सीखने के लिए मैंने हर जख्म सींचे हैं, पढ़ना है दर्द मेरा तो सब लिंक नीचे हैं
जल संकट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जल संकट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, जून 22, 2025

ग्रामीण विकास की पुनर्कल्पना: परंपरा, नवाचार और न्याय

- डॉ0 बृजेन्द्र कुमार वर्मा 


 भूमिका

ग्रामीण भारत केवल खेत, खलिहान और मिट्टी का नाम नहीं है, यह एक समृद्ध सांस्कृतिक जीवनधारा है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता, श्रम और आत्मा, सामूहिकता और विविधता का अद्भुत समन्वय है। जब हम ग्रामीण विकास की बात करते हैं, तो यह केवल बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भर नहीं है, बल्कि एक ऐसे सामाजिक ढांचे की रचना है, जो समावेशी हो, न्यायपूर्ण हो, टिकाऊ हो और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करे। हम विकास प्रक्रिया की गहराइयों में जाकर उसकी परिभाषा, चुनौतियों, संभावनाओं और नीतिगत सुधारों की विवेचना कर सकते हैं।

1. ग्रामीण विकास की पारंपरिक अवधारणाएँ और सीमाएँ

ग्रामीण विकास को प्रारंभ में मुख्यतः कृषि उत्पादन, भूमि सुधार, सिंचाई, ग्रामीण बैंकिंग, और प्राथमिक शिक्षा जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति के रूप में देखा गया। भारत के पहले पंचवर्षीय योजना (1951-56) में 'कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम' की शुरुआत हुई, जिसने ग्रामीण भारत को योजनाबद्ध विकास से जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि, इन योजनाओं में स्थानीय सामाजिक संरचनाओं, जाति व्यवस्था, और महिला सहभागिता जैसे पहलुओं की उपेक्षा रही।

वर्षों तक विकास की यह दृष्टि 'टॉप-डाउन' रही — यानी निर्णय और योजनाएँ दिल्ली या राज्य मुख्यालय से बनती थीं, और उन्हें गाँवों पर थोप दिया जाता था। इससे स्थानीय समस्याओं की जटिलता को समझने और समाधान प्रदान करने में असफलता हुई।

2. 'बॉटम-अप' विकास और स्थानीय नवाचार

डॉ. अनिल गुप्ता अपनी पुस्तक में बताते हैं कि गाँवों में केवल 'समस्या' नहीं, समाधान भी विद्यमान हैं। हनी बी नेटवर्क और राष्ट्रीय नवप्रवर्तन फाउंडेशन (NIF) ने हजारों ग्रामीण नवाचारों को संकलित कर यह दिखाया कि सीमित संसाधनों में भी कैसे रचनात्मकता फलती-फूलती है।

Digital Green, e-Choupal, और mKisan जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स ने सूचना, कृषि, और विपणन को डिजिटली जोड़कर गाँवों को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा, परंतु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि इन नवाचारों की सफलता तब ही संभव है, जब स्थानीय साक्षरता, डिजिटल साक्षरता और बुनियादी अवसंरचना मजबूत हो।

3. सामाजिक न्याय के अभाव में अधूरा विकास

भारत का ग्रामीण समाज जाति, वर्ग, लिंग और भू-अधिकार जैसे असमानताओं से व्याप्त है। दलित, आदिवासी, और महिलाएँ अधिकांश योजनाओं में परिधीय भूमिका में रहती हैं। भूमि सुधार अधिनियमों के बावजूद ज़्यादातर भूमि अब भी कुछ ऊँची जातियों के नियंत्रण में है। 

महिलाओं की सहभागिता ग्राम पंचायतों में आरक्षण के माध्यम से बढ़ी है, लेकिन निर्णय-निर्माण की वास्तविक शक्ति अभी भी सीमित है। आत्मनिर्भर गाँव की कल्पना तभी साकार होगी जब सामाजिक न्याय उसकी रीढ़ बने।

4. ग्राम सभा और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण

पंचायती राज व्यवस्था को 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से संवैधानिक दर्जा मिला। ग्राम सभा को गाँव की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक इकाई माना गया, परंतु व्यवहार में यह सशक्त संस्था नहीं बन पाई है। इसके पीछे भ्रष्टाचार, राजनीतिक हस्तक्षेप, और जन-जागरूकता की कमी जैसी अनेक समस्याएँ हैं।

जहाँ ग्राम सभाओं को सक्रिय और निर्णयात्मक इकाई बनाया गया, जैसे केरल का कुदुम्बश्री मॉडल, वहाँ ठोस परिवर्तन देखने को मिले हैं। कुदुम्बश्री (जिसका स्थानीय मलयालम भाषा में अर्थ है "परिवार की समृद्धि") केरल सरकार का चल रहा सहभागी "गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण" मिशन है, जो 1998 में शुरू हुआ था, और महिलाओं के तीन-स्तरीय सामुदायिक नेटवर्क के माध्यम से काम करता है।

5. पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास

गाँवों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः प्रकृति पर आधारित होती है — वर्षा, भूमि, जंगल और जलस्रोत। परंतु वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, और औद्योगिक प्रदूषण ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है। राजस्थान के जल योद्धा राजेन्द्र सिंह ने जल संरक्षण के पारंपरिक तरीकों का पुनरुद्धार करके यह दिखाया कि पर्यावरणीय न्याय से ही टिकाऊ विकास संभव है। महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गाँव ने सामूहिक भागीदारी से वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण, और आजीविका के विविधीकरण का ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है जो देशभर के लिए उदाहरण बन गया है। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित हिवरे बाजार गाँव, सूखे की मार झेलने के बाद वर्षा जल संचयन और जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक मॉडल बन गया है। कभी यह गाँव अत्यधिक गरीबी और पलायन का शिकार था, लेकिन आज यह महाराष्ट्र के सबसे समृद्ध गांवों में से एक माना जाता है, जहाँ कई परिवार करोड़पति हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, हिवरे बाजार का भूजल स्तर नाटकीय रूप से बढ़ा। जहाँ पहले पानी की गंभीर कमी थी, वहीं आज गाँव में 350 कुएं और एक तालाब है, और पानी की आपूर्ति आसपास के गाँवों को भी की जाती है। इस सफलता ने कृषि उत्पादन में वृद्धि की, पशुधन को बढ़ावा दिया, और ग्रामीणों की आय में भारी वृद्धि हुई, जिससे यह गाँव देश के लिए एक आदर्श बन गया है।

6. जलवायु परिवर्तन और ग्रामों की अनुकूलन क्षमता

ग्रामीण क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ रहा है — बेमौसम वर्षा, सूखा, फसलों की विफलता, और जल संकट इसके प्रमुख लक्षण हैं। इन चुनौतियों के उत्तर में ग्राम समुदायों को पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के मेल से समाधान खोजना होगा। जैविक खेती, मिश्रित कृषि प्रणाली, और सामूहिक जल प्रबंधन ऐसे कुछ विकल्प हैं। 

7. ग्राम स्वराज की नई कल्पना: 'ग्राम स्वराज 2.0'

महात्मा गाँधी का 'ग्राम स्वराज' केवल ग्राम स्वशासन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, न्याय, और नैतिकता का आदर्श था। आज की डिजिटल और वैश्वीकृत दुनिया में गाँधी के इस विचार को फिर से पढ़ने और लागू करने की आवश्यकता है — लेकिन आधुनिक संदर्भ में।

'ग्राम स्वराज 2.0' का अर्थ होगा:

  • सूचना और तकनीक आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्था

  • लिंग और जाति आधारित असमानताओं का सक्रिय उन्मूलन

  • प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की जीवन पद्धति

  • नीति निर्माण में वास्तविक ग्राम सहभागिता

निष्कर्ष

ग्रामीण विकास एक बहुस्तरीय और बहुपरिमाणीय प्रक्रिया है जिसमें केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आयाम भी शामिल हैं। यह अध्याय इस बात पर बल देता है कि ग्रामीण भारत को केवल 'पिछड़ेपन' के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार, आत्मनिर्भरता और टिकाऊ जीवन पद्धति की प्रयोगशाला के रूप में देखा जाए।

भारत का भविष्य उसके गाँवों में बसता है, और जब तक गाँवों में न्याय, नवाचार और आत्मबल का आलोक नहीं फैलेगा, तब तक कोई भी विकास अधूरा ही रहेगा।


संदर्भ सूची

  1. Planning Commission (1952), First Five-Year Plan, Govt. of India

  2. Dreze, Jean and Amartya Sen (2013), An Uncertain Glory: India and its Contradictions

  3. Gupta, Anil K. (2016), Grassroots Innovation: Minds on the Margin are not Marginal Minds

  4. ITC e-Choupal Case Study, Harvard Business Review (2003)

  5. Rawal, Vikas (2008), Ownership Holdings of Land in Rural India, EPW

  6. Kabeer, Naila (1999), Resources, Agency, Achievements: Reflections on the Measurement of Women's Empowerment

  7. Mathew, George (1994), Panchayati Raj: From Legislation to Movement, ISS

  8. Kudumbashree Mission Reports, Government of Kerala

  9. Singh, Rajendra (2010), Water Warriors: People's Movement for Water in India

  10. Sinha, D. (2006), Hivre Bazar: A Model Village, Ministry of Rural Development

  11. IPCC Report (2022), Impacts, Adaptation and Vulnerability

  12. TERI (2020), Climate Resilience in Indian Villages

  13. Gandhi, M.K. (1946), Hind Swaraj

  14. Jodhka, Surinder S. (2002), Nation and Village: Images of Rural India in Gandhi, Nehru and Ambedkar

शनिवार, अगस्त 06, 2022

भूजल निकासी का पुनर्भरण आवश्यक, नहीं तो झेलना होगा संकट

(भूजल संकट)

जल संकट के प्रति जागरूकता में मीडिया का योगदान आवश्यक

 बृजेन्द्र कुमार वर्मा,                        

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार अध्ययनकर्ता हैं)

...................................................................................................................................

जब आप बैंक से लोन लेते हैं, तो आपको उसका भुगतान करना ही पड़ता है। यदि आप ऋण चुकाने में आना-कानी भी करते हैं, तो बैंक एक न एक दिन आपसे पाई-पाई का हिसाब ले ही लेता है, वह भी ब्याज सहित। बस यही नियम जल निकासी कर रहे लोगों को सोचना चाहिए, उन्हें लगता है, प्रकृति कुछ कहेगी ही नहीं, लेकिन बेवजह और निरंतर जल निकासी कर रहे लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि जिस दिन प्रकृति ने अपना रोद्र रूप दिखाया, तो कुछ नहीं बचेगा।

            बड़ी ही गंभीरता के साथ भूजल संकट चर्चाएं हो रही हैं। ऐसा नहीं है कि समाज में रह रहे पढ़े-लिखे परिवार भूजल संकट को समझते नहीं, परंतु चिंतनीय यह है कि लोग दिए गए सुझावों अथवा नियमों पर अमल नहीं करते। विभिन्न विषयों के अध्ययनकर्ताओं ने आंकड़ों के एकत्रीकरण में यह पता लगाया कि जब भी भूजल की समस्या के परिणामों से लोगों को अवगत कराया जाता है तो कई परिवार ऐसे होते हैं, जो भूजल के लिए स्वयं को जिम्मेवार नहीं समझते। उनका कहना होता है कि पृथ्वी में हो रहे भूजल संकट उनके अकेले से नहीं हो रहा। उनका उत्तर सही तो हो सकता है, लेकिन यहां एक तर्क यह भी समझना होगा कि बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। अर्थात जो भी जल निकासी कर रहा है, उन सभी के कारण एक साथ जो परिणाम सामने आता है, वह है, गिरता भूजल, गहराता जलसंकट।

भारतीय परिप्रेक्ष्य को देखें तो जितना पानी जमीन में जाता है, उससे अधिक पानी जमीन से निकाल लिया जाता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि मूल्यांकन किए गए कुल क्षेत्र के 16 प्रतिशत में जल की वार्षिक पुनर्भरण मात्रा से वार्षिक निकासी अधिक है। इससे पता चलता है कि भारत में कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जल संकट है भी और यह लगातार बढ़ रहा है। यद्यपि कुछ क्षेत्र ऐसे भी है, जहां बारिश के पानी से निकासी की प्रतिपूर्ति हो जाती है, लेकिन ऐसे क्षेत्र बहुत कम हैं।

वर्षा ऋतु प्रकृति की तरफ से जीव-जंतुओं के लिए वरदान है, जो पूर्णतः अतुल्नीय है, लेकिन इसका नई दुनिया में दुरुपयोग बढ़ रहा है। यदि कोई शांत है, और आप उसका नाजयज फायदा उठा रहे हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह कुछ कर नहीं सकता, जिस दिन मन बदला तो परिणाम भी घातक हो सकते हैं। प्रकृति जितनी शांत है, उसका रोद्र रूप, उससे अधिक भयानक है। देश में आजकल जो बाढ़ की स्थिति है, उससे समझा जा सकता है। यहां बात सिर्फ जो जमीन से पानी लिए जाने मात्र की नहीं है, भारत में जल संचयन के लिए कई प्रयास किए हैं, और लगातार कर भी रही है। लेकिन जब बाढ़ जैसी स्थिति देखी जाती है, तो लगता है कि प्रयास कागजों में ही रहे। बड़ी ही उत्सुकता से 22 मार्च 2021 को विश्व जल दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने जल शक्ति अभियान- कैच द रेन अभियान की शुरूआत की। इस अभियान का प्रयास है कि जब भी बारिश हो और बूंदे जहां गिरे उसका वहीं संचयन किया जाए। किसानों के लिए यह प्रयास लाभदायक सिद्ध हो सकता है, क्योंकि सर्वाधिक जल उपयोग सिंचाई के माध्यम से कृषि में होता है।

ऐसा नहीं कि भारत में बारिश की स्थिति ठीक नहीं, अपितु कुल मानसून में वर्षा भरपूर होती है। प्रकृति मानसून में भारत को एक बार में इतना पानी दे जाती है, जितना वे उस पानी को सालभर में भी उपयोग नहीं कर सकते। भारत में हर साल औसतन 4000 अरब क्यूबिक मीटर जल वर्षा से प्राप्त होता है, जिसमें से लगभग 1999 बीसीएम नदियों, झीलों, जलाशयों, भूजल और ग्लेशियरों में उपलब्ध जल संसाधन है। भारत की भौगोलिक स्थिति के कारण कहीं बहुत अधिक वर्षा होती है तो कहीं कम। यही कारण है कि मानसून में कहीं बाढ़ आ जाती है तो कहीं पानी की कमी हो जाती है। लेकिन जब यह भारत को पता है कि वर्षा कहां ज्यादा और कहां कम हो रही है तो जल प्रबंधन करने में गंभीरता बरतनी चाहिए।

मान लीजिए, आपके बीमार होने पर डॉक्टर ने आपको परहेज करने को कहा, आपने डॉक्टर की बात तो सुन ली, लेकिन घर आकर उस पर अमल नहीं किया, तो होगा यह कि बीमारी आपके शरीर में बनी रहेगी, और दवा का असर भी नहीं होगा। जल पुनर्भरण के मामले में यही स्थिति है। सब जानते हैं, जल संकट गहराता जा रहा है, लेकिन इसके इलाज पर किसी का विशेष ध्यान नहीं है। असल में समाज की गंभीरता न होने का एक कारण यह भी है कि जल का वितरण पूरे देश में एक समान नहीं है। मानसून में कुछ नदियों में बाढ़ आ जाती है, तो कुछ नदियां, घाटियां सूखा ग्रस्त हो जाती हैं। यहां जल प्रबंधन की संपूर्ण दक्षता एवं जल संरक्षण की सर्वोच्च व्यवस्था की आवश्यकता है। ऐसा कर दिया जाए तो बारिश के बाद अधिकतर जल जो समुद्र में चला जाता है, उसे तो रोका ही जा सकता है, साथ ही जल के असमान वितरण को भी सुधारा जा सकता है। भारत में वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 1999 बिलियन क्यूबिक मीटर है, जिसका संरक्षण नहीं हो पाता और नदियों में और तालाबों या फिर जमीन में नहीं जा पाता, इस वजह से देश के कई भागों में पानी की किल्लत उत्पन्न होती रहती है। यद्यपि होना यह चाहिए कि पानी के असमान वितरण पर काम किया जाए, लेकिन सीमित भंडारण क्षमता और अंतर बेसिन स्थानांतरण की कठिनाइयों के कारण ऐसा नहीं हो पाता, जबकि जल परिवहन और उपयोग दक्षता में सुधार करना आवश्यक हो गया है। जल संचयन के लिए कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन जागरूकता न होने के कारण एवं योजनाओं के प्रति आकर्षण न पैदा कर पाने के कारण जल का पुनर्भरण नहीं हो पाता।

टीआरपी की होड़ और अखबारों के सर्कुलेशन की प्रतियोगिता ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि मीडिया उन्हीं विषयों को उठाती है, जो जनता पढ़ना या देखना चाहती है, सामाजिक सरोकार के विषयों को उठाना हर मीडिया के बस की बात नहीं रही। लेकिन भारत में आज भी कई मीडिया संस्थान ऐसे हैं, जो बिना किसी प्रतियोगिता के भारत के समुचित विकास को समर्पित हैं और सामाजिक सरोकार और गंभीर विषयों को उठाते रहते हैं और जनता के प्रहरी बने रहते हैं। सरकार भी ऐेसे अखबारों और मीडिया संस्थनों का सम्मान करती है।

जल संकट का प्रभाव सर्वाधिक कृषि पर पड़ रहा है। भारत में लगभग 91 प्रतिशत जल की खपत सिंचाई के लिए की जाती है, दूसरे देशों में यह आंकड़ा 30 से 70 प्रतिशत के बीच है। पानी की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण कई छोटे, मझोले किसान कृषि छोड़कर आय सजृन के लिए दूसरे कार्यों में संलग्न हो रहे हैं। सिंचाई मंहगी हो रही है। ऐसे में सरकार को कृषि से किसानों का जुड़ाव बरकरार रखना है, तो जल का पुरर्भरण के प्रति गंभीर होना होगा, तालाबों का निर्माण और वर्षा जल भरण करना होगा, झीलों को पुनर्जीवित करना होगा। यदि ऐसा नहीं हो पाता है, तो अध्ययन कि यह संभावना कि 2030 तक भारत के 40 प्रतिशत परिवारों के पास पीने के पानी की उपलबधता समाप्त हो सकती है, को बल मिलेगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक व्यक्ति को सबसे बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिदिन कम से कम 50 लीटर जल की आवश्यकता होती है और जल का स्त्रोत घर में 1 किलोमीटर के भीतर होना चाहिए और संग्रहण लगभग 30 मिनट से अधिक नहीं होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की सतत विकास लक्ष्य रिपोर्ट 2021 के अनुसार विश्व स्तर पर 2.3 अरब लोग जल की कमी वाले देशों में रहते हैं और लगभग 2.0 अरब लोगों की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच नहीं है।

वैश्वीकरण को अपनाने के बाद भारत भी जल संकट के प्रति सजग है और जल संरक्षण और जल प्रबंधन के लिए कई प्रयास किए हैं। जहां भारत में 1950 तक लगभग 380 बड़े बांध थे, वहीं 50 वर्षों में वर्ष 2000 आते आते बांधों की संख्या बढ़कर 3900 हो गई। यह सुनने में अच्छा जान पड़ता है, परंतु कृषि क्षेत्र के लिए यह न्यायोचित स्थिति नहीं कही जा सकती। कुल जल खपत का 91 फीसदी हिस्सा कृषि में खर्च होता है, शेष 7 फीसदी घरेलू कार्यां और शेष 2 फीसदी औद्योगिक क्षेत्र में। कृषि की बात करें तो 140 मिलियन हेक्टेयर के कुल बोए गए क्षेत्र में से मात्र 68 मिलियन हेक्टेयर की ही सिंचाई हो पाती है, शेष वर्षा पर निर्भर रहता है। ऐसे में किसान हमेशा भय की स्थिति में अनाज उगाता है, यदि फसल तैयार होने से पहले सूख गई तो किसान बरबाद हो जाते हैं।

विश्व के विकासशील देशों में विशेषकर पेयजल और स्वच्छता की कमी है। पीने के पानी को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी मनावाधिकार के तुल्य माना है। संयुक्त राष्ट्र ने ऐसे विकासशील देशों की मदद करने का आह्वान किया है, जहां पानी संकट हैं। भारत में जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन से जल तनाव भी बढ़ रहा है। निश्चित ही जल संकट आने वाला है। जल्दी से जल्दी जल संरक्षण, जल संचयन, जल प्रबंधन के लिए कड़े कानून लाने होंगे। जल बर्बादी करने वालों पर चालान का प्रावधान करना आवश्यक है। सिंचाई पद्धतियों में परिवर्तन की आवश्यकता है, इसके लिए कृषि शिक्षकों की सहायता लेना अनिवार्य है। अब तट रक्षक, वन रक्षक, शिक्षामित्र के पदों की तरह जल रक्षक या जल मित्र जैसे पदों का सजृन करना चाहिए और इनकी भर्ती करनी चाहिए, ताकि आने वाले समय जल बर्बादी, दुरुपयोग पर कड़ी नजर रखी जाए, साथ ही जल के महत्व के प्रति जागरूकता लायी जा सके।

भविष्य के लिए जल संरक्षण और प्रबंधन ही विकल्प

जल के असमान वितरण से कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा की स्थिति

(लेखक- ग्रामीण विकास संचार के अध्ययनकर्ता हैं)

-बृजेन्द्र कुमार वर्मा

...................................................................................................................

मानसून भारत में दस्तक दे चुका है, स्थिति यह है कि कई राज्यों में बाढ़ ने कोहराम मचा रखा है, तो कुछ राज्यों में बारिश की बहुत अधिक आवश्यकता है। कहीं बारिश की बेरुखी है तो कहीं जुल्म। दोनों ही स्थितियों में किसानों की हालत खराब है। भारत में कुल पानी की खपत में सर्वाधिक उपयोग कृषि में ही होता है। ऐसे में मुद्दा जल संरक्षण का आता है। अर्थात यदि जल संरक्षण पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए तो मानसून की इन दोनों ही स्थितियों से आसानी से निबटा जा सकता है।

आंकड़ों की बात करें तो भारत में वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 1999 बिलियन क्यूबिक मीटर है, जिसका संरक्षण नहीं हो पाता और नदियों में और तालाबों या फिर जमीन में नहीं जा पाता, इस वजह से देश के कई भागों में पानी की किल्लत उत्पन्न होती रहती है। यद्यपि होना यह चाहिए कि पानी के असमान वितरण पर काम किया जाए, लेकिन सीमित भंडारण क्षमता और अंतर बेसिन स्थानांतरण की कठिनाइयों के कारण ऐसा नहीं हो पाता, जबकि जल परिवहन और उपयोग दक्षता में सुधार करना आवश्यक हो गया है।

आजादी के समय 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, तो भारत गरीबी से तो जूझ ही रहा था, साथ ही भोजन की समस्या ने भारत को और अधिक प्रभावित कर दिया। पाकिस्तान को बंटवारे में सिंचाई की जमीन मिल गयी और ढेर सारा पानी का लाभ भी। इसलिए पश्चिमी भारत के लिए कृषि की कठिनाइयां और भी बढ़ गयी। ऐसे में जल संसाधनों का समुचित उपयोग करना नितांत आवश्यक हो गया। यही कारण रहा कि भारत सरकार ने सिंचाई को पंचवर्षीय योजनाओं में स्थान दिया और सिंचाई परियोजनाएं संचालित की गयीं। पहली पंचवर्षीय योजना में बड़े और मध्य सिंचाई क्षेत्र में वार्षिक परिव्यय 376 करोड़ था, वह 11वीं पंचवर्षीय योजना तक आते आते बढ़कर 165000 करोड़ रुपए हो गया।

जल संरक्षण और जल प्रबंधन के लिए भारत सरकार ने कई प्रयास किए हैं। जहां भारत में 1950 तक लगभग 380 बड़े बांध थे, वहीं 50 वर्षों में वर्ष 2000 आते आते बांधों की संख्या बढ़कर 3900 हो गई। यह सुनने में अच्छा जान पड़ता है, परंतु कृषि क्षेत्र के लिए यह न्यायोचित स्थिति नहीं कही जा सकती। कुल जल खपत का 91 फीसदी हिस्सा कृषि में खर्च होता है, शेष 7 फीसदी घरेलू कार्यां और शेष 2 फीसदी औद्योगिक क्षेत्र में। कृषि की बात करें तो 140 मिलियन हेक्टेयर के कुल बोए गए क्षेत्र में से मात्र 68 मिलियन हेक्टेयर की ही सिंचाई हो पाती है, शेष वर्षा पर निर्भर रहता है। इतना ही नहीं, इस 68 मिलियन हेक्टेयर में चावल और गन्ना 31 मिलियन हेक्टेयर में और गेहूं 28 मिलियन हेक्टेयर में आते हैं, अर्थात ये तीन फसलें ही 59 मिलियन हेक्टेयर सिंचाई का ले लेते हैं।

इस तर्क से नकारा नहीं जा सकता कि कृषि में जल प्रबंधन की कमी देखी गयी है। नहरों से सिंचाई का असमान वितरण है। सिंचाई की निगरानी न करना भी कारण है। सिंचाई में बेहिसाब पानी का दुरुपयोग भी होता है। जहां पानी की कमी है, वहां अधिक पानी की फसलों का बोया जाना भी गलत है। ऐसे में साफ कहा जा सकता है कि प्रशासन को गंभीर होकर सिंचाई कार्यों में हस्तक्षेप एवं निकरानी करनी होगी। भारत सरकार ने सिंचाई योजनाओं की शरुआत बहुत पहले ही कर दी। यदि सिंचाई के उत्तम तरीकों को अपना लिया जाए तो लाभ होगा। सूक्ष्म सिंचाई के प्रभाव का आकलन करने के लिए कृषि सहकारिता और किसान कल्याण विभाग द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि भूजल एवं सिंचाई के उत्तम तरीकों को अपनाया जाए तो सिंचाई लागत 20 से 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है, सब्जियों की औसत उत्पादकता में कम से कम 40 प्रतिशत की वृद्धि होती है, साथ ही उर्वरक में 7 से 42 प्रतिशत तक बचत होती है और किसान की आय में लगभग औसत 48.5 प्रतिशत की वृद्धि होती सकती है। फिलहाल केवल 14.5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र सूक्ष्म सिंचाई के तहत सिंचित किया जा रहा है, जिसमें से पिछले 7 वर्षों में 6.7 मिलियन हेक्टेयर को 2015 से भारत सरकार की प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना पीएमकेएसवाई- प्रति बूंद अधिक फसल के तहत दिए गए व्यापक प्रोत्साहन के परिणाम स्वरुप जोड़ा गया।

संयुक्त राष्ट्र की सतत विकास लक्ष्य रिपोर्ट 2021 के अनुसार विश्व स्तर पर 2.3 अरब लोग जल की कमी वाले देशों में रहते हैं और लगभग 2.0 अरब लोगों की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक व्यक्ति को सबसे बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिदिन कम से कम 50 लीटर जल की आवश्यकता होती है और जल का स्त्रोत घर में 1 किलोमीटर के भीतर होना चाहिए और संग्रहण लगभग 30 मिनट से अधिक नहीं होना चाहिए।

भारत में जितना पानी जमीन में जाता है उससे अधिक पानी जमीन से निकाला जा रहा है। भारत में भूजल उपलब्धता और उपयोग पर केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि मूल्यांकन किए गए कुल क्षेत्र के 16 प्रतिशत में जल की वार्षिक पुनर्भरण मात्रा से वार्षिक निकासी अधिक है। भारत में हर साल औसतन 4000 अरब क्यूबिक मीटर जल वर्षा से प्राप्त होता है, जिसमें से लगभग 1999 बीसीएम नदियों, झीलों, जलाशयों, भूजल और ग्लेशियरों में उपलब्ध जल संसाधन है। लेकिन यहां एक समस्या आती है कि इस जल का वितरण पूरे देश में एक समान नहीं है। मानसून में कुछ नदियों में बाढ़ आ जाती है, तो कुछ नदियां, घाटियां सूखा ग्रस्त हो जाती हैं। यहां जल प्रबंधन की संपूर्ण दक्षता एवं जल संरक्षण की सर्वोच्च व्यवस्था की आवश्यकता है। ऐसा कर दिया जाए तो बारिश के बाद अधिकतर जल जो समुद्र में चला जाता है, उसे तो रोका ही जा सकता है, साथ ही जल के असमान वितरण को भी सुधारा जा सकता है।

जल संसाधनों का उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई, घरेलू और औद्योगिक क्षेत्र में होता है। इनमें भारत में लगभग 91 प्रतिशत जल की खपत सिंचाई के लिए की जाती है, दूसरे देशों में यह आंकड़ा 30 से 70 प्रतिशत के बीच है। भारत में कृषि क्षेत्र लगातार घट रहा है, दूसरी ओर किसान कृषि छोड़कर आय के अन्य स्त्रोत भी ढूंढ रहे हैं, क्योंकि सही समय पर खेतो को खाद न मिलने से, पानी न मिलने से उन्हें नुकसान होता है और फसल बरबाद हो जाती है। सिंचाई को सुलभ और उपलब्ध कर देने से किसानों की कृषि से हट रही इच्छा को परिवर्तित किया जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी यह माना कि जल और स्वच्छता भी किसी मानवाधिकार से कम नहीं। विश्व के विकासशील देशों में विशेषकर पेयजल और स्वच्छता की कमी है। संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आह्वान करते हुए कहा कि विकासशील देशों के नागरिकों के लिए सुरक्षित, स्वच्छ, सुलभ और किफायती पेयजल और स्वच्छता प्रदान करने के लिए विकासशील देशों की मदद की जाए। भारत में जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन से जल तनाव भी बढ़ रहा है। इसको दूर करने के लिए जल संरक्षण व जल प्रबंधन की तकनीकी तंत्र में सुधार की आवश्यकता है एवं उच्च मशीनरी की मांग है। इतना ही नहीं, जल की बर्बादी को कम करने के लिए कठोर कदम भी उठाने होंगे।