सीखने के लिए मैंने हर जख्म सींचे हैं, पढ़ना है दर्द मेरा तो सब लिंक नीचे हैं

सोमवार, फ़रवरी 15, 2016

चरण वंदन

बृजेन्द्र कुमार वर्मा 
घोषणा- ये कहानी पूर्णरूप से काल्पनिक है। इसका किसी भी व्यक्ति विशेष या स्थान या किसी संस्थान से कोई भी/किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है। अगर कहीं भी किसी पाठक को ऐसा लगता है तो वह उसकी निजी सोच मात्र होगी और कुछ नहीं। लेखक ने इसी वजह से कि कोई इस कहानी को किसी से जोड़ कर न देखे, कहानी में स्थानों का और संस्थानों का नाम नहीं लिया है। 

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आज सुबह से ही मां गुस्से में थी। एक तो सुबह-सुबह पति के लिए नाश्ता तैयार करना और दूसरे घर काम। घर में सब हैं पर कोई काम के आड़े नहीं आता। पीएच0 डी0 के लिए एडमिशन का एक्जाम होने के बाद तो विक्रम आलसी हो गया था। मां कितना भी कहे पर बस पड़ा रहेगा, लेकिन कोई काम नहीं करता। 
‘हाथी हो गया है, लेकिन पड़़ा रहेगा कोई काम नहीं कर सकता। इतना बड़ा हो गया , कुछ तो घर के काम किया कर’, आज मां नाराज दिख रही थी।
विक्रम सुबह 9 बजे आंखे मलते हुए उठा और भांप गया कि मां आज नाराज लग रही है। इसलिए जल्दी से घर के कामों में लग गया। घर के काम किए फिर अपने बेड पर बैठ गया। सोचा के 11 बजे के बाद कुछ देर पढ़ाई कर ली जाए। पीएच0 डी0 का एक्जाम दिए 20 दिन हो चुके थे। पता नहीं कब परिणाम आएगा। इसी सोच में पढ़ाई में लग गया। 
मां फिर जोर-जोर से बोलने लगी। फोन विक्रम की तरफ फैंकते हुए बोली, ‘ये फोन आ रहा है, बस अब गप्पे हांको और कुछ तो काम नहीं तेरे दोस्तों को भी। आग लगे इस मोबाइल को’। विक्रम ने नज़रें झुकाते हुए चुपके से फोन कान में लगाया और हल्के से बोला। फोन दोस्त का आया था, तेज आवाज में बोला, ‘अबे जल्दी से कम्प्यूटर खोल पीएच0 डी0 का रिजल्ट आ गया है। मेरा और तेरा दोनों का नाम है। 7 दिन बाद इंटरव्यूह है। विक्रम उछल पड़ा। अभी तक मां जोर-जोर से खुशफुसा रही थी। अब विक्रम चिल्लाते हुए किचन में गया और दोपहर का भोजन बना रही मां को गोद में उठा लिया। 
‘अरे क्या कर रहा है नाशमिटे, गिर जाऊंगी मैं’ मां ने संभलते हुए बोला।
‘अरे मां मैं केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पीएच0डी0 की परीक्षा में पास हो गया। एक हफ्ते बाद इंटरव्यूह है और अगर इंटरव्यूह पास हो गया तो में सामाजिक विज्ञान में शोध करूंगा। इस देश के विकास में योगदान मेरा भी होगा। मैं भी भारत सरकार को अपने शोध के माध्यम से सुझाव दूंगा ताकि कमियों को दूर कर हम सशक्त भारत का निर्माण कर सकें।’ 
‘विक्रम के चेहरे पर आए तेज से मां की नाराजगी दूर हो गयी। विक्रम के खिलते चेहरे से मां का चेहरा भी खुशी से भर गया। उसकी आस खाली नहीं जाएगी। रोज बेटे को डांटने का शायद प्रतिफल मिल गया। वो समझ गई मेरी तपस्या सफल होने वाली है। 
मुस्कुराहट में डांटते हुए कहा, ‘तो इसमें कौन सी बड़ी बात है, जब रिसर्चर् बन जाए तो बता दियो’, मां ने अपनी खुशी छुपाते हुए कहा। मां नहीं चाहती थी कि वो सिर्फ इतनी ही खुशी में अपने आगे की तैयारी भूल जाए। अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है। 
‘चल जा यहां से और पढ़ाई कर’, मां ने कहा।
विक्रम अब नए जोश के साथ पढ़ाई में लग गया। सात दिन ज्यादा दूर नहीं थे, तो बीत गए। 
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विक्रम मां के पैर छू कर गया, केन्द्रीय विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विभाग पहुंचा, इंटरव्यूह दिया। एक अच्छी बात ये हुई कि विक्रम का इंटरव्यूह अच्छा हुआ। चेहरे पर निश्चिन्तता का भाव था। 
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ये ही कोई 7 दिन बीते होंगे कि अचानक फोन की घंटी बजी। सभी भोजन कर चुके थे। आज मां शांत थी। इस बार मां के चेहरे पर उत्सुकता का भाव था कि आखिर इतनी रात को किसका फोन आ गया। विक्रम आलसी तो हो ही गया था, शायद इसलिए कहीं भी फोन रख देता था और उसका ध्यान नहीं रखता था। मां ने खुद फोन उसे लाकर दिया कि फोन आ रहा है। विक्रम ने फोन लिया, मां वहीं खड़ी रही और बेटे के चेहरे को देखती रही। बेटे कि अचानक आंखे बड़ी हो गई। हाय राम आखिर क्या सुन लिया बेटे ने, फोन पर बात करते हुए ही बीच में बोला, ‘क्या हुआ बेटा’। बेटा एकदम जोर से चिल्लाया, ‘हुर्रेर्रेर्रेर्रे.....’‘
‘मां मेरा पीएच0डी0 के लिए सेलेक्शन हो गया’, बेटा मां से चिपक के बोला। मां भी खुशी से झूम उठी। पिता भी खबर सुन कर पास आशीर्वाद देने आ गए। अब तो विक्रम के सारे सपने पूरे होंगे। विक्रम सोचने लगा था, वो भी देश की सेवा करेगा। मां भी गर्व महसूस कर रही थी। आज तक खानदान में यहां तक कोई नहीं पहुंच सका। हर कोई दस या बारह जमात तक पढ़ पाया। पहला चिराग है, जिसने 13वीं, 14वीं, 15वीं के बाद 16वीं, 17वीं और यूजीसी का जेआरएफ भी पास किया था। मां समझ चुकी थी अब बेटे को पंख लग गए हैं। देश के लिए अब वह एक से बढ़कर एक नई ऊंचाईयां नापेगा। वो सिर्फ मां का आंचल ही नहीं रोशन करेगा, बल्कि देश को नया आयाम देगा विकास करने में। उसका रिसर्च भी समाज के काम आएगा। 
रात भर विक्रम को नींद नहीं आई। सुबह क्या-क्या करना है। इसी सोच में वो पूरी रात खुली आंख से सपने देखता रहा। मां भी कच्ची नींद ही रही। उसे भी उत्सुकता की वजह से नींद नहीं आई। पिता मुस्कान के साथ सो चुके थे। शायद वो सपने में अपने बच्चे की उपलब्धियों को गिन रहे होंगे।
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सुबह हुई, आज विक्रम जल्दी उठ गया। उसका आलसीपन पता नहीं कहां छूमंतर हो गया। मां खुद हैरान थी, जिसे जगाने के लिए दसियों खरी-खोटी सुनानी पड़ती थी, वो मां को तैयारी करने के सुझाव दे रहा था। कितना परिवर्तन आ गया था विक्रम में सिर्फ एक रात में। सच किसी को नहीं पता होता जिंदगी कब बदल जाएगी। 
विक्रम तैयारी करने लगा। सामान बांधकर आज वह घर से रिसर्च करने जा रहा था। 
‘बेटा तू रहेगा कहां, वहां कमरा कहां मिलेगा..’ मां ने परेशानी महसूस की। पर जब तक मां के चेहरे पर चिंता के भाव आते, विक्रम ने तपाक से उत्तर दिया, ‘विश्वविद्यालय में हॉस्टल के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर दिया था। अब बस वहां जाकर सामान रखना भर है और पढ़ाई में लग जाना था। आप भी मुझे लल्लू समझती हो।’
इतराते हुए कहा, ‘लेकिन मिसेज माताश्री इस विक्रम में बहुत दिमाग है परीक्षा यंू ही पास नहीं की’ मां हंस पड़ी। 
‘चल हट, भग यहां से’ मां ने मुस्कराते हुए कहा। 
विक्रम ने माता-पिता का आशीर्वाद लिया और चल दिया। 
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विश्वविद्यालय बहुत भव्य था। बिल्कुल ऐसे लग रहा था, जैसे पक्षी पहली बार उड़ना सीखकर घौसले से दूर उड़कर जाता है और ऊंचाई से पहुंचकर दुनिया का नजारा देखता है। विक्रम की जिज्ञासाओं को यहीं शांति मिलनी थी। विक्रम ने सामान रखा और मैस में खाना खा के सो गया। सुबह जल्दी उठना था, वो अब आलसी नहीं रहा था। शायद मां रिजल्ट आने के इंतजार को आलसपन समझ बैठी थी। इसीलिए शायद रिजल्ट आने के बाद उसमें आलस नहीं रहा। अब तक विक्रम सो चुका था। 
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सुबह विक्रम जल्दी से तैयार हुआ। नई नोटबुक उठाई और सामाजिक विज्ञान विभाग पहुंचा। अपनी पहचान संबंधी सरकारी औपचारिकताओं के बाद वह विभाग का एक शोधार्थी बन गया। विक्रम यहां नवागंतुक शोधार्थियों से मिला। जल्द ही विक्रम सबसे घुल मिल गया। हालांकि विक्रम किसी से ज्यादा चिपकता नहीं था। बस अपने काम से काम रखता था। न किसी की बुराई करना उसकी आदत थी न चुगली।
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अब विक्रम रोज कक्षाएं लेने लगा। पीएच0डी0 के लिए कोर्स वर्क पूरा करना था। 6 माह तक कक्षाएं चलने लगी थी। शिक्षकों से भी प्रतिदिन किसी न किसी विषय पर बात हो ही जाती थी। ऐसे में विक्रम को लगने लगा था कि अब सपने दूर नहीं थे।
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दो महीने कक्षाएं संचालित होने के बाद एक दिन अचानक दो शिक्षकों को आपस में बहस करते हुए विक्रम ने सुना। एक कोई श्री कुमार थे और एक श्री शर्मा। हालांकि आपसी बहस कुछ सेकंड ही चली। आज विक्रम को सिनॉपसिस जमा करनी थी। माहौल गरम था। आदिल, चेतना और कुनाल भी पहुंच चुके थे जो विक्रम के सहपाठी थे। आज कुछ हुआ था जो विक्रम नहीं समझ पा रहा था। सभी ने अपनी-अपनी सिनॉपसिस जमा की और अन्य कामों में लग गए। विक्रम समझ नहीं पा रहा था कि आखिर इतने पढ़े-लिखे लोग आपस में झगड़ क्यों रहे थे। क्यों इतना पढ़ लिख जाने के बाद भी हम अपने मस्तिष्क का इतना भी विकास नहीं कर पाते कि हम यह तय कर सकें कि आखिर हमें क्या करना शोभा देता है और क्या करना नहीं। 
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कुछ ही दिनों में प्री पीएच0 डी0 की परीक्षा होनी थी। जो दोस्त बने थे उनका स्वभाव भी बदलने लगा था। पहले विक्रम को यहां अपना परिवार दिखने लगा था, लेकिन कुछ दिनों से जैसे-जैसे परीक्षा पास आ रही थी वैसे-वैसे दोस्ती दूर जाने लगी थी। बातें सभी करते थे। हाल-चाल सभी पूछते थे, लेकिन वो अपना पन नहीं मिल पा रहा था जो पहले मिलता था। क्या बदल रहा था, विक्रम खुद भी नहीं समझ पा रहा था। इन सब को परे हटा विक्रम ने तैयारी करना शुरू कर दी। 
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परीक्षा की तिथि तय हो गई। टाइम टेबल बन गया। सभी परीक्षा के लिए तैयार थे। परीक्षा निर्धारित मापदंडों के अनुसार हुई। विक्रम का पेपर भी अच्छा हुआ। अब बात आगे बढ़नी थी। गाइड दिए जाने थे। डॉ0 कुमार विक्रम के गाइड बने। डॉ0 शर्मा को कुनाल का गाइड चुना गया। और आदिल को डॉ0 राधा और चेतना को डॉ उपाध्याय गाइड के रूप में मिले। अब थीसस लिखना शुरू कर दिया गया था। अब कॉलेज आना कभी कभार ही होता था। क्योंकि आंकड़ों के संकलन के लिए सर्वे करने बाहर जाना पड़ता था। विक्रम भी बाहर जाता था और कभी-कभी कॉलेज आता था। इस दौरान मित्रों से भी मेल-जोल कम होने लगा था। माहौल बदल रहा था। अब मित्र बिना सूचना के विभाग आ जाते और अपने-अपने गाइड और अन्य शिक्षकों से मिलकर चुपके से चले जाते। विक्रम समझ नहीं पा रहा था, कि आखिर 17-18 साल पढ़ लिख जाने के बावजूद लोग कैसा व्यवहार करने लग जाते हैं। जहां सोच खुली और उच्च कोटि की होनी चाहिए वहां ऐसी ओछी हरकतें अच्छी कैसे हो सकती हैं। विक्रम को ये भी आश्चर्य था कि आखिर ऐसी हरकतों को शिक्षक भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकृति दे रहे थे। शिक्षा में अपना जीवन बिता देेने वाले कैसे इन हरकतों को बढ़ावा दे सकते थे। 
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विक्रम की नजर अब शोधार्थियों के व्यवहार पर रहने लगी। जो अपने पिता के प्रतिदिन पैर नहीं छूता था या थी वो सामाजिक विज्ञान विभाग में प्रतिदिन शिक्षकों के पैर छूने लगे थे। इनके कौन-कौन से कारण है, ये नहीं पता चल पा रहा था। इनके उत्तर ढूंढना मुश्किल हो रहा था कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा हे। लग रहा था कि शिक्षकों और छात्रों के समूह बंट रहे थे। विक्रम इस परिस्थितियों से परेशान रहने लगा था। 

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शोध थीसस की रफ्तार बढ़ रही थी। हर कोई अपनी थीसस पूरी करने में जीतोड़ मेहनत करने में लग गए थे। वक्त पास आ रहा था। थीसस पूरी करने के बाद रिपोर्ट जमा करनी थी। कमेटी बनने की भी तैयारी होने लगी थी। विक्रम का काम भी लगभग पूरा हो गया था। सर्वे करते समय कुछ कमजोर हो गया था। चेहरे पर कालापन आ गया था। लेकिन फिर भी काम में लगा रहा। आदिल थोड़ा पीछे चल रहा था। चेतना खुश थी, हालांकि उसका काम पूरा नहीं हुआ था फिर भी उसे कोई परेशानी नहीं हो रही थी। कुनाल तो कभी काम करता हुआ दिखता भी नहीं था फिर भी उसका काम हो रहा था। विक्रम ने कई बार पूछा कि आखिर वो अपने शोध प्रबंध के लिए गंभीर क्यों नहीं है, उसके बावजूद उसे कोई सही उत्तर नहीं मिल पा रहा था। सभी अपने अपने गाइड से खुसफुस करते हुए दिखते हैं। राजनीति होने लगी थी। एक दूसरे की बुराई की जानी लगी थी। विक्रम इस सोच में डूब चुका था कि जो इतनी पढ़ाई करने के बाद और परीक्षा पास करने के बाद यहां तक पहुंचा उसमें कमी क्या हो सकती है? और अगर कमी है भी तो उस पर खुलकर बात क्यों नहीं होती जिससे उस कमी को दूर का सशक्त भारत का निर्माण कर सके। लेकिन सिर्फ चुगली करना ही रह गया था, सुधार कुछ नहीं। विक्रम को ये सब देखकर घुटन होने लगी थी। उसके लिए तय करना मुश्किल हो गया था कि आखिर वो यहां क्या करने आया था और किस झमेले में फंस गया। 
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शोध प्रस्तुतीकरण या मौखिक प्रश्नोत्तरी (वाएवा) के लिए कमेटी बन चुकी थी। इधर शोधार्थियों का शोध प्रबंध भी लगभग पूरा हो चुका था। सभी अपना अपना पीपीटी बना रहे थे। काम में तेजी आ चुकी थी। विक्रम भी अपने काम को जल्द पूरा करने में जुटा था।
समय बीतता चला गया और शोध प्रस्तुतीकरण या मौखिक प्रश्नोत्तरी यानि कि वाएवा का समय आ गया। आज कुनाल का शोध प्रबंध का प्रस्तुतीकरण था। कमेटी बैठ चुकी थी। पीछ की ओर छात्र बैठ गए। कुनाल ने कमेटी के लिए शोध प्रबंध के साथ खाने-पीने का भी प्रबंध किया था। प्रस्तुतीकरण शुरू हुआ। इस दौरान कमेटी आपस में वार्तालाप कर रही थी। इतने में प्रस्तुतीकरण के बीच में ही खाने-पीने की वस्तुएं परोसे जाने लगी। गरम-गरम समोसे, नमकीन, चिप्स और काजू कतली ने शिक्षकों का ध्यान भटका दिया। कुनाल ने मौके का फायदा उठाया और शोध पर बने पीपीटी की कई स्लाइड तेजी से आगे कर दिए। जब तक खाने से ध्यान वापस आता तब तक कुनाल मैथ्डोलॉजी की स्लाइड पार कर चुका था। कुनाल काफी चालाक और व्यवस्था को समझने वाला था। ऐसे में लाभ लेना आसानी से जानता था। इतना ही नहीं बे मतलब सुबह-शाम पैर छूना, कुछ न कुछ गिफ्ट लाना आदि लगा ही रहता था। शिक्षकों की झूठी तारिफ, झूठी खुशी जाहिर करने में माहिर था। ऐसे में शिक्षक उससे काफी खुश रहते थे। आज शोध प्रबंध प्रस्तुतीकरण में इसका प्रत्यक्ष लाभ उसे दिख रहा था। क्योंकि ज्यादातर का ध्यान खाने पर था और कुछ अगर पीपीटी की तरफ देखकर कमियां पता भी लगा रहे थे तो वे माफ कर रहे थे क्योंकि इस वजह से कि वह मित्र शिक्षक का शिष्य है। ऐसे में पिछले 3 साल की मेहनत रंग लाई। पर ये मेहनत शोध प्रबंध को बनाने वाली नहीं थी। यह मेहनत चापलूसी की थी। विक्रम को ये देखकर काफी बुरा लगा कि आखिर हो क्या रहा है। शोध की अगर कमियों को दूर नहीं किया गया तो ये शोध, एक शोध न रहकर शिक्षक बनने की योग्यता या जरिया मात्र रह जाएगा। कुनाल के शिक्षक बन जाने के बाद ये शोध कबाड़ मात्र के अलावा कुछ नहीं रहेगा क्योंकि खामियों से भरे इस पुलिंदे से समाज का कभी लाभ नहीं किया जा सकता। कुनाल का प्रस्तुतीकरण खत्म हो चुका था। हालांकि इस दौरान डॉ0 कुमार ने भरकस कोशिश की कि कुनाल को शोध में तब तक पास नहीं किया जाए जब तक उसकी शोध की कमियों को दूर नहीं कर लिया जाता। परंतु सहायक शिक्षक की विभागाध्यक्ष के आगे एक न चली। क्योंकि बाहर के मेहमान विभागाध्यक्ष के जान-पहचान के थे। ऐसे में अतिथि परीक्षकों ने विभागाध्यक्ष का ही पक्ष लिया और विभागाध्यक्ष के प्रिय शिष्य को पास कर दिया अर्थात उसके शोध प्रबंध को पीएच0डी0 उपाधि हेतु संतुति दे दी। सभी वहां से कुनाल को बधाई देते हुए चले गए। टेबल पर कुछ बर्फी के टुकड़े और चिप्स शेष रह गए, जिसे बाद में चपरासियों ने निपटा दिया। हालांकि समोसे सब खत्म हो चुके थे। 
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विक्रम ये सब प्रकरण देख रहा था। अब उसे घुटन महसूस होने लगी थी। जिन सपनों को लेकर अपने घर से आया था, वो अब टूट रहे थे। विक्रम को अब समझ आने लगा था, ‘हमारे देश में हजारों शोध हुए हैं फिर भी हम देश को गरीबी से नहीं निकाल पाए। समुचित विकास नहीं कर सके। गरीबी-अमीरी के बीच की खाई को कम करने के बजाए बढ़ा दिया। शायद शोध उपाधि बांटने का यही सिलसिला रहा होगा, जिस वजह से यूजीसी को उपाधि हेतु नई गाइड लाइन बनानी पड़ी। लेकिन कोई बात नहीं सरकार को आज भी विश्वास है कि मेरे जैसे मेहनतकश छात्र भी हैं जो मेहनत से शोध करते हैं और इस देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। जैसे मैं करना चाहता हूं। कोई बात नहीं अगर एक-आध ऐसे हो भी जाते हैं तो क्या हुआ मैं इस देश के लिए करूंगा।’
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एक के बाद एक का वाइवा हुआ। चेतना को नारीसशक्तिकरण का फायदा मिला क्योंकि किसी प्रश्न का जवाब नहीं दे पाती थी तो प्रश्न पूछने वाला परीक्षक ही स्वयं उत्तर दे देता था। बहरहाल उसे भी शोध उपाधि हेतु संतुति मिल गई। विक्रम में अब चिढ़न भावना आने लगी। उसे शोध में प्रवेश लेना एक भूल लगने लगा। इससे तो अच्छा जब शिक्षक ही बनना था तो प्राथमिक विद्यालय का ही शिक्षक बन जाता। कम से कम वहां न इतनी राजनीति होती है और न ही चुगलखोरी। विक्रम का ध्यान अब पढ़ाई से हटने लगा था। किसी राजनीतिक संगठन से जुड़ गया था, जो विकास और समानता की बात करते थे। इतना सब होते हुए भी वो अपने मूल उद्देश्य से नहीं भटका। और पीपीटी तैयार कर लिया। अब बस प्रस्तुत करना रह गया था।
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आखिरकार वो दिन आ ही गया, जिस दिन का विक्रम को बेसब्री से इंतजार था। समाज को कई महीने से समझ रहा था। रिसर्च करके किसी समस्या के समाधान को प्रस्तुत करना था। आज उसे फक्र महसूस हो रहा था कि वो किसी समस्या का समाधान सामने रखेगा। उसकी तारीफ होगी। लोग तालियां बजाएगे। पसीना बहाके आंकड़ों का संकलन जो किया था। रात-दिन लगा रहा उनका विश्लेषण करने में। बहरहाल आज वह इस देश को कुछ देना चाह रहा था। बस तैयारी पूरी है। अब उसे अपने शोध प्रबंध का प्रस्तुतीकरण देना है। विक्रम तैयार था। घर से तैयार होकर निकला। विभाग पहुंचा और प्रस्तुतीकरण के लिए कमेटी के आने का इंतेजार करने लगा। विक्रम ने परीक्षकों के लिए खाने-पीने का इंतेजाम नहीं किया था। उसे लगा मैं यहां शोध प्रस्तुत करने आया हूं। शिक्षकों को नमकीन बिस्कुट क्यों खिलाना। शायद वे बुरा भी तो मान सकते हैं। हजारों रुपये महिना लेने वाले शिक्षकों को ये सब अच्छा थोड़े ही लगेगा। विक्रम ने कुछ नहीं खाने-पीने की वस्तुएं नहीं खरीदी। विभाग में गाइड के पहुंचते ही विक्रम ने अभिवादन किया।
‘अरे विक्रम उनके स्वागत का प्रबंध किया कुछ किया या नहीं?’, गाइड ने जल्दी-जल्दी कामों को करते हुए पूछा।
विक्रम हकपकाया और बोला, ‘सर किस प्रकार का स्वागत। मैं तो खड़ा ही हूं उनके स्वागत में।’
‘मतलब?’, गाइड ने अचरज महसूस करते हुए पूछा। 
‘मतलब ये कि मैं तैयार दरवाजे पर खड़ा हूं उनके स्वागत में। जैसे ही वे आएंगे मैं उनको प्रणाम करके बैठने के स्थान पर ले जाऊंगा।’, विक्रम ने उत्तर दिया।
गाइड ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, ‘अरे उनके लिए कुछ नाश्ता पानी या होटल में ले जाकर लंच या डिनर का इंतेजाम तो कर लेते। और कहीं घुमाने के लिए कार बुक कर लेते ताकि उन्हें घुमाया जा सके। इससे वे खुश रहेंगे। और इसका असर ये होगा कि शोध में वो ज्यादा न नुकुर नहीं करेंगे। ’
विक्रम हंस पड़ा और स्वाभिमान से कहा, ‘सर आप परेशान मत होइए, मैंने शोध कार्य इतन शिद्दत से बनाया है कि उन्हें इस शोध को समझकर ही मजा आ जाएगा। गाइड ने नाखुशी का सर हिलाया और अन्य कामों के लिए चले गए। 
विक्रम उन बातों पर ध्यान नहीं दे पा रहा था। जिसे गाइड अप्रत्यक्ष रूप से इशारा करके समझाना चाह रहे थे। जिस व्यवस्था को विक्रम अपने सपनों में देखा करता था, शायद सच्चाई उससे परे थी। लेकिन विक्रम इन्हें शायद स्वीकार नहीं कर पा रहा था। उसे हर बात पता थी। पिछले 3 साल से यही देख रहा था। समझने भी लगा था। पर बस स्वीकार करने को तैयार नहीं हो पा रहा था। 
कमेटी भी आ गई। विक्रम ने बड़ी आदर भाव से कमेटी का स्वागत किया। सभी के चेहरों पर अनजानी सी मुस्कान थी। लग रहा था मानो मजबूरन हंसना पड़ रहा हो। पर विक्रम के चेहरे पर भी तेज था। सिर्फ श्री शर्मा ही थे जिनकी मुस्कान कुटिल थी। कुछ तो अजीब लगा रहा था। लेकिन क्योंकि आज गाइड श्री कुमार भी दबाव महसूस कर रहे थे। काम कुछ कर रहे थे और दिमाग कहीं ओर था। विक्रम का इस पर ध्यान गया था। फिर भी विक्रम ने टालते हुए आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी। 
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कार्यक्रम शुरू हो गया। शोध परीक्षकों ने अपनी जगह ग्रहण कर ली। श्री कुमार भी कमेटी में थे और श्री शर्मा भी। चूंकि श्री शर्मा विभागाध्यक्ष थे। ऐसे में शोध परीक्षक उनकी जानकारी के ही आए या ये कहा जाए कि उन्होंने अपनी मर्जी के ही जानकार बुलाए। शायद सबओर ऐसा ही होता होगा तो यहां कोई नई बात नहीं होगी। इसी वजह से श्री कुमार अपने शिष्य को लेकर परेशान थे। पर विक्रम भी किसी एकलव्य से कम नहीं था। जिसे ठान लिया उसे करके दिखाने की क्षमता रखता था फिर चाहे गुरू साथ दे अथवा न दे। बेवजह की बातों को भूलकर विक्रम मंच पर आया। स्वाभिमानी आवाज में सभी का अभिवादन किया। बाहर से आए कमेटी के अध्यक्ष ने शोध प्रबंध प्रस्तुत करने की आज्ञा दी और कार्यक्रम शुरू हो गया। 
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विक्रम ने विश्वविद्यालय में प्रवेश से बात शुरू की ओर शोध विषय की जानकारी दी। शोध की प्रस्तावना बताना शुरू किया। प्रस्तावना के बारे में चंद बाते ही बताई होंगी। इतने में एक परीक्षक का ध्यान खाली टेबल पर गया जहां विक्रम को नंबर देने के लिए मूल्यांकन पत्र के अलावा कुछ नहीं था। परीक्षक ने विक्रम द्वारा दी जाने वाली जानकारियों और प्रोजेक्टर पर चल रहे पृष्ठों से ध्यान हटा विभागाध्यक्ष श्री शर्मा से इशारे में नाश्ते-पानी के लिए पूछा। श्री शर्मा ने इस बार फिर कुटिल मुस्कान दी। इस बीच अन्य परीक्षकों का भी ध्यान इस ओर गया। श्री कुमार ये सब समझ चुके थे कि क्या पूछा जा रहा है। विक्रम ने शोध की परिकल्पना बताना शुरू किया। श्री शर्मा इसी बीच किसी बात पर हंस पड़े। लगा जैसे परिकल्पना में विक्रम ने बहुत बड़ी गलती कर दी हो। परीक्षकों ने विक्रम की बेवजह खिंचाई कर दी। 
‘अरे ये कैसी परिकल्पना है.....?’, अचानक दाएं बैठे एक परीक्षक ने पूछा। विक्रम समझ नहीं पाया कि क्या पूछा जा रहा है।
परीक्षक ने झल्ला के पूछा, ‘समझ नहीं आया क्या? अरे परिकल्पना जानते भी हो तुम? विक्रम ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘हां सर। बड़े अच्छे से जानता हूं। परिकल्पना किसी शोध समस्या के हल का कल्पित उत्तर होता है।’
इससे पहले कि विक्रम अपनी बात पूरी करता, बाएं बैठे एक अन्य परीक्षक ने पूछ लिया, ‘ओह, ऐसा क्या, तो जरा बताओ कितने प्रकार की परिकल्पना होती है? 
विक्रम ने बताना शुरू किया, ‘जी सर परिकल्पना कथन आधार पर तीन प्रकार की होती है। पहला सकारात्मक कथन, दूसरा, नकारात्मक कथन और तीसरा शून्य.....’ 
इससे पहले कि विक्रम अपनी बात पूरी करता। बात को काटते हुए श्री शर्मा ने राजनीतिक तरीके से कहा, ‘अरे बेटा वो ये पूछ रहे हैं कि तुमने कौन से प्रकार की परिकल्पना को लिया है? 
विक्रम ने बोलना चाहा, ‘सर मैंने इसमें....’ विक्रम की फिर बात काट दी गई। 
बीच में बैठकर अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर ने कहा, ‘चलो हटाओ.... तुम ये क्लीयर नहीं कर पाए। आगे बताओ’। 
विक्रम ने कहा, ‘सर मैं बिल्कुल क्लियर कर दूंगा। सर मैं ये कहना चाह रहा था कि.....’
‘अच्छा! तुम मेरी बात काट रहे हो?’, अध्यक्ष महोदय ने आश्चर्य प्रकट किया। 
विक्रम के चेहरे की चमक उड़ने लगी थी। बेवजह उसे परेशान किया जाने लगा था। डॉ0 कुमार समझ चुके थे कि अकसर डॉ0 शर्मा के साथ हुई झड़प का बदला उससे न लेकर उसके शिष्य से लिया जा रहा है। उन्हें बहुत पहले से ऐसा आभासा था। क्योंकि विक्रम से विभागाध्यक्ष डॉ0 शर्मा कई महिनों से दूरियां बनाने लगे थे। क्योंकि विक्रम डॉ0 कुमार का बहुत सम्मान करता था अन्य शिक्षकों जैसा। उसके अंदर किसी प्रकार का मेल या द्वैष नहीं था। उसका दिल साफ था। वह एक अच्छा छात्र है। देश को ऐसे कर्मयोगी छात्रों की आवश्यकता है। डॉ0 कुमार ने सोच लिया कि अब उन्हें हस्तक्षेप करना पड़ेगा। अगर नहीं किया तो विक्रम का भविष्य बर्बाद भी हो सकता है। नहीं तो कम से कम तीन साल तो बर्बाद हो ही जाएंगे। 
विक्रम ने अपना शोध प्रबंध आगे पढ़ना शुरू किया। इस बार उसे न्यादर्श पर घेरने की कोशिश की गई। ऐसा लग रहा था कि विक्रम को परेशान करने की रणनीति पहले ही तय हो चुकी थी। बार-बार टोकने की वजह से विक्रम परेशान होने लगा था। 
‘अच्छा बेटा ये बताओ ये टेप्पेट कौन थे?, दाएं बैठे परीक्षक ने सवाल किया।
विक्रम ने हल्की आवाज में जवाब दिया, ‘सर में टिप्पेट जी के बारे में ज्यादा तो नहीं जानता पर हां इतना जरूर जानता हॅंू कि इन्होंने रेनडम सेम्पलिंग का एक नया तरीका बताया था’
दाएं बैठे परीक्षक ने मुंह बनाकर कहा, ‘अरे तुम्हें ये ही नहीं पता, उफ्फ अब क्या कहा जाए।
अध्यक्ष महोदय ने नाटकीय ढंग से विक्रम का पक्ष रखते हुए कहा, ‘चलो कोई बात नहीं, अगर नहीं पता तो कुछ और पूछ लो... अच्छा बेटा ये बताओ स्तरीकृत निदर्शन और गुच्छ निदर्शन में क्या अंतर है? 
विक्रम को ये गुच्छ निदर्शन के बारे में अच्छी जानकारी थी। लेकिन स्तरीकृत के बारे में वो थोड़ा भूल चुका था। उसे ये भी नहीं पता था कि स्तरीकृत निदर्शन दो प्रकार का होता है। फिर भी विक्रम ने बताना शुरू किया कि गुच्छ क्या होता है।
‘अरे बेटा तुम समझे नहीं मैंने अंतर पूछा है, न कि इनकी परिभाषा’। अध्यक्ष महोदय ने बड़ी चतुराई से विक्रम को फंसा दिया था। 
विक्रम का गला सूखने लगा था। इसी बीच डॉ0 कुमार ने बचाव करते हुए कहा, ‘असल में सर विक्रम ने कोटा निदर्शन विधि का प्रयोग किया है। तो आप उस बारे में पूछेंगे तो ये जरूर बता देगा।’
‘तो हमें क्यों बुलाया, आप स्वयं ही पूछ लेते कुछ भी’, बाएं बैठे परीक्षक ने काफी नाराजगी के साथ प्रतिक्रया दी। इधर डॉ0 शर्मा मुस्करा रहे थे। जैसे उनका कोई उद्देश्य पूरा हो गया हो। 
‘अरे कुमार साहब ये तो सबसे सरल सवाल हैं, छात्रों को पता रहना चाहिए।’, बड़ी चतुराई से डॉ0 शर्मा ने अपनी चाल चली और दया भावना के साथ विक्रम से कहा अच्छा बेटा तुम्हें जो पता हो निदर्शन के बारे में वही बता दो।’
विभागाध्यक्ष की इस तरह की टिप्पणी से विक्रम हताश हो गया। उसे जो याद था वो भी भूलने लगा। वो निराश होने लगा। डॉ0 कुमार भी आज असहाय से लगने लगे। उनकी बेचैनी उनके चेहरे पर झलकने लगी। 
‘यार तुम्हें निदर्शन के बारे में भी सही से पता नहीं है और परिकल्पना भी सही से नहीं बता पाए। तुम तीन साल से कर क्या रहे थे?’ 
अब विक्रम का बात करने का लहजा बदल गया, ‘सर निदर्शन के दो प्रकार होते हैं, एक संभाव्यता और दूसरा असंभाव्यता। संभाव्यता के कई प्रकार हैं। दैव निदर्शन, स्तरीकृत निदर्शन, बहुस्तरीय निदर्शन, व्यवस्थित निदर्शन, गुच्छ निदर्शन और इतना ही नहीं। दैव निदर्शन भी कई प्रकार के हैं। जैसे - लॉटरी विधि, कार्ड विधि, नियमित अंकन, अनियमित अंकन, रेण्डम नम्बर या टेप्पेट, जिसे आप थोड़ी देर पहले मुझसे पूछ रहे थे, और ग्रिड विधि। सर और भी होते हैं। इसी प्रकार असंभाव्यता के भी प्रकार हैं सर, इसमें उद्देश्यपूर्ण निदर्शन, आकस्मिक निदर्शन और अभ्यंश निदर्शन।’ 
‘सर पता तो काफी है, बस स्तरीकृत को भूल रहा हूं। मैं यही भी जानता हूं सर कि स्तरीकृत भी दो प्रकार के होते हैं। एक होता है समानुपातिक स्तरीकृत निदर्शन और दूसरा असमानुपातिक स्तरीकृत निदर्शन, पर सर मैं स्तरीकृत से न्यादर्श चुनने की प्रक्रिया भूल रहा हूं बस और कुछ नहीं।’, अपनी बात कहते कहते विक्रम की आवाज रूंधने लगी। 
अब विक्रम भी समझ चुका था कि उसे जबरन परेशान किया जा रहा है। क्योंकि पहले हो चुके वाएवा में ऐसा किसी शोधार्थी के साथ नहीं किया गया था। कुनाल के समय तो ये सभी हंस रहे थे। नाश्ते पर टूट रहे थे और प्रोजेक्टर पर चल रहे पृष्ठों पर तो ध्यान था ही नहीं। पीपीटी के 250 पृष्ठ मात्र 15 से 20 मिनट में ही खत्म हो गए और सभी मुंह में नमकीन भरे या मिठाई भरे उसे बधाई भी देने लगे थे। और इधर विक्रम के पीपीटी के 180 पृष्ठों में से 35 पृष्ठ भी पूरे नहीं हुए और 40 मिनट बीत गए। 
‘चलो सारी बातें छोड़ों ओर आगे बताओ, देर भी हो रही है’, अध्यक्ष महोदय ने कहा।
विक्रम ने सर्वे के माध्यम से संकलित किए आंकड़ों के विश्लेषण को बताना शुरू किया। कुछ ही देर हुई होगी की। विभागाध्यक्ष हंस दिए। इस बार अध्यक्ष्य महोदय और दाएं बाएं बैठे परीक्षक भी मजाक में हंसने लगे। पीछे बैठे अन्य बच्चे अपने भविष्य पर आंच न आ जाए इस वजह से चुप ही रहे। किसी ने हस्तक्षेप करने की कोशिश नहीं की। डॉ0 कुमार चुपचाप थे। वे हंसे नहीं। उनकी नजर में कोई हंसी की बात हुई ही नहीं, वरना पीछे बैठे छात्र भी हंस देते, पर ऐसा हुआ नहीं था। विक्रम भी ठिठक गया कि अब क्या कर दिया। 
अध्यक्ष महोदय ने थके भाव में कहा, ‘विक्रम जी आप तो अपने शोध का निष्कर्ष ही बता दो, बाकी हटाओ’। इतना ही नहीं अन्य परीक्षकों का भी यही रवैया रहा। विभागाध्यक्ष डॉ0 शर्मा अब भी मुस्करा रहे थे।
अब विक्रम कर भी क्या सकता था। अपनी बात रखना भी चाहे तो कमेटी की तरफ से धनात्मक प्रतिक्रिया आ ही नहीं रही थी कि वो अपनी बात कह पाता। आखिर उसे अपना सपना पूरा करना था। इस देश के विकास में भागीदार बनना था। उसे देश की विभिन्न समस्याओं में से एक का समाधान देना था। ऐसे में उसने वही करना सही समझा जो कमेटी ने कहा। 
इधर बाएं बैठे परीक्षक ने कहा, ‘एक घंटा हो गया। यार कोई पानी ही पिला दो’
 बस इतने में विभागाध्यक्ष को बोलने और कंमेट करने का मौका मिल गया। ’पता नहीं सब क्या करते रहते हैं। नाक कटाने पर तुले रहते हैं सब विभाग की। पानी रखना चाहिए था। सब मुझे ही देखना पड़ता है।’ डॉ0 शर्मा मंद मंद मुस्करा भी रहे थे। और ये दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि विभाग इनके बिना तो चल ही नहीं सकता। 
डॉ0 कुमार को बहुत गुस्सा आ रहा था। उनके चेहरे पर खून उभर आया था। 
विक्रम ने अपनी बात कही ओर शोध का निष्कर्ष कमेटी को बताया। एक घंटा चालीस मिनट वाएवा चला। इस केन्द्रीय विश्वविद्यालय का यह पहला मामला था जिसमें शोध प्रस्तुतीकरण 1ः40 घंटा चला हो। कमेटी ने आपस में खुसर-फुसर की कुछ इशारे विभागाध्यक्ष की तरफ भी हुए, लेकिन इस दौरान डॉ0 कुमार की तरफ किसी ने नहीं देखा। कमेटी ने मूल्यांकन पत्र में अंक भर दिए और उसी दौरान सभी परीक्षकों के द्वारा दिए अंकों को उसी समय सुना दिया। 
कमेटी ने जो तय किया उसे कमेटी के अध्यक्ष ने सबसे सामने बोला, ‘विक्रम के शोध में काफी तकनीकी पूर्ण कमियां हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी है। इतना ही नहीं इसे व्यस्थित भी सही ढंग से नहीं किया गया। निष्कर्ष भी नगण्य है। ऐसे में इनके कार्य को शोध उपाधि हेतु संतुति नहीं दी जा सकती। सुधार के लिए 6 माह का समय दिया जाता है।’
विक्रम सहम गया। उसके होश उड़ गए। आंखों के आगे अंधेरा छा गया। सपने टूट गए। भविष्य बिखर गया। पर बात क्या हुई। सभी शोधार्थियों में से सबसे अधिक मेहनत करने वाला सत्य और विश्वसनीय न्यादर्श भरने वाला जिसने कभी झूठे सेंपल नहीं लिए। अध्ययन में धोखा नहीं किया। उसके शोध प्रबंध को रोक दिया गया और सुधार के लिए वापस कर दिया। और जिन्होंने घर बैठे सर्वे किया और 60 प्रतिशत प्रश्नावली फर्जी भर के निष्कर्ष निकाल दिया उन्हें सहर्ष शोध उपाधि प्रदान करने की संतुति कर दी गई। 
कमेटी जाने लगी। विक्रम सहम कर अपनी पेन ड्राइव निकाल कर वहीं का वहीं खड़ा रह गया। पीछे बैठे छात्र भी अचरज महसूस कर रहे थे कि मेहनती और सभ्य छात्र को क्यों परेशान किया गया। इधर डॉ0 कुमार जो सोच रहे थे, वैसा ही हुआ। आज उन्हें अपने पर भी गुस्सा आ रहा था। डॉ0 कुमार ने विक्रम को सांत्वना दी और घर जाकर आराम करने को कहा। विक्रम वहां से चलने लगा। रास्ते भर वो यही सोचता रहा कि आखिर हुआ क्या? क्या गलती कर दी? क्या पढ़ाई में सचमुच कमजोर था। अगर किसी की कमी निकालनी है तो कुछ न कुछ तो आसानी से निकाली जा सकती है। दूध का धुला तो इस दुनिया में कोई है ही नहीं। 
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विक्रम अपने हॉस्टल पहुंचा। न कपड़े बदले। न हाथ-मुंह धोया टांगे लटकाए बेड पर लेट गया। शाम हो चुकी थी। सुबह पांच बजे उठ गया था तो थकान होना स्वाभाविक था। ऊपर से एक ऐसा प्रहार दिमाग पर हुआ था जिसकी कल्पना विक्रम ने सपने में भी नहीं की थी। 
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विक्रम सोचने लगा, आखिर हमारा देश विकास क्यों नहीं कर पा रहा है। श्रम के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर हम हैं। पूरा विश्व हमारे श्रम का लोहा मानते हैं। आर्थिक वृद्धि भी ठीक है। बड़े-बड़े उद्यमी हैं। विभिन्न उत्पादों के लिए बड़ा बाजार है। बड़े-बड़े संत हुए। महान लोगों ने यहां जन्म लिया। समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, इतिहासविद्, आई0ए0एस0, पी0सी0एस0 अधिकारियों की लंबी कतार है। राजनीतिक पार्टियां है। फिर आखिर है क्या जो हम विकास नहीं कर पा रहे हैं। हमारा देश विभिन्नता का देश है। चाहे विभिन्नता धर्म की हो या जाति की या धन की हो या संस्कृति की या भाषा की या भौगोलिक क्षेत्र की। इसी विभिन्नता की वहज से हर राज्य की अपनी एक अलग पहचान है। 
क्या ये विभिन्नता ही इस देश की सबसे बड़ी समस्या है। विक्रम को अब समझ आने लगा था। लोग एक दूसरे से जलते हैं। एक धर्म के लोग अपने धर्म को अच्छा बताते हैं और दूसरे धर्म की परंपराओं पर उंगली उठाते हैं। आपस में लड़ते हैं। हमारे देश में आज भी मनुष्यों के एक वर्ग को अछूत समझा जाता है। घर में गाय, भैंस, कुत्ता, बिल्ली, सुअर, घोड़ा, गधा और न जाने कौन-कौन से जानवर पाल लिए जाएंगे और उन्हें छूने में परहेज नहीं होगा लेकिन मनुष्यों के एक वर्ग को हमारे देश में छूने से कतराते हैं। उन्हें आस-पास बैठने नहीं दिया जाता। सांप्रदायिक दंगे होते हैं। एकता का अभाव है। भड़काने वाले लोगों की देश में कमी नहीं। विक्रम को लगा कि शायद मेरे खिलाफ भी किसी ने विभागाध्यक्ष को भड़का दिया। कमाल की बात तो यह है कि इतना पढ़ा-लिखा आदमी किसी के बहकावे में आ भी गया। ऐसी पढ़ाई का फायदा क्या। इससे अच्छा तो अनपढ़ है, कम से कम समझदार तो होता है। शिक्षा हमें ज्ञान देती है। परंतु अपनी समझ को हमें स्वयं विकसित करना होता है। अगर हम अपनी समझ को विकसित कर लें तो हम सशक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं। पर लगता है कि लोग जितना उच्च शिक्षा में जाते हैं उतना ही ज्यादा गर्त में चले जाते हैं। क्योंकि यहां पढ़ाई के अलावा भी कई गतिविधियों में लिप्त रहना पड़ता है। राजनीति आम हो गई। और वो भी ऐसी राजनीति जिससे किसी का लाभ नहीं होता, सिवाय नुकसान होने के। इस देश में जो मेहनत करता है, वो यहां ज्यादा दुखी है। जिस पेड़ में फल लगते हैं, पत्थर भी उसी पर ज्यादा पड़ते हैं। यहां आपस में लोग मिलकर नहीं रहना चाहते। फूट डालो शासन करो की नीति पुरानी रही है और आज यह सिद्धांत कामयाब हथियार के तौर पर उपयोग किया जाता है। उच्च शिक्षा में भी शायद यही हाल है। एक शिक्षक दूसरे की टांग खींचता और दूसरा तीसरे की। ऊपर बैठा हुआ शिक्षक अपनी कुर्सी संभालने के चक्कर में न शिक्षकों को सुधार पाता है और न ही व्यवस्था। कभी-कभी तो शिक्षक ही ऊपर बैठे हुए को ऐसा सुधार देते हैं कि दोबारा वह व्यवस्था ठीक करने के लिए प्रयोग करने का नहीं सोचता। और व्यवस्था बगड़ती चली जातीे। बदलाव लाने वालों की संख्या बहुत कम है।
देश में शोध करने कराने की भी यही स्थिति है। अगर शोध फर्जी और झूठे आंकड़़ों पर ही निर्भर रहकर करना है तो सरकार ये शोध कार्य कराती क्यों है। और अगर सरकार अच्छे शोध कराती भी है तो उनके संरक्षण के लिए व्यवस्था क्यों नहीं करती। शिक्षकों के द्वेष का कोपभाजन छात्रों को होना पड़ता है। कई बार तो छात्रों से सीधे लड़ाई हो जाती है। छात्रों को सताया जाने लगता है। शोध छात्रों को इतना ज्यादा यातना देते हैं कि वे आत्महत्या करने लगते है। कई उदाहरण है, इसके हमारे पास। 
विक्रम को जिंदा रहना था। उसे व्यवस्था बदलनी थी। इसलिए उसने मरने का नहीं सोचा। अपने बिस्तर से उठा और ठान लिया क्या करना है।
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छः महीने विक्रम ने चापलूसी शुरू कर दी। अब सब खुश थे। विभागाध्यक्ष की कुटिल मुस्कान नहीं रही। क्योंकि अब विक्रम रोज विभागाध्यक्ष जी के चरण वंदन करने लगा, कभी-कभी अपने गाइड की बुराई भी कर देता। विभागाध्यक्ष निंदा रस के बड़े प्यासे रहते थे। डॉ0 शर्मा के शोध पत्र लिखता था और नाम विभागाध्यक्ष का छपता था। इसके अलावा अखबारों के लिए लेख भी विक्रम ने लिखे और विभागाध्यक्ष जी के नाम छप गए। कई घरेलू काम भी विक्रम करने लगा। इससे डॉ0 शर्मा काफी खुश रहने लगे। कई बार विक्रम विभागाध्यक्ष की पुरानी शर्ट और पैंट की तारिफ भी कर देता। जूतों पर पॉलिश कर देता। विक्रम ने शोध में कोई परिवर्तन नहीं किया था। बस शोध परिकल्पना में पहली कल्पना को तीसरी कल्पना बना दिया और तीसरी को पहली। बाकी सब कुछ वैसे का वैसा ही रहा। 
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छ महीने चरण वंदन के बाद जब वाएवा का समय आया तो उससे पहले ही टेबल पर तीन प्रकार की मिठाई, दो प्रकार के बिस्कुट, जिसमें एक नमकीन और एक मीठा था, कुछ कोलड्रिंक की बोतल और खाली गिलास। कुछ स्नेक्स भी रखे गए। टेबल व्यंजनों से भरी पड़ी थी। इस वजह से मूल्यांकन पत्र वहां नहीं रख पा रहे थे। इस वजह से मूल्यांकन पत्रों को समेट कर ये सोच कर अलग रख दिया कि इनका काम तो नाममात्र का होगा। बस नम्बर ही तो देने हैं। 
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वाएवा का समय आ गया। कमेटी का दिखावटी पैर छूकर अभिवादन किया। अध्यक्ष की घड़ी की तारिफ की, एक अन्य परीक्षक की शर्ट की तारीफ की और एक अन्य परीक्षक के हेयर स्टाइल की तारीफ की। सभी का दिल खुश हो गया। जैसे ही अध्यक्ष जी कुर्सी पर बैठने को हुए, विक्रम ने अपने रूमाल से कुर्सी को पोछा। अध्यक्ष जी का दिल गदगद हो गया। इसके साथ ही नीचे झुकते ही मन में कहा हरामखोर फिर घुटने छू लिए। अध्यक्ष जी ने फिर जोरदार आशीर्वाद दे दिया। 
इससे पहले कि वह अपना शोध पढ़ना शुरू करता और पीपीटी के पृष्ठों को पलटना शुरू करता उसने एक निजी सहायक रखा जिसने अथितियों को व्यंजन परोसने शुरू कर दिए। जो खाना बंद कर देता उसे विक्रम स्वयं कह देता, ‘सर प्लीज आप लीजिए न।’ ये सुनकर अतिथि खुश हो जाते। उनके मन में सहानुभूमि पैदा हो जाती। 
अब कमेटी का ध्यान पूरी तरह प्रोजेक्टर पर चलने वाले पीपीटी पृष्ठों से हट कर टेबल तक ही सीमित रह गया। व्यंजनों की बाढ़ से उनकी नज़रें प्रोजेक्टर स्क्रीन तक जा ही नहीं पा रही थी। विक्रम सिर्फ इस बात का इंतेजार कर रहा था कि कब व्यंजर खत्म हो, तभी वह अपना प्रस्तुतीकरण बंद कर देगा। 15 मिनट में सभी व्यंजन खत्म हो गए। और इसी के साथ प्रस्तुतीकरण भी पूरा हो गया। 
‘सर मेरा शोध कैसा लगा’?, विक्रम ने दाएं बैठे एक परीक्षक से पूछा।
परीक्षक ने तपाक से उत्तर दिया, ‘बहुत बढि़या..... मिठाई थी।.... वो काजू कतली तो गजब की लगी..... और ये....’ इससे पहले की परीक्षक अपनी बात पूरी करता, विक्रम ने बात काटी ओर मन में सोचा, ‘अबे भुक्कड़, भिखारी, देश पर बोझ, मैंने कुछ ओर पूछा था कमीने।’ बाद में मुस्कराते हुए कहा, ‘सर में शोध प्रबंध के बारे में पूछ रहा हूं।’
परीक्षक ने उत्तर दिया, ‘अरे अच्छा है। मैंने देखा जो पिछली बार कमियां थी, वो तुमने सुधार ली हैं। मुझे अच्छा लगा।’
‘अबे अंधे, दिमागी अनपढ़, मैंने परिकल्पना को ऊपर-नीचे करने के अलावा कुछ किया ही नही ंतो तूने क्या देख लिया जो मैंने सही किया।’, मन में सोचते हुए विक्रम ने परीक्षक के पैर घुटने छू लिए। 
अंत में मूल्यांकर पत्र में ढूंढा गया जो एक किनारे रख दिया गया। अंक दिए गए। और वहीं घोषणा करते हुए कहा गया कि कमेटी विक्रम की मेहनत की सराहना करती है। उनके उन्हें पीएच0डी0 उपाधि हेतु संतुति देती है।
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विक्रम ज्यादा खुश नहीं था। क्योंकि उसे पता चल चुका था कि इस देश में मेहनत से ज्यादा किसी और चीज पर ध्यान दिया जाता है। विक्रम ने उसी पर ध्यान केन्द्रित कर अपना काम निकाला और विश्वविद्यालय से चलता बना। हां ये अलग बात है कि उसने कसम खाई जैसा उसके साथ हुआ, शिक्षक बनने पर वो किसी ओर के साथ ऐसा नहीं करेगा। 
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अब विक्रम उच्च शिक्षा संस्थान में एक शिक्षक बन गया है। और व्यवस्था बदलने के लिए फिर संघर्ष कर रहा है। 

गुरुवार, दिसंबर 24, 2015

क्या फ़िल्मी गाने बलात्कार को बढ़ावा देते हैं?, एक अध्ययन

एक और हमारा देश विश्व पटल पर अपना लोहा मनवा रहा है तो दूसरी तरफ हम अन्दर ही अन्दर खोखले होते जा रहे हैं. 12 दिसम्बर 2012 की रात सामूहिक बलात्कार हुआ. उसमें एक नाबालिग भी था जिसे 3 साल की सजा मिली, 20 दिसम्बर 2015 को हाल ही में उसे रिहा कर दिया गया. समाज ने
खैर अब विषयवस्तु पर आते हैं. क्या कभी सोच है हमने कि देश में नाबालिग इस तरह के कृत्य करने पर क्यों उतारू हो रहे हैं?
अगर ये कहा जाए कि देश में फ़िल्मी गाने बलात्कार को बढ़ावा दे रहे हैं तो गलत नहीं होगा. देश में बढ़ रही अश्लीलता और द्विअर्थी संवादों ने बहुत अधिक प्रभावित किया है. फिल्म, नाटक, ऑफिस, मॉल, दुकान, पार्क इत्यादि जगहों पर आपको द्विअर्थी बाते करते यार दोस्त मिल ही जायेंगे.

 हिंदी फिल्में/ अन्य भाषाई गाने कितने जिम्मेदार

आधुनिकीकरण की परिभाषा का हिंदी फिल्मों ने जो शोषण किया है उससे संस्कृति तो गर्त में चली ही गई, अब साथ में संवेदनाएं भी मरती जा रही हैं.
बच्चे कैसे बिगड़ते हैं, कुछ उदहारण देखिये-
"मैन्यु लगा सोलवां साल"- इस गाने को सुनकर नाबालिग या बालिग ये सोचेगे कि आखिर लड़कियों के सोल्वे साल में ऐसा क्या होता है, जिससे लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं, जब उन्हें इसका जवाब नहीं मिलेगा तो वो असली में किसी 16 साल की लड़की के पीछे लग जायेंगे, ये पता लगाने के लिए कि 16 साल कि लड़की होने पर उसके पीछे लोग क्यों पड़ जाते हैं.
बस, यहीं से छेड़खानी की शुरुआत हो जाती है. लड़कियों के पीछे पड़ना अच्छा लगने लगता है और धीरे धीर भटके हुए बच्चे क्राइम की गर्त में चले जाते हैं.

"चढ़ती जवानी" - जब नाबालिग इस गाने को सुनेगे तो पता लगाने की कोशिश करेंगे की आखिर कौन कौन सी सीढ़ी हैं जिनसे जवानी चढ़ती है?, जवानी चढ़ती कैसे है? जवानी चढ़ने से होता क्या है? इन सवालों के जवाब उन्हें पढाई से दूर करने लगते हैं. घर से दूर इन सवालों के जवाब ढूँढने के चक्कर में अप्रत्यक्ष रूप से वे कोई न कोई गलत काम शुरू कर देते हैं. इसमें लड़के एवं लड़कियां दोनों शामिल हैं.

"... मेरी रातों का नशा...सोया हुआ जिस्म जगा" - दिसम्बर 2015 में एक फिल्म रिलीज़ हुए जिसमें ये गाना दिखाया गया. इस गाने को सुन-देख कर जानने की कोशिश जरूर करेंगे कि एक जवान महिला के पुरुष से चिपकने पर ही जिस्म क्यों जाग जाता है. और सुबह जब पूरी दुनिया जाग ही जाती है तो रात को कौन सा जिस्म जगाने की बात कही जा रही है. इस गाने से सिर्फ नाबालिग लड़के ही नहीं कुप्रभावित होंगे अपितु ये लड़कियों को भी भटकाने के लिए काफी है. नाबालिग लड़कियां स्वयं सोचेंगी की आखिर सुबह जागने के बावजूद ऐसा कौन सा हिस्सा है जो सिर्फ पुरुष से चिपकाने पर ही जाग सकता है. ऐसे में छोटी उम्र में वे वो सब करने लग जाती है जो उनके भविष्य और शरीर के लिए नुकसान दायक होता है.

"कान में दम है तो बंद कर वालो"- एक गाने में जोर दिया गया है कि पार्टी होती रहेगी. और कान में दम हो तो बंद करवा लो. "कान" शब्द का ही क्यों प्रयोग किया गया. जबकि दम की ही बात करनी थी तो "हाथों में दम" या फिर "पैरों में दम" की बार करते. कान तो शरीर का एक छोटा सा हिस्सा होता है. इसमें किस तरह ताकत हो सकती है. विश्व में खेले जाने वाले तमाम खेल या होने वाले युद्ध में हाथ पैरों की ताकत दिखाई जाती है. सब जानते हैं कि कान में दम का कोई सार्थक अर्थ नहीं है. ऐसे में इस गाने में "कान" शब्द का इस्तेमाल करके कौन सा अर्थ निकालने की कोशिश की गई ये सभी व्यस्क जानते हैं. फिर भी हमारा समाज और खासकर युवा इस गाने को शादी, पार्टी, मोबाइल फ़ोन में खूब सुनते हैं.

"मैं हूँ बलात्कारी" - इस गाने पर तो पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने समबधित व्यक्ति को कोर्ट में बुलाया था. इस गाने से टीनएजर्स क्या सीखेंगे. खुद ही मूल्यांकन कर लीजिये

भोजपुरी फिल्म/गाने

भोजपुरी गानों ने तो अश्लीलता की हदें ही पार कर दी. इनके पोस्टर भी कम अश्लील नहीं होते. आखिर हम कौन सा समाज तैयार करना चाह रहे हैं. देखिये कुछ उदहारण -
"तेरी गर्मी दूर कर दूंगा", "अइसन दिहलू पप्पी", "हाफ पेंट वाली", "कॉलेज के पीछे, "माल कचा कचवा बनिहें गोलगप्पा", "मार दी कवनो बम", "मन करेला चुसे के होठवा", "देखे वाला चीज बा औढ़निया में", "ए रसीली हो", "मजा लेले माल पटाके", "इतना अप डाउन कईलू चएन फिरी क दिहलू", "लगा दी हमरा लहंगा में मीटर", "भउजी के चोली अलमारी भईल", "फराक तोहर टाईट बा", "मोबाइल दूध पियता", "बजार तोहार गरम बा", "हेड लाईट देखावेली", "सामियाना छेद छेद हो जाई", "बाबू साहेब लहंगा उठाई", "छेदवा छोट बा", "जींस ढीला हो जाई", "डाल तनी लूर से ना", "आपन ओढ़नी बिछाव गमछा छुट गईल बा घरे".... और भी कई गानों के बोल हैं.
इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि द्विअर्थों का प्रभाव बढ़ रहा है. यहाँ एक बात और बतानी जरूरी है, चूंकि द्विअर्थी संवाद में हंसी आने पर नाबालिग इस और खींचे चले जाते हैं, ऐसे में जो भाषा पुस्तकों में लिखी होती है वो छात्र छात्राओं को रोचक नहीं लगती. नतीजा ये होता है नाबालिग पुस्तकों से दूर हो जाते हैं. पढ़ने में मन नहीं लगता, फिर परीक्षा में पास होने के लिए नक़ल करते हैं, और अगर फ़ैल हो गये तो ख़ुदकुशी जैसे गलत कदम उठाने लगते हैं. ये प्रक्रिया देश के भविष्य को खोखला करती जाती है.

सोशल मीडिया और नाबालिग 

 नए जमाने में नाबालिगों का मनोरंजन करने का ढंग काफी बदला है. इससे अचरज नहीं होना चाहिए कि बच्चे अब मैदान में खेलने के बजाए घर में मोबाइल फ़ोन या इन्टरनेट पर आँखें गढ़ाए रहते हैं. वाट्स एप, फेसबुक, यू ट्यूब पर अकाउंट बनाते हैं और इसकी लत पड़ जाती है. स्कूलों में मोबाइल फ़ोन ले जाना, क्लास बंक करना जैसे गलत काम शुरू कर देते हैं. इसके अलावा बॉय फ्रेंड/गर्ल फ्रेंड बनने या बनाने लगते हैं. और ऐसे बच्चे समुचित विकास और समुचित शिक्षा को खो देते हैं. यही कारण है कि यौन शिक्षा देना आज के दौर में कितना जरूरी हो गया है.

दोस्तों 21वीं सदी का मतलब लोगों ने ये नहीं लगाया था कि लोगों के तन से कपड़े गायब हो जायेंगे. हिंदी फिल्मों के पोस्टर, उनके गाने, और संवाद ने लोगों को अश्लील मनोरंजन परोसा है. फिल्मों ने लोगों को संवाद का नया आयाम दिया जिसमें अश्लीलता आने लगी. भले ही शुरू में ये अच्छा लगता हो, पर इसने लोगों के दिमाग में गन्दगी भर दी है. वर्तमान में हो रही छेड़-छाड़ और बलात्कार, यौन शोषण जैसे अपराध इसी का नतीजा है. बड़ों को समझाने के समय तो गया, पर नाबालिगों को बर्बाद होने से बचा सकते हैं.

जो पेड़ तिरछे हो गये उन्हें तो सीधा नहीं किया जा सकता, उन्हें सिर्फ काटा जा सकता है, परन्तु जो पौधे तिरछे हो रहे हैं उन्हें तो सहारा देकर सीधा किया जा सकता है. क्यूं हम उसके तिरछे होकर पेड़ बनने का इंतज़ार करें और तब काट दें. पेड़ काटना कोई समाधान नहीं है. पेड़ काट काट कर तो बगीचा ही ख़तम हो जाएगा. क्यूं न ऐसा रास्ता निकला जाए कि बगीचा भी हरा भरा हो और हर पेड़ सीधा बढ़ता रहे.
जरा कल्पना तो कीजिए.


सन्दर्भ (द्वितीयक आकड़े)
1. http://www.bhojpurixp.com/bhojpuri-me-aslilta-ka-part-3/
2. http://emalwa.com/entertainment/%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A4%A8
3. इंटरनेट. 

शनिवार, सितंबर 19, 2015

मीडिया आखिर करे तो करे क्या ?

डेंगू का कहर इन दिनों जोरों पर है. हर जगह लोगों में एक दर पैदा हो गया है. स्थिति ये है, कि सरकार को स्वयं कहना पड़ रहा है कि डरने की जरूरत नहीं, डेंगू का इलाज है. अगर डेंगू कि खबरों कि बात करें तो मीडिया इन दिनों भारी दवाब से गुजर रहा है. बात ये नहीं कि मीडिया डेंगू के मरीजों की बढ़ती संख्या को दिखा रहा है या अस्पतालों की खस्ता हालत को बयाँ कर रहा है और डेंगू के डर को फैला रहा है या उसकी रोकथाम में अपने भूमिका दर्ज करा रहा है. बात ये भी है, कि आखिर जो भी खबरें मीडिया में प्रकाशित या प्रसारित की जा रही हैं, उनका असर लोगों पर क्या पड़ रहा है?

एक ओर, एक पाठक, एक ही अख़बार पढ़कर डेंगू की भयावय स्थिति को जानता है और वहीं दूसरी ओर, उसी अखबार में सरकारी विज्ञापन, ये सन्देश देता दिखाई देता है कि डेंगू से डरने की जरूरत नहीं, दहशत में आने की जरूरत नहीं है. अब ऐसे में पाठक समझ ही नहीं पाता कि आखिर अखबार कहना या बताना क्या चाहता है? कई बार पाठक द्वारा ये तय करना मुश्किल हो जाता है कि आखिर भारत में प्रकशित हो रहे अखबारों का मूल उद्देश्य क्या है? क्या उनका मूल उद्देश्य सूचनाओं को प्रेषित करना है या विज्ञापन प्रकाशन के चलते धन कमाना?

पिछले कुछ दिनों से अखबारों में डेंगू की स्थिति पर अच्छा कवरेज हुआ है. हर दिन डेंगू के बढ़ते मरीजों के अलावा, अस्पतालों के हाल तक बयाँ किये जा रहे हैं. आलम ये है कि लोग डेंगू से जुडी ख़बरों को पढ़कर डरने लगे हैं. क्यूंकि आये दिन डेंगू के बुखार से लोग मर रहे हैं. सरकारी चिकित्सालयों में मरीजों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ने से सबको सही तरह से इलाज़ नहीं मिल पा रहा है. खबरें ये भी आयीं हैं कि छोटे-छोटे बच्चे डेंगू कि चपेट में आये, बुखार हुआ और डेंगू का पता लगते ही 48 घंटों में ही उनकी मौत हो गयी. इस तरह की खबरों को पढ़कर शायद ही कोई पाठक होगा जो सहमा नहीं होगा या कहें, दहशत में नहीं आया होगा. एक तो सरकार डेंगू के मरीजों को सही समय पर वांछित उपचार और आराम नहीं दे पा रही है, क्यूंकि डेंगू के मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा है कि डेंगू के सकारात्मक या नकारात्मक होने की रिपोर्ट सही समय पर नहीं मिल पा रही है, और जब तक रिपोर्ट आती है तब तक मरीज की हालत और बिगड़ जाती है. हाल ही में खबर मिली कि डेंगू के टेस्ट की फीस भी बारह सौ से पंद्रह सौ तक पहुँच गई है. निजी अस्पतालों की तो बल्ले बल्ले हो रही है आजकल. 

स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, मरीजों को सरकारी अस्पतालों में बिस्तर तक नसीब नहीं हो पा रहा है, किसी का उपचार फर्श पर लिटाकर किया जा रहा है तो किसी को जमीन पर लेटने के लिए जगह तक नसीब नहीं. हर पाठक इन परिस्थितियों से वाकिफ हो रहा है. अब बात आती है, कि इस तरह की ख़बरों का पाठकों या कहें जनता पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, तो बड़े आसानी से इसका जवाब मिल जाएगा कि लोग अब दहशत में आने लगे हैं. डेंगू जिस कदर लोगों को उनके परिजनों से हमेशा हमेशा के लिए दूर कर रहा है, इस तरह की खबरों से हर कोई हैरान-परेशान हो चुका है. अब पाठक अखबार में डेंगू की स्थिति जानने के लिए अख़बार नहीं पढ़ रहा, अब पाठक सिर्फ रोकथाम और सार्थक उपचार को खोज रहा है.

अभी तो हमने सिर्फ एक पक्ष की बात की है. दूसरा पक्ष भी हमें देखना होगा. मीडिया में चाहे खबरों का कुछ भी असर हुआ हो लेकिन, विज्ञापनों के जरिये लोगों तक ऐसी जानकारी पहुंचाई जा रही है, जिससे वे सहमे नहीं और विवेक से काम लें. सरकार द्वारा जारी किये जा रहे विज्ञापनों में डेंगू सम्बन्धी रोकथाम और उपचार के बारे में बताया गया है. अगर एक और खबरों से पाठक भय में भी आया है तो विज्ञापन से मन थोडा बहुत तो हल्का हुआ है.. इसका एक लाभ ये हुआ कि लोगों तक पहुंचकर विज्ञापन ने उन्हें सांत्वना दी है और दूसरी तरफ अखबार को भी विज्ञापन प्रकाशित करने से आर्थिक लाभ पहुंचा. सरकार भी पुरजोर प्रयास कर रही है, पर ये प्रयास डेंगू के कहर के आगे कमजोर नजर आ रहे हैं. सरकार के नुमाइंदों को अब सड़क पर आना ही पड़ेगा. यहाँ आला अधिकारियों को उपचार करने के लिए नहीं कहा जा रहा. यहाँ उनके द्वारा डेंगू को और अधिक न बढ़ने देने और उसकी रोकथाम में अहम् भूमिका निभाने से हैं. जबरन गन्दगी फैलाने वालों पर सख्त कार्यवाही को शुरू करना होगा. जागरूक अभियानों को नये कलेवर के साथ प्रस्तुत करना होगा. "पानी जमा न होने दें" जैसे संदेशों के विज्ञापनों का दौर अब लगभग खत्म हो चुका है. अब वक़्त है ये बताने का कि जब आप आस्तीन में सांप नहीं पालते, ये जानते हुए कि इसके काटने से आदमी की मौत अड़तालीस घंटों में हो सकती है, उसी प्रकार आप अपने घर में रुके हुए पानी में मच्छर कैसे पाल सकते हो, जिसके काटने से भी आदमी की मौत अड़तालीस घंटों में हो सकती है?

शनिवार, सितंबर 12, 2015

ब्रज भाषा पर भ्रम

12 सितम्बर 2015 
हाल ही में हिंदी के सम्बन्ध में एक पुरानी पुस्तक पढने का मौका मिला.
इस पुस्तक में उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से की एक भाषा को लेकर एक अजीब बात लिखी है.

लेखक के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खड़ीबोली से वर्तमान हिंदी और उर्दू कि उत्पत्ति हुई. और दूसरी बोली ब्रज भाषा, पूर्वी हिंदी की बोली अवधी के साथ कुछ काल पूर्व तक साहित्य के क्षेत्र में वर्तमान खड़ीबोली हिंदी का स्थान लिए हुए थी. आगे लिखा उन्होंने, "इन दो बोलियों के अतिरिक्त पश्चिमी हिंदी में और भी कई बोलियाँ सम्मिलित हैं, किन्तु साहित्य की दृष्टि से ये विशेष ध्यान देने योग्य नहीं हैं....."

क्यों साहब, क्यों ध्यान देने योग्य नहीं है???
 ब्रज भाषा ने हिंदी साहित्य को बहुत कुछ दिया है. इसे कोई भी अनदेखा नहीं कर सकता. 
मैं बड़े सम्मान के साथ विरोध करता हूँ लेख का और ये बड़े आदर के साथ बता देना चाहता हूँ, कि वर्तमान में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केवल खड़ी बोली या अवधी ही नहीं, बल्कि ब्रज ने भी अपनी जड़ें जमाई है. आगरा, मथुरा, फर्रुक्खाबाद, एटा, इटावा, औरैया, कन्नौज, मैनपुरी, फिरोजाबाद और हाथरस जैसे जिलों के आस पास के क्षेत्र में बड़े स्तर पर ब्रज बोली जाती है.

हिंदी विद्वानों ने ब्रज भाषा को सबसे अधिक कोमल भाषा मानी है.
सूरदास, नरोत्तमदास ने इस भाषा में अपनी रचनाओं को लोगों के सामने रखा.
अब बुंदेलखंड में भी बुन्देलखंडी भाषा का बोलबाला बढ़ रहा है, इस क्षेत्र को हम बिल्कुल नकार नहीं सकते. अब तो बुंदेलखंड अपनी अलग पहचान बना चुका है.

इस पुस्तक में बहुत सी जानकारी है जो अध्ययनकर्ता के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है, परन्तु मुझे इसमें कुछ कमी लगी तो मैंने इस पुस्तक का सन्दर्भ लेकर इसके बारे में अपनी राय दी. 
मैंने आलोचना नहीं की है.
मैंने अपना विचार प्रस्तुत किया है. हो सकता है, लेखक का मंतव्य वो न हो जैसा मैं सोच रहा हूँ. हो सकता हो, लेखन कुछ और अपनी बात कहना चाहता हो... पर मुझे लगा तो मैंने अपनी राय लिखी.

बुधवार, अगस्त 26, 2015

मीडिया और मिस्टेक

हाल ही में एक ऐसा गलती एक अखबार ने विज्ञापन को प्रकाशित कर के कर दी है जो शायद भारतीय शक्ति को कमजोर करने में एक उत्प्रेरक का काम करे....
हुआ यूं, कि "---------" दैनिक समाचार पत्र  के नई दिल्ली संस्करण में 20 अगस्त 2015 को 15वें पृष्ठ एक विज्ञापन प्रकाशित किया. यह विज्ञापन भारतीय सशस्त्र बल द्वारा जारी किया गया था. चूंकि भा.स.ब. भारत-पाक युद्ध 1965 कि स्वर्ण जयंती मनाने जा रहा है. कार्यक्रम 28 अगस्त से शुरू होकर २२ सितम्बर तक चलेगा. इसमें आम जनता को निःशुल्क प्रवेश दिया जा रहा है. आयोजित होने वाले कार्यक्रम में देश के लिए शहीद हो गये वीरों को और अन्य बहादुर सैनिकों को याद किया जाएगा. इसलिए इस सम्बन्ध में  इस विज्ञापन को आम जन और उनके आस पास रह रहे सैनिकों तक जानकारी पहुंचाने के लिए प्रकाशित किया गया. 
विज्ञापन सरल भाषा और सटीक शब्दों के साथ युद्ध की गाथा को बयाँ करता है. अगर आप पढ़े तो पता चलेगा कि किन मुश्किलों में हमारे देश के वीरों ने युद्ध में विजय प्राप्त की. कितना नुक्सान हुआ.... आदि.
बवाल क्या हुआ.
वो विज्ञापन जिसमें गलती प्रकाशित हुई।
मैं उस समय बहुत आश्चर्य चकित रह गया जब इस विज्ञापन में मात्र एक अक्षर "ट" ने अर्थ का अनर्थ कर दिया.
हुआ ये कि भा.स.ब. द्वारा जारी इस विज्ञापन में वीरों की और युद्ध कि ऐतिहासिक घटना बयाँ की. पर "इस" दैनिक समाचार पत्र ने लेख की 5वीं लाइन में गलती कर दी.
".....पाकिस्तान द्वारा किये गये जबर्दस्त जवाबी हमले का डरकर मुकाबला किया....."
यहाँ "डटकर" की जगह "डरकर" छाप दिया और तो और प्रकाशित भी कर दिया. 
पाकिस्तान को प्रोत्साहन मिला
अगर पाकिस्तान में हिन्दुस्तान समाचार पत्र का अगर ई-पेपर पढ़ा जा रहा होगा तो निश्चित ही उन्हें इस बात से और हौसला मिलेगा कि देखो हम चाहे हार गये हों फिर भी हमारे हमले से भारत के सैनिक डर गये होंगे।.. तभी ऐसा लिख रहे हैं... कि डर के मुकाबला किया.
मान लीजिये पाकिस्तान का मीडिया इस पर खबर प्रकाशित कर दे और इस विज्ञापन कि प्रति को वह दिखाए तो भारत कि छवि पर असर पड़े न पड़े परन्तु, इस संभावना से हम मुकर नहीं सकते कि पाकिस्तान में रह रहे भारत विरोधी तत्वों को इससे भारत में और आतंक फैलाने का मौका मिल जाएगा.
विज्ञापनो के किनारे दबाकर पेश किया गया खंडन
हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि प्रोत्साहन व्यक्ति के अन्दर "आस" अथवा एक "जूनून" पैदा कर देता है. प्रोत्साहन सिद्धांत पर स्किनर ने खासा काम किया है. बी.एड., - एम.एड. छात्रों को ज्ञानार्जन सम्बन्धी अध्ययन में इनके सिद्धांत को पढ़ाया जाता है.  व्यक्तिगत रूप से कहूं तो ये कोई बड़ी गलती नहीं है. हाँ पर में इस बात से सहमत नहीं हो सकता कि इसका असर नहीं होगा. इसका असर हो सकता है. 10वीं पास छात्र सेना में छोटे मोटे पदों पर लग जाते हैं और देश की सेवा करने में जुट जाते हैं और अपनी पढ़ाई रोक देते हैं. ऐसे में उनकी सोच का विकास उतना नहीं हो पता जितना अन्य छात्रों द्वारा शिक्षा में लगातार अध्ययनरत रहने से हो जाता है. अब ऐसे में ऐसे सैनिक जो कम पढ़े लिखे थे एवं/अथवा  आज रिटायर हो चुके हैं... अगर वे इस विज्ञापन को पढ़ते हैं, तो जरा अपने दिल से पूछिए उन पर क्या बीती होगी????  एक बार तो उनका मन क्रूद्ध तो हुआ होगा. मन में एक टीस तो उठी होगी कि हमने "डटकर" सामना किया और इस देश का अख़बार कह रहा है कि हमने "डरकर" सामना किया. 
शब्द का खंडन
प्रकाशित अखबार में खंडन (नीचे की तरफ)
कमाल कि बात ये है कि समाचार पत्र ने भी बड़े इतराकर खेद प्रकट किया. वो भी अगले दिन नहीं, बल्कि दूसरे दिन (22 अगस्त 2015)
इतना ही नहीं, बल्कि बड़े बड़े विज्ञापनों के किनारे खंडन फंसा दिया. ऐसा इसलिए कर दिया, ताकि लोगों का ध्यान उस गलती को पढ़ने में न जाकर बड़े बड़े चिपकाए गये विज्ञापनों कि तरफ जाए... आप संलग्न फोटो में देख सकते हैं.
आई.ए.एस. और पी.सी.एस. की तरह मीडिया में हो "प्रेस अधिकारियों" की भर्ती.
अब समय आ गया है, अब आई.ए.एस. और पी.सी.एस. की तरह पत्रकारों को भी लोग सेवा आयोग द्वारा भरा जाना चाहिए. तभी मीडिया को मजबूत बनाया जा सकता है, वरना आज़ादी के बाद से जो स्थिति मीडिया की हुई है, जहाँ मीडिया हाउस का मालिक अपने तरह से सूचना को प्रकाशित करता है, और पैसा कमाता है, वही स्थिति बनी रहेगी.
आप क्या सोच रहे हैं, ये गलती अनजाने में हुई है? असल में ये गलती अनजाने में नहीं, बल्कि पत्रकारों के साथ किये जाने वाले शोषण का नतीजा है, उन्हें कोल्हू के बैल कि तरह रखा जाता है, जैसे कोल्हू के बैल के मूंह से कोल्हू को खींच-खींच कर फैना टपकता रहता है और जब थक कर रुकने की कोशिश करता है तो मालिक उसे "पल्हेंटी" (डंडे में चमड़े के लम्बे फीते से बंधकर जानवरों को हाकने के लिए बना एक औज़ार) से मारकर फिर चलने को विवश कर देता है, वैसी ही स्थिति पत्रकारों की हो गई है. ज्यादा तनख्वा मिलती नहीं, हमेशा नौकरी से निकाले जाने का डर, निर्धारित समय से अधिक काम करना, कोई इच्छित छुट्टी नहीं, समय पर तनख्वा नहीं देना, रात में काम करवाना..... और न जाने क्या क्या.... 
अब स्वयं ही सोचिये गलती न हो तो क्या हो... पर मैं उक्त गलती को इस दवाब में हो सकने वाली गलतियों से नहीं जोड़ सकता.... क्यूंकि ये गलती हामारी अस्मिता से जुड़ी है. क्यूंकि ये गलती, गलती नहीं, बल्कि देश के हौसले को कमजोर करने वाली कड़ी है. अगर मीडिया देश को एक मजबूत करने की क्षमता नहीं रखता, तो उस माध्यम को स्वयं ही अयोग्य घोषित कर बंद कर देना चाहिए. 
सुझाव
दिल से कहूं तो समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित की गई गलती के खंडन के प्रकाशन से सहमत नहीं हूँ.
मेरा सुझाव है, जो गलती की है तो उसे सहर्ष स्वीकार करे. साथ ही खंडन को कारणों सहित प्रकाशित करे और यह भी वादा करे कि आगे से ऐसी गलती न हो इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा... इसके अलावा खंडन विशेष आकर्षण के साथ प्रकाशित किया जाए ताकि सभी को पता चल सके कि गलती को स्वीकार किया जा रहा है.
...और उसे प्रथम पृष्ठ पर ऊपर की तरफ- बिना विज्ञापन के किनारे या बीच में, बिना किसी बड़ी खबर या सूचना के किनारे या बीच में,बिना किसी फोटो के किनारे या बीच में, या किसी भी ऑफर या लाभ की जानकारी के किनारे या बीच में प्रकाशित न करे. उसके लिए एक विशेष स्थान बनाए. 
ऐसा करना कोई बड़ी बात नहीं, बल्कि इससे तो समाचार पत्र की प्रशंसा / तारीफ़ होगी. 
वरना, उक्त प्रकाशित खंडन तो ऐसा लग रहा है, जैसे एक आदमी ने दूसरे आदमी के "..चटाक... " से तमाचा मार दिया, फिर अकड़ कर माफ़ी माफ़ ली... "अबे ओए! माफ़ कर दे... समझा क्या...."
और अंत में 
-जिस प्रकार पाप धोने के लिए हम हर किसी नदी में नहीं नहाते बल्कि डुबकी लगाने के लिए गंगा नदी में जाते हैं, बिलकुल उसी प्रकार समाचार पत्र को भी हृदय से पत्र में जगह देकर गलती को मानकर सही जगह देकर माफ़ी मांग लेनी चाहिए.

देश भोले शंकर की तरह बड़ा दयालु है, माफ़ कर देगा.
यही संसार है, यही संचार है.

गुरुवार, जुलाई 16, 2015

विचारों का द्वंद्व: दो चहरों वाला समाज

आज एक ऐसे विषय पर लिखने को विवश हुआ हूँ, जिसने कई बार मेरे मन में विभिन्न तर्कों को जन्म दिया है. तर्कों ने मुझे समाज के दो चेहरे देखने का मौका दिया. असल में हम कई बार एक ही विचार पर किसी समय कुछ होते हैं और किसी और समय पहले से हटकर अर्थात कुछ और. हमारा मन, हमारे समक्ष, हमारे लाभ और व्यक्तिगत उचित-अनुचित के अनुसार विचार प्रस्तुत करता है. मान लीजिये बरसात में छाता की जरूरत है और वह आम दिनों के मुकाबले किसी दूकान पर मंहगा बिकने लगा तो मन में विचार उठेगा कि भाई कितना मंहगा बेचा जा रहा है, इसे तो सस्ता होना चाहिए और जब बरसात का मौसम न हो और उसी दूकान में बहुत सारे छाते बिक रहे हों तो मन में विचार आएगा, "भई इन छातों का क्या काम?" ऐसे में हम इस बात से सहमत हो सकते हैं कि एक विषय पर एक ही व्यक्ति की समय-समय पर विचारधारा अलग-अलग हो सकती है.
खैर, मैं यहाँ कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूँढना चाहता हूँ.

1. पहला सवाल - वंश किसका कहलाता है- पुरुष का या महिला का ?
वर्तमान में महिला सशक्तिकरण के लिए हर जगह प्रयास किये जा रहे हैं. जागरूकता लाने के लिए आये दिन विभिन्न घटनाओं और विषयों पर बहस होती रहती है. ऐसा होना भी चाहिए. मैं इसका समर्थन करता हूँ.
महिला को पुरुष के बराबर माना जाता है, मानसिक तौर पर भी और कानूनन भी. मैं इसे भलीभाति समझता और सहर्ष स्वीकारता हूँ. 
आज कल एक बहस जोरों पर है कि शादी के बाद जब बच्चों का जन्म होता है तो वंश पुरुष का क्यों माना जाए, महिला का क्यों नहीं? समाज में चली आ रही परम्परा के अनुसार वंश को पुरुष आगे बढ़ाता है, अर्थात स्त्री पुरुष के वंश को आगे बढ़ाती है. घूमफिर कर वंश पुरुष का होता है. स्त्री का कोई वंश नहीं होता. इस पर भी जबरदस्त बहस चलती है, मीडिया, सेमिनार, कॉलेज, सामाजिक जनमाध्यमों (social media) जैसे फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स एप आदि पर आये दिन लोग इस सम्बन्ध में जागरूकता लाने सम्बन्धी विचार प्रस्तुत एवं प्रसारित करते ही रहते हैं.
मैं इस बात से पूर्णरूपेण सहमत हूँ कि वंश सिर्फ पुरुष का ही नहीं हो सकता, इस पर नारी का भी उतना ही अधिकार है. और जो सिर्फ वंश पर अधिकार पुरुष का मानते हैं मैं उनका विरोध करता हूँ. 
पर यहाँ सवाल कुछ और है.....

क्या है सवाल? 
जब कोई पुरुष किसी नारी को बहला फुसलाकर उसे गर्भवती बना देता है तो लोग स्त्री से प्रश्न करते हैं- "किसका पाप है?" (ये वाक्य आप भारतीय फिल्मों, मनोरंजक धारावाहिकों, नाटकों, लेखों में सुन और पढ़ सकते हैं.)

अब जरा समझें- "किसका पाप है?" का अर्थ ये हुआ कि पीड़ित स्त्री से पूछा जा रहा है कि- जो बच्चा गर्भ में पल रहा है उसका जिम्मेदार पुरुष कौन है? इस वाक्य से यह बात निकल कर आती है कि जब कोई पुरुष, नारी को बहला-फुसलाकर दुष्कर्म जैसा घटिया, नीच और घिनौना काम करता है तब उसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ पुरुष को माना जाता है, नारी को नहीं, क्यूंकि नारी को तो बहलाया और फुसलाया गया... (क़ानून भी ऐसी पीड़ित महिला का पक्ष रखता है. महिलाओं का संरक्षण होना भी चाहिए.) ऐसे में जिम्मेदारी पुरुष की हुई... अर्थात पीड़ित नारी के गर्भ में पल रहे बच्चे का जिम्मेदार पुरुष हुआ.

तर्क- 
जब कोई पुरुष दुष्कर्म जैसा घटिया, नीच कर्म कर नारी को बहला फुसलाकर उसे गर्भवती बना देता है तो उस कृत्य से गर्भ में आये बच्चे का पूरा जिम्मेदार वो पुरुष होता है, तो शादी के बाद पति द्वारा पत्नी के गर्भ में आये बच्चे का पूरा जिम्मेदार पति अर्थात पुरुष क्यों न हो? क्यों न वंश पुरुष का माना जाए?
या फिर, अगर शादी के बाद जन्मे बच्चे पर महिला का बराबर अधिकार हो और वंश पुरुष का होने के साथ महिला का भी वंश माना जाए तो पुरुष द्वारा स्त्री के साथ किये कृत्य में महिला को भी बराबर का दोषी क्यों न माना जाए? शादी से पहले अवेध सम्बन्ध बनाने के बाद गर्भ में आये बच्चे का जिम्मेवार पुरुष के साथ स्त्री को भी क्यों न माना जाए? तब समाज का पीड़ित स्त्री से सवाल, "किसका है ये पाप?" न होकर "किसके साथ किया ये पाप?" क्यों न हो? परन्तु ऐसा नहीं होता.
अगर पुरुष बहला फुसला कर स्त्री को गर्भवती करे तो गर्भ का जिम्मेदार पुरुष और जब शादी के बाद यही कार्य पुरुष करे तो लोग स्त्री के अधिकार और सम्मान की बात कर गर्भ के बच्चे को महिला का भी वंश माने जाने की वकालत करते हैं. ऐसे में हमें समाज के दो अलग अलग चेहरे देखने को मिलते हैं. 

इसमें भी एक सवाल
अगर मान लीजिये शादी के बिना कोई स्त्री सोचसमझ कर और जानकार-बूझकर पुरुष के साथ मिलकर गर्भवती होती है, तब भी क्या गर्भ का जिम्मेदार सिर्फ पुरुष को माना जायेगा? क्या तब भी कहा जाएगा के वंश सिर्फ पुरुष का है या यहाँ भी स्त्री के वंश होने की वकालत की जाएगी. आखिर बात ये समझ नहीं आ रही कि स्त्री को बहलाने-फुसलाने पर पुरुष द्वारा किये किसी कृत्य के कारण ही सारी विचारधारा क्यों बदल जाती है? 

शादी से पहले किये किसी कृत्य पर समाज की विचारधारा कुछ और, और फिर शादी के बाद किये उसी कृत्य पर समाज की विचार धारा कुछ और?
खैर...

2. दूसरा सवाल- क्या पुरुष और स्त्री बराबर हैं?

इस प्रश्न का मैंने हर जगह यही उत्तर पाया कि हाँ, स्त्री और पुरुष मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, व्यावहारिक (शारीरिक शक्ति छोड़ कर) हर पहलु में बराबर है. इसमें कोई संदेह नहीं. कानून भी इसका समर्थन करता है. यही कारण है कि किसी सरकारी पद पर जो आय पुरुष को दी जाती है उतने बराबर की आय महिला को भी दी जाती है. महिलाओं और पुरुषों का किसी एक पद पर एक जैसा ही पे-ग्रेड और तनख्वा का प्रावधान है. इस व्यवहार की सराहना करनी चाहिए. ये विचारधारा सिद्ध करती है कि पुरुष और महिला एक बराबर हैं.

तर्क- 
कमाल की बात है कि स्त्री-पुरुष मानसिक और दिमागी तौर पर दोनों एक सामान हैं तो फिर एक उम्र + एक बौद्धिक स्तर के पुरुष (मान लीजिये बी.ए. III का छात्र) द्वारा उसी उम्र की + उसी बौद्धिक स्तर की स्त्री (मान लीजिये बी.ए. III का छात्रा) को बहला-फुसला कैसे लेता है? अर्थात किसी उम्र+ एक बौद्धिक स्तर का पुरुष जब उसी उम्र + उसी बौद्धिक स्तर की स्त्री को बहलाने और फुसलाने की कोशिश करता है तो वो स्त्री कैसे बहल और फुसल जाती है?? तब स्त्री की बौद्धिक स्थिति और मानसिक स्तरता कैसे कम हो जाती है? अगर विज्ञान और कानून को माने तो स्त्री और पुरुष सामान हैं, सीधी सी बात है कि पुरुष के बहलाने-फुसलाने पर स्त्री को बहलना-फुसलना नहीं चाहिए क्योंकि दोनों एक सामान दिमागी स्तर के हैं.
यह एक सोचनीय प्रश्न है, जिसपर आत्मचिंतन करने की जरूरत है.

मैं अपनी बात कहूँ तो-
इसका उत्तर पहला ये हो सकता है कि- पुरुष द्वारा स्त्री को बहलाने-फुसलाने की सम्भावना तब ज्यादा हो सकती है जब पुरुष विकसित क्षेत्र का हो सकता है और स्त्री पिछड़े इलाके और अविकसित क्षेत्र की. हम जानते हैं कि क्षेत्र और समुदाय का निश्चित ही जीवन और विचार-व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है. यही कारण है कि छात्र अपने पिछड़े इलाको से बहार निकल कर शहर पढ़ने या नौकरी करने आते हैं. 

दूसरा उत्तर ये भी हो सकता है, कि भारत में हज़ारों वर्षों से स्त्री को दबाकर रखा गया. स्त्री को एक उपभोग की वस्तु समझा गया, धीरे-धीरे स्त्रियाँ अपने को स्वयं में कमजोर समझने लगी (और आज भी समझती हैं), इन हज़ारों वर्षों में निर्णय लेने की क्षमता कम हो गई... आज स्थिति ये है कि कोई भी निर्णय लेने के लिए पिता, भाई अथवा पति (जो सभी पुरुष हैं) पर आश्रित रहती हैं, ऐसे में उन्हें अगर कोई पुरुष बहलाने की कोशिश कर रहा होता है तो उन्हें लगता है कि शायद उक्त पुरुष सही ही बोल रहा होगा. ऐसे में महिला स्वयं का विवेक का उपयोग न कर दूसरों की बात पर विश्वाश कर लेती  और पुरुष के बहलाने-फुसलाने पर बहल और फुसल जाती हैं. 
जो स्थिति महिलाओं की हज़ारों वर्षों से है, बिलकुल वैसी ही स्थिति दलितों की भी रही. इन्हें भी दबाया-कुचला गया. धीरे धीरे ये वर्ग भी उस जख्म से उबर रहे हैं, जो ऊँची जातियों ने इन्हें दिए हैं. आरक्षण इसमें एक सहायक के तौर पर सामने आया. आरक्षण ने न केवल दलितों को आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित माहौल दिया अपितु महिलाओं को भी आरक्षण देकर उन्हें शान से जीने का हक दिया. उनका स्वाभिमान जगाया है. 

निष्कर्ष 
अजीबो गरीब प्रश्नों और उनके तर्कों का विश्लेषण करने पर हम छोटे मोटे निष्कर्ष पर तो पहुँच गये, फिर भी इसका असर जब तक समाज में देखने को न मिले तब तक इन निष्कर्षों का कोई मूल्य नहीं.
1. निष्कर्ष यह निकल कर आता है कि अगर पिछड़े क्षेत्र की महिलाओं को जो कि आगे बढ़ना चाहती हैं परन्तु संसाधनों के अभाव में नहीं बढ़ पा रही हैं, अगर उन्हें उसी पिछड़े क्षेत्र में आगे बढ़ने अथवा पढने और सुरक्षित माहौल प्रदान किया जाए तो वे जागरूक होंगी और तब किसी पुरुष की हिम्मत न होगी जो स्त्री को बहला अथवा फुसला सके.

2. दूसरा निष्कर्ष यह निकल कर आता है कि जिस प्रकार से, मान लीजिये बस में कोई भरा सिलेन्डर ले जाए और बस में फट जाए तो इसमें दोष सिर्फ उस व्यक्ति का नहीं जिसने सिलेंडर बस में रखा बल्कि परिचालक का भी है जिसने उसे बस में रखने दिया, ठीक उसी प्रकार से जब कोई पुरुष, किसी स्त्री को बहलाने की कोशिश करता है, तो दोष सिर्फ उस पुरुष का ही नहीं, बल्कि दोष उस कानून पालकों का भी है जिनकी नाक के नीचे ये सब निडर होकर किया जा रहा है, उस व्यवस्था का भी है जिसने पुरुष को मौका दिया ऐसा कृत्य करने का. इस का भी सुधार होना चाहिए. 

3. भ्रष्टाचार में सरकारी कर्मचारियों के लिप्त होने के कारण अपराधी सरेआम कुकृत्य करते रहते हैं, और बेख़ौफ़ घुमते हैं, क्यूंकि वो जानते हैं कि सरकारी कर्मचारियों के पास इतना टाइम ही नहीं कि वे अपराधियों को पकड़ सकें. सारा समय अच्छी जगह स्थानान्तरण कराने में और बाकी समय स्थानान्तरण में किये "खर्चे" को पूरा करने और "कमाने" में लगा देते हैं.

अंत में इतना ही कहना चाहता हूँ, मैंने यहाँ कोई बहस का मुद्दा नहीं दिया. मैंने अपने प्रश्नों के उत्तर तलाशने की कोशिश की. जीवन में हर राह में प्रश्न होते हैं. उन्ही के हल मनुष्य आजीवन करता है, और जिसके हल मिलते जाते हैं, उनको मनुष्य संचार के माध्यम से प्रेषित करता रहता है. यही संसार है, यही संचार है.

शुक्रवार, मई 29, 2015

हाँ

किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ न मिला है और न ही मिल सकता है.
हमें सिर्फ ये प्रयास करते रहना चाहिए कि हम समझ में अच्छे से अच्छा कर सकें. बाकि सब भगवान् पर छोड़ देना चाहिए.
कहते हैं, जिसके कर्म सही हैं उसका सब कुछ सही है. और जिसके कर्म ख़राब हैं, वो कितना ही अच्छा दिखावा कर ले. पर उसका प्रतिफल उसे उसके कर्मों के अनुसार ही मिलता है. 

शुक्रवार, जुलाई 11, 2014

धन्य हो बेसिक शिक्षा परिषद् और डाएट

उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रशिक्षु शिक्षक चयन 2011 में हाल ही में वेबसाइट पर अपलोड की गये विवरण में जबरदस्त गलतियां कर दी गईं. जो हाजारों में आंखें खोल कर गलतियाँ कर रहे हों उनसे प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाने की क्या आशा की जा सकती है. 

प्रशिक्षु शिक्षक चयन 2011 के लिए भरे गये फॉर्म को विभाग ने वेबसाइट पर अपलोड किया. एटा में 90 प्रतिशत अभ्यर्थियों की जन्मतिथि गलत अपलोड के दी गई. ये हाल सिर्फ एटा का ही नहीं कासगंज का भी है यहाँ भी हज़ारों अभ्यर्थियों की जन्मतिथि एक जैसी है. कनौज को तो गलतियाँ करने का अवार्ड दिया जाना चाहिए क्यूंकि कन्नौज में सभी अभ्यर्थियों की जन्मतिथि की जगह " #### " बना हुआ है.... इससे लगता है कि जैसे ये अभ्यर्थी अभी तक पैदा ही नहीं हुए.

कमाल ये नहीं कि गलतियाँ कर दी गईं, बल्कि कमाल ये है की आंखे खोल कर भी सही जानकारी नहीं अपलोड कर सके.

धन्य हो बेसिक शिक्षा परिषद् और डाएट, आपसे आशा है की देर-सबेर आप इन गलतियों को ठीक कर देंगे.

11 july 2014 amar ujala


excel file of Etah
excel file of Kannauj
excel file of Kasganj
















































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क्या चाहती है बेसिक शिक्षा परिषद्

प्रशिक्षु शिक्षक चयन 2011 में गलतियों का अम्बार तो लगा ही है साथ ही अभ्यर्थियों को लगातार परेशान किये जाने का क्रम भी जारी है. परिषद् द्वारा मेरिट जारी करने के बाद गलतियों के सुधार के लिए प्रत्यावेदन मांगे थे. अब स्थिति ये है की इस प्रत्यावेदन को 3 बार संशोधित किया जा चुका है. 

सर्वप्रथम प्रत्यावेदन के प्रारूप में (4 जुलाई से लेकर शाम 8 जुलाई तक) 10वें क्रम पर सिर्फ मोबाइल नम्बर प्रदर्शित हो रहा था, 8 जुलाई को प्रत्यावेदन का नया प्रारूप तैयार कर दिया गया जिससे छात्र हकबका गये क्योंकि इन चार दिनों में पुराने प्रत्यावेदन प्रारूप पर ही छात्र संसोधन के लिए विवरण विभिन्न जिलों के डाएट में भेज चुके थे. प्रत्यावेदन के नये प्रारूप में 10वें क्रम के विवरण में, जिसमें मोबाइल नम्बर की जानकारी दी गयी थी, यूपी टेट परीक्षा 2011 का रोल नम्बर भी मांग लिया. ये रोल नम्बर किसी भी जिले में किसी भी छात्र के अपलोड नहीं किये गये. इस तरह अभ्यर्थी संशय में पड़ गये कि जो विवरण वे भेज चुके हैं वे स्वीकार भी होंगे या नहीं. कई अभ्यर्थियों के सेकड़ों रूपए स्पीड पोस्ट में खर्च हो चुके हैं, ऐसे में प्रत्यावेदन का नया प्रारूप और अभ्यर्थियों को और परेशान करने का शबब बन गया.

अभ्यर्थियों को नींबू की तरह निचोड़ने का काम अभी थमा भी नहीं था कि बेसिक शिक्षा परिषद् ने मात्र दो दिनों के भीतर प्रत्यावेदन का तीसरी बार प्रारूप बदल दिया. 10 जुलाई की सुबह तीसरी बार बदले गये प्रत्यावेदन के प्रारूप में 10वें क्रम को दो भागों में विभाजित कर दिया गया. पहले भाग में मोबाइल नम्बर दिया गया, जो सही होने पर दिखा रहा था और गलत होने पर गलत और कहीं-कहीं तो मोबाइल नम्बर उपलोड ही नहीं किये गये, इसके अलावा दूसरे भाग में, यूपी टेट परीक्षा 2011 का रोल नम्बर के लिए जगह खाली छोड़ दी गयी. यह जानकारी विभाग द्वारा अपलोड नहीं की गयी थी बल्कि भेजने वाले अभ्यर्थियों से मांगी गयी थी.

क्या अजीब है, दिसम्बर 2011 में फॉर्म भरते समय अभ्यर्थियों ने वेबसाइट पर अपलोड यूपी टेट परीक्षा 2011 के परिणाम की अंक तालिका की इन्टरनेट कॉपी लगाकर सम्बंधित जिले में भेजी थी. इस तरह हर जिले में टेट परीक्षा 2011 के अंक और रोल नम्बर की जानकारी मौजूद है, परन्तु स्वयं काम न करने की प्रतियोगिता में किसी भी जिले में टेट के अंक अपलोड ही नहीं किये. अब दोबार यही जानकारी मांग कर अभ्यर्थियों को नचाने में विभाग कोई कसर नहीं छोड़ रहा.


प्रत्यावेदन का प्रथम प्रारूप 
प्रत्यावेदन का द्वितीय प्रारूप 

प्रत्यावेदन का तृतीय प्रारूप 























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