सीखने के लिए मैंने हर जख्म सींचे हैं, पढ़ना है दर्द मेरा तो सब लिंक नीचे हैं

मंगलवार, मई 05, 2020

बदलती परिभाषा की परिकल्पना

वैसे तो अर्थशास्त्र में विकसित और विकासशील की अलग परिभाषा है, लेकिन कोरोना वायरस 19 ने यानि के एक बीमारी ने परिभाषा को पलट के रख दिया.
अर्थशास्त्र में विकसित मतलब हर तरह की बेहतर सुविधायें. पैसा ही पैसा
और विकासशील का मतलब बेहतर सुविधाओं के लिए संघर्ष.
लेकिन #covid19 ने परिभाषा को बदल दिया.
covid19 के अनुसार विकासशील मतलब जहाँ कम मौतें हो रही हैं और
covid19 के अनुसार विकसित मतलब लाशों का अम्बार, लाशें ही लाशें. रखने को जगह नहीं.

बंटाई

कविता 

  बंटाई  


फसल काट ली 
बोरों में भर ली 
बंटवारे की बात आई 
जिसकी जितनी क्षमता थी
उतनी बोरे रखने की आज़ादी 
मेहनत करने वाले ने अपना झोपड़ा खोला 
जमीन वाले ने अपना महल 
-बृजेन्द्र कुमार वर्मा 

शुक्रवार, मई 01, 2020

फेसबुक पर ऑनलाइन जुड़ाव नया आईडिया नहीं है

कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि ऑनलाइन जुड़ाव नया आईडिया है.
नहीं भाई, फेसबुक पर "उस तरह" के लोग "उस तरह" के लोगों के लिए कई बार और कई साल से ऑनलाइन मीटिंग कर रहे हैं, जिसमें कुछ "उस तरह" के कर्मचारियों को बैठा दिया जाता है और घंटों बात चीत होती रहती है... सवाल जवाब चलते रहते हैं.
हालाँकि ये लोग, राजनीती, विकास, अर्थव्यवस्था आदि पर बात नहीं करते. लेकिन हां ज्ञान जरूर देते हैं.
क्राइम ब्रांच अधिकतर ऐसे लोगों पर नजर रखता है. देश में कई सालों से ह्यूमन ट्रेफिकिंग का सिलसिला जारी है. इन सब को आपस में जोड़ने की कोशिश कीजिये तो पता चल जायेगा. ऑनलाइन कब से और किस बारे में होती आ रही है.

और अंत में
फेसबुक पर ऑनलाइन गेदरिंग नई नहीं है. इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा, की देश में नई से नई तकनिकी का, शुरूआती दौर में गलत वर्ग के लोग ही उपयोग करने लगते हैं, सही उपयोग तो दैर में शुरू होता है .
तभी तो कहावत बनी है, देर आये दुरुस्त आये. 

मंगलवार, अप्रैल 28, 2020

क्यों ख़राब हो रही है सोशल मीडिया की छवि ?

सोशल मीडिया की छवि को जबरन खराब बनाया जाता है, क्योंकि वे जानते हैं यदि सोशल मीडिया को दबाया नहीं गया तो यही सोशल मीडिया सच की ऐसी दीवारे कड़ी कर सकता है जिसे गिरा पाना नामुमकिन हो जाएगा. जो काम आज सोशल मीडिया कर रहा है, वही का आज से पहले 20वीं शदाब्दी के शुरू के दशकों में प्रेस कर रहा था. जब उन पर रोक लगा दी जाती तो चुपचाप प्रेस चलाया जाता और छुपे छुपे पत्र एवं लेख एक जगह से दूसरी जगह भेजे जाते. लोगो को जागरूक करने की मुहीम हमेशा से चलती रही और चलती रहेगी.

वर्तमान में भी सोशल मीडिया पर सवाल उठाते हैं, इस माध्यम को बदनाम करते हैं, ताकि लोगो को जागरूक न किया जा सके. एक और कारण है, आजकल टेलीविजन पर समाचार कम देखे जाने लगे है और सोशल मीडिया पर आने वाले सूचना दायक वीडियो ज्यादा देखे जाते हैं, ऐसे में जो मुख्यधारा का मीडिया सूचना को तोड़ता मरोड़ता है तो आम जन को सोशल मीडिया से मिली सूचना से तुलना करके उस मुख्यधारा के मीडिया की सच्चाई पता चल जाती है और लोग देखना कम कर देते हैं, ऐसे में उस मीडिया की TRP प्रभावित होती है.

आज कल कुछ न्यूज़ चैनल, सोशल मीडिया के कुछ संदेशो की सच्चाई, जांच पड़ताल आदि जैसे कार्यक्रम कर बताते हैं कि सोशल मीडिया पर कैसे फेक न्यूज आ रही हैं..... पर वे लोगों को जिन्दा जलाने वाले वीडियों, या महिला पुरुष को भगा भगा के मारने वाले वीडियो की जांच पड़ताल नहीं करते... क्योंकि वे सरकार के इशारों पर काम करते हैं और सरकार की हो सकने वाली बदनामी वाले सो० मि० के संदेशों की जांच नहीं करते.
इससे कहा जा सकता है कहीं तो सोशल मीडिया को दबाने का प्रयास किया जा रहा है. 

इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि सोशल मीडिया का दुरूपयोग भी तेजी से बढ़ा है. इसके लिए आम जन उपयोग करता को आना होगा. हर आने वाले मेसज के बारे में तर्क करना होगा. ताकि दुरूपयोग को रोका जासके. 

आप सोशल मीडिया को दूसरे तरह से भी समझ सकते हैं, जिस समय मुख्यधारा के चैनल विदेश की बातें, पडोसी देश के कारनामे दिखाए जाएँ तो उस समय आप अपना सोशल मीडिया पर आ रहे संदेशों पर ध्यान दें... आपको पता चल जाएगा... न्यूज़ चैनल विदेश की बातें क्यों कर रहे हैं... और सोशल मीडिया क्या बता रहा है. 
सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों को एक बात से सचेत रहना होगा की वे किसी गलत मकसद से आने वाले संदेशो से बचे एवं उस व्यक्ति से तत्काल हट जाएँ या ग्रुप से रिमूव कर दें जो अनैतिक बात कर रहा है, धार्मिक द्वेष फैलाने की कोशिश कर रहा है. समझदारी से लिए गये निर्णय से आप सोशल मीडिया को भी बचा सकते हैं और इसकी छवि को भी. 

सोशल मीडिया पर सवाल उठाना कितना सही ?

जो छात्र छात्राएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं या कर चुके हैं, शिक्षक बनना चाहते हैं या बन चुके हैं, वे हो सके तो अपना अध्ययन शेयर करें, उन्होंने क्या विशेष सीखा जो वे समाज को देना चाहते हैं. 

अभी तमाम लोग सोशल मीडिया से जुड़े हैं, ऐसे में ज्ञानार्जन कर रहे विद्यार्थी अपनी कोई विशेष योगता शेयर कर लोगों को ज्ञान विज्ञान आदि की जानकारी दे सकते हैं. समाज के आधी जनता भी चाहे तो सोशल मीडिया का उच्चतम उपयोग किया जा सकता है. सिर्फ ये कह देना की सोशल मीडिया जहर फैला रहा है... फलां फलां कर रहा है, इससे कुछ नहीं होगा. 

सोशल मेदिय अभी कोरे कागज की तरह होता है. आप उस पर कुछ भी शेयर कर सकते हैं. जैसे एक कलाकार, केनवास पर कुछ भी चित्र उकेर सकता है, जैसे कुम्हार मिट्टी से कोई भी बर्तन बना सकता है, ऐसे भी सोशल मिडिया का उपयोग उपयोगकर्ता कैसे भी कर सकता है... ज्ञान वर्धक जानकारी देकर या फिर जहरीली बातें शेयर करके.... आप माध्यम को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते... माध्यम को उपयोग करने वालो पर सवाल जरूर उठा सकते हैं.

जैसे, युद्ध में बन्दूक से दुश्मन को मारे तो सही लेकिन उसी बन्दूक से किसी अन्य को मार दें तो इसमें बन्दूक पर सवाल नहीं उठा सकते. वह तो सिर्फ एक उपकरण है. बिलकुल इसी तरह से आप सोशल मीडिया पर सवाल नहीं उठा सकते क्योंकि ये एक माध्यम है लोगो से, समूह से जुड़ने का. अब चाहे इसका सही उपयोग किया जाए या गलत. 

रविवार, अप्रैल 12, 2020

"social distancing" शब्द होना चाहिए या "physical distancing"


क्या सच में "social distancing" शब्द होना चाहिए या "physical distancing" covid-19 वायरस ने लोगों के बीच दूरी बना दी है, जिन्दा रहना है तो दूर रहना ही पड़ेगा, सामाजिकता तो वो प्यार मोहब्ब्बत है जो भारत में न कभी खत्म हुयीं न होगी.
हजारों सालों से मनुष्य ने दुनिया पर राज किया और ऐतिहासिक विकास किया है. मनुष्य ने इतना विकास कर लिया है कि कई वैज्ञानिकों ने तो अब ये ढूँढना शुरू कर दिया है की मनुष्य ने अपना विकास आखिर कहाँ से शुरू किया था. खेर ये तो बातें बाद में करेंगे. अब वापस आते हैं टॉपिक पर. किसी भी राष्ट्र में मीडिया के खासी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. और इसका गंभीरता को समझना पड़ेगा.
शुरू में अमेरिका भी कोरोना को मजाक में ले रहा था और चीन पर मजाकिया टिप्पणियां कर रहा था, आज अमेरिका कोरोना से विश्व में सबसे अधिक प्रभावित है.
इस बीच भारत में "सामाजिक दूरी" पर जोर दिया जा रहा है, भारत हजारो वर्षों से बहुत ही सोम्य रहा है, इसका फायदा अक्सर विदेशियों ने उठाया और कई बार भारत को गुलाम बनाने का प्रयास किया. असल में भारत की यही सोम्यता और सहजता उसके लिए शक्ति भी साबित होती है. तमाम कोशिशों के बावजूद लोगों ने समाज से दूरी नहीं बनायी, हाँ शारीरिक दूरी बनायी हुई है क्योंकि कोरोना वायरस 19 को हराना है. हमारे वरिष्ठ चिंतकों को सोचना होगा और अपील भी करनी होगी कि शरीरिक दूरी बनानी है न कि सामाजिक दूरी. सामाजिकता तो मनुष्य के रहन सहन, खान पान, पहनावा, बोल चाल, व्यवहारिक जुड़ाव, विभिन्न परम्पराओं के अनुसार तय होती है, जो फ़िलहाल कोरोना से प्रभावित नहीं है, प्रभावित है तो वो है स्वास्थ्य.
आज भी लोगों का व्यवहार वैसा ही है जैसा कोरोना के फैलने से पहले था... जहर फैलाने वाले कोरोना से पहले भी किसी न किसी विषय को लेकर जहर फैला रहे थे सो आज भी फैला रहे हैं.
अपना ध्यान रखें. सुरक्षित रहें. दूसरों को भी सुरक्षित रखें.

गुरुवार, अप्रैल 02, 2020

देश के हर जिले में हो "जिला पत्रकार अधिकारी"

जैसे हर जिले में हर विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी होता है, अब वैसे ही पत्रकारिता के स्तर को ठीक करने के लिए एक जिले का जिला पत्रकार अधिकारी बनाने की जरूरत है जो सीधे केंद्र का प्रतिनिधित्व करे. जैसे जिला कलेक्ट्रेट, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला आबकारी अधिकारी, जिला स्वास्थ्य अधिकारी, जिला आपूर्ति अधिकारी, जिला विद्युत् अधिकारी आदि, वैसे ही अब जरूरत है कि पत्रकारिता में भी जिला स्तर कर सबसे बड़ा पद का सर्जन किया जाए जो जिला पत्रकार अधिकारी हो, जिसकी जिम्मेवारी प्रेस और मीडिया से संबधित सभी कार्यों की जिम्मेवारी हो.

एक महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस से सम्बंधित यह भी लेना होगा कि प्रेस से संबधित हर क्षेत्र में सरकारी/प्राइवेट नौकरियों कासृजन किया जाए. देश सभी जिलों में जिला प्रत्रकार हो. इसकी जिम्मेवारी होगी की यह जिले से प्रकाशित हर खबर पर नजर रखे और यदि कोई पत्रकार गलत  खबर लिखता है या अन्धविश्वासी खबर हो तो तत्काल उस पर कार्यवाही कर सके. उसे बर्खास्त कर सके. उसका वेतन रोकना आदि जैसे अधिकार उसे प्राप्त हों.  अभी इस तरह की जिम्मेवारी जिला कलेक्टर के पास है. 

जिले का जिम्मेवार हो 
जब जिले में आपूर्ति सम्बन्धी कोई कमी होती है या शिकायत होती है तो जिले का आपूर्ति विभाग का जिला अधिकारी कार्यवाही करता है, जब किसी स्कूल में कोई घटना घटती है तो उसका जिम्मेवार जिला शिक्षा अधिकारी होता है. ऐसे ही अब जिला पत्रकार अधिकारी होना चाहिए जो जिले के प्रत्येक पत्रकार का और उसकी ख़बरों का जिम्मेवार हो. 

देश के हर जिले के हर विभाग में एक पत्रकार हो 
अब वक़्त आ गया कि जिले में कार्यरत हर विभाग में एक पत्रकार की पोस्ट होनी ही चाहिए. इससे होगा ये तमाम सूचनाओं से संबधित कार्य विभाग का पत्रकार करेगा. अभी होता ये है की बिजली कट गयी तो फ़ोन बिजली विभाग के सीधे अधिकारी को कर देते हैं, जबकि अधिकारी से पास पहले से ही बहुत काम होता है, ये अधिकारी अपना विषय पढ़कर आते हैं, जनसंचार की पढाई करने वाला ही जानता है कि जनता से जन संचार कैसे किया जाए. 

आज कल अधकारियों के प्रति, पुलिस के प्रति, राजनेताओं के प्रति जनता में अराजकता का भाव आ रहा है. यह और कुछ नहीं, सिर्फ और सिर्फ जन संचारकों की कमी की वजह से है. 

मंत्री, सांसद, विधायक को दिया जाए पत्रकार
हर मंत्री, सांसद, विधायक की टीम में सरकारी मीडिया कर्मी होना चाहिए जिसके पास जन संचार की डिग्री हो, जो जनता और जन प्रतिनिधि के बीच में पुल का काम करे. अभी तक यह काम वे लोग करते हैं जो जन संचार को कभी पढ़े भी नहीं होंगे. ऐसे में जन प्रतिनिधि और जनता के बीच जो खायी है उसे भरना बहुत मुश्किल है, जनता अपने जनप्रतिनिधि से मिल नहीं पाती, इस खायी को सिर्फ एक पत्रकार ही भर सकता है. एक विकासशील देश के लिए ऐसी खायी विकास में बड़ी रुकावट की तरह है. 

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग नाकाफी 
हमारे देश में हर जिले में, बाकी तीनो स्तंभों से जुड़े अधिकारी/प्रतिनिधि मिलते हैं लेकिन, विभागों में पत्रकार नहीं मिलते. हालाँकि जिले में जनसंपर्क विभाग होता है, जिसे देश की 3 तिहाई आबादी जानती तक नहीं. और बाकी विभागों में जनसंपर्क विभाग वह व्यक्ति संभालता है जिसने कभी जन संपर्क नहीं पढ़ा होता. रेलवे, बस अड्डे में जाइये और उनके बात करने का लहजा देखिये और उसे रिकॉर्ड करके लोगों को सुनाइए और चर्चा कीजिये. अस्पतालों में भी जनसंपर्क का काम कोई डॉक्टर ही देखता है. ऐसे में प्रेस की गंभीरता को समझना चाहिए. हालांकि कई जगह अब एक पोस्ट के लिए पत्रकारिता में डिग्री मांगने लगे है, लेकिन ये क्षद्म स्तर पर ही है. 

प्रेस/मिडिया में भर्ती के समय नहीं होती मानसिक परीक्षा
जब आई0आई0टी0, आई0आई0एम० या छोटे संस्थानों से भी कोई प्लेसमेंट होता है तो उनका फिटनेस सर्टिफिकेट भी माँगा जाता है. लेकिन अख़बारों और मीडिया में ऐसा देखने को नहीं मिलता. जबकि प्रेस/मीडिया में जिसे नौकरी दी जा रही है उसका मानसिक संतुलन अवश्य चेक करना चाहिए. हमारे देश की जनसँख्या 1,30,00,00,000 से भी ज्यादा है, ऐसे में यहाँ के पत्रकारों की मानसिक स्थिति कैसी है इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए.  क्योंकि इसका सीध असर देश पर ही पड़ता है.

समय समय पर हो पत्रकारों की काउन्सलिंग 
आपने सुना होगा समय समय पर अधिकारीयों के लिए कार्यशाला आयोजित की जाती है, जिसमें उन्हें उनके काम के दवाब के साथ कैसे समायोजन करना है, अपना ध्यान रखना है आदि सिखाया जाता है. लेकिन पत्रकारिता में ऐसा शायद ही कहीं होता हो. अभी हाल ही में दलित दस्तक के सम्पादक ने भरत रत्न बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर के प्रथम अख़बार "मूकनायक" एक 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजन किया था, जिसमे देश भर के पत्रकार, समाज चिंतक आदि को आमंत्रित किया गया था, जिसमें पत्रकारिता से सम्बंधित चर्चा भी हुयी. कई राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय अखबार समय समय पर कार्यक्रम आयोजित करती है जिसमें आम जनता की भी सहभागिता होती है लेकिन, देखा जाए तो विशेष तौर पर सिर्फ पत्रकारों से सम्बंधित कोई विशेष कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाता जिसमें उनके स्वास्थ्य सम्बन्धी, मानसिक या किसी भी प्रकार की काउंसलिंग नहीं की जाती. सवा सौ करोड़ की जनता के लिए विभिन्न राज्यों में विभिन्न अखबार प्रकाशित न्यूज़ चैनल प्रसारित किये जा रहे हैं, लेकिन उनके लिए काम करने वालो की परिस्थितियों पर किसी प्रकार की चर्चा नहीं होती.

पत्रकार अब समाजसेवी नहीं एक पद है. 
ऐसा इसलिए है कि अभी तक पत्रकार को समाज सेवी समझा जा रहा है, लेकिन भारत के वैश्विक होने के बाद अब ऐसा नहीं रहा. पत्रकार भी किसी न किसी संसथान से जुड़ा होता है, जिसमें किसी कंपनी की तरह के ही नियम लागू होते हैं. जैसे एक कर्मचारी एक कंपनी में काम करता है तो वह दूसरी कंपनी में काम नहीं कर सकता. दोहरी आमदनी का काम नहीं करेगा. कंपनी में किये जाने वाले काम की जानकारी सार्वजनिक नहीं करेगा आदि. इसी तरह से पत्रकार पर भी कुछ नियम लागू होते हैं, वह अपने संस्थान के लिए लिखी खबर को अन्य अखबार को न देगा, न बेचेगा. दो अखबारों में काम नहीं कर सकता. पत्रकारिता की नौकरी के साथ कोई अन्य काम नहीं कर सकता. टैक्स के दायरे में आएगा.
अब जबकि एक पत्रकार कानूनी नियमों का पालन कर रहा है तो उसे समाज सेवी नहीं समझना चाहिए. उसकी एक पोस्ट होती है, उसका भी प्रोमोशन होता है, यदि कोई समाज सेवी है तो वह आजीवन समाज सेवी ही रहेगा. समाजसेवियों का कोई प्रोमोशन नहीं होता. तमाम तर्क यह सिद्ध करते हैं की पत्रकार को समाज सेवी नहीं मन जाना चाहिए, वह एक व्यावसायिक नौकरी (प्रोफेशनल जॉब) है, जिसमें काम के बदले निर्धारित आय प्राप्त होती है. पत्रकार के पास अपे संस्थान का पहचान पत्र (आई0डी0) होता है, जैसे अन्य कंपनी अपने कर्मचारी को देती हैं. वह भी टैक्स भरता है.

पत्रकरों की भी लिखी जानी चाहिए CR 
जिस तरह से तमाम अधिकारियों की CR (चरित्र रजिस्टर) लिखी जाती है, बिल्कुल वैसे ही पत्रकारों की CR लिखी जानी चाहिए, इससे उनमें डर बना रहेगा कि गलत खबर दिखाने पर उनके चरित्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा. एक दो अख़बारों को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई अख़बार गलती प्रकाशित हो जाने पर माफ़ी मांगता है.
जिस देश में धार्मिक कट्टरता, पाखण्डवाद, सैकड़ों जातियां, अन्धविश्वास जैसी चीजों से जड़ें जमा रखी हों, वहां एक छोटी सी गलती नरसंहार, दंगे, झगड़े-फसाद, जातिगत हिंसा आदि करवा देती है, जिसके कई उदहारण हमारे सामने हैं.  ऐसे में पत्रकारिता की जिम्मेवारी बहुत ही गंभीर हो जाती है.

नये प्रेस आयोग की हो स्थापना 
भारत की आज़ादी के कुछ समय बाद 1952 में प्रेस आयोग की स्थापना की गयी थी, फिर 1978 में, जिसे दोबारा गठित किया 1980 में. ऐसे में 40 साल हो रहे हैं.
इन चालीस सालों में 2 पीढ़ी जवान हो गयीं हैं, टीवी रंगीन हो गये हैं, अख़बारों के पन्ने बढ़ गये, छपाई की गुणवत्ता बेहतर हो गयी, रेडियो में एफ0एम0 भी जुड़ गया, तकनीकी जबर्दस्त तरीके से फैली. हर काम कंप्यूटर से होए लगे. मोबाइल के रूप में दुनिया मुट्ठी में आ गयी. भारत खुली अर्थव्यवस्था बन गया.
इतना सब कुछ बदल जाने के बाद अब नये प्रेस आयोग का गठन होना जरूरी हो गया है. जीवन का तरीका बदला है, नजरिया बदला है, पहनावा, खान पान, व्यवहार आदि में भी परिवर्तन है ऐसे में पत्रकारिता भी बदली है.
इस बदली पत्रकारिता के लिए नये आयोग को आना चाहिए और नये ज़माने और लगातार परिवर्तित होती तकनीकी के अनुसार नियमन कर करना चाहिए.



सोमवार, मार्च 30, 2020

पत्रकारिता को 10वीं 12वीं में क्यों पढ़ाया जाय

संविधान के चार स्तम्भ हैं और माध्यमिक और उच्च माध्यमिक में सिर्फ 3 स्तंभों (न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका) बारे में कुछ न कुछ पढ़ाया ही जाता है, लेकिन जब बात आती है चौथे स्तम्भ  पत्रकारिता की तो इसकी तरफ कोई ध्यान नहीं जाता, जबकि चौथा स्तम्भ असीम संभावनाओं का भण्डार है.

जबकि होना ये चाहिए कि देश में सबसे अधिक पढाई और सजगता इस स्तम्भ के प्रति होनी चाहिए. प्रेस को फ्री कर देने से इसका नाजायज फायदा भी उठाया जाता है जो आजादी के बाद से होता आ रहा है. सर्वाधिक विविधता प्रेस के पाठ्यक्रम को लेकर होनी चाहिए. प्रेस की पढाई माध्यमिक से जरूर शुरू कर देनी चाहिए. उच्च माध्यमिक में और विविधता के साथ पढ़ाया जाना चाहिए, विषय के रूप में पढ़ाये तो और अच्छे निष्कर्ष आयेंगे.
चूँकि, प्रेस की पढ़ाई स्नातक से होती है तो ऐसे में प्रेस के पाठ्यक्रम से जुड़ाव जल्दी नहीं होता, प्रेस का पाठ्यक्रम भी बहुत छोटा और दूसरे विषयों से लिए उधार पर टिका होता है, ऐसे में प्रेस की जो गंभीरता आनी चाहिए वह आ नहीं पाती.
करोड़ों की जनसँख्या वाले भारत देश में प्रेस/मीडिया में अन्धविश्वास या आध्यात्म ज्यादा दिखाई देता है और विज्ञानं की कमी देखी जाती है. आज भी भारत में तमाम न्यूज़ चैनल ऐसे हैं जो भविष्य फल, धार्मिक स्थलों का रहस्य, धार्मिक प्रवचन आदि दिखाते हैं, जबकि उतनी मात्रा में संविधान या क़ानून की जानकारी या विज्ञान या तकनीकी की जानकारी वाली सामग्री नहीं होती. 

असल में इस तरह की कमी उनकी सोच और नजरिये की वजह से है, उनकी पत्रकारिता की पढाई या फिर प्रेस के प्रति जिम्मेदारी का अहसास उनके पाठ्यक्रम में कराया ही नहीं गया. प्रेस को बहुत ही छोटा मान लिया गया. देश के किसी पाठ्यक्रम को इस तरह नहीं बनाया गया जिससे प्रेस और संचार क्षमता की गंभीरता और उसके प्रतिफल को समझा सके. 

लगभग सभी संस्थानों को सिर्फ और सिर्फ अपना पाठ्यक्रम पूरा करके नौकरी दिलवानी है ताकि "कैम्पस प्लेसमेंट" दिखाकर और बच्चों को प्रवेश के लिए ललचा सकें. 

पत्रकारिता किसी भी देश की रीढ़ होती है. यदि संचार गलत किया गया, तो देश की विचारधारा भी वैसी ही बनेगी. किसी राष्ट्र का विकास वहां मौजूद पत्रकारिता (प्रेस/मीडिया) की कार्पयप्ररणाली पर निर्भर करता है.  

गंभीरता से लिया जाए तो प्रेस की पढ़ाई माध्यमिक स्तर से ही शुरू कर देनी चाहिए. छात्र जितना जागरूक होंगे, उतना ही प्रेस को निखारा जा सकेगा. जुझारू छात्र इस ओर आएंगे और प्रेस की भी यही मांग होती है. 



शनिवार, मार्च 21, 2020

कोरोना वायरस और फ्रंट पेज के विज्ञापन


जिस देश में कोरोना वायरस की वजह से प्रतियोगी परीक्षाएं रद्द कर दीं हों, चहरे के मास्क और सेनाटाजर आउट ऑफ़ स्टॉक चल रहे हों, मंदिर बंद, मस्जिद बंद, चर्च बंद, गुरूद्वारे बंद, रेल यात्री कम, हवाई यात्राएं बंद होने को, 8वीं तक के बच्चों को बिना परीक्षा पास की घोषणा कर दी हो, घर बैठे दफ्तर का काम शुरू हो गया हो, 60 प्रतिशत देश का हिस्सा प्रभावित हो चूका हो, खाने और रहने की जरूरतों का सामान स्टॉक होने लगा हो, जिस देश के  प्रधानमन्त्री लोगों को घरों में रहने की अपील कर दें, जहाँ कोरोना वायरस जांच किट की सन्दिग्ध के मुकाबले कमी हो, जहाँ आये दिन कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हों,....
वहां -
अखबारों के फ्रंट पेज पर भारी ऑफर वाले विज्ञापन आ रहे हैं. प्रेस का आज़ादी की लड़ाई में विशेष योगदान है. एक वक़्त था जब अंग्रेजी सरकार की विशेष नजर अख़बारों पर हुआ करती थी. क्योंकि सबको पता था अख़बार एक धधकते अंगारे की तरह है जो एक कोयले से दूसरे  कोयले में पहुँच कर उसे भी सुलगा देती है. पर आज अखबार पैसा कमाने की मशीन बन गये है. आजकल लगभग हर बड़ा बिसिनेस मैन अख़बार चला रहा है या अखबारों में निवेश कर रहा है. पहले संपादक के निर्णय स्वीकार किये जाते थे. आज़ादी के बाद से इसमें तेजी से परिवर्तन आया और सम्पादक की जगह प्रकाशक महत्वपूर्ण हो गया, अख़बार से अधिक विज्ञापनों पर ध्यान जाने लगा. लाभ के लिए ख़बरों से छेड़छाड़ होने लगी. पैसा कमाने का एक नया नाम सामने आया "पेड न्यूज़". और अब कई तरह से अख़बारों में पैसा कमाया जा रहा है जिसे आप सिद्ध भी नहीं कर पाएंगे.
मैंने टेलीविजन की बात नहीं की, क्योंकि टीवी पर आने वाली खबरों ने कभी भी लोगों का भरोसा नहीं जीत पाया. विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि टीवी पर आने वाली खबरों से अधिक अखबारों की ख़बरों पर भरोसा किया जाता है. इसीलिए मैं भी सबसे भरोसेमंद जनमाध्यम की बात करूंगा. हालाँकि टीवी न्यूज़ चैनल की बात करें तो विज्ञापनों के मामले में वे भी समान टिप्पणी के लायक हैं. बात कितनी भी गंभीर हो विज्ञापन से कोई समझौता नहीं होता. निर्भया के दोषियों को मिली फांसी की खबर के बीच में भी ब्रेक लिया जा रहा है. कोरोना से लोग किन किन राज्यों में प्रभावित हो रहे हैं ये भी ब्रेक के बाद बताया जायेगा. जब देश में वायरस को लेकर विषम परिस्थितियां बनती दिख रही हो तो न्यूज़ चैनलों का ऐसा व्यवहार विकासशील देश के लिए शोभा नहीं देता. 
भारत में आजादी के बाद से आज तक किसी सम्पादक को फांसी नहीं दी गयी. हजारों छोटे-बड़े अख़बार-पत्रिकाएँ निकलती हैं. उन्हें नियंत्रित और उन पर निगाह रखने के लिए प्रेस काउंसिल भी है, लेकिन आज तक किसी सम्पादक को फांसी या उम्र कैद जैसी सजा नहीं मिली, इसका मतलब ये माना जा सकता है कि किसी भी सम्पादक ने कोई बड़ा अपराध नहीं किया है.
अब वापस आते है कोरोना वायरस पर. देश में इस बीमारी को लेकर लोगों में बेचैनी बढ़ रही है, आये दिन लोग इस वायरस से प्रभावित हो रहे हैं, और अब तो मरने वालों की संख्या भी बढ़ रही है. इसी बीच अफवाह फैला कर विक्रेता वस्तुओं की कीमत बढ़ाकर बेंच रहे हैं. हालाँकि भारत में अफवाह फैलाकर पैसा कमाने की पुरानी रीति रही है, लेकिन अब हफ्ते दो हफ्ते में कुछ न कुछ अफवाह फ़ैल ही रही है.
इन सब के बीच अखबार या न्यूज़ चैनल अफवाहों पर उचित खबर नहीं बना रहे. कोरोना वायरस के प्रभाव या जांच पर खबरें मिल रही है. जागरूकता को लेकर ख़बरों की भरी कमी है. कोरोना वायरस को लेकर यदि कोई जागरूकता विज्ञापन प्रकाशित या प्रसारित हो भी रहा है तो वह पैसे के बिना नहीं है, जबकि अब फ्री भी जागरूकता विज्ञापन दिए जाए तो भी कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए. 
आज केंद्रीय और राज्य सरकारों को एक होकर काम करना होगा, जोकि फिलहाल नहीं हो रहा है. अभी भी पूर्वोतर राज्य सरकारों के जागरूकता सम्बन्धी विज्ञापन या खबरें देखने को नहीं मिली हैं. केरल में कोरोना के भारी प्रभाव के बावजूद तमिलनाडु, कर्नाटक में जागरूकता अभियान धीमा ही है. 
वक़्त आ गया है संविधान के चारों स्तंभों को एक हो जाने का, बिना किसी लाभ हानि की चिंता किये बगैर देश को समर्पित हो जाने का.
जन नेता, अखबार अक्सर शब्द इस्तेमाल करते हैं, "जनता तो बहुत भोली है". ऐसे में इस भोली भाली जनता को सँभालने का महत्वपूर्ण समय यही है. क्योंकि ये जनता, "जनता कर्फ्यू" पर भी बाहर निकलेगी, मना करने पर भी वही करेगी जो नहीं करना चाहिए, क्यूंकि "जनता तो भोली भाली है".

(20 मार्च की कुछ फोटो)




बुधवार, मार्च 04, 2020

वरिष्ठ पत्रकार विश्वेश्वर शर्मा सर को श्रद्धांजलि

बात उस समय की है, जब मैंने पत्रकारिता की डिग्री हांसिल कर प्रेस में गया था. दुनिया नयी थी और काम भी. राज एक्सप्रेस में पहली नौकरी मिली और उप सम्पादक का पद भी मिला. काम सीखने की रफ़्तार तेज थी, जूनून और डिग्री सर चढ़कर बोल रही थी. उसी दौरान वरिष्ठ पत्रकार विश्वेश्वर शर्मा सर राज एक्सप्रेस में एक स्टेड हेड के पद पर आये और मेरे कैरियर में बदलाव आने शुरू हो गये. शर्मा सर की एक बहुत ख़ास बात ये थी की शीले सर की तरह ये भी उन पत्रकारों पर ध्यान देते थे, जिनमें पत्रकारिता के प्रति समर्पण और विश्वास के साथ लग्न हो. मुझे याद है, जब मैं राज एक्सप्रेस में था, तो "विशु" सर (प्यार से सब उन्हें विशु सर कहते थे) ऑफिस में हर प्रांतीय डेस्क पर जाते थे और ये देखते थे कौन कितनी लग्न से काम कर रहा है. यही वो समय होता था जब वे और शीले सर जांचते थे कि कौन आगे बढ़ाने लायक है. मैं अपने काम को लेकर बहुत सजग था. मेरे रिश्तेदारों में आज भी कोई पत्रकार या पत्रकारिता जगत से नहीं है. मुझे अपने रिश्तेदारों में अपने पर गर्व होता था कि मैंने पत्रकारिता में आकर अपने दादा जी और नाना जी का सपना पूरा किया है. ऐसे में पहली नौकरी राज एक्सप्रेस में मन लगाकर काम करता था.

विशु सर की एक और ख़ास बात थी कि वे पत्रकार को समय समय पर परखते थे. जैसे जब भी कोई इंचार्ज छुट्टी पर चला जाता था तो उसका कार्यभार वे पुराने खिलाड़ी को न देकर नये पत्रकारों को देते थे. ऐसे में यदि वो नया उस जिम्मेदारी में खरा उतरता तो समझो उसका प्रमोशन पक्का. मुझे आज भी याद है, जब एक इंचार्ज छुट्टी पर गये तो मेरे डेस्क इंचार्ज को फ़ोन आया और इंचार्ज ने कहा, "बृजेन्द्र तुम्हें विशु सर ने बुलाया है." मेरा तो दिल ही बैठ गया. क्योंकि स्टेड हेड का फ़ोन आने का मतलब उस समय ये होता था कि अख़बार में गलती छप गयी है, और उप सम्पादक की खटिया खड़ी होने वाली है.

मैं उस समय समझा कि मुझसे कोई गलती हो गयी है और डांट पड़ेगी. कलेजा संभालते हुए उनके केबिन में गया, चेहरे के तोते तो उड़ रखे थे, लेकिन विशु सर की उस प्रतिभा से मैं उस समय परिचित नहीं था, सो जैसे ही मैं उनके कैबिन में गया, विशु सर मुस्कुराए और बोले, "बिजेन (सर मुझे बृजेन्द्र की जगह प्यार से बिजेन कहते थे) आज तू अपकंट्री का चार्ज संभालेगा." मेरा दिल तो जोर से धड़कने लगा. चेहरे पर हलकी मुस्कान और दिल में उमंग जागी. ऐसा लगा जैसे किसी ने छत्रपति साहू जी महाराज की तलवार हाथ में दे दी हो. जीवन में कभी सोचा भी नहीं था, मात्र 1 साल में मुझे किसी डेस्क का इंचार्ज भी बनाया जा सकता है. विशु सर ने एक दो बार और ऐसा किया और मेरी सफलता पर मुझे प्रोमट कर दिया गया और मुझे बनाया दिया डेस्क इंचार्ज. इस पर कई लोगों की भृकुटी तन गयी. उस समय राज एक्सप्रेस का सबसे कम उम्र का डेस्क इंचार्ज बना. ये सिर्फ विशु सर और शीले सर का आशीर्वाद और उनकी परख का नतीजा ही था. ऐसा ही कुछ और "नये चावलों" के साथ किया गया. राज एक्सप्रेस अख़बार को लेकर भी बड़े बदलाव हो रहे थे. अखबार का रंग, फॉण्ट, साइज़ सम्बन्धी भी उसी दौरान बड़े निर्णय लिए जा रहे थे. सर्कुलेशन में बदलाव देखा जाने लगा. अखबार ने प्रसार में जोर पकड़ा तो प्रबंधन ने नये पदों का सृजन किया, जिसे भरने की जिम्मेदारी एडिटोरियल बोर्ड को दी गयी. राज एक्सप्रेस में निकली भर्ती के लिए मुझे भी भर्ती बोर्ड का सदस्य बनाया गया. ये मेरी एक और उपलब्धि थी.

भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के कुछ महीने बाद विशु सर ने एक और मास्टर स्ट्रोक खेला जिसे मैं जिन्दगी में नहीं भूलूंगा. ये मास्टर स्ट्रोक था स्टेड हेड और पूरे डेस्क के बीच की कड़ी का पद.अभी तक सभी इंचार्ज का हेड स्टेड हेड हुआ करता था, लेकिन काम को और आसान बनाने और अच्छे समन्वय (co-ordination) के लिए एक स्टेड कोर्डिनेटर पद सृजित किया गया. उस समय शीले सर राज एक्सप्रेस के ग्रुप हेड थे और विशु सर स्टेट हेड. बड़े पदों के निर्णय, प्रबंधन, विभिन्न हेड, महत्वपूर्ण अधिकारी आदि लेते थे.

ऐसे में स्टेड कोर्डिनेटर के पद को भरने के लिए अख़बार के सभी इंचार्ज की मीटिंग बुलाई गयी, गरमा गर्मी देख पद भरने की तिथि को टाल दिया गया. और कुछ दिन बीतने के बाद विशु सर ने सीधा मास्टर स्ट्रोक खेला और मेरा नाम स्टेड कोर्डिनेटर के पद के लिए प्रस्तावित कर गया.

ऑफिस में खलबली मच गयी. बृजेन्द्र कॉर्डिनेट करेगा. मैं ऑफिस पहुंचा तो कुछ लोग चुपचाप बधाई देने लगे. जैसे जैसे शाम होती गयी माहौल गर्म हो गया. बड़े पदाधिकारी और कई पुराने मझे हुए पत्रकारों ने अपना मत रखा. बहरहाल अंत में इस पद को वापस हटाना पड़ा और ऑफिस के माहौल को ठीक किया गया. वैसे भी मुझे लगता है इतनी बड़ी जिम्मेदारी में संभल नहीं सकता था, क्यूंकि अनुभव की कमी थी. लेकिन जब भी वे दिन याद करता हूँ तो विशु सर और शीले सर की याद आ जाती है.

देश में पत्रकारिता की बात की जाती है तो हमेशा उदहारण उन्हीं पत्रकारों के दिए जाते हैं जिन्होंने अपने समय में संघर्ष किया और कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया. तमाम पत्रकार ऐसे भी रहे जिन्होंने पत्रकारिता को अपना जीवन समर्पित कर दिया और उसका हौवा भी नहीं बनाया और उन्हीं में एक स्वर्गीय विश्वेश्वर शर्मा सर हैं.

विशु सर उन पत्रकारों में रहे जिन्होंने हमेशा जुनूनी लोग ढूँढने में समय बिताया क्योंकि उनका मानना था कि पत्रकारिता कभी भी पैसा कमाने का जरिया नहीं हो सकती. ये शिक्षा की तरह शुद्ध सेवा का क्षेत्र है. लेकिन फिर भी लोग इसमें कमाई का जरिया ढूँढ़ते है जिसकी वजह से सच्ची पत्रकारिता को जिन्दा रहने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ता है.

कल विशु सर की वाल पर उन्हीं की खबर पढ़ी तो कतई यकीन नहीं हुआ, भोपाल होता तो तुरंत उनके घर जाता, लेकिन लखनऊ में होने के कारण फ़ोन करने के अलावा कोई और तरीका नहीं था. जब खबर सच्ची निकली तो दिल कुछ समय के लिए आहें भरने लगा. अपने विश्वविद्यालय भी नहीं गया. पता नहीं क्यों ये सब लिखने का मन कर रहा था तो लिख दिया.

विशु सर ने मुझे पत्रकारिता को जीना सिखाया उनके इस जज्बे को नहीं भूलूंगा. सर आप पंचतत्व में विलीन हो गये तो क्या मेरे दिल में हमेशा जिन्दा रहंगे.

बृजेन्द्र कुमार वर्मा