सीखने के लिए मैंने हर जख्म सींचे हैं, पढ़ना है दर्द मेरा तो सब लिंक नीचे हैं

गुरुवार, जुलाई 16, 2015

विचारों का द्वंद्व: दो चहरों वाला समाज

आज एक ऐसे विषय पर लिखने को विवश हुआ हूँ, जिसने कई बार मेरे मन में विभिन्न तर्कों को जन्म दिया है. तर्कों ने मुझे समाज के दो चेहरे देखने का मौका दिया. असल में हम कई बार एक ही विचार पर किसी समय कुछ होते हैं और किसी और समय पहले से हटकर अर्थात कुछ और. हमारा मन, हमारे समक्ष, हमारे लाभ और व्यक्तिगत उचित-अनुचित के अनुसार विचार प्रस्तुत करता है. मान लीजिये बरसात में छाता की जरूरत है और वह आम दिनों के मुकाबले किसी दूकान पर मंहगा बिकने लगा तो मन में विचार उठेगा कि भाई कितना मंहगा बेचा जा रहा है, इसे तो सस्ता होना चाहिए और जब बरसात का मौसम न हो और उसी दूकान में बहुत सारे छाते बिक रहे हों तो मन में विचार आएगा, "भई इन छातों का क्या काम?" ऐसे में हम इस बात से सहमत हो सकते हैं कि एक विषय पर एक ही व्यक्ति की समय-समय पर विचारधारा अलग-अलग हो सकती है.
खैर, मैं यहाँ कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूँढना चाहता हूँ.

1. पहला सवाल - वंश किसका कहलाता है- पुरुष का या महिला का ?
वर्तमान में महिला सशक्तिकरण के लिए हर जगह प्रयास किये जा रहे हैं. जागरूकता लाने के लिए आये दिन विभिन्न घटनाओं और विषयों पर बहस होती रहती है. ऐसा होना भी चाहिए. मैं इसका समर्थन करता हूँ.
महिला को पुरुष के बराबर माना जाता है, मानसिक तौर पर भी और कानूनन भी. मैं इसे भलीभाति समझता और सहर्ष स्वीकारता हूँ. 
आज कल एक बहस जोरों पर है कि शादी के बाद जब बच्चों का जन्म होता है तो वंश पुरुष का क्यों माना जाए, महिला का क्यों नहीं? समाज में चली आ रही परम्परा के अनुसार वंश को पुरुष आगे बढ़ाता है, अर्थात स्त्री पुरुष के वंश को आगे बढ़ाती है. घूमफिर कर वंश पुरुष का होता है. स्त्री का कोई वंश नहीं होता. इस पर भी जबरदस्त बहस चलती है, मीडिया, सेमिनार, कॉलेज, सामाजिक जनमाध्यमों (social media) जैसे फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स एप आदि पर आये दिन लोग इस सम्बन्ध में जागरूकता लाने सम्बन्धी विचार प्रस्तुत एवं प्रसारित करते ही रहते हैं.
मैं इस बात से पूर्णरूपेण सहमत हूँ कि वंश सिर्फ पुरुष का ही नहीं हो सकता, इस पर नारी का भी उतना ही अधिकार है. और जो सिर्फ वंश पर अधिकार पुरुष का मानते हैं मैं उनका विरोध करता हूँ. 
पर यहाँ सवाल कुछ और है.....

क्या है सवाल? 
जब कोई पुरुष किसी नारी को बहला फुसलाकर उसे गर्भवती बना देता है तो लोग स्त्री से प्रश्न करते हैं- "किसका पाप है?" (ये वाक्य आप भारतीय फिल्मों, मनोरंजक धारावाहिकों, नाटकों, लेखों में सुन और पढ़ सकते हैं.)

अब जरा समझें- "किसका पाप है?" का अर्थ ये हुआ कि पीड़ित स्त्री से पूछा जा रहा है कि- जो बच्चा गर्भ में पल रहा है उसका जिम्मेदार पुरुष कौन है? इस वाक्य से यह बात निकल कर आती है कि जब कोई पुरुष, नारी को बहला-फुसलाकर दुष्कर्म जैसा घटिया, नीच और घिनौना काम करता है तब उसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ पुरुष को माना जाता है, नारी को नहीं, क्यूंकि नारी को तो बहलाया और फुसलाया गया... (क़ानून भी ऐसी पीड़ित महिला का पक्ष रखता है. महिलाओं का संरक्षण होना भी चाहिए.) ऐसे में जिम्मेदारी पुरुष की हुई... अर्थात पीड़ित नारी के गर्भ में पल रहे बच्चे का जिम्मेदार पुरुष हुआ.

तर्क- 
जब कोई पुरुष दुष्कर्म जैसा घटिया, नीच कर्म कर नारी को बहला फुसलाकर उसे गर्भवती बना देता है तो उस कृत्य से गर्भ में आये बच्चे का पूरा जिम्मेदार वो पुरुष होता है, तो शादी के बाद पति द्वारा पत्नी के गर्भ में आये बच्चे का पूरा जिम्मेदार पति अर्थात पुरुष क्यों न हो? क्यों न वंश पुरुष का माना जाए?
या फिर, अगर शादी के बाद जन्मे बच्चे पर महिला का बराबर अधिकार हो और वंश पुरुष का होने के साथ महिला का भी वंश माना जाए तो पुरुष द्वारा स्त्री के साथ किये कृत्य में महिला को भी बराबर का दोषी क्यों न माना जाए? शादी से पहले अवेध सम्बन्ध बनाने के बाद गर्भ में आये बच्चे का जिम्मेवार पुरुष के साथ स्त्री को भी क्यों न माना जाए? तब समाज का पीड़ित स्त्री से सवाल, "किसका है ये पाप?" न होकर "किसके साथ किया ये पाप?" क्यों न हो? परन्तु ऐसा नहीं होता.
अगर पुरुष बहला फुसला कर स्त्री को गर्भवती करे तो गर्भ का जिम्मेदार पुरुष और जब शादी के बाद यही कार्य पुरुष करे तो लोग स्त्री के अधिकार और सम्मान की बात कर गर्भ के बच्चे को महिला का भी वंश माने जाने की वकालत करते हैं. ऐसे में हमें समाज के दो अलग अलग चेहरे देखने को मिलते हैं. 

इसमें भी एक सवाल
अगर मान लीजिये शादी के बिना कोई स्त्री सोचसमझ कर और जानकार-बूझकर पुरुष के साथ मिलकर गर्भवती होती है, तब भी क्या गर्भ का जिम्मेदार सिर्फ पुरुष को माना जायेगा? क्या तब भी कहा जाएगा के वंश सिर्फ पुरुष का है या यहाँ भी स्त्री के वंश होने की वकालत की जाएगी. आखिर बात ये समझ नहीं आ रही कि स्त्री को बहलाने-फुसलाने पर पुरुष द्वारा किये किसी कृत्य के कारण ही सारी विचारधारा क्यों बदल जाती है? 

शादी से पहले किये किसी कृत्य पर समाज की विचारधारा कुछ और, और फिर शादी के बाद किये उसी कृत्य पर समाज की विचार धारा कुछ और?
खैर...

2. दूसरा सवाल- क्या पुरुष और स्त्री बराबर हैं?

इस प्रश्न का मैंने हर जगह यही उत्तर पाया कि हाँ, स्त्री और पुरुष मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, व्यावहारिक (शारीरिक शक्ति छोड़ कर) हर पहलु में बराबर है. इसमें कोई संदेह नहीं. कानून भी इसका समर्थन करता है. यही कारण है कि किसी सरकारी पद पर जो आय पुरुष को दी जाती है उतने बराबर की आय महिला को भी दी जाती है. महिलाओं और पुरुषों का किसी एक पद पर एक जैसा ही पे-ग्रेड और तनख्वा का प्रावधान है. इस व्यवहार की सराहना करनी चाहिए. ये विचारधारा सिद्ध करती है कि पुरुष और महिला एक बराबर हैं.

तर्क- 
कमाल की बात है कि स्त्री-पुरुष मानसिक और दिमागी तौर पर दोनों एक सामान हैं तो फिर एक उम्र + एक बौद्धिक स्तर के पुरुष (मान लीजिये बी.ए. III का छात्र) द्वारा उसी उम्र की + उसी बौद्धिक स्तर की स्त्री (मान लीजिये बी.ए. III का छात्रा) को बहला-फुसला कैसे लेता है? अर्थात किसी उम्र+ एक बौद्धिक स्तर का पुरुष जब उसी उम्र + उसी बौद्धिक स्तर की स्त्री को बहलाने और फुसलाने की कोशिश करता है तो वो स्त्री कैसे बहल और फुसल जाती है?? तब स्त्री की बौद्धिक स्थिति और मानसिक स्तरता कैसे कम हो जाती है? अगर विज्ञान और कानून को माने तो स्त्री और पुरुष सामान हैं, सीधी सी बात है कि पुरुष के बहलाने-फुसलाने पर स्त्री को बहलना-फुसलना नहीं चाहिए क्योंकि दोनों एक सामान दिमागी स्तर के हैं.
यह एक सोचनीय प्रश्न है, जिसपर आत्मचिंतन करने की जरूरत है.

मैं अपनी बात कहूँ तो-
इसका उत्तर पहला ये हो सकता है कि- पुरुष द्वारा स्त्री को बहलाने-फुसलाने की सम्भावना तब ज्यादा हो सकती है जब पुरुष विकसित क्षेत्र का हो सकता है और स्त्री पिछड़े इलाके और अविकसित क्षेत्र की. हम जानते हैं कि क्षेत्र और समुदाय का निश्चित ही जीवन और विचार-व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है. यही कारण है कि छात्र अपने पिछड़े इलाको से बहार निकल कर शहर पढ़ने या नौकरी करने आते हैं. 

दूसरा उत्तर ये भी हो सकता है, कि भारत में हज़ारों वर्षों से स्त्री को दबाकर रखा गया. स्त्री को एक उपभोग की वस्तु समझा गया, धीरे-धीरे स्त्रियाँ अपने को स्वयं में कमजोर समझने लगी (और आज भी समझती हैं), इन हज़ारों वर्षों में निर्णय लेने की क्षमता कम हो गई... आज स्थिति ये है कि कोई भी निर्णय लेने के लिए पिता, भाई अथवा पति (जो सभी पुरुष हैं) पर आश्रित रहती हैं, ऐसे में उन्हें अगर कोई पुरुष बहलाने की कोशिश कर रहा होता है तो उन्हें लगता है कि शायद उक्त पुरुष सही ही बोल रहा होगा. ऐसे में महिला स्वयं का विवेक का उपयोग न कर दूसरों की बात पर विश्वाश कर लेती  और पुरुष के बहलाने-फुसलाने पर बहल और फुसल जाती हैं. 
जो स्थिति महिलाओं की हज़ारों वर्षों से है, बिलकुल वैसी ही स्थिति दलितों की भी रही. इन्हें भी दबाया-कुचला गया. धीरे धीरे ये वर्ग भी उस जख्म से उबर रहे हैं, जो ऊँची जातियों ने इन्हें दिए हैं. आरक्षण इसमें एक सहायक के तौर पर सामने आया. आरक्षण ने न केवल दलितों को आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित माहौल दिया अपितु महिलाओं को भी आरक्षण देकर उन्हें शान से जीने का हक दिया. उनका स्वाभिमान जगाया है. 

निष्कर्ष 
अजीबो गरीब प्रश्नों और उनके तर्कों का विश्लेषण करने पर हम छोटे मोटे निष्कर्ष पर तो पहुँच गये, फिर भी इसका असर जब तक समाज में देखने को न मिले तब तक इन निष्कर्षों का कोई मूल्य नहीं.
1. निष्कर्ष यह निकल कर आता है कि अगर पिछड़े क्षेत्र की महिलाओं को जो कि आगे बढ़ना चाहती हैं परन्तु संसाधनों के अभाव में नहीं बढ़ पा रही हैं, अगर उन्हें उसी पिछड़े क्षेत्र में आगे बढ़ने अथवा पढने और सुरक्षित माहौल प्रदान किया जाए तो वे जागरूक होंगी और तब किसी पुरुष की हिम्मत न होगी जो स्त्री को बहला अथवा फुसला सके.

2. दूसरा निष्कर्ष यह निकल कर आता है कि जिस प्रकार से, मान लीजिये बस में कोई भरा सिलेन्डर ले जाए और बस में फट जाए तो इसमें दोष सिर्फ उस व्यक्ति का नहीं जिसने सिलेंडर बस में रखा बल्कि परिचालक का भी है जिसने उसे बस में रखने दिया, ठीक उसी प्रकार से जब कोई पुरुष, किसी स्त्री को बहलाने की कोशिश करता है, तो दोष सिर्फ उस पुरुष का ही नहीं, बल्कि दोष उस कानून पालकों का भी है जिनकी नाक के नीचे ये सब निडर होकर किया जा रहा है, उस व्यवस्था का भी है जिसने पुरुष को मौका दिया ऐसा कृत्य करने का. इस का भी सुधार होना चाहिए. 

3. भ्रष्टाचार में सरकारी कर्मचारियों के लिप्त होने के कारण अपराधी सरेआम कुकृत्य करते रहते हैं, और बेख़ौफ़ घुमते हैं, क्यूंकि वो जानते हैं कि सरकारी कर्मचारियों के पास इतना टाइम ही नहीं कि वे अपराधियों को पकड़ सकें. सारा समय अच्छी जगह स्थानान्तरण कराने में और बाकी समय स्थानान्तरण में किये "खर्चे" को पूरा करने और "कमाने" में लगा देते हैं.

अंत में इतना ही कहना चाहता हूँ, मैंने यहाँ कोई बहस का मुद्दा नहीं दिया. मैंने अपने प्रश्नों के उत्तर तलाशने की कोशिश की. जीवन में हर राह में प्रश्न होते हैं. उन्ही के हल मनुष्य आजीवन करता है, और जिसके हल मिलते जाते हैं, उनको मनुष्य संचार के माध्यम से प्रेषित करता रहता है. यही संसार है, यही संचार है.

शुक्रवार, मई 29, 2015

हाँ

किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ न मिला है और न ही मिल सकता है.
हमें सिर्फ ये प्रयास करते रहना चाहिए कि हम समझ में अच्छे से अच्छा कर सकें. बाकि सब भगवान् पर छोड़ देना चाहिए.
कहते हैं, जिसके कर्म सही हैं उसका सब कुछ सही है. और जिसके कर्म ख़राब हैं, वो कितना ही अच्छा दिखावा कर ले. पर उसका प्रतिफल उसे उसके कर्मों के अनुसार ही मिलता है. 

शुक्रवार, जुलाई 11, 2014

धन्य हो बेसिक शिक्षा परिषद् और डाएट

उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रशिक्षु शिक्षक चयन 2011 में हाल ही में वेबसाइट पर अपलोड की गये विवरण में जबरदस्त गलतियां कर दी गईं. जो हाजारों में आंखें खोल कर गलतियाँ कर रहे हों उनसे प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाने की क्या आशा की जा सकती है. 

प्रशिक्षु शिक्षक चयन 2011 के लिए भरे गये फॉर्म को विभाग ने वेबसाइट पर अपलोड किया. एटा में 90 प्रतिशत अभ्यर्थियों की जन्मतिथि गलत अपलोड के दी गई. ये हाल सिर्फ एटा का ही नहीं कासगंज का भी है यहाँ भी हज़ारों अभ्यर्थियों की जन्मतिथि एक जैसी है. कनौज को तो गलतियाँ करने का अवार्ड दिया जाना चाहिए क्यूंकि कन्नौज में सभी अभ्यर्थियों की जन्मतिथि की जगह " #### " बना हुआ है.... इससे लगता है कि जैसे ये अभ्यर्थी अभी तक पैदा ही नहीं हुए.

कमाल ये नहीं कि गलतियाँ कर दी गईं, बल्कि कमाल ये है की आंखे खोल कर भी सही जानकारी नहीं अपलोड कर सके.

धन्य हो बेसिक शिक्षा परिषद् और डाएट, आपसे आशा है की देर-सबेर आप इन गलतियों को ठीक कर देंगे.

11 july 2014 amar ujala


excel file of Etah
excel file of Kannauj
excel file of Kasganj
















































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क्या चाहती है बेसिक शिक्षा परिषद्

प्रशिक्षु शिक्षक चयन 2011 में गलतियों का अम्बार तो लगा ही है साथ ही अभ्यर्थियों को लगातार परेशान किये जाने का क्रम भी जारी है. परिषद् द्वारा मेरिट जारी करने के बाद गलतियों के सुधार के लिए प्रत्यावेदन मांगे थे. अब स्थिति ये है की इस प्रत्यावेदन को 3 बार संशोधित किया जा चुका है. 

सर्वप्रथम प्रत्यावेदन के प्रारूप में (4 जुलाई से लेकर शाम 8 जुलाई तक) 10वें क्रम पर सिर्फ मोबाइल नम्बर प्रदर्शित हो रहा था, 8 जुलाई को प्रत्यावेदन का नया प्रारूप तैयार कर दिया गया जिससे छात्र हकबका गये क्योंकि इन चार दिनों में पुराने प्रत्यावेदन प्रारूप पर ही छात्र संसोधन के लिए विवरण विभिन्न जिलों के डाएट में भेज चुके थे. प्रत्यावेदन के नये प्रारूप में 10वें क्रम के विवरण में, जिसमें मोबाइल नम्बर की जानकारी दी गयी थी, यूपी टेट परीक्षा 2011 का रोल नम्बर भी मांग लिया. ये रोल नम्बर किसी भी जिले में किसी भी छात्र के अपलोड नहीं किये गये. इस तरह अभ्यर्थी संशय में पड़ गये कि जो विवरण वे भेज चुके हैं वे स्वीकार भी होंगे या नहीं. कई अभ्यर्थियों के सेकड़ों रूपए स्पीड पोस्ट में खर्च हो चुके हैं, ऐसे में प्रत्यावेदन का नया प्रारूप और अभ्यर्थियों को और परेशान करने का शबब बन गया.

अभ्यर्थियों को नींबू की तरह निचोड़ने का काम अभी थमा भी नहीं था कि बेसिक शिक्षा परिषद् ने मात्र दो दिनों के भीतर प्रत्यावेदन का तीसरी बार प्रारूप बदल दिया. 10 जुलाई की सुबह तीसरी बार बदले गये प्रत्यावेदन के प्रारूप में 10वें क्रम को दो भागों में विभाजित कर दिया गया. पहले भाग में मोबाइल नम्बर दिया गया, जो सही होने पर दिखा रहा था और गलत होने पर गलत और कहीं-कहीं तो मोबाइल नम्बर उपलोड ही नहीं किये गये, इसके अलावा दूसरे भाग में, यूपी टेट परीक्षा 2011 का रोल नम्बर के लिए जगह खाली छोड़ दी गयी. यह जानकारी विभाग द्वारा अपलोड नहीं की गयी थी बल्कि भेजने वाले अभ्यर्थियों से मांगी गयी थी.

क्या अजीब है, दिसम्बर 2011 में फॉर्म भरते समय अभ्यर्थियों ने वेबसाइट पर अपलोड यूपी टेट परीक्षा 2011 के परिणाम की अंक तालिका की इन्टरनेट कॉपी लगाकर सम्बंधित जिले में भेजी थी. इस तरह हर जिले में टेट परीक्षा 2011 के अंक और रोल नम्बर की जानकारी मौजूद है, परन्तु स्वयं काम न करने की प्रतियोगिता में किसी भी जिले में टेट के अंक अपलोड ही नहीं किये. अब दोबार यही जानकारी मांग कर अभ्यर्थियों को नचाने में विभाग कोई कसर नहीं छोड़ रहा.


प्रत्यावेदन का प्रथम प्रारूप 
प्रत्यावेदन का द्वितीय प्रारूप 

प्रत्यावेदन का तृतीय प्रारूप 























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मंगलवार, जुलाई 08, 2014

डाटा ऑपरेटरों को बर्खास्त किया जाए.

प्रशिक्षु शिक्षक चयन 2011- 72825 भर्त्ती में 4 जुलाई 2014 को मेरिट लिस्ट जारी की जिसमें 1 लाख से ज्यादा छात्रों के विवरण गलत अपलोड कर दिए गये. 

लगभग हर जिले में हज़ारों में फॉर्म आये हैं कहीं कहीं तो लाखों में फॉर्म पहुचे हैं. इन फॉर्म की कंप्यूटर पर एंट्री ऑपरेटरों ने गलत भर दी.

जब जानकारी वेबसाइट पर अपलोड हुयी तो हज़ारों अभ्यर्थी अपने फॉर्म का विवरण देख हेरान हो गये. किसी की जन्मतिथि गलत तो किसी के पिता का नाम गलत, किसी के यूपी टेट परीक्षा के अंक गलत. और तो और हज़ारों अभ्यर्थियों के तो नाम ही नहीं मिल रहे जिससे यह लगता है कि उनका तो नाम ही गलत फीड किया होगा जिससे उनका नाम ही नहीं दिखा रहा.

सरकारी नौकरी से बर्खास्त किया जाए 
ऐसे डाटा एंट्री करने वाले ऑपरेटरों को निष्कासित यानी नौकरी से बर्खास्त करना बेहद जरूरी है, क्योंकि इन्हीं की वजह से छात्रों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसी भारी गलतियाँ करने वाले ऑपरेटरों ने लाखों की रिश्वत दी होगी और सरकारी नौकरी पा ली होगी, तभी तो ये इतनी बड़ी बड़ी गलतियाँ कर रहे हैं. 

अधिकारी क्यों चुप?
अधिकारी इन ऑपरेटरों द्वारा भारी गलतियाँ करने पर कोई कार्यवाही भी नहीं कर रहे हैं जिससे यह साफ़ होता है कि अधिकारियों ने रिश्वत लेकर इन्हें सरकारी नौकरी पर रख लिया है और अब इनसे काम तो हो नहीं रहा तो कुछ कह भी नहीं सकते क्योंकि रिश्वत तो ले ली है तो डाटने का तो हक रहा नहीं.

गलती ऑपरेटरों की और भुगत रहे अभ्यर्थी
आप इस निकृष्ट व्यवस्था का उदाहरण देखिये कि जिन्होंने गलतियां की उन्हें कुछ कहा नहीं जा रहा और जो दो साल से नौकरी के लिए अपने चप्पल घिस रहे हैं उन्हें गलतियों के सुधार के लिए कहा जा रहा है....
मतलब ये कि जिन्होंने गलती की वो मौज कर रहे हैं और जिन्होंने गलती नहीं की वे बेचारे जिला दर जिला भटक रहे हैं.

विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों से पता चलता है कि जब किसी व्यक्ति को उसका समाज नाजायज तरीकों से परेसान करता है और सताता है जबकि उसने कुछ न किया हो. निर्दोषों को बेवजह सजा दे दी जाती है तो ऐसे में कुछ समाज से तंग आ कर समाज के खिलाफ हिंसक और असामाजिक कदा उठाने को मजबूर हो जाते हैं. 
यूपी टेट भर्ती 2011 में ये देखने में आया है कि बेवजह की देर की जा रही है. जब प्रशिक्षु शिक्षक चयन 2011- 72825 भर्त्ती के 2012 में दोबारा फॉर्म निकाले गये तो चालान के लिए बैंकों में हजारों में जमावड़ा लग गया, कई लोगों को धक्का मुक्की में चोटें आयीं तो कुछ ने तो व्यथित होकर आत्महत्या कर ली. अब अभ्यर्थियों के सब्र का बाँध टूट रहा है.

अब वक़्त आ गया है इन अयोग्य ऑपरेटरों के खिलाफ आवाज़ उठाने का. अयोग्य हटेंगे तभी योग्य ओपरेटर आयेंगे. एक योग्य ऑपरेटर 1 गलती करेगा, 2 करेगा, 100 करेगा पर हज़ारों में नहीं करेगा.

हम उत्तर प्रदेश सरकार से अपील करते हैं कि जिन ऑपरेटरों ने प्रशिक्षु शिक्षक चयन 2011- 72825 भर्त्ती में उपलोड अभ्यर्थियों के विवरण में भारी गलतियाँ की हैं उन्हें नौकरी से बर्खास्त किया जाए.

क्या आप सहमत हैं?


 
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रविवार, जुलाई 06, 2014

अक्ल बनाम यूपी टेट भर्ती

4 जुलाई को यूपी टेट बेसिक सहायक अध्यापक शिक्षा भर्ती 72825 की मेरिट जारी कर दी गई और साथ ही सरकार और अधिकारियों ने अपनी अक्ल का परिचय भी दे दिया.

05-07-2014 AMAR UJALA LKO
05-07-2014 AMAR UJALA LKO
 हुआ ये की जब मेरिट जारी की तो साथ ही अभ्यर्थियों की सामान्य जानकारी जैसे नाम, पता, जन्मतिथि, यूपी टेट 2011 नम्बर भी अपलोड किये. इन जानकारियों में भारी गलतियों कर दी गयीं. और कह दिया कि जिन अभ्यर्थियों की सूची जारी की है उनके सामान्य जानकारी गलत उपलोड हुयी है वे 5-8 जुलाई तक जहाँ फॉर्म भरा है उस जिले के डाईट में स्वयं जाकर प्रतिवेदन देकर ठीक करा सकते हैं.

क्या अजीब बात है. सोचिये, जिसने 20-30 जहग फॉर्म भरा है वह मात्र 3-4 दिनों में सभी जिलों में कैसे जा सकता है. इतना ही नहीं, जिस वेबसाइट पर जानकारी उपलोड की वो दो दिन तक इतनी बिजी रही की कई हजार लोग तो खोल ही नहीं पाए. उन्हें यही पता नहीं चल पाया दो दिनों में कि किस किस जिले में उनकी सामान्य जानकारी में गलती है.

क्या अधिकारी इस छोटी सी बात को समझ नहीं पाए कि अभ्यर्थियों ने कम से कम 5  और अधिक से अधिक 65 जिलों में फॉर्म डाला हैं. ऐसे में वे कैसे प्रत्येक जिले के डाईट में पहुच कर ठीक करा पायेंगे.


मान लीजिये किसी अभ्यर्थी के फॉर्म की जानकारी सहारनपुर] सोनभद्र और कुशीनगर में गलत है. तो वह 4 दिन में कैसे उत्तर प्रदेश की अतिम छोर पर बसे इन जिलों में जा पायेगा.

हालाँकि अभ्यर्थियों ने जबरदस्त विरोध और सरकार और अधिकारियों की अक्ल के चर्चे होने के बाद गलतियों को सुधारने की तिथि भी बढ़ा दी गई और सम्बंधित जिले में जाने के बजाये स्पीड पोस्ट का विकल्प भी दे दिया.

ऎसी अकाल का परिचय सिर्फ उत्तर प्रदेश में देखने को मिलता है.

आप भी आमंत्रित हैं ये सब देखने के लिए. आइये हमारे उत्तर प्रदेश.

शनिवार, जून 28, 2014

टाटा डोकोमो और त्याग

(फैंटेसी कहानी)
ओह मेरे प्रिय टाटा डोकोमो, मुझे माफ़ करना. आज वक़्त आ गया है कि तुमसे अपने दिल की बात कह दूं.
ऐसा नहीं कि तुमने मेरी सेवा नहीं की या अब करना बंद कर दी. मैं ये भी नहीं भूल सकता कि जब मैं घर से बाहर था तब सिर्फ तुम ही थे जो मुझे मेरी मम्मी और पापा से जोड़े रखता था. मैं ये भी नहीं भूलूंगा कि जब मेरा सिलेक्शन का कॉल आया तब तुम्हारे जरिये ही ये खुशखबरी सुनी. मैं जब स्नातकोतर उपाधि में प्रथम श्रेणी में पास हुआ तो तुम्हारे जरिये ही मुझे ये खबरें मिलीं. प्रतियोगिता परीक्षा पास करने की सूचना भी तुमने ही मेरे कानो में पहुचाई, तब तो फ़ोन भी मटक मटक कर नाच रहा था. वो तमाम खुशियों के पल तुम्हारे जरिये ही सुनने को मिले जिन्हें में कभी भूल नहीं सकता. प्रिय टाटा डोकोमो वो तुम ही तो थे जिसने मुझे हर पल "उसकी" खूबसूरत आवाज से जोड़े रखा. उसके पास भी तुम थे और मेरे पास भी. तुमने ही तो मुझे एक स्पेशल रिचार्ज से पूरे महीने "उससे" मुफ्त दिन-रात बातें करने का मौका दिया. उफ़! कैसे भूल सकता हूँ उन दिनों को.

मैं तो तुमसे ये शिकायत भी नहीं कर सकता कि तुम्हारी वजह से ही मेरा दिल चोरी हो गया और तुम्हारी ही वजह से मेरे दिल पर "उसने" हुकूमत कर ली और मैं कुछ न कर सका. पर जो मेरे साथ नींद, चैन, प्यार, दिल की लूट हुयी उसका भी जीवन में एक आनंद था. उस लूट ने ही तो कंगाल होने पर मुझे मेहनत करने के लिए प्रेरित किया. आज उसी लूट का ही तो नतीजा है जिस जगह में पंहुचा हूँ. पर इसका पूरा श्रेय मैं उस लूट को नहीं दे सकता, इसका कुछ श्रेय तुम्हें भी जाता है.

पर, टाटा डोकोमो तुम बहुत निर्दयी भी हो. मैं उस दर्द को कैसे भूल जाऊं जब तुम तेजी से सुबह सुबह ही चीखने लगे, इतना तो तय था खबर मनहूस ही होगी तभी तो फ़ोन भी पहले से ही कांपने लगा था. मैं सुनने को मजबूर था, जैसे ही तुम्हे अपने दिल से हटाकर कान पर लगाया तो सच मानो टाटा डोकोमो दुःख का पहाड़ टूट पड़ा. काश उस दिन तुम छुट्टी पर चले जाते. या "उसे" कह देते कि मैं अभी पहुँच से बाहर हूँ तो शायद वो मनहूस खबर तो नहीं सुनता. पर तुम्हें भी क्या दोष दूं, तुम तो अपना काम नि:स्वार्थ भाव से कर रहे थे. 

जानते हो टाटा डोकोमो उस दिन हुआ क्या? "उस" बेचारी को भी क्या दोष हूँ मैं, वो तो समाज के ठेकेदारों से हारी है. समाज से बाहर शादी करने को मना कर दिया तो उसने वही मुझसे कह दिया. बस! लेकिन यहाँ सब कुछ ख़तम नहीं हो जाता. काश! मैं इंसान न होकर तुम्हारी तरह ही एक माध्यम होता. जैसे तुम आईडिया, एयरटेल, बीएसएनएल अन्य माधयमों से चाहने भर से तुरंत और बिना इजाजत जुड़ जाते हो, काश समाज भी बिना इजाजत और मुक्त स्वभाव से किसी से भी जुड़ सकता तो दुनिया बेहद खूबसूरत होती. 

खैर, गड़े मुर्दे क्या उखाड़ना. जब जब तुम मेरे दिल के करीब होते हो तो सिर्फ तुम ही दिल के करीब नहीं होते. पुरानी यादें भी करीब होती हैं. इसलिए मैंने एक कठोर और असहनीय निर्णय लिया है. जैसे राम ने लक्ष्मण के साथ रहकर सीता जी की देखभाल की, वैसे ही तुमने मेरे साथ रहकर हमेशा उसकी खैर-खबर बनाए रखी. लेकिन, एक वक़्त राम ने ही न चाहते हुए भी लक्ष्मण को मजबूरी और वचन में बंधने के कारण त्याग दिया था. वैसे ही आज मैं भी तुम्हें त्यागने के लिए मजबूर हूँ. ताकि पुरानी यादें ताजा न हों. 

मुझे माफ़ कर देना टाटा डोकोमो. और हो सके तो मुझे संवेदनहीन मालिक न कहना.


तुम्हारा-  समाज से लड़ता "संघर्ष"


सोमवार, जून 23, 2014

जिम्मेदारी को तो समझाना ही होगा


कदम कदम "हगाये" जा, खुशी के गीत गाये जा,

ये गन्दगी है देश की, तू देश में फैलाये जा.








कितनी अजीब बात है, जब कोई हमारी बहन को घूर कर देखता है तो हमारा खून खोल जाता है, पर शौचालय के लिए जब वो बहन जाती है और तब उसे कोई शौच करते देखे तो कोई दिक्कत नहीं होती.
दोस्तों बड़ा दुःख होता है जब सरकार द्वारा शौचालय बनाने के लिए खाते में रुपया पहुँचाया जाता है और लोग उस पैसे को चाट कर जाते हैं... और फिर रोना रोते हैं की हम गरीब कहाँ से पैसे जुटाएं.
और फिर क्या होता है, हर सुबह की तरह बैठे मिलते हैं या तो नदी नालों के अगल बगल में या पटरी पर.

ये गलत आदत है. आप सिर्फ अपना ही नुक्सान नहीं कर रहे, बल्कि गन्दी फैलाकर पर्यावरण को भी दूषित कर रहे हैं.

आप रोज रोज एक ही जगह मलत्याग करने जाओगे और वह सफाई नहीं होगी तो मल सड़ते सड़ते जहर बन जायेगा और पर्यावरण में कणों के रूप में खुलकर आपके गाँव-मुहल्लों को ही बीमार करेगा.
मैं विज्ञान का छात्र तो नहीं हूँ, पर आर्ट साइड में भी इतना तो सीखा ही है की क्या गंदगी है और क्या सफाई.


मैं इस बात को नहीं नकारता कि नेता पैसा खा जाते हैं, लेकिन जितना भी मिलता है उतना तो शौचालय की दीवार बनाई जा सकती है, एक गड्ढा तो बनाया ही जा सकता है.


ये भी सच नहीं है की लोग जागरूक नहीं हैं, अगर जागरूक नहीं होते तो शौचालय का पैसा पाने के लिए इतनी भाग दौड़, खाता खुलवाना आदि नहीं कर पाते. ये काफी जागरूक हैं. बस काम करने को राजी नहीं हैं. वोट देकर पूरी जिम्मेदारी सरकार पर सौप देना चाहते हैं.

कृपया शौचालय बनवाइए और बीमारियों को कम कीजिये, क्योंकि अमीर तो अपने घर में दरवाजा, खिड़की बंद कर लेगा, A.C में बैठेगा. उसके बीमार होने के चांस बहुत कम होते हैं. बीमारी के 99 % संभावनाएं निर्धन और गरीब, मजदूर लोगों की ही होती है. और आप लोग ही अपने आस पास गंदगी फैलाते हो.
एक कहावत है- अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना. ये लोग वही कर रहे हैं. इन्हें पता नहीं, की अपने सड़ते मल मूत्र से एक दिन वही बीमार पद जायेंगे, और जब बीमारी हवा की तरह फैलने लगेगी तो दोष सरकार पर डाल देंगे, कि सर्कार प्रशासन ने कुछ नहीं किया.
अरे पहले जो आपने "किया" है उस पर तो चर्चा करो, फिर जो सरकार ने नहीं किया उस पर चर्चा करना.

मुझे समझने की कोशिश कीजियेगा, मैं आप पर आरोप नहीं, आपकी कमी बता रहा हूँ ताकि उसका जल्द सुधार हो और आप स्वयं की बीमारी से पार पा सकें :-)

आपका छोटा भाई.