क्या अब भाभी भी मुझे...। मुझे
धोखा हुआ नहीं है, धोखा दिया है। जिसे मैंने अपनी बहन माना उसने
ही...। नफरतों की फहरिस्त में एक और नाम जुड़ जाने से नफरतों का तौल नहीं बढ़ जाता,
हाँ इतना जरूर है, खतरे बढ़ जाते
हैं।
प्रेमिका को अब बस घड़े का ही सहारा था, सो घड़े से ही विनती करने लगी। ‘
ऐ घड़े- मेरा बस एक काम कर दे,
पिघलते जिस्म को जाम कर दे,
थाम ले कुछ साँस अपनी,
हाथ मेरे अपनी लगाम कर दे,
देख नदी ने जान लिया है,
लहरों ने भी पहचान लिया है,
बस यही एक एहसान कर दे,
इस नदी के पार कर दे।’
घड़ा क्या करता, कसमसाता हुआ बोला, ‘प्रेमिका तुम समझती क्यों नहीं मैं
कच्चा घड़ा हूँ। मुझे पकाया नहीं गया।’
प्रेमिका ने भी उत्तर दिया, ‘तुम कच्चे हो तो क्या हुआ, आखिर मेरा प्यार तो पक्का है। जीवन
भी इंसान को कच्चे से पक्के होने का समय देती है। दुख और सुख साथ-साथ चलते हैं। दुख
ही ऐसे हैं, जो इंसान को समय के साथ-साथ पक्का बना देती हैं।
माना तुम्हें पकाया नहीं गया, इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम स्वयं
भी पकना नहीं चाहो। जब दुख का समय आता है, उस समय पकने का सही
मौका होता है। जिन बच्चों को शिक्षा नहीं मिलती तो क्या वे समझदार नहीं माने जा सकते।
जरा समाज में बात तो करके देखो, कभी-कभी ऊँचे पदों पर बैठे लोगों से ज्यादा अच्छी बातें वे
कर जाते हैं, जिन्होंने स्कूल तक का मुँह नहीं देखा होता।’
‘देखो प्रिय घड़े मेरा वक्त हमेशा से बुरा ही रहा है, इस
नदी को ही देखो। आज तक जिसने मेरे शरीर की प्यास बुझाई और उस किनारे पहुँचाकर मेरी
आत्मा की प्यास बुझाई, जिसने हजारों इंसानों की, वृक्षों की प्यास बुझाई, निर्मलता दी, आज वह भी इस मौसम की मार झेल रही है। याद रखना जिसका दिल भी इस पवित्र नदी
जैसा होगा, उसे किसी न किसी बात को लेकर कुछ न कुछ झेलना
जरूर पड़ेगा|’
घड़ा पिघलने लगा, ‘अब मेरा समय आ गया है। मैं इस काबिल न बन पाया कि तुम्हें उस पार ले जा सकूं।
मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन अब तो लगता है, यदि कोई अच्छा भी हो तो हालात आपको उसकी मदद नहीं करने देते।’
‘मैं डूब रही हूँ। अब क्या करूं, क्या उनसे मुलाकात नहीं
होगी, ऐसा ही है तो मुझे कुछ कहना है उनसे। इस जीवन में उनकी
नहीं बन सकी, लेकिन अगले जन्म में उनकी बनूँगी। लेकिन पक्षी बनकर,
इंसान नहीं। इंसानों ने तो गाँव, शहर, सरहदों, समाज, वर्ग यहाँ तक कि जिस्म तक पर पाबंदियाँ लगा दी हैं। पंछी आजाद
होते हैं।’
घड़ा पिघल रहा था, उस पर चढ़ा रंग फीका पड़ने लगा। प्रेमिका की कोशिशें जारी थीं, लेकिन विफलता का दामन बढ़ता जा रहा था, मानो उसे हराने
में सारी कायनात एक हो गयी हो।
साँस फूलने लगी तो हड़बड़ाते हुए घड़े से बोली, ‘
अब तो नदी को भी तरस आने लगा, मौसम को धिक्कारने लगी, क्या अभी ही खराब
होना था, थोड़ा रुक नहीं सकते थे। उन्हें क्यों नहीं सताते, जो
दूसरों को सताते हैं, क्यों उन पर बिजलियाँ नहीं गिराते जो सिर्फ
अपने लाभ के लिए दूसरों के घरों में आग लगा देते हैं। नदी कर भी क्या सकती है,
नियती से बंधी जो है।
घड़ा अंतिम समय में आ गया, ‘अब मुझे माफ कर दो, जितना कर सकता था,
कर दिया अब सहा नहीं जाता, पानी में खो जाने का
समय आ गया। सोचा था, मेरा निर्माण हुआ है तो एक काम तो अच्छा
जरूर करूँगा। हर किसी को अपने जीवन में एक अच्छा काम जरूर करना चाहिए, जो बाकी जीवन को आसान बना दे, लेकिन मैं एक भी काम अच्छा
नहीं कर पाया, मुझे दुख है। तुम्हें उस पार पहुँचाने की कोशिश
भी अब नाकाम हो गई। मेरा आधा शरीर डूब गया, तुम भी हाँफने लगी।
हे ईश्वर! कुछ ऐसा कर दे,
मेरे कर्मों में नेक लिख दे,
इस लड़की को उस पार कर दे।’
सिसक कर रोने लगी प्रेमिका, ‘तुम तो कमजोर निकले घड़े। तन से भी और मन से भी। देखो, मैं तो
स्त्री हूँ, न जाने मुझे कहाँ-कहाँ से धोखा मिला, नफरतें मिली।
लेकिन, एक प्रेम ने मुझे इतना मजबूत बना दिया कि सारे धोखों और नफरतों को मैंने माफ
कर दिया। और सच ये भी है कि मैं तुम्हें भी माफ करती हूँ। तुम्हें तो एक बुरा काम करने
के लिए बनाया गया था, लेकिन फिर भी तुमने एक अच्छा काम किया,
मेरी जितनी मदद हो सकी, उतनी कर दी। अब इन लहरों
ने तुम्हारे चीथड़े करना शुरू कर दिया, ये उनका कर्म है,
वे भी नियती से जो बंधे हैं।’
‘काश मैं उन्हें देख पाती, सुनो... मुझे माफ कर दो आपको
बेवजह इंतजार करवा दिया...’, प्रेमिका अब थकने लगी थी।
उस ओर खड़े प्रेमी की धड़कन अचानक बढ़ गई। जैसे प्रेमिका कुछ कह रही है। इतना मौसम
खराब था तो आना ही नहीं चाहिए था, लेकिन दिल इतना बेचैन क्यों हो रहा है। इतनी तेज बारिश आँधी में
कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा, शाम तो थी ही साथ ही बादलों ने और
अंधेरा कर दिया। नदी में आँधी से टूटे पेड़ तैर रहे हैं, डूब चुके
जानवर भी उतराने लगे। लेकिन अभी तक प्रेमिका आती दिखाई नहीं दे रही।
प्रेमी का दिल इतना बेचैन हुआ कि लगा नदी किनारे लहरें उसके पैरों को पकड़कर गिड़गिड़ा
रही हों, चलो जल्दी चलो, कहीं देर न हो जाए। प्रेमी को जब कुछ
समझ नहीं आया तो आखिरकार लहरों ने ही प्रेमिका की चोली उसके पैरों में ला रख दी। प्रेमी
चिला उठा और नदी में छलांग लगा दी। लहरें नियति से बंधी थी, तो
क्या मदद नहीं कर सकती ?
एक अधिकारी नियमों के तले काम करता है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वह नियमों
का गुलाम हो गया, वह अधिकार प्राप्त व्यक्ति होता है,
जो नियम के लिए काम जरूर करता है लेकिन समयानुसार वह निर्णय ले सकता
है, जो किसी के भले के लिए हों। यदि नियमों से भलाई होती नहीं
दिखती, तो यह अधिकारी ही होती है जो विरोध कर सकता है, क्योंकि
वह नियम और नियम मानने वालों के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी होता है। ऐसा ही कुछ लहरों ने
नियति का पालन करते हुए प्रेमी के साथ प्रेमिका के लिए किया।
आखिरकार लहरों ने प्रेमी को प्रेमिका के पास पहुँचा दिया, प्रेमिका अपनी थकान
भूल गई, भयानक मौसम को भूल गई, अपने साथ
बहाकर ले जाती लहरें उसे मखमल लगने लगी, घड़ा तो मानो उसका हथियार
बन गया, मुस्कराते हुए प्रेमी से कहने लगी, ‘माफ कर दो मुझे, मैं आ नहीं पायी’
प्रेमी की आँखों में आँसू थे, दोनों एक दूजे से लिपट गए। जोर-जोर से अपनी किस्मत पर रोने लगे।
वे समझ गए आखिर प्रकृति चाहती क्या थी। घड़ा पिघल चुका था, बस
मुँह ही रह गया था पिघलने को, क्योंकि प्रेमिका ने उसे भी अपने सीने से लगा रखा था,
सो बचा रहा। हाय रे प्रेमिका तुझे अपनी जान की परवाह न रही, उस कमजोर घड़े को बचाए रही, जिससे खुद मदद माँग रही थी। नारी दिखती कमजोर है,
पर होती सबसे मजबूत है। उसकी आवाज में कितनी विवशता क्यों न हो, लेकिन उसके कर्म प्रकृति
को जिन्दा रखते हैं।
जैसे ही प्रेमी जोड़ा मिला, वैसे ही गाँव में बाढ़ आ गयी। लग रहा था, मानो प्रेमियों के आँसूओं से बाढ़ आ गयी। नदी का गुस्सा फूट पड़ा। ऐसा लग रहा
था, जैसे नदी अपने लहरों को गाँवों में संदेश भेज कर कह दिया
हो, बेरहमों! लो मैं उन्हें अपने साथ ले जा रही हूँ, जिन्हें तुमने प्यार से रहने नहीं दिया। ये बेचारे तो जीना चाहते थे,
लेकिन इनको मरता देख तुम खुश हो रहे होगे। देख लो, अब तुम्हें नफरत करने
की जरूरत नहीं, ले जा रही हूँ इन्हें हमेशा के लिए। लेकिन इतना याद रखना जब तक मेरा
अस्तित्व है, इनके प्रेम की सुगंध मुझसे आती रहेगी।
घड़ा प्रेमी जोड़े के प्यार को देख रोने लगा। अंतिम साँसों में पूछ बैठा, ‘प्रेमिका क्या
तुमसे कुछ पूछ सकता हूँ ? मैं जानता हूँ, तुम्हारी मदद नहीं कर
पाया, जानता हूँ, तुमसे पहले मैंने हिम्मत छोड़ दी, तुम आखिरकार अपने प्रेमी से मिल ही ली। इस अंत समय में मेरा योगदान क्या है
?’
प्रेमी जोड़ा डूब रहा था, अंत समय में भी प्रेमिका के चेहरे पर मुस्कान थी, कहने लगी, ‘तुम्हारा ही योगदान है कि मैं अपने प्रेम
से आखिरी समय में मिल पायी और अभी तक नहीं डूबी। तुमने जो सहारा इस संकट में दिया,
वो हमेशा याद रहेगा। तुम कच्ची मिट्टी के जरूर बने हो, लेकिन तुम्हारे इरादे किसी फौलाद
से कम न थे। मुझे तुम्हारे इरादों ने बचाकर रखा। जाओ तुम्हें वरदान भी देती हूँ, जो
लोग हम दोनों के प्रेम को याद रखेगा, वो तुम्हें भी याद रखेगा। इस नदी ने हम प्रेमियों
को जगह दी। तो इन नदियों से ही पता चलेगा कि दुनिया में प्रेम कितना शेष है। नदियाँ
सूखने लगे तो समझना प्रेम खत्म हो रहा है।’
प्रेमिका ठहरी नहीं, अंत में यह भी कह गई, ‘घड़े तुम्हें ये किसने का कि तुम पूरी
तरह डूब जाओगे, माना कि तुम्हारा पूरा बदन पानी में मिल गया,
लेकिन तुम्हारा मौखला मेरे हृदय से लगने के बाद मेरे जैसा मजबूत हो गया
है, तुम्हें किनारा जरूर मिलेगा। जब नई कोपलें खिलें, तो तुम
उन्हें इस अंत समय की घटना को जरूर सुनाना। इंसान पूरी जानकारी ले न ले, अंत सबको जरूर समझना चाहिए।
इसके बाद नदी प्रेमी जोड़े को अपने आगोश में ले गई। जो घड़ा अपनी अंतिम साँसे ले
रहा था, अब उसे पता चला कि उसकी अंतिम साँसे नहीं है, जो घबराहट थी,
वह अब न रही। बारिश तेज हो रही थी, नदी उफान पर
थी, गाँव डूब चुके थे। शाम ढल चुकी थी। अंधेरा हो चुका था। सूरज
तो जैसे डूबा, नहीं अचानक बदहवाश गिर गया हो। ऐसा लग रहा था, कोई मनवंतर शुरू हो गया
हो।
घड़ा अब किनारा ढूंढ रहा था।